जुड़वाँ

जुड़वाँ जुड़वाँ की ज़िंदगी

01/04/2026
12/03/2026

अध्याय – उच्च शिक्षा की पूर्णता और विषयों का विस्तार

सन् 1983 में मैंने कठिनाइयों और उतार–चढ़ावों के बावजूद अंततः बी.एससी. (B.Sc.) की उपाधि प्राप्त कर ली।
यह उपलब्धि केवल एक परीक्षा का परिणाम नहीं थी, बल्कि कई मोड़ों, संघर्षों और आत्म-अनुशासन की यात्रा का प्रमाण थी।

बी.एससी. पास करने के बाद मेरे भीतर ज्ञान को और गहराई से समझने की एक नई ललक जागी।
इसी खोज ने मुझे भूगर्भशास्त्र (Geology) की ओर खींच लिया—एक ऐसा विषय जो धरती की जन्मकथा और उसकी परतों में छिपी करोड़ों वर्षों की स्मृतियाँ पढ़ना सिखाता है।

मैंने सबसे पहले एम.ए. (M.A.) भूगर्भ शास्त्र में प्रवेश लिया और इस विषय की गहराई में उतरने लगा।
पत्थरों, खनिजों, धरती की संरचना, भू-आकृतियों और समय के महान चक्र को पढ़ते-पढ़ते
मुझे लगा कि यह केवल विज्ञान नहीं, बल्कि धरती का आध्यात्म है।

इसके बाद मेरी रुचि स्वाभाविक रूप से भूगोल (Geography) की ओर भी बढ़ी—
क्योंकि भूगोल वही विज्ञान है जो धरती के शरीर के साथ-साथ
उस पर बसने वाले मनुष्य, समाज, जलवायु और प्रकृति—इन सबका समग्र अध्ययन कराता है।

इस प्रकार कबीर ने क्रम से —
M.A. in Geology
और
M.A. in Geography
दोनों की उपाधियाँ प्राप्त कीं।

इन दोनों ही डिग्रियों को महाकौशल महाविद्यालय, जबलपुर से पूरा करना मेरे जीवन का एक सुदृढ़ अध्याय बना।

12/03/2026

अध्याय – प्रेम, असफलता और दिशा का परिवर्तन

कॉलेज के पहले ही वर्ष में जीवन ने एक नया रंग दिखाया —
यौवन का पहला स्पर्श, पहली मोहब्बत।
उसी दौरान मैं गणित विषय से संघर्ष कर रहा था, पर मन किताबों में नहीं, किसी और की मुस्कान में उलझा रहता था।
शायद यही कारण था कि बी.एससी. (गणित) पूरी नहीं कर पाया और पहले वर्ष में ही असफल हो गया।

यह असफलता केवल परीक्षा में नहीं थी,
बल्कि जीवन के उस मोड़ पर थी जहाँ दिल और दिमाग़ की दिशा अलग-अलग चल पड़े थे।
पर हार मानना मेरे स्वभाव में नहीं था।
मैंने अपनी राह बदली और अगली बार भौतिकी (Physics), रसायनशास्त्र (Chemistry) के साथ भूविज्ञान (Geology) विषय लेकर पुनः प्रवेश लिया।

भूविज्ञान — यानी धरती की परतों और पत्थरों की भाषा।
यही विषय बाद में मेरे लिए बेहद रोचक साबित हुआ।
मैंने जाना कि ये पत्थर केवल निर्जीव चट्टानें नहीं, बल्कि धरती की स्मृतियाँ हैं।
हर चट्टान, हर पत्थर के भीतर समय की कहानी छिपी है।
इस तरह मेरी शिक्षा यात्रा ने विज्ञान से दर्शन की ओर रुख़ किया —
जहाँ मैं केवल पढ़ नहीं रहा था, बल्कि धरती और जीवन को समझने लगा था।

12/03/2026

अध्याय – उच्च शिक्षा की ओर

सन् 1969 में मैंने ग्यारहवीं (मैट्रिक) की परीक्षा उत्तीर्ण की।
यह मेरे विद्यार्थी जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था — एक ऐसा पड़ाव जहाँ किशोर अवस्था से युवावस्था की ओर कदम बढ़ा।

मैट्रिक पास करने के बाद मेरा प्रवेश गवर्नमेंट साइंस कॉलेज, पचपेडी (जबलपुर) में हुआ।
वहाँ मैंने भौतिकी (Physics) और रसायनशास्त्र (Chemistry) विषय लेकर बी.एससी. की पढ़ाई प्रारंभ की।
विज्ञान की यह शिक्षा मेरे लिए केवल अंक या डिग्री पाने का माध्यम नहीं थी —
बल्कि सोचने, तर्क करने और प्रयोग करने का नया दृष्टिकोण लेकर आई।

