Dhanwantri Ayurvedic Kender

Dhanwantri Ayurvedic Kender Complete Ayurvedic medical solutions

रागों से अनेक बीमारियों का इलाजसंगीत चिकित्सा मेटाबॉलिज्म को तेज करती है, उससे मांसपेशियों की ऊर्जा बढ़ाती है। भारत ही न...
31/08/2023

रागों से अनेक बीमारियों का इलाज
संगीत चिकित्सा मेटाबॉलिज्म को तेज करती है, उससे मांसपेशियों की ऊर्जा बढ़ाती है। भारत ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों में भी संगीत की उपचार क्षमता पर कई अध्ययन अनुसंधान हो रहे हैं। संगीत द्वारा बहुतसी बीमारियों का उपचार सभंव, चिकित्सा विज्ञान मानता हैं कि प्रतिदिन २० मिनट अपनी पसंद का संगीत सुनने से बहुत रोगों से बचा जा सकता है। रोग का संबंध किसी ना किसी ग्रह विशेष से होता हैं,उसी प्रकार संगीत के सुरो व रागो का संबंध भी किसी ना किसी ग्रह से होता हैं। जातक को जिस ग्रह विशेष से संबन्धित रोग हो और उसे उस ग्रह से संबन्धित राग, सुर अथवा गीत सुनाये जायें तो जातक शीघ्र स्वस्थ होता हैं| जिन शास्त्रीय रागों का उल्लेख किया है उन रागों मे कोई भी गीत, भजन या वाद्य यंत्र बजाया या सुना जा सकता हैं। (सुर व राग से संबन्धित फिल्मी गीत उदाहरण के लिए)

ध्रुव वैद्य
1. हृदय रोग (cardiac care)
राग दरबारी व राग सारंग से संबन्धित संगीत सुनना लाभदायक है। इनसे संबन्धित गीत हैं :-
तोरा मन दर्पण कहलाए (काजल),
राधिके तूने बंसरी चुराई (बेटी बेटे ),
झनक झनक तोरी बाजे पायलिया ( मेरे हुज़ूर ),
बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम (साजन),
जादूगर सइयां छोड़ मोरी (फाल्गुन),
ओ दुनिया के रखवाले (बैजू बावरा ),
मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोये (मुगले आजम )

2. अनिद्रा (insomania)
राग भैरवी व राग सोहनी सुनना लाभकारी होता है, जिनके प्रमुख गीत हैं :-
रात भर उनकी याद आती रही (गमन),
नाचे मन मोरा (कोहिनूर),
मीठे बोल बोले बोले पायलिया (सितारा),
तू गंगा की मौज मैं यमुना (बैजु बावरा),
ऋतु बसंत आई पवन (झनक झनक पायल बाजे),
सावरे सावरे (अनुराधा),
चिंगारी कोई भड़के (अमर प्रेम),
छम छम बजे रे पायलिया (घूँघट ),
झूमती चली हवा (संगीत सम्राट तानसेन ),
कुहू कुहू बोले कोयलिया (सुवर्ण सुंदरी )

3. एसिडिटी (acidity)
होने पर राग खमाज सुनने से लाभ मिलता है | इस राग के प्रमुख गीत हैं :-
ओ रब्बा कोई तो बताए प्यार (संगीत),
आयो कहाँ से घनश्याम (बुड्ढा मिल गया),
छूकर मेरे मन को (याराना),
कैसे बीते दिन कैसे बीती रतिया (अनुराधा),
तकदीर का फसाना गाकर किसे सुनाये ( सेहरा ),
रहते थे कभी जिनके दिल मे (ममता ),
हमने तुमसे प्यार किया हैं इतना (दूल्हा दुल्हन ),
तुम कमसिन हो नादां हो (आई मिलन की बेला)

4. दुर्बलता (weakness)
यह शारीरिक शक्तिहीनता से संबन्धित है| व्यक्ति कुछ कर पाने मे स्वयं को असमर्थ अनुभव करता है। इस में राग जयजयवंती सुनना या गाना लाभदायक है। इस राग के प्रमुख गीत हैं :-
मनमोहना बड़े झूठे (सीमा),
बैरन नींद ना आए (चाचा ज़िंदाबाद),
मोहब्बत की राहों मे चलना संभलके (उड़न खटोला ),
साज हो तुम आवाज़ हूँ मैं (चन्द्रगुप्त ),
ज़िंदगी आज मेरे नाम से शर्माती हैं (दिल दिया दर्द लिया ),
तुम्हें जो भी देख लेगा किसी का ना (बीस साल बाद )

5. स्मरण (memory loss)
जिनका स्मरण क्षीण हो रहा हो, उन्हे राग शिवरंजनी सुनने से लाभ मिलता है | इस राग के प्रमुख गीत है -
ना किसी की आँख का नूर हूँ (लालकिला),
मेरे नैना (मेहेबूबा),
दिल के झरोखे मे तुझको (ब्रह्मचारी),
ओ मेरे सनम ओ मेरे सनम (संगम ),
जीता था जिसके (दिलवाले),
जाने कहाँ गए वो दिन (मेरा नाम जोकर )

