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“देश की उड़ान नीचे, नारे ऊपर — नया इंडिया हवा में नहीं, हवा-हवाई में!”देश में हालात कुछ ऐसे हैं कि अगर कोई विदेश से लौटत...
11/12/2025

“देश की उड़ान नीचे, नारे ऊपर — नया इंडिया हवा में नहीं, हवा-हवाई में!”

देश में हालात कुछ ऐसे हैं कि अगर कोई विदेश से लौटते वक्त एयरपोर्ट पर उतर जाए, तो उसे लगेगा कि वो किसी विकसित राष्ट्र में नहीं, बल्कि किसी रियलिटी शो में आ गया है—जहां हर गेट पर नई ड्रामा सीरीज़ चल रही है।

टिकट के दाम 10% बढ़ गए, उड़ानें बिना बताए रद्द, और यात्री ऐसे लाइन में खड़े जैसे मुफ्त राशन मिल रहा हो। एयरपोर्ट पर लोगों की आवाज़ें गूंज रही हैं, शिकायतें आसमान छू रही हैं… मगर सरकार?
सरकार तो अभी भी “वंदे मातरम्” मोड 5.0 पर अपडेट होकर बैठी है।

लगता है देश को चलाने का नया फार्मूला बन गया है—
“समस्या बड़ी हो तो राष्ट्रगीत बजा दो, सब भूल जाएंगे।”

एयरपोर्ट पर कोहराम, टीवी पर जयघोष

जहां जनता पूछ रही है —
“उड़ान क्यों रद्द हुई?”
वहीं गोदी मीडिया पूछ रहा है —
“आज आपने कितनी बार वंदेमातरम बोला?”

किसी चैनल पर बहस है कि देशभक्ति किसकी ज़्यादा पवित्र है,
तो किसी पर ये चर्चा कि चुनाव कौन जीतेगा।
पर एक भी डिबेट ये नहीं कि
“लोगों को अपने ही देश में यात्रा करना इतना मुश्किल क्यों हो गया?”

आर्थिक मुद्दे? वो क्या होते हैं भाई!

टिकट महंगे, यात्रा मुश्किल, आम आदमी परेशान —
मगर सरकार के कैलेंडर में एक ही चीज़ फ़िक्स है:
राष्ट्रभक्ति का शो और इवेंट मैनेजमेंट।

देश की अर्थव्यवस्था नीचे जाए
या विमान बीच आसमान में—
दोनों का इलाज एक ही बताया जाता है:
“जय हिंद बोलो, सब ठीक हो जाएगा।”

बर्बादी दिख रही है, पर देखना मना है

जब हालात खराब होते हैं, तो सरकार कहती है —
“नेगेटिव मत सोचो। विपक्ष बोलकर माहौल खराब करता है।”
जब जनता बोलती है —
“हम परेशान हैं।”
सरकार कहती है —
“बर्बादी कहां है? हम तो 5 ट्रिलियन की तरफ बढ़ रहे हैं!”
शायद 10% महंगाई का असर सिर्फ टिकटों पर नहीं,
सरकार की सुनने की क्षमता पर भी पड़ा है।

नया इंडिया: जहां परेशानी जनता की होती है, और बात राष्ट्रवाद की

आज के भारत में:

उड़ान रद्द हो जाए —
“वंदे मातरम् गाओ, मन शांत करो।”

टिकट महंगा हो जाए —
“देश की इमेज का सवाल है, शिकायत मत करो।”

जनता परेशान हो —
“आप देशविरोधी सवाल क्यों पूछते हैं?”

देश जल रहा हो तो बुझाने का काम नहीं,
फोटो खिंचवाने का काम चलता है।

---

निष्कर्ष? देश नहीं, जनता समझदार हो रही है

लोग अब समझ रहे हैं कि
नारा कभी पेट नहीं भरता,
और राष्ट्रगीत कभी उड़ान नहीं भरवा सकता।

जब तक असल मुद्दों को गीतों और नारों की भीड़ में दबाया जाता रहेगा,
तब तक एयरपोर्ट हो या देश—
दोनों रनवे पर खड़े रह जाएंगे, उड़ नहीं पाएंगे।

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