03/02/2026
हीरो को यकीन था पिटेगी फिल्म, इसलिए भागा शहर छोड़कर और उधर सिनेमाघरों में लगी हाउसफुल की भीड़!
साल था 1974, अप्रैल का महीना। गर्मियों की शुरुआत हो चुकी थी। हिंदी सिनेमा के ही-मैन धर्मेंद्र की एक फिल्म रिलीज़ के लिए तैयार थी - नाम था 'दोस्त' ।
लेकिन रिलीज़ से पहले ही धर्मेंद्र को पूरा भरोसा हो गया था कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलेगी।
हालात ऐसे बने कि फिल्म के रिलीज़ से पहले ही धर्मेंद्र मुंबई छोड़कर कश्मीर चले गए। उन्हें लग रहा था कि फिल्म फ्लॉप होगी और कुछ हफ्ते शहर से दूर रहना ही बेहतर रहेगा।
ट्रायल शो ने और बढ़ा दिया डर
फिल्म का ट्रायल शो देखने के बाद धर्मेंद्र ही नहीं, उनके दोस्तों को भी यही महसूस हुआ कि 'दोस्त' शायद दर्शकों को पसंद न आए।
यही वजह रही कि धर्मेंद्र न तो प्रीमियर में शामिल हुए और न ही रिलीज़ के आसपास मुंबई में रुके।
‘गाड़ी बुला रही है…’ बना कामयाबी की पहचान
12 अप्रैल 1974 को जब 'दोस्त' सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई, तो कहानी पूरी तरह पलट गई।
फिल्म का गाना 'गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है' पहले ही लोगों की जुबान पर था। किशोर कुमार की आवाज़ ने इस गीत को अमर बना दिया।
फिल्म में हेमा मालिनी और शत्रुघ्न सिन्हा लीड रोल में थे, जबकि अमिताभ बच्चन एक छोटे से किरदार में नजर आए थे। उस वक्त अमिताभ का सुपरस्टारडम अभी आना बाकी था।
'सत्यकाम' की नाकामी का असर
धर्मेंद्र के डर की वजह साल 1969 की फिल्म 'सत्यकाम' थी।
इस फिल्म में उनकी एक्टिंग को करियर की बेस्ट परफॉर्मेंस माना गया, लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली।
हालांकि, ऋषिकेश मुखर्जी को इसके लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
'दोस्त' में धर्मेंद्र का किरदार कुछ हद तक 'सत्यकाम' जैसा ही था। इसी वजह से उन्हें डर था कि कहीं इतिहास खुद को दोहरा न दे।
कश्मीर में शूटिंग, देशभर में हाउसफुल
उधर धर्मेंद्र कश्मीर में शूटिंग में व्यस्त थे, इधर मुंबई समेत देश के कई शहरों में 'दोस्त' हाउसफुल चल रही थी।
तीन-चार दिन बाद जब उन्हें फोन पर फिल्म की जबरदस्त सफलता की खबर मिली, तो वे खुद यकीन करने सिनेमाघर पहुंचे।
कश्मीर में भी सभी शो फुल थे। दर्शकों की तालियों और सीटीयों ने धर्मेंद्र के सारे डर खत्म कर दिए।
1974 की तीसरी सबसे बड़ी हिट
जिस फिल्म को धर्मेंद्र अपनी सबसे बड़ी नाकामी समझ रहे थे, वही फिल्म 1974 की तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म साबित हुई।
इस दिलचस्प किस्से का जिक्र धर्मेंद्र ने अपनी आत्मकथा
'धर्मेंद्र: नॉट जस्ट ए ही-मैन' में भी किया है।
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