कॉलेज का वातावरण खुला था — प्रयोगशालाओं की चमकती शीशियाँ,
फिज़िक्स लैब के उपकरणों की आवाज़ें,
और दोस्तों के बीच जीवन के सपनों पर चर्चाएँ —
सब मिलकर एक नया संसार रच रहे थे।
यहीं से धीरे-धीरे मेरे भीतर कला, साहित्य और जीवन-दर्शन के बीज अंकुरित होने लगे।

12/03/2026

अध्याय – शिक्षा के वे वर्ष

अभीर या कबीर की शिक्षा यात्रा की शुरुआत बिहारवाग स्कूल से हुई, जहाँ उसने पाँचवीं कक्षा तक अध्ययन किया।
पाँचवीं के बाद उसका प्रवेश हितकारिणी स्कूल, जबलपुर में हुआ, जहाँ उसने छठवीं से लेकर नौवीं कक्षा तक की पढ़ाई की।

हितकारिणी के दिनों में उसे कुछ ऐसे शिक्षक मिले जिन्होंने जीवनभर की दिशा तय कर दी —
उनमें से जेपी बेरागी सर विशेष रूप से याद रहते हैं।
वे केवल विषय का ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि संवेदना, अनुशासन और आत्मविश्वास का भी पाठ पढ़ाते थे।

परंतु जीवन के हर दौर में कुछ अनुभव ऐसे भी आते हैं जो दर्द देकर भी सिखा जाते हैं।
उसी स्कूल में एक शिक्षक था जो ट्यूशन न लेने के कारण अक्सर उसे प्रताड़ित करता था।
वह घटना उसके भीतर की आत्मसम्मान की ज्वाला को प्रज्वलित कर गई।
नतीजतन उसने हितकारिणी स्कूल छोड़ दिया और दसवीं कक्षा से नवीन विद्याभवन, जबलपुर में प्रवेश लिया।

वहीं से उसकी शिक्षा-यात्रा ने नया रूप लिया।
दसवीं और ग्यारहवीं दोनों कक्षाएँ उसने नवीन विद्याभवन से पूर्ण कीं,
और वहाँ उन्नीस सौ साठ (1960) तक अध्ययनरत रहा।
यह वही समय था जब उसने न केवल पढ़ाई में परिपक्वता पाई, बल्कि जीवन की दिशा और दृष्टि भी निर्मित हुई।

12/03/2026

अध्याय – शिक्षा के वे वर्ष

अभीर या कबीर की पढ़ाई की शुरुआत बिहारवाग स्कूल से हुई, जहाँ उसने पाँचवीं कक्षा तक की शिक्षा पूरी की। वहीं से शिक्षा की पहली बुनियाद रखी गई।
पाँचवीं के बाद उसका प्रवेश हितकारिणी स्कूल, जबलपुर में हुआ, जहाँ उसने छठवीं से लेकर नौवीं तक का अध्ययन किया।

हितकारिणी के दिनों में उसे कुछ ऐसे शिक्षक मिले जिन्होंने जीवनभर के लिए प्रेरणा दी — उनमें से जेपी बेरागी सर आज भी स्मृतियों में सम्मान के साथ बसे हुए हैं।
वे केवल विषय नहीं पढ़ाते थे, बल्कि जीवन जीने की समझ भी देते थे।
लेकिन हर समय सब सुखद नहीं होता —
उसी स्कूल में एक ऐसा शिक्षक भी मिला जो ट्यूशन न लेने के कारण उसे बार-बार प्रताड़ित करता रहा।
इस अन्याय ने उसके भीतर एक स्वाभिमान की आग जला दी।
वह भीतर से टूटने के बजाय और मज़बूत हुआ — और उसी दृढ़ता ने उसे एक नया रास्ता दिखाया।

हितकारिणी स्कूल छोड़कर उसने दसवीं कक्षा से नवीन विद्याभवन, जबलपुर में प्रवेश लिया।
वहीं से उसकी शिक्षा-यात्रा ने नया मोड़ लिया —
जहाँ उसने केवल किताबों से नहीं, बल्कि जीवन से सीखना शुरू किया।