6. रक्त की कमी (animia)
होने पर व्यक्ति का मुख निस्तेज व सूखा सा रहता है। स्वभाव में भी चिड़चिड़ापन होता है। ऐसे में राग पीलू से संबन्धित गीत सुनें :-
आज सोचा तो आँसू भर आए (हँसते जख्म), * नदिया किनारे (अभिमान),
खाली हाथ शाम आई है (इजाजत),
तेरे बिन सूने नयन हमारे (लता रफी),
मैंने रंग ली आज चुनरिया (दुल्हन एक रात की),
मोरे सैयाजी उतरेंगे पार (उड़न खटोला),

7. मनोरोग अथवा अवसाद (psycho or depression)
राग बिहाग व राग मधुवंती सुनना लाभदायक है। इन रागों के प्रमुख गीत है :-
तुझे देने को मेरे पास कुछ नही (कुदरत नई), * तेरे प्यार मे दिलदार (मेरे महबूब),
पिया बावरी (खूबसूरत पुरानी),
दिल जो ना कह सका (भीगी रात),
तुम तो प्यार हो (सेहरा),
मेरे सुर और तेरे गीत (गूंज उठी शहनाई ),
मतवारी नार ठुमक ठुमक चली जाये मोहे (आम्रपाली),
सखी रे मेरा तन उलझे मन डोले (चित्रलेखा)

8. रक्तचाप (blood pressure)
ऊंचे रक्तचाप मे धीमी गति और निम्न रक्तचाप मे तीव्र गति का गीत संगीत लाभ देता है। शास्त्रीय रागों मे राग भूपाली को विलंबित व तीव्र गति से सुना या गाया जा सकता है। -----ऊंचे रक्तचाप मे (high BP)
चल उडजा रे पंछी कि अब ये देश (भाभी),
ज्योति कलश छलके (भाभी की चूड़ियाँ ),
चलो दिलदार चलो (पाकीजा ),
नीले गगन के तले (हमराज़)
निम्न रक्तचाप मे (low BP)
ओ नींद ना मुझको आए (पोस्ट बॉक्स न. 909),
बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना (जिस देश मे गंगा बहती हैं ),
जहां डाल डाल पर ( सिकंदरे आजम ),
पंख होते तो उड़ आती रे (सेहरा )

9. अस्थमा (asthma)
आस्था तथा भक्ति पर आधारित गीत संगीत सुनने व गाने से लाभ राग मालकँस व राग ललित से संबन्धित गीत सुने जा सकते हैं। जिनमें प्रमुख गीत :-
तू छुपी हैं कहाँ (नवरंग),
तू है मेरा प्रेम देवता (कल्पना),
एक शहँशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल (लीडर),
मन तड़पत हरी दर्शन को आज (बैजू बावरा ), आधा है चंद्रमा ( नवरंग )

10. शिरोवेदना (headache)
राग भैरव सुनना लाभदायक होता है। इस राग के प्रमुख गीत :-
मोहे भूल गए सावरियाँ (बैजू बावरा),
राम तेरी गंगा मैली (शीर्षक),
पूंछों ना कैसे मैंने रैन बिताई (तेरी सूरत मेरी आँखें),
सोलह बरस की बाली उमर को सलाम (एक दूजे के लिए).

श्वेत कुष्ठ अनभूत प्रयोग आवश्यक सामग्री :25 ग्राम देशी कीकर (बबूल) के सूखे पते25 ग्राम पान की सुपारी (बड़े आकार की)25 ग्र...
31/08/2023

श्वेत कुष्ठ
अनभूत प्रयोग

आवश्यक सामग्री :
25 ग्राम देशी कीकर (बबूल) के सूखे पते
25 ग्राम पान की सुपारी (बड़े आकार की)
25 ग्राम काबली हरड का छिलका

बनाने की विधि :
उपरोक्त तीन वस्तुएँ लेकर दवा बनाये। कही से देशी कीकर (काटे वाला पेड़ जिसमे पीले फुल लगते है ) के ताजे पत्ते (डंठल रहित ) लाकर छाया में सुखाले कुछ घंटो में पत्ते सुख जायेगे बबूल के इन सूखे पत्तो को काम में ले पान वाली सुपारी बढिया ले इसका पावडर बना ले कबाली हरड को भी जौ कुट कर ले और इन सभी चीजो को यानि बबूल , सुपारी , काबली हरड का छिलका (बड़ी हरड) सभी को 25-25 ग्राम की अनुपात में ले कुल योग 75 ग्राम और 500 मिली पानी में उबाले पानी जब 125 मिली बचे तब उतर कर ठंडा होने दे और छान कर पी ले ये दवा एक दिन छोड़ कर दुसरे दिन पीनी है अर्थात मान लीजिये आज आप ने दवा ली तो कल नहीं लेनी है और इस काढ़े में 2 चमच खांड या मिश्री मिला ले (10 ग्राम) और ये निहार मुह सुबह –सुबह पी ले और 2 घंटे तक कुछ भी खाना नहीं है दवा के प्रभाव से शरीर शुद्धि हो और उलटी या दस्त आने लगे परन्तु दवा बन्द नहीं करे 14 दीन में सिर्फ 7 दिन लेनी है और फीर दवा बन्द कर दे कुछ महीने में घिरे –घिरे त्वचा काली होने लगेगी हकीम साहब का दावा है की ये साल भर में सिर्फ एक बार ही लेने से रोग निर्मूल (ख़त्म) हो जाता है अगर कुछ रह जाये तो दुसरे साल ये प्रयोग एक बार और कर ले नहीं तो दुबारा इसकी जरूरत नहीं पडती।

