30/08/2026
*31 अगस्त : दूसरी आज़ादी, विमुक्ति दिवस और दादा साहब महाशय मसुरियादीन पासी जी का ऐतिहासिक योगदान*…
एक शोधपरक एवं अकादमिक विवेचन:-
31 अगस्त को *“दूसरी आज़ादी”* के रूप में स्मरण करना केवल किसी एक समुदाय की भावनात्मक अभिव्यक्ति ही नहीं है; अपितु इसके पीछे भारत के औपनिवेशिक इतिहास, जाति-आधारित अपराधीकरण, पुलिस निगरानी, नागरिक स्वतंत्रता और स्वतंत्र भारत द्वारा औपनिवेशिक कानूनों को समाप्त करने की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रक्रिया जुड़ी हुई है।
इस संदर्भ में दादा साहब महाशय मसूरियादीन पासीजी का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत उन्हें स्वतंत्रता सेनानी, संविधान सभा के सदस्य, उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य तथा स्वतंत्र भारत की पहली चार लोकसभाओं के सम्मानित सांसद के रूप में स्मरण करते हैं। साथ ही, समकालीन लेखों और सामुदायिक ऐतिहासिक स्मृतियों में उन्हें Criminal Tribes Act के विरुद्ध संघर्ष के प्रमुख नेता के रूप में माना गया है। ([Indian Express][1])
लेकिन इसे अकादमिक रूप से प्रस्तुत करते समय एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है—*31 अगस्त 1952 को समाप्त हुई कानूनी व्यवस्था को सीधे-सीधे 1871 के मूल अधिनियम का उसी दिन निरसन कहना तकनीकी रूप से पूरी तरह सही नहीं है।1871 के कानून के बाद 1911 और फिर 1924 के संस्करण भी आए;
1952 का *Criminal Tribes Laws (Repeal) Act* मुख्यतः 1924 के अधिनियम और उससे संबंधित प्रांतीय कानूनों को समाप्त करने वाला विधि-पाठ था।
1(क) *1871 : औपनिवेशिक शासन और “जन्मजात अपराध” की अवधारणा* के अंतर्गत ब्रिटिश शासन ने 12 अक्टूबर 1871 को Criminal Tribes Act-1871 को लागू किया। इसके मूल प्रावधानों में कुछ समुदायों, जनजातियों अथवा समूहों को “criminal tribe” घोषित करने तथा उनकी registration, surveillance and control की व्यवस्था की गई थी। कानून का मूल ढाँचा ही इस धारणा पर आधारित था कि कुछ समूहों में अपराध करने की प्रवृत्ति सामुदायिक अथवा वंशानुगत रूप से मौजूद है।आधुनिक आपराधिक न्यायशास्त्र के दृष्टिकोण से यह अत्यंत गंभीर समस्या थी, क्योंकि सामान्य सिद्धांत यह है कि *अपराध व्यक्ति के कृत्य से निर्धारित होता है, न कि जन्म, जाति अथवा समुदाय से।*
इस औपनिवेशिक व्यवस्था ने पहली बार बड़े पैमाने पर ऐसी प्रशासनिक श्रेणी बनाई जिसमें किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आपराधिक गतिविधि के बजाय उसका *समुदाय और जन्म* पुलिस निगरानी का आधार बन गया।
2(ख) *कानून का वास्तविक प्रभाव : केवल “नाम” नहीं, जीवन पर नियंत्रण था।*
Criminal Tribes व्यवस्था का प्रभाव केवल किसी सरकारी सूची में नाम दर्ज होने तक सीमित नहीं था।
इसके माध्यम से विभिन्न स्रोतों के अनुसार प्रभावित समुदायों को—
*पुलिस के समक्ष पंजीकरण*
*आवागमन पर नियंत्रण*
*निर्धारित स्थान पर रहने की बाध्यता*
*लगातार पुलिस निगरानी*
*रिपोर्टिंग की व्यवस्था*
*संदिग्ध गतिविधियों पर सामुदायिक स्तर पर निगरानी
जैसी व्यवस्थाओं का सामना करना पड़ता था।*
भारत सरकार के विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू जनजातियों से संबंधित राष्ट्रीय आयोग की सामग्री भी बताती है कि इस कानून के तहत पुलिस को समुदायों की गतिविधियों और आवागमन पर व्यापक निगरानी का अधिकार प्राप्त था और इससे उनके जीवन, आजीविका तथा सामाजिक स्थिति पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