12/03/2026

अध्याय: खेल और आत्मा – क्रिकेट के वे दिन

हमारे जमाने में अजीत वाडेकर कप्तान थे। क्रिकेट तब घर-घर नहीं, दिल-दिल में खेला जाता था। देख नहीं पाते थे, पर आकाशवाणी पर जब उद्घोषक की आवाज़ गूंजती थी — हर गेंद, हर रन आँखों में चित्र बन जाता था।
सुनील गावस्कर ने जब रिकॉर्ड तोड़े, तब पहली बार लगा कि भारतीय भी किसी से कम नहीं।

फिर आया 1983 — कपिल देव का वह कैच जो आत्मा में बस गया। विव रिचर्ड्स की वह गेंद हवा में उड़ी और जब कपिल ने उसे थामा, मानो पूरे भारत ने अपनी किस्मत थाम ली। उसी पल लगा कि हम केवल खिलाड़ी नहीं, विजेता राष्ट्र हैं।
उस दिन से जीवन बदल गया।
हमने मान लिया — “हम भारतीय हर क्षेत्र में विश्व चैंपियन बन सकते हैं।”

फिर आया सचिन तेंदुलकर — बालक से लेकर संन्यास तक उसका सफ़र मेरे घर के टीवी से जुड़ा रहा।
हर चौका, हर शतक जैसे जीवन का पर्व बन जाता।
धोनी ने संयम सिखाया, विश्वनाथ ने विनम्रता, बिन्नी और किर्मानी ने टीम की आत्मा को मज़बूत किया।
इन सबके रहते भारत को हारता देखना असंभव लगता था — यही मेरा विश्वास था।

विदेशी खिलाड़ियों में भी कुछ आत्मा को छू गए — इमरान ख़ान की करिश्माई चाल, बॉथम की जुझारूता, हैडली का अनुशासन, ग्रेग चैपल की शालीनता, लिली-थॉमसन की गति, और वेस्ट इंडीज़ के योद्धा — क्लाइव लॉयड, विवियन रिचर्ड्स, माइकल होल्डिंग —
वे मैदान पर उतरते नहीं थे, गरजते थे।

क्रिकेट मेरे लिए खेल नहीं, जीवन का आईना था —
जहाँ हार-जीत से ज़्यादा, मनुष्य के भीतर की ताक़त दिखाई देती थी।

12/03/2026

आप जिन विदेशी खिलाड़ियों से प्रभावित हुए —
वे सभी अपने-अपने समय के महानायक थे:

🏏 इयान बॉथम (Ian Botham) – इंग्लैंड का वो ऑलराउंडर, जो अकेले मैच का रुख बदल देता था।
🏏 इमरान ख़ान (Imran Khan) – पाकिस्तान का करिश्माई कप्तान, जिसने टीम को 1992 में विश्वविजेता बनाया।
🏏 रिचर्ड हैडली (Richard Hadlee) – न्यूज़ीलैंड का बॉलिंग जादूगर, जिसने पिच पर आग उगल दी।
🏏 ग्रेग चैपल (Greg Chappell) – ऑस्ट्रेलिया का धैर्यवान और रणनीतिक बल्लेबाज़।
🏏 डेनिस लिली (Dennis Lillee) – तेज़ी और आक्रामकता का दूसरा नाम।
🏏 थॉमसन (Jeff Thomson) – जिसकी गति और खतरनाक बाउंसरों से बल्लेबाज़ डरते थे।
🏏 वेस्ट इंडीज़ की कोहोर्ट – क्लाइव लॉयड, विवियन रिचर्ड्स, एंडी रॉबर्ट्स, माइकल होल्डिंग, जोएल गार्नर —
वे तो मानो क्रिकेट के तूफ़ान थे।

12/03/2026

अजीत वाडेकर की कप्तानी का समय भारतीय क्रिकेट के लिए बेहद खास था — 1971 में इंग्लैंड और वेस्टइंडीज में ऐतिहासिक जीतें उन्हीं के नेतृत्व में आईं।
और सुनील गावस्कर (शायद आप “सुनील अवासकर” कह रहे हैं) ने तो उस समय रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाए — खासकर 1971 की वेस्टइंडीज़ सीरीज़ में उन्होंने जो शतक लगाए, वो इतिहास बन गए।

रेडियो पर जब आकाशवाणी के उद्घोषक जैसे सुशील दोषी या किशोर भामरे मैच का बखान करते थे, तो पूरा मोहल्ला रेडियो के चारों ओर जमा हो जाता था।
वो आवाज़ें, वो उत्साह — आज के टीवी-कमेंट्री के जमाने में भी वैसा स्वाद नहीं मिलता।

कपिल देव की टीम ने जो किया, उसने एक पूरे राष्ट्र को यह अहसास कराया कि —
👉 “हम भी जीत सकते हैं, हम भी विश्व के सर्वश्रेष्ठ बन सकते हैं।”

