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02/08/2017

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02/03/2017
  का संपादकीय=>>"टीबी के खिलाफ यह जंग दुनिया जीतेगी या नहीं, यह भारत पर निर्भर करता है"★सन्दर्भ :- टीबी के मरीजों और इस ...
04/11/2016

का संपादकीय
=>>"टीबी के खिलाफ यह जंग दुनिया जीतेगी या नहीं, यह भारत पर निर्भर करता है"

★सन्दर्भ :- टीबी के मरीजों और इस बीमारी से होने वाली मौतों के लिहाज से भारत दुनिया में सबसे आगे है. द हिंदू की संपादकीय टिप्पणी

◆विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मांग की है कि तपेदिक यानी टीबी पर पहली बार संयुक्त राष्ट्र की एक आम बैठक बुलाई जाए. उसे ऐसा करने के लिए मजबूर होना पड़ा है क्योंकि इस बीमारी से सबसे ज्यादा जूझ रहे देश इससे निपटने के लिए पर्याप्त इच्छाशक्ति नहीं दिखा रहे.
◆टीबी के खिलाफ लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती जब तक इससे सबसे ज्यादा ग्रस्त देश, जिनमें भारत सबसे ऊपर है, अपनी सरकारी मशीनरी को प्रभावी तरीके से हरकत में नहीं लाते.

◆टीबी की दर और इस बीमारी से होने वाली मौतों का आंकड़ा वैश्विक स्तर पर लगातार घट रहा था लेकिन, हाल में इसमें फिर बढ़ोतरी होने लगी है. यह बढ़ोतरी पहले लगाए गए अनुमान से कहीं अधिक है. इसकी मुख्य वजह है भारत में इस बीमारी के मरीजों की संख्या में आया तेज उछाल.
◆2014 में भारत में टीबी के 22 लाख मरीज थे. यह आंकड़ा 2015 में 28 लाख पहुंच गया. विडंबना यह है कि यह आंकड़ा भी अंतरिम है. वास्तविक आंकड़े का पता तभी चल सकेगा जब अगले साल शुरू होने वाला राष्ट्रीय टीवी सर्वे पूरा होगा और तब यह कहीं ज्यादा हो सकता है. अनुमानों के मुताबिक 2014 की तुलना में 2015 में टीबी से होने वाली मौतों की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा हो गई है. मरीजों की तरह मौतों का यह आंकड़ा भी सर्वे के बात बढ़ सकता है.

◆इस बढ़ोतरी की वजह यह भी है कि 2013 से 2015 के दौरान निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की तरफ से टीबी के मामलों की सूचनाओं में 34 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. लेकिन यह भी सच है कि 2015 में प्राइवेट सेक्टर के डॉक्टरों द्वारा दी गई सूचनाएं ऐसी कुल सूचनाओं का 16 फीसदी ही थीं.
◆2012 में ये सूचनाएं दर्ज करना अनिवार्य कर दिया गया था लेकिन, 2015 में सरकारी और निजी क्षेत्र द्वारा टीबी के सिर्फ 17 लाख मामले सूचीबद्ध किए गए. इसलिए कोई नहीं जानता कि बाकी 11 लाख मरीजों का क्या हुआ.
◆टीबी के खिलाफ प्रभावी लड़ाई के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रम के तहत हर मरीज को इलाज मिलना और उससे जुड़ी जानकारियां दर्ज की जानी जरूरी हैं. निजी अस्पतालों या डॉक्टरों के पास आने वाले टीबी के मरीजों में से 50 फीसदी दवाइयों का कोर्स सफलतापूर्वक पूरा नहीं करते.

◆उधर, एक हालिया अध्ययन बताता है कि 2013 में अगर 19 लाख लोग टीबी की शिकायत लेकर सरकारी अस्पताल गए तो उनमें से सिर्फ 65 फीसदी ने पूरी दवाइयां लीं. इसके चलते दवाइयों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुके टीबी के मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो गई है जिससे इस बीमारी का इलाज महंगा और मुश्किल होता जा रहा है. इसने संकट को और गहरा दिया है.

◆बच्चों के लिए सुरक्षित टीबी की दवा उपलब्ध कराने जैसे कई मायनों में राष्ट्रीय तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम अभी लक्ष्यों से पीछे चल रहा है. टीबी को काबू करने का काम तभी हो सकता है जब सब मोर्चों पर एक साथ जंग छेड़ी जाए. टीवी के खिलाफ वैश्विक लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती जब तक भारत अपनी सीमाओं के भीतर इस लड़ाई में जीत हासिल नहीं करता.
Reference : http://m.thehindu.com/opinion/editorial/get-serious-about-fighting-tb-says-who/article9285813.ece

Pushed to a corner owing to lack of political will on the part of countries with a high burden of tuberculosis, the World Health Organisation has called for the first United Nations General Assembly session on the disease. The fight against TB cannot be won as long as the high-burden countries, part...

