08/01/2020
सभी को निवेदन है कि, इस लेख को शांतिपूर्वक पढ़ो, विचार करो, सोचो, बाद में प्रतिक्रिया दो और राष्ट्रहित में शेयर करो.
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राष्ट्रवादी भारतीयों, संघर्ष भावनात्मक नहीं है, वैचारिक है !
जहाँ भी मौका मिले, थोड़ी सी भी कही जगह मीले, वह झूठ ही क्यो न हो, कांग्रेस के तमाम नेता कभी कोई मौका नहीं छोड़ते स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को बदनाम करने का.
हमारे यह चिंतन का विषय शुरू से ही रहा है कि आखरी ऐसी क्या बात है कि हमेशा ही हाथ धोकर सावरकर के पीछे कांग्रेस के नेता क्यों पड़े रहते हैं?
यह आज की बात नही है, यह कोई भी आपको बता सकता है कि कांग्रेस और उसके तमाम नेता हमेशा सावरकर के बारे में कुछ न कुछ अनापशनाप बोलते रहते हैं, फिर वह झूठ क्यो न हो लेकिन बोलना जरूर है.
यह एक ऐसा प्रश्न है जो सभी नागरिकों के लिए आम है.
वास्तव यह है कि अब सावरकर तो नहीं रहे, वह हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे, तो हिंदू महासभा की राजनीतिक शक्ति भी आज नगण्य है. यानी मान के चलिए की सावरकर और हिंदु महासभा यह आज अस्तित्व में ही नही है.
फिर भी,
राहुल गांधी और उनके सहयोगी सावरकर के बारे में कुछ न कुछ बोलते रहते हैं, बताते रहते है, झूठ तो अकसर बोलते ही रहते हैं, यह इनकी परंपरा है, यह सबको पता है, नये से बताने की कोई आवश्यकता भी नही है.
"माफी मांगने के लिए मैं राहुल सावरकर नहीं हूं, राहुल गांधी हु" ऐसा राहुल गांधी कहते हैं।
इसके पीछे यानी यह कथन करने के पीछे दो राय है,
एक, ऐसा कहने वाले राहुल गांधी एक तो मूर्ख होना चाहिए दुसरा, या फिर बहुत शातिर.
सावरकर के बारे में अनापशनाप बोलकर वोट परसेंटेज में कोई वॄद्धि नही होती, इस बात की समझ राहुल गांधी को नही है ऐसा नही समझना चाहिए.
उसको यह बात पक्की मालूम है कि सावरकर के बारे में अनापशनाप बोलकर कोई वोटिंग बढ़ने वाली नही है.
फिर बार बार सावरकर का नाम लेने से राहुल गांधी या कांग्रेस को क्या फायदा?
यह प्रश्न उठना लाजमी है.
ऐसी कौनसी वह कांग्रेसरूपी अश्वत्थामा के कपाल पर सावरकररूपी काल की वह जखम है, वह घाव है, जो कांग्रेस को न मरने देती है, न जीने देती है, न सावरकर को भूलने भी नही देती?
हमे आज अश्वत्थामा की वह जखम देखनी चाहिए, क्या क्या राज छुपे हुए हैं उस जखम में, वह जखम सावरकररूपी एक व्यक्ति कैसे दे गया विशालकाय कांग्रेस को?
चलो अब असल मुद्दा जो इस जखम का है उसपर आते हैं, जरा ध्यान से पढ़ना.
"मैं राहुल सावरकर नहीं हूं, मैं राहुल गांधी हूं।" यह वाक्य दो प्रकार के भारत को दर्शाता है.
एक भारत, नेहरू-गांधी का भारत है,
और दूसरा भारत सावरकर का भारत है.
नेहरू-गांधी विचारधारा है,
सावरकर भी विचारधारा है.
यह संघर्ष नेहरू, गांधी और सावरकर जैसे विचारकों के बीच का संघर्ष नहीं है, इन तीन व्यक्तियों के बीच का संघर्ष नही है तो यह दो विचारधाराओं का संघर्ष है.
जबतक हम यह संघर्ष क्या है, कैसा है, इसका स्वरूप क्या है इन बातों को नही समझेंगे तब तक आप कभी राहुल गांधी, कभी कपिल सिब्बल, कभी मणिशंकर अय्यर और कभी अन्य कांग्रेसी नेता सावरकर से इतनी नफरत क्यो करते हैं, सावरकर का इतना द्वेष क्यो करते हैं, यह आपके समझ में नही आएगा.
आगे बढ़ते है.
नेहरू-गांधी विचारधारा यही मानती है की 1947 में भारत नामक देश अस्तित्व में आया, यह नया देश उदार होना चाहिए, यहां सभी धर्मों के लोगों को समान दर्जा दिया जाना चाहिए.