इसलिए “जरायम पेशा कानून” को केवल एक पुराना पुलिस कानून मानना, इसके इतिहास को छोटा कर देना होगा। यह *औपनिवेशिक सामाजिक नियंत्रण की एक व्यवस्था थी।*
3(ग़) स्वतंत्रता आंदोलन और ऐसे समुदाय में
यहाँ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरोधाभास दिखाई देता है। भारत में अनेक ऐसे समुदाय थे जिन्होंने औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिरोध किया। किंतु औपनिवेशिक शासन की दृष्टि से स्वतंत्र और गतिशील समुदाय, विशेषकर वे समुदाय जो उसकी प्रशासनिक व्यवस्था में आसानी से नियंत्रित नहीं हो रहे थे, संदेह की दृष्टि से देखे गए।इसीलिए Criminal Tribes कानून का इतिहास केवल अपराध-विरोधी कानून का इतिहास नहीं है। यह *औपनिवेशिक सत्ता, सामाजिक नियंत्रण और भारतीय समुदायों के प्रतिरोध*के संबंध का भी इतिहास है।
प्रश्न उठता है, कि ब्रिटिश शासन को इस क्रिमिनल ट्राइबल एक्ट की आवश्यकता क्यों पड़ी...?
गहन मंथन के बाद देखा गया कि सुगम शासन संचालन में ये ट्राइबल समाज के लोग बाधक थे, वे समय-समय पर सरकारी गतिविधियों में बाधा डालते थे, अपनी व्यवस्था में हस्ताक्षेप पसंद नहीं करते थे.. ये ट्राइबल लोग बड़े स्वाभिमानी प्रकृति के थे, सुई की नोक के बराबर भी समझौता पसंद नहीं करना चाहते थे, उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों पर नज़र डालें तो ये प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के आस पास कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गए थे। अवध क्षेत्र में एक पासी क्रांतिकारी वीरांगना ऊदा देवी ने 36 अंग्रेज़ों का क़त्ल कर दिया था, छोटू पासी ने अंग्रेज़ी खज़ाना लूट लिया था, पचास हज़ार के ईनामी वीरा पासी जी ने जेल को तोड़ कर रायबरेली के स्थानीय शासक राणा बेनीमाधव को जेल से मुक्त करा लिया था। वहीं देश के अन्य भागों में भी जनजातिय समुदाय के क्रांतिकारियों ने भी स्थान-स्थान पर विद्रोह कर के शासन की नाक में दम कर दिया था.. जिसमें कुछ क्रांतिकारी और उनसे जुड़ी घटनायें निम्न वत हैं..बिरसा मुंडा: मुंडा विद्रोह (उलगुलान) के महानायक।टंट्या भील: 'आदिवासी रॉबिनहुड' के नाम से प्रसिद्ध क्रांतिकारी।सिद्धू और कान्हू मुर्मू: संथाल विद्रोह (1855) के प्रमुख नायक।अल्लूरी सीताराम राजू: रम्पा विद्रोह के नेता (इन्हें 'मान्यम वीरुडु' भी कहा जाता है)।रानी गाइदिनल्यू: नागालैंड की क्रांतिकारी, जिन्हें जवाहरलाल नेहरू ने 'रानी' की उपाधि दी।भीमा नायक: निमाड़ क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ भील विद्रोह के नेतृत्वकर्ता।तिल्का मांझी: ब्रिटिश शासन के खिलाफ हथियार उठाने वाले पहले आदिवासी नेताओं में से एक।राजी गोंड: तेलंगाना क्षेत्र में निजाम और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले गोंड शहीद।खज्या नायक: भीमा नायक के साथी और निमाड़ के प्रमुख भील योद्धा।
*Criminal Tribal Act को हटाने के उपक्रम की पृष्ठभूमि में महाशय मसुरियादीन पासी जी द्वारा किया गया प्रतिरोधपूर्ण संघर्ष महत्वपूर्ण इसे बनाता है*।
4(घ) दादा साहब महाशय मसुरियादीन पासी : संघर्ष से संसद तक:-