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18/07/2015

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17/01/2015

26 जनवरी गणतन्त्र दिवस

मातृभुमि के सम्मान एवं उसकी आजादी के लिये असंख्य वीरों ने अपने जीवन की आहूति दी थी। देशभक्तोंकी गाथाओं से भारतीय इतिहास के पृष्ठ भरे हुए हैं। देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत हजारों की संख्या में भारत माता के वीर सपूतों ने, भारत को स्वतंत्रता दिलाने में अपना सर्वस्य न्योछावर कर दिया था। ऐसे ही महान देशभक्तों के त्याग और बलिदान के परिणाम स्वरूप हमारा देश, गणतान्त्रिक देश हो सका।

गणतन्त्र (गण+तंत्र) का अर्थ है, जनता के द्वारा जनता के लिये शासन। इस व्यवस्था को हम सभी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं। वैसे तो भारत में सभी पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं, परन्तु गणतंत्र दिवस को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाते हैं। इस पर्व का महत्व इसलिये भी बढ जाता है क्योंकि इसे सभी जाति एवं वर्ग के लोग एक साथ मिलकर मनाते हैं।

गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी को ही क्यों मनाते हैं? मित्रों, जब अंग्रेज सरकार की मंशा भारत को एक स्वतंत्र उपनिवेश बनाने की नजर नही आ रही थी, तभी 26 जनवरी 1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरु जी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पूर्णस्वराज्य की शपथ ली। पूर्ण स्वराज के अभियान को पूरा करने के लिये सभी आंदोलन तेज कर दिये गये थे। सभी देशभकतों ने अपने-अपने तरीके से आजादी के लिये कमर कस ली थी। एकता में बल है, की भावना को चरितार्थ करती विचारधारा में अंग्रेजों को पिछे हटना पङा। अंतोगत्वा 1947 को भारत आजाद हुआ, तभी यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1929 की निर्णनायक तिथी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनायेंगे।

26 जनवरी, 1950 भारतीय इतिहास में इसलिये भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि भारत का संविधान, इसी दिन अस्तित्व मे आया और भारत वास्तव में एक संप्रभु देश बना। भारत का संविधान लिखित एवं सबसे बङा संविधान है। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में 2 वर्ष, 11 महिना, 18 दिन लगे थे। भारतीय संविधान के वास्तुकार, भारत रत्न से अलंकृत डॉ.भीमराव अम्बेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने विश्व के अनेक संविधानों के अच्छे लक्षणों को अपने संविधान में आत्मसात करने का प्रयास किया है। इस दिन भारत एक सम्पूर्ण गणतान्त्रिक देश बन गया।देश को गौरवशाली गणतन्त्र राष्ट्र बनाने में जिन देशभक्तो ने अपना बलिदान दिया उन्हे याद करके, भावांजली देने का पर्व है, 26 जनवरी।

मित्रो, भारत से व्यपार का इरादा लेकर अंग्रेज भारत आये थे, लेकिन धीरे -धीरे उन्होने यहाँ के राजाओं और सामंतो पर अपनी कूटनीति चालों से अधिकार कर लिया। आजादी कि पहली आग मंगल पांडे ने 1857 में कोलकता के पास बैरकपुर में जलाई थी, किन्तु कुछ संचार संसाधनो की कमी से ये आग ज्वाला न बन सकी परन्तु, इस आग की चिंगारी कभी बुझी न थी। लक्ष्मीबाई से इंदिरागाँधी तक, मंगल पांडे से सुभाष तक, नाना साहेब से सरदार पटेल तक, लाल(लाला लाजपत राय), बाल(बाल गंगाधर तिलक), पाल(विपिन्द्र चन्द्र पाल) हों या गोपाल, गाँधी, नेहरु सभी के ह्रदय में धधक रही थी। 13 अप्रैल 1919 की (जलिया वाला बाग) घटना, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे अधिक दुखदाई घटना थी। जब जनरल डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज ने गोलियां चला के निहत्थे, शांत बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों को मार डाला था और हज़ारों लोगों को घायल कर दिया था। यही वह घटना थी जिसने भगत सिंह और उधम सिंह जैसे, क्रांतीकारियों को जन्म दिया। अहिंसा के पुजारी हों या हिंसात्मक विचारक क्रान्तिकारी, सभी का ह्रदय आजादी की आग से जलने लगा। हर वर्ग भारतमात के चरणों में बलिदान देने को तत्पर था।