पूरक उपचार
एक निम्बू, एक अनार और एक सेब तीनो का अलग – अलग ताजा रस निकालने के बाद अच्छी तरह परस्पर मिलाकर रोजाना सुबह शाम या दिन में किसी भी समय एक बार नियम पूर्वक ले। यह फलो का ताजा रस कम से कम दवा सेवन के प्रयोग आगे 2-3 महीने तक जारी रख सके तो अधिक लाभदायक रहेगा।

औषधियों की प्रयोग विधि :
दवा के सेवन काल के 14 दिनों में मक्खन घी दूध अधिक लेना हितकर है क्योकि दवा खुश्क है।
चौदह दिन दवा लेने के बाद कोई बिशेस परहेज पालन की जरुरत नहीं है श्वेत कुष्ठ के दुसरे इलाजो में कठीन परहेज पालन होती है परन्तु इस ईलाज में नातो सफेद चीजो का परहेज है और ना खटाई आदि का फीर भी आप मछली मांस अंडा नशीले पदार्थ शराब तम्बाकू आदि और अधिक मिर्च मसले तेल खटाई आदि का परहेज पालन कर सके तो अच्छा रहेगा।
दवा सेवन के 14 दिनों में कभी –कभी उलटी या दस्त आदि हो सकता है इससे घबराना नहीं चाहिए बल्कि उसे शारीरिक शुध्धी के द्वारा आरोग्य प्राप्त होनेका संकेत समझना चाहिए।
रोग दूर होने के संकेत हकीम साहब के अनुसार दवा के सेवन के लगभग 3 महीने बाद सफेद दागो के बीच तील की तरह काले भूरे या गुलाबी धब्धे ( तील की तरह धब्बे ) के रूप में चमड़ी में रंग परिवर्तन दिखाई देगा और साल भर में धीरे –धीरे सफेद दाग या निसान नष्ट हो कर त्वचा पहले जयसी अपने स्वभाविक रंग में आ जाएगी फीर भी यदि कुछ कसर रह जाये तो एक साल बीत जाने के बाद दवा की सात खुराके इसी तरह दुबारा ले सकते है।
दिवान हकीम साहब का दावा है की उतर्युक्त ईलाज से उनके 146 श्वेत कुष्ठ के रोगियों में से 142 रोगी पूर्णत : ठीक अथवा लाभान्वित हुये है कुछ सम्पूर्ण शरीर में सफेद रोगी भी ठीक हुये है निर्लोभी परोपकारी दीवान हकीम परमानन्द जी की अनुमति से बिस्तार से यह अनमोल योग मानव सेवा भावना के साथ जनजन तक पहुचा रहा हु इस आशा और उदात भावना के साथ की पाठक निश्वार्थ भावना से तथा बिना किसी लोभ के जनजन तक जरुर पहुचाये।
स्रोत : स्वदेशी चिकित्सा के चमत्कार लेख दीवान हकीम परमानन्द नई दिल्ली द्वारा अनभूत प्रयोग। अपने नजदीकी कुशल वैद्य या चिकित्सक की सलाह अवश्य ले तथा उनकी देख रेख में कोई कदम उठाएं

घुटनों के दर्दघुटनों में दर्द के कारणघुटनों में होने वाले दर्द आमतौर पर दो प्रकार के होते हैं,क्रॉनिक (दीर्घकालिक) दर्द ...
31/08/2023

घुटनों के दर्द
घुटनों में दर्द के कारण
घुटनों में होने वाले दर्द आमतौर पर दो प्रकार के होते हैं,
क्रॉनिक (दीर्घकालिक) दर्द से अस्थायी दर्द (थोड़े समय का दर्द) अलग होता है
1. गठिया (rheumatoid arthritis) – यह एक दीर्घकालिक सूजन संबंधी ऑटो इम्यून डिसऑर्डर होता है, जो दर्दनाक सूजन का कारण बन सकता है और अंत में हड्डियों में विकृति और क्षय (घिसना, अपरदन) का कारण बन सकता है,

2. डिस्लोकेशन (dislocation) – हड्डियों के जोड़ उखड़ने या जगह से हिल जाने को डिस्लोकेशन कहा जाता है, घुटने की उपरी हड्डी (टॉपी) का डिस्लोकेशन अक्सर ट्रामा के कारण ही होता है,

3. मेनिस्कस टियर (meniscus tear) – घुटने के कार्टिलेज में एक या उससे ज्यादा टूट-फूट होना,
4. लिगामेंट का टूटना (torn ligament) – लिगामेंट एक रेशेदार और लचीला ऊतक होता है, जो दो हड्डियों को आपस में जोड़ने में मदद करता है. घुटने में स्थित चार लिगामेंट में से एक का भी टूटना घुटने के दर्द का कारण बन सकता है, क्षतिग्रस्त लिगामेंट में ज्यादातर एंटेरियर क्रूसिएट लिगामेंट (ACL) के मामले पाए जाते हैं,
5. ऑस्टियोआर्थराइटिस (osteoarthritis) – इसमें जोड़ों के बिगड़ने और उनकी बद्तर स्थिति होने के कारण दर्द, सूजन और अन्य समस्याएं होने लगती हैं,
6. टेंडिनाइटिस (tendinitis) – इसमें घुटने के अगले हिस्सें में दर्द होता है, जो सीढ़ियां चढ़नें और चलते समय और अधिक बद्तर हो जाता है,
7. बर्साइटिस (bursitis) – यह घुटने का बार-बार सामान्य से अधिक इस्तेमाल करना, या चोट आदि लगने से होता है,
8. गाउट (gout) – यह गठिया का एक रूप होता है, जो यूरिक एसिड बनने की वजह से होता है,
9. बेकर्स सिस्ट (Baker’s cyst) – इसमें घुटने के पीछे सिनोवियल द्रव (जोड़ों में चिकनाई लाने वाला द्रव) का निर्माण होने लगता है,
10. हड्डियों के ट्यूमर (bone tumors) – ऑस्टियोसार्कोमा कैंसर, दूसरा सबसे प्रचलित हड्डियों का कैंसर होता है, यह सबसे ज्यादा घुटनों में ही होता है,
रामबाण ओषधि योग के सेवन से मिलेगी घुटनों और जोड़ों के दर्द से राहत