नेहरू-गांधी विचारधारा पुरजोर तरीके से यह भी मानती है कि यह हिंदुस्तान या भारत देश हिंदुओं का नहीं है, इसलिए की हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि सभी इस देश में रह रहे हैं.
नेहरू-गांधी विचारधारा यह भी मानती है कि इस देश की संस्कृति हिंदू संस्कृति नहीं है, बल्कि एक समग्र संस्कृति है.
नेहरू-गांधी विचारधारा यह भी मानती है कि शिवाजी और महाराणा प्रताप इस देश के आदर्श है, तो अकबर और टीपू सुल्तान भी भारत के आदर्श है.
नेहरू-गांधी विचारधारा यह भी मानती है कि मुस्लिम आक्रांता लूट के लिए इस देश में आए थे, वे देश में रहते थे, उन्होंने देश को हमारा माना, इसलिए हमें उन्हें अपना मानना चाहिए.
चलो यह बात हो गयी नेहरू-गांधी विचारधारा की,
अब इसके विपरीत सावरकर विचारधारा को भी समझ लेते हैं.
सावरकर की विचारधारा इसके विपरीत हैं.
सावरकर विचारधारा यह मानती है कि यह देश बहुत प्राचीन है, इसे 1947 में नहीं बनाया गया था.
सावरकर विचारधारा यह मानती है कि हिंदू समाज एक राष्ट्रीय समाज है, यह देश हिंदुओं का है, तो यह हिंदुस्तान है, इसकी एक महान प्राचीन परंपरा और संस्कृति है.
सावरकर विचारधारा यह मानती है कि अन्य धर्मों को इस मूल संस्कृति के साथ जोड़ा जाना चाहिए, उनके अलग अस्तित्व को बनाए नहीं रखा जाना चाहिए.
सावरकर विचारधारा यह मानती है कि हिंदू समाज के संगठन का आधार हमारी मातृभूमि होनी चाहिए.
सावरकर विचारधारा यह मानती है कि सिंधु नदी से दक्षिण सागर तक, यह भूमि हमारी जन्मभूमि और पुण्यभूमि है, और यह प्राचीन काल से है.
यह दोनों विचारधाराएँ परस्पर विरोधी हैं.
नेहरू-गांधी विचारधारा का नेतृत्व महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे.
सावरकर विचारधारा का नेतृत्व विनायक दामोदर सावरकर यह कर रहे है.
विचारधारा, विचारधाराए होनी भी चाहिए क्योंकि यह समाज का दिग्दर्शन करती है.
विशिष्ट परिस्थितियों में विशिष्ट विचारधारा को समाज अपनाता भी है और उसके विफल होने के बाद समाज उस विचारधारा को ठुकराता भी है, और दुनिया के इतिहास में यह कई कई बार हुआ भी है.
ऐसे कई उदाहरण दुनिया के इतिहास में देखे जा चुके है कि विचारधाराओं के विफल होने के बाद उनको समाज ने ठुकराया और नई और उचित विचारधाराओं के साथ समाज खड़ा हो गया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारे सामने है वह दुनिया से साम्यवाद का खतम हो जाना.
नेहरू-गांधी विचारधारा के भीतर असंख्य दोष, विसंगतियां हैं, इस विचारधारा के कारण जो परिणाम हुए वह देश के लिए बहुत हानिकारक रहे हैं, यह मैं नही कह रहा हु यह सब आप सब के सामने है की पिछले 70 से 80 सालों में देश के साथ क्या क्या हुआ और उसके परिणामस्वरूप आज भी क्या क्या हो रहा है.
अब नेहरू-गांधी विचारधारा के क्या परिणाम हुए इसका भी विवेचन होना चाहिए.
अपना राष्ट्रीयत्व किस बात में है यह मुस्लिम लीग के समझ में न आने के कारण फुटिरतावादी मुस्लिम लीग की अवास्तव मांगो को हर बार ईस विचारधारा द्वारा माना गया, मानो जैसे उनको कोरा चेक दे दिया हो.
यह जानते हुए भी की मुस्लिम लीग की नीयत क्या है, वह इस्लामी कट्टरता को बढ़ावा देनेवाला संगठन है, वह देश को तोड़ना चाहता है, फिर भी उसको आवश्यकता से ज्यादा खुली छूट, यह इस नेहरू-गांधी विचारधारा का परिणाम इस देश पर रहा.
महात्मा गांधी ऐसी भाषा में कहते थे जो सुनने में मधुर हो-
"हिंदू बड़े भाई हैं, मुसलमान छोटे भाई हैं, बड़े को उदार होकर छोटे भाई की कुछ मांगों को स्वीकार करना चाहिए."