उपलब्ध जीवनी-सामग्री के अनुसार मसुरियादीन पासी जी का जन्म *2 अक्टूबर 1911* को प्रयागराज के गंगा किनारे बसे जोंधवल मोहल्ले में हुआ था। वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलनों के कारण कई बार जेल गए। उपलब्ध स्रोत उन्हें 1930 के दशक से 1940 के दशक तक स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय बताते हैं। *Times of India* के शोधपरक लेख के अनुसार वे नमक सत्याग्रह के दौरान जेल गए और 1940 तथा 1942 में भी गिरफ्तार हुए। उन्होंने एक मुद्रण प्रेस भी चलाया, जिसके माध्यम से औपनिवेशिक-विरोधी साहित्य प्रकाशित होता था। उन्हें केवल “राजनेता” के रूप में देखना अधूरा होगा। वे *स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षावादी और जनप्रतिनिधि,इन सभी भूमिकाओं में सक्रिय थे।
5 (च) संविधान सभा में उनकी उपस्थिति:-
मसुरियादीन पासी स्वतंत्र भारत की संवैधानिक व्यवस्था के निर्माण की प्रक्रिया से भी जुड़े।उपलब्ध अभिलेखीय सूचनाएँ उन्हें *संविधान सभा के सदस्य*के रूप में दर्ज करती हैं। इसके बाद वे अनंतिम संसद (Provisional Parliament) में भी रहे और स्वतंत्र भारत की पहली चार लोकसभाओं के सदस्य चुने गए। उनका संसदीय जीवन विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि वे उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने—औपनिवेशिक शासन देखा → स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया → संविधान निर्माण की प्रक्रिया में योगदान दिया व उपबंधों के संयोजन में विधिवेत्ताओं का मार्गदर्शन किया→ स्वतंत्र भारत की संसद में प्रवेश किया।
यह संक्रमणीय दौर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
6 (छ)चार बार लोकसभा सदस्य होने का तथ्य
यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि मसुरियादीन पासी जी ने स्वतंत्र भारत की *पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी लोकसभा*में निर्वाचित हुए। उपलब्ध अभिलेखीय विवरण उन्हें 1952 से 1970 तक संसद से जोड़ते हैं।
1952 और 1957 में वे फूलपुर से जवाहरलाल नेहरू के साथ निर्वाचित हुए थे। उस समय फूलपुर संसदीय क्षेत्र में एक सामान्य और एक अनुसूचित जाति प्रतिनिधित्व की व्यवस्था के कारण दोनों साथ संसद पहुँचे। बाद में उन्होंने चायल/कौशाम्बी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।
इसलिए उन्हें *चार बार के सांसद* कहना ऐतिहासिक रूप से उचित है।
7(ज) Criminal Tribes Act-1871 के विरुद्ध दादा साहब मसुरियादीन पासी जी..
समकालीन मीडिया-आधारित शोध उन्हें Criminal Tribes Act को समाप्त कराने के आंदोलन से जोड़ता है। *Indian Express* ने उन्हें इस कानून के उन्मूलन के लिए आंदोलन शुरू करने वाले नेताओं में श्रेय दिया है और यह भी उल्लेख किया है कि उन्हें इस कानून के विरोध के कारण जेल जाना पड़ा था।*Times of India* में उनके जीवन पर प्रकाशित शोधपरक सामग्री में भी उनके परिवार और शोधकर्ताओं के हवाले से Criminal Tribes Act के उन्मूलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख किया गया है।
इस आधार पर यह कहना उचित है कि:*दादा साहब महाशय मसुरियादीन पासी जी ने Criminal Tribes व्यवस्था के विरुद्ध राजनीतिक और सामाजिक प्रतिरोध को संगठित रूप में करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।लेकिन अकादमिक लेखन में यह कहना कि“केवल मसूरियादीन पासी के प्रयासों से कानून समाप्त हुआ” उपलब्ध प्राथमिक दस्तावेजों के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता। इसके पीछे केंद्र सरकार, प्रांतीय सरकारों, सामाजिक आंदोलनों, स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिकी तथा अन्य नेताओं की भूमिका भी थी। ऐसा कहना इतिहास को कमजोर नहीं करता; बल्कि मसुरियादीन पासी जी के वास्तविक योगदान को अधिक विश्वसनीय बनाता है।
8(झ) 15 अगस्त 1947 के बाद भी समस्या क्यों बनी रही?
यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारत 15 अगस्त 1947 को राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हुआ, लेकिन औपनिवेशिक काल की सभी कानूनी व्यवस्थाएँ उसी दिन समाप्त नहीं हो गईं। Criminal Tribes व्यवस्था इसका महत्वपूर्ण उदाहरण था। स्वतंत्रता के बाद भारतीय राज्य के सामने यह प्रश्न था कि क्या किसी समुदाय को जन्म अथवा जातीय पहचान के आधार पर “अपराधी” मानने वाली व्यवस्था नए लोकतांत्रिक और संवैधानिक भारत में स्वीकार की जा सकती है?
उत्तर स्पष्ट रूप से 'नहीं' था।
नए भारत का संवैधानिक दर्शन व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और विधि के समक्ष समान संरक्षण पर आधारित था। इसी व्यापक परिवर्तन के संदर्भ में Criminal Tribes व्यवस्था को समाप्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
9(ट) एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सुधार : 1871 → 1911 → 1924 → 1952
यहाँ इतिहास को सही क्रम में रखना आवश्यक है:
1871 में पहली बार Criminal Tribes Act लागू हुआ।
1911 में दूसरी बार कानून में व्यापक परिवर्तन हुए और नई कानूनी व्यवस्था बनी।
1924 में विभिन्न संशोधनों को समेकित करते हुए **Criminal Tribes Act, 1924** आया। India Code की सूची भी 1871, 1911 और 1924 के अलग-अलग अधिनियमों को दर्ज करती है। [IndiaCode by eCourtsIndia]
1947 के बाद स्वतंत्र भारत में इस औपनिवेशिक व्यवस्था की समीक्षा तेज हुई।
1952 में संसद ने Criminal Tribes Laws (Repeal) Act, 1952 पारित किया। इसमें 1924 के Criminal Tribes Act और संबंधित कानूनों को समाप्त करने का प्रावधान था। [India Code]
10(ठ) 31 अगस्त 1952 का ऐतिहासिक महत्व
यहाँ 31 अगस्त 1952 का वास्तविक कानूनी महत्व सामने आता है।
Criminal Tribes Laws (Repeal) Act, 1952 में स्पष्ट रूप से कहा गया कि Criminal Tribes Act, 1924 तथा संबंधित कानून 31 अगस्त 1952 से समाप्त होंगे। अर्थात् 31 अगस्त 1952 औपनिवेशिक Criminal Tribes व्यवस्था के कानूनी अंत का निर्णायक दिन।
*इसी कारण आज 31 अगस्त को भारत के विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों के बीच विमुक्ति दिवस / Vimukta Jatis Day* के रूप में मनाया जाता है।
11(ड)“200+ जातियाँ” — इस संख्या को कैसे समझें?
लोकप्रिय सामाजिक स्मृति में अक्सर कहा जाता है कि 200 से अधिक जातियों/समुदायों को 31 अगस्त 1952 को मुक्ति मिली।
यह संख्या व्यापक अर्थ में प्रचलित है, लेकिन अकादमिक लेखन में संख्या को सावधानी से प्रस्तुत करना चाहिए। उदाहरण के लिए जवाहरलाल नेहरू के 2 सितंबर 1952 के मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में **153 समुदायों** के denotification का उल्लेख मिलता है।
दूसरे ऐतिहासिक स्रोत अलग-अलग चरणों और क्षेत्रों में अलग संख्या देते हैं। इसलिए बेहतर अकादमिक भाषा होगी:“देश के विभिन्न हिस्सों में 150 से अधिक तथा व्यापक ऐतिहासिक गणनाओं में लगभग 200 समुदायों को इस औपनिवेशिक कलंक से विमुक्त किया गया।”
इस तरह संख्या को राजनीतिक नारे की तरह नहीं बल्कि ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
12(ढ). क्या 31 अगस्त को “दूसरी आज़ादी” कहना उचित है?