सफेद मूसली 50 GMs
अश्वगंधा 30 GMs
शतावर जड. 20 GMs
ईलायची 10 GMs
गोखरु 30 GMs
प्रवाल पिष्टि 10 GMs
कुकुडन्तांक भस्म. 05 GMs
शंख भस्म. 10 GMs
मुक्ता शुकित भस्म. 05 GMs
कपदिँका भस्म. 10 GMs
सुवणँ माक्षिक भस्म 5 GMs
हाडँजोड 10 GMs
उपर बताई गई औषधि पंसारी से और सभी भसम बैधनाथ की ही लें सभी को मिक्स करके चूरन बनाकर सुबह शाम आधा -आधा चमच लेकर 150 ml दूध मे मिलाकर सुबह शाम ले.
10 दिनो के अंदर हि रविंद्र जी आपको धुंटनो मे बिलकुल आराम दिखने लगेगा. पर 3 महिने सेवन करना है

“अनिद्रा” नींद न आना भी कई बीमारियों की जड़ है, यदि नींद ठीक से आई तो दिनभर फुर्ती बनी रहती है, वर्ना सिर भारी रहना, उबास...
31/08/2023

“अनिद्रा”
नींद न आना भी कई बीमारियों की जड़ है, यदि नींद ठीक से आई तो दिनभर फुर्ती बनी रहती है, वर्ना सिर भारी रहना, उबासियाँ आना, जी न लगना व इसी तरह के कई परेशानी होती रहती हैं।
अनुभूत नुस्खा:-
अश्वगंधा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, बच,मुलहठी, आँवला,अर्जुन छाल ,जटामासी, असली खुरासानी अजवायन प्रत्येक का 50-50 ग्राम , मालकंगनी 25 ग्राम , स्वर्णमाक्षिक भस्म 15 ग्राम, अकीक पिष्टी ,मुक्ताशुक्ति पिष्टी 10-10 ग्राम सबको मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें। रात को सोने के पूर्व 3 से 5 ग्राम मात्रा ।दूध के साथ सेवन करें। एक सप्ताह बाद इसका प्रभाव देखें। अनिद्रा नष्ट होकर गहरी स्वाभाविक नींद आने लगती है, स्वप्न भी नहीं आते व उच्च रक्तचाप में भी आराम होता है। नींद की गोली की तरह बेहोशी नहीं आती, बल्कि प्रातः उठते ही ताजगी महसूस होती है।शरीर और मन हल्का महसूस हेता है । उच्च रक्तचाप रोगी भी यह ले सकते है । समर्थानुसार मोती पिष्टी , जवाहर मोहरा नं १ की गोली भी साथ में ले सकते है ।
नुस्खा नं २ :-
सर्पगंधा, अश्वगंधा और भाँग तीनों सममात्रा में मिलाकर रख लें। इस चूर्ण को रात को सोते समय 3 से 5 ग्राम मात्रा में जल के साथ लें, यह औषधि निरापद है। भाँग को पानी में उबालकर सुखाकर ही प्रयोग करें । तब तक उबालते, पानी बदलते रहे, जब तक पत्ते सफेद न हो जाएं ।
नुस्खा नं ३ :-

आप बाजार से बनी-बनाई दवा “सर्पगंधाघन वटी” २ गोली रात को दूध से लें सकते है । चाय और काफी का सेवन रात को न करें । “रोगन खसखस” रात को सोते समय नाक में ३-४ बूंद डालें । माथे पर भी हल्के हाथों से इस तैल की मालिश करें । पैरों के तलवों में सरसों रे तैल या देशी घी की मालिश करनी चाहिए। बहुत लाभकारी है । कई रोगियो पर आजमाया है

समस्त ज्वरों में अद्भुत प्रयोग ,10 साल पुराना बुखार भी टूटेगा।गिलोय बेल 100 ग्राम चिरायता 100 ग्रामसतावरी 100 ग्रामआंवला...
31/08/2023

