01/07/2024
#हिन्दूसाहेबान_नहींसमझे_गीतावेदपुराणPart25 के आगे पढिए.....)
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#हिन्दूसाहेबान_नहींसमझे_गीतावेदपुराणPart26
"अगस्त ऋषि का चमत्कार"
एक अगस्त ऋषि हुआ है। (जो कुंभज से जन्मा था) उसने तप करके सिद्धियाँ प्राप्त की। सातों समुन्दरों को एक घूंट में पी लिया। फिर वापिस भर दिया अपनी महिमा बनाने के लिए। क्या यही मुक्ति है?
ऐसे-ऐसे ऋषियों की अपनी विचारधारा पुराण हैं। पुराणों में जो ज्ञान वेदों व गीता से मेल नहीं करता, वह लोक वेद है। उसे त्याग देना चाहिए।
इन ऋषियों से प्राप्त लोक वेद को वर्तमान पवित्र हिन्दू धर्म के वर्तमान धर्म प्रचारक, गीता मनीषि, आचार्य तथा शंकराचार्य व महामंडलेश्वर प्रचार कर रहे हैं तथा हिन्दू धर्म के अनुयाई यानि हिन्दू उसी अज्ञान को ढो रहे हैं। जो गीता में मनमाना आचरण बताया है अर्थात् व्यर्थ साधना कही है।
अब पुनः उसी विषय पर चर्चा करता हूँ कि हिन्दू साहेबान! नहीं समझे निर्मल गीता ज्ञान :-
प्रश्न 15 (हिन्दू पक्ष) भक्ति व धर्म-कर्म तो लगभग सब करते हैं। आप तथा आपके अनुयाई ही नहीं करते। आप कहना क्या चाहते हैं? आपकी बातों से लग रहा है कि आपके अतिरिक्त कोई ठीक से भक्ति नहीं करते?
उतर:- यह सही है। दास (रामपाल दास) यही कहता है कि विश्व में कोई भी गुरू मेरे अतिरिक्त शास्त्रोक्त साधना न तो स्वयं करता और न ही अपने अनुयाईयों से करवाता है क्योंकि उनको अपने-अपने शास्त्रों का ज्ञान ही नहीं है। आप निम्न बातें नोट करो और बताओ :-
प्रश्न 16 : क्या आप बता सकते हैं? : गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता बोलने वाले प्रभु ने अपने से अन्य किस परमेश्वर की शरण में जाने को कहा है?
उत्तर (हिन्दू पक्ष) :- श्री कृष्ण यानि श्री विष्णु जी ने अपनी शरण में आने को कहा है। श्री विष्णु जी से ऊपर कोई शक्ति यानि सत्ता अर्थात् भगवान ही नहीं है। फिर अपने से अन्य की शरण में जाने को कहने का प्रश्न ही नहीं है।
प्रश्न 17 :- आपको शास्त्रों का ज्ञान नहीं है। इसलिए आप ऐसी बातें कह रहे हो।
उत्तर (हिन्दू पक्ष) :- मैं 40 वर्ष से धार्मिक ग्रन्थों गीता व पुराणों को पढ़ता आ रहा हूँ। मुझे पूर्ण ज्ञान है।
प्रश्न 18 :- (हिन्दू पक्ष) प्रमाण दिखाओ जो बातें आप कह रहे हो कि
श्री विष्णु जी से ऊपर श्री देवी जी व उससे ऊपर काल ब्रह्म है। काल ब्रह्म से ऊपर परम अक्षर ब्रह्म है? उत्तर : आप झूठ कह रहे हो कि श्री विष्णु जी से ऊपर कोई परमात्मा (शक्ति) नहीं है।
पेश है प्रमाण के लिए संक्षिप्त श्रीमद् देवीभागवत (पुराण) के प्रथम स्कंध के अध्याय 4 पृष्ठ 44-45 की फोटोकॉपी जिसमें श्री विष्णु जी ने कहा है कि मैं देवी दुर्गा (अष्टांगी) की भक्ति करता हूँ। इससे बड़ी शक्ति यानि भगवान कोई नहीं है :- इस संक्षिप्त श्रीमद् देवीभागवत के उल्लेख से हिन्दू पक्ष का दावा गलत सिद्ध होता है कि श्री विष्णु से ऊपर कोई भगवान नहीं है क्योंकि श्रीमद् देवीभागवत (देवी पुराण) के प्रथम स्कंध के अध्याय 4 में प्रमाण है कि "एक बार श्री ब्रह्मा