25/02/2024
⑮ शब ए बरात , हलवा और चिरागा
लोगो मे ये बात मारूफ कर दी गयी है की शाबान की पंद्रह तारीख़ को सय्यदना अमीर ए हमज़ा रजि अल्लाहु अन्हु शहीद हुए थे और इस रात नबी सललल्लाहु अलैहि वसल्लम के (गजवा ए ओहद) दानदाने मुबारक शहीद हुए थे तो आप सललल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हलवा खाया इसलिए तमाम लोग रात को खुशुशी तौर पर हलवे का एहतेमाम करते है।
[किताबुल मा-सबाता फी अल-सुन्ना सफा : 214 शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दीस देहलवी रहिमाउल्लाह
फायदा : ये बात बिल-इत्तेफाक मुसल्लम है की गजवा ए ओहद 6 श्व्वाल , 3 हिजरी , 26 जनुअरी 625 को हुआ।
[तारीख़ उल इस्लाम : 1/61 , इब्ने साद : 2/25]
अल्लामा अब्दुल हयी लखनवी रहिमाउल्लाह फरमाते है की : रजब और शाबान मे होने वाले सभी काम (नमाज़ , हलवा , आतिशबाज़ी वगैरह) बिदअत मे से है।
[आसार ए मरफुआ सफा : 108-109 , फतावा अब्दुल हयी सफा : 110 मुतर्जिम]
۞ अजीब कहानी एक राज़
अहले तसय्यू का उसूल : तीसरे ईमाम हुसैन के सिवा हर ईमाम का ईमाम ए साबिक की औलाद से होना जरूरी है , उसूल ए काफ़ी और दीगर कुतुब ए शिया के मुताबिक ग्यारहवे ईमाम "हसन असकरी" है जो की ला-वलद थे , अब शिया को अपने उसूल वा अक़ीदे के मुताबिक हसन असकरी की औलाद से बारहवा ईमाम शाबित करने की मुश्किल पेश आयी तो उसका हल उन्होंने ये निकाला , की उसके लिए एक अफसाना गढ़ा वोह ये की हसन असकरी के इंतेक़ाल से चार या पाँच साल पहले उसके घर ईमाम मेहदी पैदा हुआ (अहले तसय्यू इसी मेहदी की खुशी मे इस रात आतिशबाज़ी और हलवा खोरी करते है) जो अवाम को नजर नहीं आता और हसन असकरी के इंतेक़ाल से दस रोज पहले सिर्फ चार पांच साल का ये बच्चा चालीस हांथ लम्बा और ऊँट की रान जितना मोटा , क़ुरान और तमाम अम्बिया सबकीन पर नाज़िल शुदा किताबे और वो सारा सामान जो हर ईमाम के पास रहता था सब उठा कर "सर मन रायी" मे गायब हो गया।
बजअम शिया मेहदी की गीबत ए सगरा की इब्तेदा से गीबत ए कुबरा तक उसके चार नाइब अली अल-तरतीब गुजरे है जिन को मेहदी के मक़ाम रिहाइस का इल्म है।
अबु उमर बिन सईद , मुहम्मद बिन उसमान बिन सईद , हुसैन बिन रूह , अली बिन मुहम्मद , इनका अक़ीदा ये है की शाबान की पंद्रह तारीख़ को हमारे ईमाम हुसैन बिन रूह जाहिर होगे जो हमे ईमाम मेहदी तक ले जाएगे जिसके लिए वो हर शाबान की पंद्रह को दरियाओं और नहरो के किनारो पर चिराग रोशन करके उसका इंतजार करते है और जब वो सुबह तक नमूदार नहीं होते तो फिर चिट्ठी लिख कर दरिया मे बहा देते है की अब उनका जहूर आइंदा साल होगा।
मजीद उनका कहना है की "शब ए बारात" मे जागना और तिलावत ए क़ुरान , दुआ वा नमाज़ मे बसर करना , आतिश ए जहन्नम से आजादी और दुआ कबूल होने का बअस है फिर सुबह ही सुबह उस चिट्ठी का पेश करना मामूल ए मोमिन है जो हुजूर साहब अल-आमिर अलैहिस्सलाम की खिदमत ए अकदस मे इस्तेगासा है। (चिट्ठी हाजत जो सुबह-सुबह पेश करते है उसकी एक मखसूस दुआ है जो लिखने की हमे हमारे किरतास (पत्र) इजाजत नहीं देते इसलिए छोड़ दे रहे है)
۞ चिट्ठी ए हाजत के मुताल्लिक हिदायत :
जाफरान से चिट्ठी के दरमियान मे अपनी हाजत लिख कर निचे अपना नाम लिखे और खुसबू लगाकर या पाक मिट्टी मे रखकर दरिया या नहर या गहरे कुंवे मे सुबह-सुबह डाले। (ये मंजर शब ए बरात को लाहौर दरिया ए रावी के किनारे पर देखा जा सकता है) जिस वक़्त चिट्ठी दरिया मे डालने का इरादा करे तो बा-तोजह तमाम पुकारे या हुसैन बिन रूह और दुआएं चिट्ठी पढ़ कर चिट्ठी डाल दे।
تحفة العوام (مصدقه مقبول جديد) (ص/٤٩٥،٤٩٢) سات سائل از مفتی رشید (ص/٤٠،٣٩)