02/07/2025
गीता के इस श्लोक का अनुवाद किसी कवि ने बहुत सुंदर किया है।उनका नाम संभवतः: श्री रामनरेश त्रिपाठी है।
*"मृत्यु एक सरिता है,जिसमें श्रम से कातर जीव नहाकर।*
*फिर नूतन धारण करता है,काया रूपी वस्त्र बहाकर।।"*
इधर कुछ दिनों तक आपने गीता का श्लोक डालना शायद बंद कर दिया था।मैं नित्य आपके नए श्लोक को पढ़ता हूँ , इसलिए खैजता रहता हूँ क्योंकि जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य जी ने कहा है-
*"भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजल लवकणिका पीता।* *तस् यम: नहि कुरुते चर्चा।..."*
अन्यत्र फिर वह कहते हैं कि-
*"गेयं गीतानामसहस्त्रं , ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम्।..."*
और गीता माहात्म्य में तो बहुत कुछ लिखा गया है जो सर्वविदित है अतः: हम उसका पिष्ट-पेषण नहीं कर रहे हैं।इसी बहाने यदि अधिक नहीं तो कम से कम एक श्लोक तो आँखों के सामने आ ही जाता है। यद्यपि पाठ का फल तो नहीं मिल सकता क्योंकि वह स्नान करके पवित्र हैकर पाठ करने से ही मिलता है-
*"य: पठेत् #प्रयतो पुमान्।"*
फिर भी भगवान् के श्रीमुख से डायरेक्ट निकले हुए शब्दों का साक्षात्कार तो होता ही है।यह सोच सकते हैं कि ठीक है हम पढ़ते हैं,तो पढ़ें किन्तु यह सब बताने की क्या जरूरत है? तो उसका कारण है कि इसकी महत्ता को जानकर शायद अन्य कोई भी इस पथ पर चलकर लाभान्वित हो सकें क्योंकि एक तो *"गतानुगतिको लोक:।"* और दूसरे -
*"संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने।*
*ताते मैं अति अलप बखाने।।"*
धन्यवाद।सभी मित्रों को सुप्रभात एवं शुभ दिन।
*"सर्वे भवन्तु सुखिनः।"*
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