जी ने श्री विष्णु जी को महान तप करते हुए देखकर प्रश्न किया कि हे प्रभो! आप देवताओं के अध्यक्ष, जगत के स्वामी तथा सर्व जीवों के शासक होते हुए भी किस देवता की अराधना में ध्यानमग्न हैं। मुझे असीम आश्चर्य तो यह हो रहा है कि आप देवेश्वर एवं सारे संसार के शासक होते हुए भी समाधि लगाए बैठे हैं। आप सर्व समर्थ पुरूष से बढ़कर कौन विशिष्ट हैं? उसे बताने की कृपा कीजिए। ब्रह्मा जी के विनीत वचन सुनकर भगवान श्री हरि उनसे कहने लगे, 'ब्रह्मन् ! सावधान होकर सुनो। मैं अपने मन का विचार व्यक्त करता हूँ। मैं भगवती अद्या शक्ति यानि अष्टांगी (देवी दुर्गा) का ध्यान तप करके किया करता हूँ। ब्रह्मा जी! मेरी जानकारी में इन भगवती शक्ति (प्रकृति देवी- अष्टांगी देवी) से बढ़कर दूसरे कोई देवता नहीं हैं।" इस संक्षिप्त देवी भागवत पुराण के लेख से स्पष्ट हुआ कि श्री विष्णु जी (श्री कृष्ण जी) श्री देवी दुर्गा जी की भक्ति (पूजा) करते हैं। कहा है कि इस अद्याशक्ति से बड़ा कोई (देवता) भगवान मेरी जानकारी में नहीं है।
लेखक :- हिन्दू साहेबानों की झूठ सामने है जो कहते हैं कि श्री कृष्ण जी (श्री विष्णु जी) से बढ़कर कोई देवता यानि परमेश्वर नहीं है जबकि श्री विष्णु जी ने अपने से अन्य सर्व समर्थ शक्ति श्री देवी दुर्गा को बताया है।
"ओम नाम ब्रह्म का जाप है। इससे ब्रह्मलोक प्राप्त होता है। ब्रह्म आकाश में ब्रह्मलोक में रहता है।"
संक्षिप्त श्रीमद् देवीभागवत (पुराण) (गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित व मुद्रित है जिसके संपादक हैं हनुमान प्रसाद पोद्दार व चिमन लाल गोस्वामी} के सातवें स्कंध के अध्याय 36 में श्री देवी जी ने राजा हिमालय से कहा कि पर्वतराज! उस ब्रह्म का क्या स्वरूप है, यह बतलाया जाता है। (श्री देवी जी ने पहले तो कहा कि मेरी भक्ति करो तो ऐसे करो जैसे अध्याय 35 में बताया है। परंतु मेरी व अन्य सबकी भक्ति छोड़कर "उस एकमात्र परमात्मा को ही जानो"। दूसरी सब बातों को छोड़ दे। यही अमृत स्वरूप परमात्मा के पास पहुँचाने वाला पुल है। संसार समुद्र से पार होकर अमृत स्वरूप परमात्मा को प्राप्त करने का यही सुलभ साधन है।..... इस आत्मा का "ॐ" के जप के साथ ध्यान करो। इससे अज्ञानमय अंधकार से सर्वथा परे और संसार समुद्र से उस पार जो ब्रह्म है, उसको पा जाओगे। तुम्हारा कल्याण हो।.... वह यह सबका आत्मा "ब्रह्म" ब्रह्मलोक रूप दिव्य आकाश में स्थित है।)
गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता ज्ञान दाता यानि ब्रह्म ने कहा है कि परमशान्ति प्राप्त करनी है अर्थात् जन्म-मरण से छुटकारा चाहता है तथा सनातन परम धाम को प्राप्त करना चाहता है तो उस परमेश्वर की शरण में जा जिसको गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में परम अक्षर ब्रह्म कहा है तथा गीता अध्याय 8 श्लोक 89,10 में कहा है कि जो उस परम अक्षर ब्रह्म की भक्ति करता है, उसी को प्राप्त होता है। गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि (तत्वज्ञान रूपी शस्त्र से अज्ञान को काटकर) उसके पश्चात