महात्मा गांधी को छोटा भाई बड़े भाई का गला काटने के लिए हाथ में चाकू लेकर खडा है यह नहीं दीखा और देखकर भी नेहरू ने इसे कभी नहीं देखा.
है न आश्चर्य की बात.
1947 में, इस छोटे भाई ने अपनी माँ का गला काट दिया, देश के दो टुकड़े हो गए, यह गांधी-नेहरू विचारधारा की सबसे बड़ी हार है.
सावरकर ने भविष्यवाणी की थी कि देश तोड़ दिया जाएगा.
सिंध प्रांत 1936 में मुंबई से अलग कर दिया गया था, उसका कारण यह था कि सिंध मुस्लिम बहुल प्रांत बनाना था, और बाद में सिंध को पाकिस्तान के साथ जोड़ना था.
गांधी ने इस बात को नहीं समझा, नेहरू को समझने का सवाल ही नहीं था.
1940 में, लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान का एक प्रस्ताव पारित हुआ.
नेहरू ने कहा कि, "पाकिस्तान की मांग बहुत ही मूर्खतापूर्ण है."
1947 में, इतिहास ने "नेहरू को मूर्ख बना दिया."
भारत के बटवारे से पहले गांधी ने कहा,-
"पहले मेरा शरीर दो हिस्सों में कट जाएगा और फिर देश का विभाजन हो जाएगा"
देश का विभाजन हुआ और आठ मिलियन हिंदुओं के शरीर काट दिए गए मुसलमानों द्वारा. मुसलमानों ने बड़े पैमानेपर एक सोची समझी साजिश के तहत हिंदुओ का खून बहाया.
हिंदुओ की खून की नदियों में नेहरू-गांधी और उनकी विचारधारा पवित्र होने के लिए डुबकियां लगाते रहे और हिंदू मुस्लिम भाईचारे की दुहाई हिंदुओ को, नोट करना, हांजी मात्र हिंदुओं को देते रहे.
यह गांधी-नेहरू विचारधारा की एक और विकट हार है.
पंडित नेहरू ने चीन के हाथों पर तिब्बत का जल छोड़ा, चीन के साथ पंचशील समझौता हुआ. यह पंचशील भगवान गौतम बुद्ध ने कहा है, नेहरू ने उस शब्द को मात्र लिया.
ईस समय भी सावरकर ने चेतावनी दी थी, नेहरू को सतर्क किया था.
सावरकर ने तब कहा था कि,-
"तिब्बत को निगलने के बाद, भारत की भूमि हड़पने के लिए चीन की भूख बढ़ जाएगी, अगर चीन भविष्य में भारत की जमीन पर हमला करता है तो उससे आश्चर्य नहीं होना चाहिए."
उपर दी गयी सावरकर की यह भविष्यवाणी 1954 की है.
चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण किया, उसने उदारवादी, उदारवाद, शांति के तत्वज्ञान की कबर खोद डाली.
बुरी बात यह है कि इसमें हजारों भारतीय सैनिक मारे गए.
यह नेहरूवाद की एक और भयानक हार है.
असम में 1930 से ही बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ शुरू हो गयी थी.
आज, असम की लगभग 30 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है.
इतिहास का सिद्धांत यह है कि वह क्षेत्र जहां भारत में अधिकांश मुसलमान हो जाते हैं वह क्षेत्र भारत में नहीं रहता.
इतिहास उठाकर देख लो इसके उदाहरण अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पाकिस्तान के अधिकांश हैं, यह जितेजागते उदाहरण है.
सावरकर ने इसके खिलाफ भी चेतावनी दी थी, लेकिन नेहरू-गांधी विचारधारा ने नही मानी.
सावरकर द्वारा दी गयी वह चेतावनी इसतरह थी कि-
"अगर इस तरह की घुसपैठ जारी रही तो असम की संस्कृति को खतरा पैदा हो जाएगा और पूर्वोत्तर अशांति फैल जाएगी."
आज हम उस चेतावनी का अनुभव कर रहे हैं, पूर्वोत्तर राज्यों में पिछले 70 सालों में जो बीज बोए हुए है आज उसका खामियाजा हमे भुगतना पड़ रहा है.
पूर्वोत्तर के बारे में जब सावरकर ने नेहरू को चेतावनी दी तो सावरकर के इस चेतावनी पर नेहरू ने तब कहा था,-
“प्रकृति का सिद्धांत है की जहां काफी खाली जमीन है, वहां दूसरे इलाके से लोग आएंगे. ”
यह था नेहरू का देश के प्रति दृष्टिकोण.
मुझे व्यक्तिगत तौर पर इस बात का मलाल है और घृणा भी की पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसा व्यक्ति इस देश का पहला प्रधानमंत्री बना, इससे बड़ा इस देश का कोई दुर्भाग्य नही हो सकता.