अतः 26 जनवरी को उन सभी देशभक्तों को श्रद्धा सुमन अपिर्त करते हुए, गणतंत्र दिवस का राष्ट्रीय पर्व भारतवर्ष के कोने-कोने में बड़े उत्साह तथा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। प्रति वर्ष इस दिन प्रभात फेरियां निकाली जाती है। भारत की राजधानी दिल्ली समेत प्रत्येक राज्य तथा विदेषों के भारतीय राजदूतावासों में भी यह त्योहार उल्लास व गर्व से मनाया जाता है।



26 जनवरी का मुख्य समारोह भारत की राजधानी दिल्ली में भव्यता के साथ मनाते हैं। देश के विभिन्न भागों से असंख्य व्यक्ति इस समारोह की शोभा देखने के लिये आते हैं। हमारे सुरक्षा प्रहरी परेड निकाल कर, अपनी आधुनिक सैन्य क्षमता का प्रदर्शन करते हैं तथा सुरक्षा में सक्षम हैं, इस बात का हमें विश्वास दिलाते हैं। परेड विजय चौक से प्रारम्भ होकर राजपथ एवं दिल्ली के अनेक क्षेत्रों से गुजरती हुयी लाल किले पर जाकर समाप्त हो जाती है। परेड शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री ‘अमर जवान ज्योति’ पर शहीदों को श्रंद्धांजलि अर्पित करते हैं। राष्ट्रपति अपने अंगरक्षकों के साथ 14 घोड़ों की बग्घी में बैठकर इंडिया गेट पर आते हैं, जहाँ प्रधानमंत्री उनका स्वागत करते हैं। राष्ट्रीय धुन के साथ ध्वजारोहण करते हैं, उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाती है, हवाई जहाजों द्वारा पुष्पवर्षा की जाती है। आकाश में तिरंगे गुब्बारे और सफेद कबूतर छोड़े जाते हैं। जल, थल, वायु तीनों सेनाओं की टुकडि़यां, बैंडो की धुनों पर मार्च करती हैं। पुलिस के जवान, विभिन्न प्रकार के अस्त्र-षस्त्रों, मिसाइलों, टैंको, वायुयानो आदि का प्रदर्षन करते हुए देश के राष्ट्रपति को सलामी देते हैं। सैनिकों का सीना तानकर अपनी साफ-सुथरी वेषभूषा में कदम से कदम मिलाकर चलने का दृष्य बड़ा मनोहारी होता है। यह भव्य दृष्य को देखकर मन में राष्ट्र के प्रति भक्ति तथा ह्रदय में उत्साह का संचार होता है। स्कूल, कॉलेज की छात्र-छात्राएं, एन.सी.सी. की वेशभूषा में सुसज्जित कदम से कदम मिलाकर चलते हुए यह विश्वास उत्पन्न करते हैं कि हमारी दूसरी सुरक्षा पंक्ति अपने कर्तव्य से भलीभांति परिचित हैं। मिलेट्री तथा स्कूलों के अनेक बैंड सारे वातावरण को देशभक्ति तथा राष्ट्र-प्रेम की भावना से गुंजायमान करते हैं। विभिन्न राज्यों की झांकियां वहाँ के सांस्कृतिक जीवन, वेषभूषा, रीति-रिवाजों, औद्योगिक तथा सामाजिक क्षेत्र में आये परिवर्तनों का चित्र प्रस्तुत करती हैं। अनेकता में एकता का ये परिदृष्य अति प्रेरणादायी होता है। गणतन्त्र दिवस की संध्या पर राष्ट्रपति भवन, संसद भवन तथा अन्य सरकारी कार्यालयों पर रौशनी की जाती है।

26 जनवरी का पर्व देशभक्तों के त्याग, तपस्या और बलिदान की अमर कहानी समेटे हुए है। प्रत्येक भारतीय को अपने देश की आजादी प्यारी थी। भारत की भूमि पर पग-पग में उत्सर्ग और शौर्य का इतिहास अंकित है। किसी ने सच ही कहा है- “कण-कण में सोया शहीद, पत्थर-पत्थर इतिहास है।“ ऐसे ही अनेक देशभक्तों की शहादत का परिणाम है, हमारा गणतान्त्रिक देश भारत।
26 जनवरी का पावन पर्व आज भी हर दिल में राष्ट्रीय भावना की मशाल को प्रज्वलित कर रहा है। लहराता हुआ तिरंगा रोम-रोम में जोश का संचार कर रहा है, चहुँओर खुशियों की सौगात है। हम सब मिलकर उन सभी अमर बलिदानियों को अपनी भावांजली से नमन करें, वंदन करें।

जय हिन्द, जय भारत

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