सामाजिक और स्मृति-इतिहास के स्तर पर—हाँ,
यह अत्यंत सार्थक अभिव्यक्ति है।
15 अगस्त 1947 ने भारत को औपनिवेशिक राजनीतिक शासन से स्वतंत्र किया।
31 अगस्त 1952 ने उन समुदायों को औपनिवेशिक “Criminal Tribe” की कानूनी पहचान से मुक्ति दी जिन्हें स्वतंत्रता के बाद भी औपनिवेशिक कानून की विरासत झेलनी पड़ रही थी।
इसलिए दोनों स्वतंत्रताओं की प्रकृति अलग थी:
*{15, अगस्त 1947}* -- *{31, अगस्त 1952}*
1-विदेशी शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता | --
1-औपनिवेशिक आपराधिक-कलंक से कानूनी मुक्ति |
2-भारत की स्वतंत्रता ----
2-विमुक्त समुदायों की denotification
3- सत्ता का हस्तांतरण ----
3- दमनकारी कानूनी व्यवस्था का अंत |
4-राष्ट्रीय स्वतंत्रता ----
4- सामाजिक-कानूनी स्वतंत्रता |
इसी तरह व्यापक अर्थ में हम पहली आज़ादी के साथ-साथ “दूसरी आज़ादी” के रूप में विमुक्ति दिवस को एक शक्तिशाली ऐतिहासिक रूपक के रूप में अभिव्यक्त कर सकते हैं।
13(ण) लेकिन क्या 31 अगस्त 1952 के बाद भेदभाव पूरी तरह समाप्त हो गया?
*दुर्भाग्य से नहीं...*
Criminal Tribes व्यवस्था समाप्त होने के बाद भी उसकी सामाजिक और पुलिस-प्रशासनिक विरासत समाप्त नहीं हुई।
कई विमुक्त और घुमंतू समुदायों को बाद में अलग-अलग राज्यों में *Habitual Offenders*संबंधी कानूनों और पुलिस निगरानी की व्यवस्थाओं का सामना करना पड़ा।
उदाहरण के लिए 1952 के पंजाब के Habitual Offenders कानून के उद्देश्य में Criminal Tribes कानून के समाप्त होने के बाद “habitual offenders” की निगरानी के लिए नई व्यवस्था बनाने की बात कही गई थी। ([Indian Kanoon][11])
इसलिए इतिहासकारों के लिए 31 अगस्त 1952 अंतिम समाधान नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ रहा है।
आज भी विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों से संबंधित सरकारी और शोध संस्थाएँ इस औपनिवेशिक विरासत के सामाजिक प्रभावों—कलंक, पुलिस संदेह, आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक बहिष्करण—पर चर्चा करती हैं।
14(प) महाशय मसुरियादीन पासी जी की विरासत का व्यापक अर्थ:-*मसुरियादीन पासी जी की विरासत को केवल “पासी समाज के नेता” तक सीमित करना उनके ऐतिहासिक योगदान को संकुचित करना होगा।*
उनका जीवन कम-से-कम चार बड़े संघर्षों को जोड़ता है:
① राजनीतिक स्वतंत्रता:-उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और जेल गए। ② संवैधानिक लोकतंत्र:-वे संविधान सभा से जुड़े और स्वतंत्र भारत की संस्थाओं के निर्माण में भागीदार बने। ③ सामाजिक सम्मान:-Criminal Tribes जैसी औपनिवेशिक पहचान के विरुद्ध उनका संघर्ष समुदायों की गरिमा और नागरिक अधिकारों के प्रश्न से जुड़ा था।
④ शिक्षा:-उनके जीवन से संबंधित स्रोत बताते हैं कि उन्होंने अनुसूचित जातियों की शिक्षा के लिए भी काम किया और इलाहाबाद में छात्रावास(डी सी हॉस्टल) तथा प्राथमिक विद्यालय स्थापित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इसलिए उनकी विरासत का केंद्रीय संदेश केवल ज़रायम पेशा “कानून हटाना” ही नहीं बल्कि—
*स्वतंत्रता + सम्मान + शिक्षा + प्रतिनिधित्व + संवैधानिक अधिकार का समन्वय है।
15(फ़) इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण संदेश:-
Criminal Tribes Act का इतिहास हमें आधुनिक लोकतंत्र की एक बुनियादी शिक्षा देता है कि
*किसी व्यक्ति को उसके अपराध के लिए दंडित किया जा सकता है; लेकिन किसी व्यक्ति को केवल उसके जन्म, जाति या समुदाय के कारण अपराधी मानना न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांत के विरुद्ध है।*