आज का धधकता हुआ पूर्वउत्तर और पूर्व नेहरू विचार का एक स्मारक है.
इतिहास हर जगह सावरकर को दूरदर्शी के रूप में महसूस कर रहा है, और इतिहास हर जगह विफलता और अपराध के लिए गांधी-नेहरू को दोषी ठहरा रहा है.
अगर गांधी-नेहरू परिवार कांग्रेस चलाना चाहता हैं तो गांधी-नेहरू विचारधारा का विफलतापूर्ण और आपराधिक इतिहास नहीं चलेगा, लोगों को इस घृणित इतिहास का पता चलेगा तो लोग कांग्रेस को उखाड़कर फेंक देंगे, यह डर कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार को हमेशा सताता रहता है.
इसलिए, सावरकर की बदनामी, यह कांग्रेस के लिए एक टॉनिक बन गई है. मान के चलिए की सावरकर के बारे में अनापशनाप बोलकर ही कांग्रेस की दुकान चल रही है.
नेहरू-गांधी परिवार की विरासत को बनाए रखने के लिए वह सावरकर को गालियां देने के लिए बाध्य हैं.
इस परिवार के पैरों को चाटने वाले चाटूकार राजनेता राहुल गांधी के साथ घुलते-मिलते रहेंगे, उसकी हाँ में हाँ मिलाते रहेंगे, यह उनके राजनीतिक अस्तित्व का सवाल है.
सब राष्ट्रवादी भारतीय समाज के लिए भी चेतावनी है, इसको जरा ध्यान से पढ़ना.
जब सावरकर को बदनाम किया जाता है, तो कई लोग भावुक हो जाते हैं, उनकी भावनाएं आहत होती है और यह स्वाभाविक है.
इन्ही आहत भावनाओ के चलते फिर उन्हें सावरकर के त्याग, अंडमान में 13 साल की जेल, उनके परिवार के नुकसान के बारे में सब कुछ याद आने लगता हैं.
सवाल भावुक होने का नहीं है.
सवाल वैचारिक संघर्ष के बारे में है.
अपने मस्तिष्क को वैचारिक संघर्षों में ठंडा रखना पड़ता है.
प्रतिद्वंद्वी के भाते में के तीर को नेस्तनाबूत करना पड़ता है, उनकी असफलताओं को और भी बड़ा करना होगा.
आपको ऐसा करते रहना चाहिए, यह आपका हमारा सबका दायित्व भी है.
"कांग्रेस मुक्त भारत" यह आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की घोषणा है. इसको जरा गंभीरता से लेना चाहिए.
कांग्रेस को एक राजनीतिक पार्टी के रूप में ईस देश में रहना चाहिए, लेकिन कांग्रेस को एक विचारधारा के रूप में समाप्त कर देना चाहिए.
कांग्रेस को नेहरू की विचारधारा से मुक्त किया जाना चाहिए.
सावरकर के विचारों को समझना और पचाना है, हिंदू लोगों द्वारा इस क्षमता का निर्माण किया जाना चाहिए.
'सावरकर राष्ट्रीय सुरक्षा के जनक हैं!'
पाकिस्तान बनाकर नेहरू कांग्रेस ने एक दुश्मन को अपने दरवाजे पर ला खड़ा किया, हम पिछले 70 सालों से पीड़ित हैं.
राहुल गांधी अपने दादा-दादी की परंपरा का नेतृत्व कर रहे हैं, उसपर व्यक्तिगत रूप से हमला करने का कोई मतलब नहीं है.
उनके वैचारिक दिवालियापन पर लगातार बहस होनी चाहिए, चार-दो लेखकों द्वारा नहीं, तो वह बहस सामूहिक होना चाहिए.
इसलिए हमें यह समझना होगा कि एक पाठक के रूप में हमारी ज़िम्मेदारी क्या है और निर्भय होकर इस वैचारिक लड़ाई में उतरना है, लड़ना है और इनका काला चिट्ठा दुनिया के सामने खोलना है.
राहुल गांधी ऊंची आवाज में कहते हैं,-
''मैं राहुल सावरकर नहीं हूं, राहुल गांधी हु, मुझे सच बोलने के लिए माफी मांगने के लिए कहते है, मर गया तो भी माफी नहीं मांगुंगा। ”
राहुल गांधी को मरना नहीं चाहिए, जीवित रहना है, 100 साल का अच्छा जीवन उन्हें मिले, क्योंकि नियति की ऐसी इच्छा है कि उन्हें अपने हाथों से, नेहरू विचारों की कब्रों को बांधना है उन्हें एक महान जीवन की आवश्यकता है!
एन डी पाटील.
संयोजक- #कैंसरमुक्त_भारत_अभियान
Organizer-
International Movement for World Without Cancer.