समस्त ज्वरों में अद्भुत प्रयोग ,
10 साल पुराना बुखार भी टूटेगा।
गिलोय बेल 100 ग्राम
चिरायता 100 ग्राम
सतावरी 100 ग्राम
आंवला 50 ग्राम
तुलसी बीज 50 ग्राम
काली मिर्च 50 ग्राम
नीम गिरी 50 ग्राम
दालचीनी 15 ग्राम
लौंग 15 ग्राम
सोंठ 15 ग्राम
गोदन्ती भस्म 10 ग्राम
मीचका ( करंज बीज ) की गिरी 100 ग्राम ।
सभी को अलग अलग कुटपिस कर बारीक चूर्ण बनाकर कपड़छान कर ले।बाद में सारी सामग्री के चूर्ण को मिश्रित कर ले।कांच या किसी अच्छे मर्तबान में रख ले।समस्यानुसार ले।
मात्रा;-दिन में 3 बार बकरी या देसी गऊ के दूध से 5-5 ग्राम ले। खाने के 1घण्टे बाद ही ले।
इस दवा से दो खुराकों से ही आराम आना आरम्भ हो जायेगा।
यह नुख्सा डेंगू,मलेरिया,चिकनगुनिया,टायफाइड,शरीर में जकड़न रहना,कमजोर रहना,हर समय बुखार सा महसूस होते रहना, प्लेटलेट्स कम होने,सर्व ज्वर के लिए,खाँसी,जुकाम इत्यादि समस्याओं में काम करता है।यह हजारो से ज्यादा लोगों पर परीक्षित अनुभव है l

हमारे ऋषियों और आयुर्वेदाचार्यों ने युगों पूर्व निर्धारित समय पर सोने-जागने एवं आहार-विहार के जो नियम-उपनियम बनाये थे वि...
31/08/2023