औपनिवेशिक शासन ने जिस सामुदायिक अपराधीकरण को प्रशासनिक व्यवस्था बनाया था, स्वतंत्र भारत ने धीरे-धीरे उसे अस्वीकार किया।
इस दृष्टि से 31 अगस्त केवल एक तारीख नहीं है।
यह उस विचार की विजय का प्रतीक है कि अपराध व्यक्ति का कृत्य हो सकता है, लेकिन अपराधीपन किसी जाति की विरासत नहीं हो सकता।*
16(ब) निष्कर्ष :- “दूसरी आज़ादी” का वास्तविक अर्थ
आज 31 अगस्त को महाशय मसूरियादीन पासी को याद करना केवल किसी महान पूर्वज को श्रद्धांजलि देना नहीं है, अपितु यह उस ऐतिहासिक संघर्ष को याद करना है जिसमें औपनिवेशिक सत्ता ने समुदायों को अपराधी घोषित किया, स्वतंत्रता सेनानियों ने उस कलंक का विरोध किया, संविधान ने समानता और स्वतंत्रता का नया दर्शन दिया, और अंततः स्वतंत्र भारत ने Criminal Tribes की कानूनी व्यवस्था को समाप्त किया।
इस पूरे ऐतिहासिक क्रम में महाशय मसूरियादीन पासी का योगदान विशेष सम्मान का अधिकारी है। उपलब्ध स्रोत उन्हें Criminal Tribes Act के विरुद्ध संघर्ष के महत्वपूर्ण नेताओं में स्थान देते हैं। ([Indian Express]
इसलिए *31 अगस्त 1952 को “दूसरी आज़ादी” कहना एक गहरी सामाजिक-स्मृति और न्याय की चेतना का प्रतीक है।*
हालाँकि अकादमिक दृष्टि से यह भी याद रखना चाहिए कि यह मुक्ति किसी एक व्यक्ति या एक राजनीतिक निर्णय का परिणाम नहीं थी; यह लंबे संघर्ष, स्वतंत्रता आंदोलन, संवैधानिक परिवर्तन, सरकारी समितियों और अनेक सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेपों की संयुक्त परिणति थी। नेहरू के 1952 के पत्र में भी 1949 की समिति द्वारा कानून समाप्त करने की अनुशंसा का उल्लेख मिलता है। ([Nehru Archive][10])
इसलिए इतिहास का अधिक संतुलित निष्कर्ष यह होगा कि 15 अगस्त 1947 ने भारत को विदेशी शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता दी; 31 अगस्त 1952 ने विमुक्त समुदायों को औपनिवेशिक ‘जरायम पेशा’ पहचान और उससे जुड़ी कानूनी व्यवस्था से मुक्ति की दिशा में निर्णायक कदम दिया। इस ऐतिहासिक परिवर्तन के संघर्षशील नायकों में महाशय मसूरियादीन पासी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है और यही कारण है कि 31 अगस्त 'विमुक्ति दिवस' को स्मरण करना केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान, संवैधानिक समानता और नागरिक गरिमा की रक्षा का संकल्प दोहराना भी है।
उपर्युक्त आलेख के आलोक में सबसे आश्चर्यजनक बात यह रही कि इस काले क़ानून को तत्कालीन परिवेश में किसी भी राष्ट्रीय स्तर के नेता चाहे महात्मा गाँधी जी रहे हों या दलित मसीहा कहे जाने वाले दलितोद्दोरक.. किसी ने भी गंभीरता से न लिया, और न ही कभी इसकी आलोचना किया, इसके विरुद्ध संघर्ष और हटाने की बात तो बहुत दूर की रही... जबकि देखा जाए तो इसी काले क़ानून ने समाज में आज़ आर्थिक रूप से जो खाईं खोद दी गयी है, वह इसी की काले क़ानून की देन है....क्योंकि इस काले क़ानून ने यहाँ के कुछ भारतीय नागरिकों की चल-अचल सम्पत्ति छीन कर दूसरे नागरिकों को देने का काम किया है...अमीर और ग़रीब बनाने का काम यहाँ इसी क़ानून ने किया था, जिसका दंश आज़ भी एक बहुत बड़ी आबादी भुगतने को अभिशप्त है।
(लेख का स्रोत/आधार:- भारत सरकार का *Criminal Tribes Laws (Repeal) Act, 1952* ([India Code][8]); संसद का डिजिटल अभिलेख ([E-Parliament][13]); नेहरू अभिलेख में 1952 का पत्र ([Nehru Archive][10]); National Commission for Denotified, Nomadic and Semi-Nomadic Tribes की ऐतिहासिक सामग्री ([DWBDNC][3]); तथा मसूरियादीन पासी के जीवन पर उपलब्ध संसदीय/ऐतिहासिक एवं शोधपरक सामग्री। (वीके पासी Times of India.)
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