26/07/2025
*🌸 कविता - बलोच और बलोचनी🌸*
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भोली भाली एक बलोचनी ,इसी बात पर रूठी ।
दिलवाई क्यों नहीं बलोच, हीरे जड़ी अंगूठी ।।
शादी के पहले दिन से ही ,तुझ पर नेह लुटाया ।
सेवा पूरी करी चाव से ,मन क्रम वचन निभाया ।
दो दो बच्चे पैदा करके ,तेरा वंश बढ़ाया ।
ऐसा तू निर्मोही बालम,क्यों उपहार न लाया ।
सेवा सास ससुर की भी मैं ,पूरी करती आयी ।
सही समय खाना देकर ,उनको खाना खिलायी ।
गाय भैंस की धार निकालूं ,देती चारा पानी ।
छोटा सा उपहार न लेकर ,आया तू अज्ञानी ।
पीहर से लेकर आई जो ,बिछुआ कंगन बाली ।
चैन गले की एक अंगूठी , मामा जी ने डाली ।
बहना तेरी एक अंगूठी , नेग सगन ले भागी ।
मेरी उंगली खाली खाली ,किस्मत उसकी जागी ।
वादे रोज अनोखे करता, गढ़े कहानी झूठी ।।
दिलवाता क्यों नहीं बलोच ,हीरे जड़ी अंगूठी ।।
तेरी सारी बात ठीक हैं ,मेरी भी मजबूरी ।
तुझको बहकाता आया हूं ,वादे किए खजूरी ।
छोटा एक किसान समझ तू , पैदा होती थोड़ी ।
भावों पर अंकुश सरकारी ,हाथ न आए कौड़ी ।
मंडी के सौदागर बैठे ,इसका लाभ उठाने ।
अपनी सूखी अंतड़िया वो,खाते रोज मखाने ।
खाद बीज इतने महंगे हैं , सारा धन लुट जाता ।
ऊपर से डीजल का खर्चा , मेरा दर्द बढ़ाता ।
बच्चों की भी ड्रेस फीस का , काम अभी है बाकी ।
तेरे सम्मुख सारा लेखा ,मान नहीं चालाकी ।
देख पड़ोसन के आभूषण , मान न मुझको दोषी ।
बड़ी बड़ी खेती वाले हैं ,अपने सभी पड़ोसी ।
कर्ज़ सदा छाती पर रहता ,खाली रहती मूठी ।।
भोली भाली एक बलोचनी ,इसी बात पर ,रूठी ।।
जान गई तेरी पीड़ा मैं ,मुझको भान नहीं था ।
खर्ज चलाता कैसे घर का ,ये अनुमान नहीं था ।
हिम्मत नहीं हार जाना मैं,तेरे साथ खड़ी हूं ।
तेरे संघर्षों के पथ की , मैं भी एक कड़ी हूं ।
बच्चों को शिक्षित करने में,तेरा साथ निभाऊं ।
देख पड़ोसन के आभूषण ,कभी नहीं ललचाऊं ।
यदि सच्चा तप कर्म हमारा ,बच्चे खूब पड़ेंगे ।
पढ़ने में या खेलकूद में , ये प्रतिमान गढ़ेंगे ।
यही दुआ है अल्लाह से , इतना नाम कमाएं ।
खेलों में यदि रुचि होवे तो, ओलंपिक तक जाएं ।
'हलधर' मुझको क्षमा दान दे , प्रश्न तीक्ष्ण जो दागे ।
एक अंगूठी की क्या कीमत , स्वर्ण पदक के आगे ।
पश्चाताप किया है मैंने ,छोड़ी मांग अनूठी ।।
भोली भाली एक बलोचनी ,इसी बात पर ,रूठी ।।
Yasin_baloch_Rj04- ✍️✍️✍️