हमारे ऋषियों और आयुर्वेदाचार्यों ने युगों पूर्व निर्धारित समय पर सोने-जागने एवं आहार-विहार के जो नियम-उपनियम बनाये थे विज्ञानियों ने अपनी लम्बी शोधों के दौरान शरीर के बॉडी क्लॉक (जैविक घड़ी) के काम करने के तरीके को समझने का प्रयास कर हमारे पुरातन ऋषि मत का समर्थन किया है।
अंगों की सक्रियता और जैविक घड़ी कुछ रोचक तथ्य
दिलचस्प होगा कि वैदिक आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत की संहिता में हमारी ‘जैविक घड़ी’ की सक्रियता से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी जो दुर्लभ जानकारियां मिलती हैं; उन्हीं की पुष्टि यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्र्जि के भारतीय मूल के युवा वैज्ञानिक अभिषेक रेड्डी ने बीते दिनों अपनी शोधों में की है। अभिषेक रेड्डी ने अपनी शोधों में पाया कि कि मनुष्य में ‘जैविक घड़ी’ का मूल स्थान उसका मस्तिष्क है। मस्तिष्क ही हमें जगाता और सुलाता है। आइए जानते हैं कि ‘जैविक घड़ी’ की कार्यप्रणाली से तमाम ज्ञानवर्धक जानकारियां-
1. सुबह 3 से 5 बजे के बीच फेफड़े सर्वाधिक क्रियाशील रहते हैं। जो इस काल में उठकर गुनगुना पानी पीकर थोड़ा खुली हवा में घूमते या प्राणायाम करते हैं तो उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है, क्योंकि इस दौरान उन्हें शुद्ध और ताजी वायु मिलती है। हिन्दू धर्म में इस इस अमृत बेला को ध्यान और प्रार्थना को सबसे उत्तम माना गया है।
2. सुबह 5 से 7 बजे के बीच बड़ी आंत क्रियाशील रहती है। अत: इस बीच मल त्यागने का समय होता है। जो व्यक्ति इस वक्त सोते रहते हैं और मल त्याग नहीं करते उनकी आंतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती है। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।
3. सुबह 7 से 9 बजे आमाशय की क्रियाशीलता और 9 से 11 तक अग्नाशय एवं प्लीहा क्रियाशील रहते हैं। इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। अत: करीब 9 से 11 बजे का समय सुबह के जलपान और नाश्ते के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है। इस समय अल्पकालिक स्मृति सर्वोच्च स्थिति में होती है तथा एकाग्रता व विचारशक्ति भी उत्तम होती है। इसीलिए इस समय शरीर की क्रियाशीलता सबसे अधिक होती है।
4. दोपहर 11 से 1 बजे के बीच के समय में ऊर्जा का प्रवाह ह्दय में प्रवाहित होता है इसीलिए दोपहर 12 बजे के आसपास सभी प्राथमिक, उचित और मांगलिक कार्य निपटा लेने चाहिए। भारतीय संस्कृति में इस समय दया, प्रेम आदि जैसी भावनाएं एवं संवेदनाओं को विकसित करने के लिए मध्याह्न-संध्या करने का विधान बनाया गया है।
5. दोपहर 1 से 3 के बजे के बीच छोटी आंत सक्रिय होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आंत की ओर ढकेलना होता है। इस समय पर्याप्त मात्रा में पानी पीने का सुझाव दिया गया है। ऐसा करने से त्याज्य पदार्थ को आगे बड़ी आंत में जाने में सहायता मिलती है। यदि इस समय आप भोजन करते या सोते हैं तो पोषक आहार रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होगा और इससे शरीर रोगी और दुर्बल बन जाएगा।
6. दोपहर 3 से 5 बजे के बीच मूत्राशय की सक्रियता का काल रहता है। मूत्र का संग्रहण करना मूत्राशय का कार्य है। 2-4 घंटे पहले पीया गया जल मूत्र में बदल जाता है इसलिए इस समय मूत्रत्याग की इच्छा होती है।
7. शाम 5 से 7 बजे के बीच सुबह लिए गए भोजन की पाचन क्रिया पूर्ण हो जाती है अत: इस काल में हल्का भोजन करना चाहिए। शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल में) भोजन न करें। जैन मतावलंबी इस नियम का अभी भी पालन करते हैं और जो हिन्दू जानकार हैं वे भी इसी नियम से चलते हैं।
8. सुबह भोजन के 2 घंटे पहले तथा शाम को भोजन के 3 घंटे बाद दूध पी सकते हैं।
9. रात्रि 7 से 9 बजे के बीच गुर्दे सक्रिय रहते हैं। इसके अलावा इस समय मस्तिष्क विशेष सक्रिय रहता है। अत: प्रात:काल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रहता है।
10. रात्रि 9 से 11 बजे के बीच रक्तवाहिकायों और धमनियों की सक्रियता रहती है और इस समय ऊर्जा का प्रवाह रीढ़ की हड्डी में रहता है। इस समय पीठ के बल या बाईं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक शांति देने वाली होती है। रात्रि 9 बजे पश्चात पाचन संस्थान के अवयव विश्रांति प्राप्त करते हैं अत: यदि इस समय भोजन किया जाए तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहकर सड़ जाता है। उसके सडऩे से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं, जो अम्ल (एसिड) के साथ आंतों में जाम रोग उत्पन्न करते हैं इसलिए इस समय भोजन करना हानिकारक होता है
11. रात्रि 11 से 1 बजे के बीच पित्ताशय, यकृत सक्रिय होता है। पित्त का संग्रहण पित्ताशय का मुख्य कार्य है। इस समय यदि आप जाग्रत रहते हैं तो पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है जिससे अनिद्रा, सिरदर्द आदि पित्त-विकार तथा नेत्ररोग उत्पन्न होते हैं। रात्रि को 12 बजने के बाद दिन में किए गए भोजन द्वारा शरीर की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के बदले में नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। इस समय जागते रहने से बुढ़ापा जल्दी आता है।
12. रात्रि 1 से 3 बजे के बीच यकृत अर्थात लिवर ज्यादा क्रियाशील होता है। अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यकृत का कार्य है। इस समय शरीर को गहरी नींद की जरूरत होती है। इसकी पूर्ति न होने पर पाचन तंत्र बिगड़ जाता है। जिस समय शरीर नींद के वश में होकर निष्क्रिय रहता है उस समय जागते रहते से दृष्टि मंद होकर भ्रमित रहती है इसीलिए ऐसे समय में ही अधिकतर सड़क दुर्घटनाएं होती हैं।
भारतीयों को गौरवान्वित होना चाहिए कि ‘जैविक घड़ी’ के बाइलोजिकल रिदम के लिए निर्धारित जीन व इसकी कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण शोध के लिए वर्ष 2017 का नोबल पुरस्कार भौतिकी के तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों- जेफ्री सी. हॉल, माइकल रोसबॉश और माइकल वी. यंग को दिया गया है। क्योंकि जैविक घड़ी के मुताबिक दिनचर्या का निर्धारण हमारे वैदिक ऋषि सदियों पहले ही कर चुके थे। उन्होंने तो घड़ी के आविष्कार के बहुत पहले ही सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों एवं नक्षत्रों की गतिविधियों द्वारा समय का हिसाब-किताब रखने का एक अनूठा विज्ञान भी विकसित कर लिया था। भारतीय ऋषियों ने मानव सभ्यता के विकास के आरम्भिक काल में ही प्रकृति की इस लय के महत्व को समझ प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करने वाली दिनचर्या और जीवनशैली विकसित कर ली थी। उन्होंने समय को भूत, भविष्य एवं वर्तमान, दिन-रात, प्रात:काल, मध्यकाल, संध्याकाल, क्षण, प्रहर आदि विभिन्न भागों में बांटकर 24 घंटे की समूची दिनचर्या को धार्मिक परंपराओं से जोड़कर सोने-जागने, खाने-पीने, काम-आराम, मनोरंजन आदि सभी क्रियाकलापों को निर्धारित समय पर करने की बात पर बल दिया था।
इस घड़ी को दुरुस्त रखने के लिए उन्होंने रात्रि के अंतिम प्रहर यानी ‘ब्रह्म मुहूर्त’ पर जागरण का विशेष महत्व बताया था। उनके अनुसार इस काल में शैया त्याग देने से उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। इस निर्धारण के पीछे उनकी जो वैज्ञानिक सोच निहित थी, उसकी पुष्टि आज के वैज्ञानिक नतीजों से भी हो चुकी है कि ब्रह्म मुहुर्त में वायुमंडल में ऑक्सीजन (प्राण वायु) की मात्रा सबसे अधिक 41 प्रतिशत होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है तथा शुद्ध वायु मिलने से मन, मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है। भारतीय आयुर्वेद आचार्यों का कहना है कि ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।

सहजन के औषधीय गुण दुनीया का सबसे ताकतवर पोषण पूरक आहार है सहजन (मुनगा) 300 से अधिक रोगो मे बहुत फायदेमंद इसकी जड़ से लेक...
31/08/2023

सहजन के औषधीय गुण

दुनीया का सबसे ताकतवर पोषण पूरक आहार है सहजन (मुनगा) 300 से अधिक रोगो मे बहुत फायदेमंद इसकी जड़ से लेकर फूल , पत्ती, फली, तना, गोन्द हर चीज़ उपयोगी होती है।
आयुर्वेद में सहजन से तीन सौ रोगों का उपचार संभव है।
सहजन के पौष्टिक गुणों की तुलना
विटामिन सी-संतरे से सात गुना
विटामिन ए- गाजर से चार गुना
कैलशियम- दूध से चार गुना
पोटेशियम- केले से तीन गुना
प्रोटीन- दही की तुलना में तीन गुना
स्वास्थ्य के हिसाब से इसकी फली, हरी और सूखी पत्तियों में कार्बोहाइड्रेट , प्रोटीन ,कैल्शियम , पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन-ए , सी और बी काम्प्लेक्स प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
इनका सेवन कर कई बीमारियों को बढ़ने से रोका जा सकता है। इसका बॉटेनिकल नाम मोरिगा ओलिफेरा है। हिंदी में इसे सहजन , सुजना , सेंजन और मुनगा नाम से भी जानते हैं.
जो लोग इसके बारे में जानते हैं। वे इसका सेवन जरूर करते हैं।
सहजन में दूध की तुलना में चार गुना कैल्शियम और दोगुना प्रोटीन पाया जाता है.
सहजन के औषधीय गुण
सहजन का फूल पेट और कफ रोगों में , इसकी फली वात व उदरशूल में , पत्ती नेत्ररोग , मोच , साइटिका , गठिया आदि में उपयोगी है।
- इसकी छाल का सेवन साइटिका , गठिया , लीवर में लाभकारी होता है। सहजन के छाल में शहद मिलाकर पीने से वात और कफ रोग खत्म हो जाते हैं।
- इसकी पत्ती का काढ़ा बनाकर पीने से गठिया , साइटिका , पक्षाघात , वायु विकार में शीघ्र लाभ पहुंचता है। साइटिका के तीव्र वेग में इसकी जड़ का काढ़ा तीव्र गति से चमत्कारी प्रभाव दिखता है।
- मोच इत्यादि आने पर सहजन की पत्ती की लुगदी बनाकर सरसों तेल डालकर आंच पर पकाएं और मोच के स्थान पर लगाने से जल्दी ही लाभ मिलने लगता है।
सहजन की सब्जी के फायदे
- सहजन की फली की सब्जी खाने से पुराने गठिया , जोड़ों के दर्द , वायु संचय , वात रोगों में लाभ होता है।
- इसके ताजे पत्तों का रस कान में डालने से दर्द ठीक हो जाता है साथ ही इसकी सब्जी खाने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी कटकर निकल जाती है।
- इसकी जड़ की छाल का काढ़ा सेंधा नमक और हींग डालकर पीने से पित्ताशय की पथरी में लाभ होता है।
- सहजन के पत्तों का रस बच्चों के पेट के कीड़े निकालता है और उल्टी-दस्त भी रोकता है।
- ब्लड प्रेशर और मोटापा कम करने में भी कारगर सहजन का रस सुबह-शाम पीने से हाई ब्लड प्रेशर में लाभ होता है।
- इसकी पत्तियों के रस के सेवन से मोटापा धीरे-धीरे कम होने लगता है।
- इसकी छाल के काढ़े से कुल्ला करने पर दांतों के कीड़े नष्ट होते है और दर्द में आराम मिलता है।
- इसके कोमल पत्तों का साग खाने से कब्ज दूर होता है। इसके अलावा इसकी जड़ के काढ़े को सेंधा नमक और हींग के साथ पीने से मिर्गी के दौरों में लाभ होता है।
- इसकी पत्तियों को पीसकर लगाने से घाव और सूजन ठीक होते हैं।
- पानी के शुद्धिकरण के रूप में कर सकते हैं प्रयोग। सहजन के बीज से पानी को काफी हद तक शुद्ध करके पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
- इसके बीज को चूर्ण के रूप में पीसकर पानी में मिलाया जाता है। पानी में घुल कर यह एक प्रभावी नेचुरल क्लेरीफिकेशन एजेंट बन जाता है यह न सिर्फ पानी को बैक्टीरिया रहित बनाता है , बल्कि यह पानी की सांद्रता को भी बढ़ाता है।
काढ़ा पीने से क्या-क्या हैं फायदे
- कैंसर और पेट आदि के दौरान शरीर के बनी गांठ , फोड़ा आदि में सहजन की जड़ का अजवाइन , हींग और सौंठ के साथ काढ़ा बनाकर पीने का प्रचलन है। यह भी पाया गया है कि यह काढ़ा साइटिका (पैरों में दर्द) , जोड़ों में दर्द , लकवा , दमा, सूजन , पथरी आदि में लाभकारी है |
- सहजन के गोंद को जोड़ों के दर्द और शहद को दमा आदि रोगों में लाभदायक माना जाता है। आज भी ग्रामीणों की ऐसी मान्यता है कि सहजन के प्रयोग से वायरस से होने वाले रोग , जैसे चेचक के होने का खतरा टल जाता है।
शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
- सहजन में हाई मात्रा में ओलिक एसिड होता है , जो कि एक प्रकार का मोनोसैच्युरेटेड फैट है और यह शरीर के लिए अति आवश्यक है। सहजन में विटामिन-सी की मात्रा बहुत होती है। यह शरीर के कई रोगों से लड़ता है।
सर्दी-जुखाम
- यदि सर्दी की वजह से नाक-कान बंद हो चुके हैं तो , आप सहजन को पानी में उबालकर उस पानी का भाप लें। इससे जकड़न कम होगी।
हड्डियां होती हैं मजबूत
- सहजन में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है , जिससे हड्डियां मजबूत बनती हैं। इसके अलावा इसमें आयरन, मैग्नीशियम और सीलियम होता है।
- इसका जूस गर्भवती को देने की सलाह दी जाती है , इससे डिलवरी में होने वाली समस्या से राहत मिलती है और डिलवरी के बाद भी मां को तकलीफ कम होती है। गर्भवती महिला को इसकी पत्तियों का रस देने से डिलीवरी में आसानी होती है।
- सहजन में विटामिन-ए होता है , जो कि पुराने समय से ही सौंदर्य के लिए प्रयोग किया आता जा रहा है
- इस हरी सब्जी को अक्सर खाने से बुढ़ापा दूर रहता है इससे आंखों की रोशनी भी अच्छी होती है।
- यदि आप चाहें तो सहजन को सूप के रूप में पी सकते हैं इससे शरीर का खून साफ होता है।

धर्म ग्रंथों और आयुर्वेद में भोजन से जुड़ी की चीजें बताई गई है। इसमें किस दिन कौन सी चीज खानी चाहिए और किसका परहेज करना च...
31/08/2023

धर्म ग्रंथों और आयुर्वेद में भोजन से जुड़ी की चीजें बताई गई है। इसमें किस दिन कौन सी चीज खानी चाहिए और किसका परहेज करना चाहिए इस बारे में भी बताया गया है। इसके पीछे धार्मिक के साथ साथ वैज्ञानिक कारण भी जुड़े हैं।
चौते गुड़, वैशाखे तेल, जेठ के पंथ, अषाढ़े बेल।
सावन साग, भादो मही, कुवांर करेला, कार्तिक दही।
अगहन जीरा, पूसै धना, माघै मिश्री, फाल्गुन चना।
जो कोई इतने परिहरै, ता घर बैद पैर नहिं धरै।
* चैत्र माह में गुड़ खाना मना है।
* बैशाख माह में नया तेल लगाना मना है।
* जेठ माह में दोपहर में चलना मना है।
* आषाढ़ माह में पका बेल न खाना मना है।
* सावन माह में साग खाना मना है।
* भादौ माह में दही खाना मना है।
* क्वार माह में करेला खाना मना है।
* कार्तिक माह में बैंगन और जीरा खाना मना है।
* माघ माह में मूली और धनिया खाना मना है।
* फागुन माह में चना खाना मना
साल के किस महीने में क्या न खाएं…
जनवरी-फरवरी : जनवरी और फरवरी में मिश्री नहीं खाना चाहिए।
मार्च-अप्रैल : इस समय गुड़ नहीं खाना चाहिए।
अप्रैल-मई : इसमें तेल व तली-भुनी चीजों से परहेज करना चाहिए।
मई-जून : इन महीनों में गर्मी का प्रकोप रहता है अत: ज्यादा घूमना-फिरना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
जून-जुलाई : हरी सब्जियों के सेवन से बचें।
जुलाई-अगस्त : दूध व दूध से बनी चीजों के साथ ही हरी सब्जियां भी न खाएं।
अगस्त-सितंबर: इन दो महीनों में छाछ, दही नहीं खाना चाहिए।
सितंबर-अक्टूबर : इस माह में करेला वर्जित माना गया है।
अक्टूबर-नवंबर : इन दो महीनों में भी दही और दही से बनी अन्य चीजें नहीं खाना चाहिए।
नवंबर: दिसंबर : इस समय में भोजन में जीरे का उपयोग नहीं करना चाहिए।
दिसंबर-जनवरी : इन दोनों माह में धनिया नहीं खाना चाहिए क्योंकि धनिए की प्रवृति ठंडी मानी गई है और सामान्यत: इस मौसम में बहुत ठंड होती है।
चैत चना, बैसाखे बेल, जैठे शयन, आषाढ़े खेल, सावन, हर्रे, भादो तिल।
कुवार मास गुड़ सेवै नित, कार्तिक मूल, अगहन तेल, पूस करे दूध से मेल।
माघ मास घी-खिचड़ी खाय, फागुन उठ नित प्रात नहाय।
किस माह में क्या खाएं या करें?
जनवरी-फरवरी : घी, खिचड़ी
फरवरी-मार्च : घी, खिचड़ी और सुबह जल्दी नहाना फायदेमंद है।
मार्च-अप्रैल : चना का सेवन करें।
अप्रैल-मई : बेल
मई-जून : इन माह में पर्याप्त नींद लेना अति आवश्यक है। अन्यथा इसका बुरा प्रभाव झेलना पड़ सकता है।
जून-जुलाई : अधिक से अधिक व्यायाम और खेलना-कूदना आदि क्रियाएं करें।
जुलाई-अगस्त : हरड़ का सेवन करें।
अगस्त-सितंबर : तिल खाएं।
सितंबर-अक्टूबर : गुड़ का सेवन करें, बहुत फायदेमंद रहेगा।
अक्टूबर-नवंबर : मूली
नवंबर: दिसंबर : तेल, तेल से बनी हुई चीजे अधिक खाएं।
दिसंबर-जनवरी : नियमित रूप से दूध अवश्य पीएं।साथ ही एक सेब प्रतिदिन अवश्य लें।

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