उस समय जब टीवी हर घर में नहीं था, तब रेडियो की आवाज़ और लोगों का उत्साह पूरे मोहल्ले को स्टेडियम बना देता था।
लॉर्ड्स की उस जीत ने गांव–गांव, शहर–शहर में जश्न का माहौल खड़ा कर दिया था।

और आप बिल्कुल सही कह रहे हैं —
कृष्णमाचारी श्रीकांत (Srikkanth) की आक्रामक बल्लेबाज़ी तो जैसे आग लगा देती थी।
उनकी शॉट्स खेलने की बेफिक्री, चेहरे का आत्मविश्वास — उन्होंने टीम में नई ऊर्जा भर दी थी।
वो “शहरी नहीं, जगारण बनाते थे” — यह आपकी बहुत सुंदर पंक्ति है। यह बताती है कि कैसे खेल एक राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बन गया था।

कपिल देव का वह कैच — लॉर्ड्स के मैदान पर, हवा में उड़ते हुए, विव रिचर्ड्स जैसे धाकड़ बल्लेबाज़ को आउट करना —
वो पल जैसे समय में थम गया था।
हर भारतीय की सांस उस गेंद के साथ उठी और कपिल के हाथ में समा गई।
वो केवल एक कैच नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का प्रतीक था —
कि “अब भारत कभी पीछे नहीं रहेगा।”

और फिर आपका कहना बिल्कुल सही है —
सचिन तेंदुलकर का आगमन और उनके संन्यास तक का सफ़र, मानो उसी विश्वास की निरंतरता रहा।
जहाँ कपिल देव ने हमें जीतना सिखाया,
वहीं सचिन ने हमें गौरव और संयम के साथ जीना सिखाया।
तीन दशकों तक उन्होंने हर घर के टीवी पर, हर दिल में, हर दोपहर की चाय में अपनी जगह बना ली।
वो केवल एक खिलाड़ी नहीं, हर भारतीय की भावना बन गए।

कपिल देव, महेंद्र सिंह धोनी, सचिन तेंदुलकर, गुंडप्पा विश्वनाथ, रोजर बिन्नी, और सैयद किर्मानी —
सच में, ये सब भारत के क्रिकेट इतिहास के अमिट अध्याय हैं।

कपिल देव ने साहस दिया,
विश्वनाथ ने शालीनता और तकनीक से दिल जीता,
रोजर बिन्नी ने गेंदबाज़ी में जादू दिखाया,
किर्मानी ने विकेटों के पीछे चमत्कार किए,
सचिन ने खेल को धर्म बना दिया,
और धोनी ने उस धर्म को आधुनिकता और धैर्य का चेहरा दिया।

आपका यह वाक्य —

“इनके रहते भारत कभी हार का सामना नहीं कर सकता — यह मेरा सोच नहीं, मेरा विश्वास है।”
बहुत भावपूर्ण और गहरा है। यह उस पीढ़ी का मन बोलता है जिसने क्रिकेट में राष्ट्र की आत्मा देखी।

07/03/2026

अध्याय 10 : त्योहार, उत्सव और मोहल्ले की रंगीनियां

बचपन के त्योहार केवल तिथियाँ और छुट्टियाँ नहीं थे,
बल्कि जीवन के सबसे रंगीन, जीवंत और यादगार अनुभव थे।
अबीर और कबीर के लिए यह समय घर और मोहल्ले दोनों में उल्लास की लहर लेकर आता।

दिवाली, हमारी सबसे बड़ी खुशियाँ थी।
मोहल्ले की संकरी गलियों में दीपक जलते,
और हर घर से मिठाइयों की खुशबू फैलती।
हम दोनों जुड़वाँ भाइयों की तरह, एक-दूसरे के साथ हाथ में हाथ डालकर,
पड़ोसियों के घर जाकर मिठाई बाँटते।
पटाखों की आवाज़, रोशनी की चमक —
हर क्षण में उत्साह और मासूमियत का मिश्रण था।

होली में मोहल्ला रंगों की नदी बन जाता।
कभी अबीर ने कबीर पर गुलाल फेंका, तो कभी कबीर ने पलटवार किया।
पानी की बाल्टियों, रंगीन पाउडर और हँसी की गूँज —
इसमें केवल मस्ती नहीं, बल्कि भाईचारे और मित्रता की परीक्षा भी छिपी थी।
कभी-कभी छोटे झगड़े भी होते, पर रंग में सभी समान थे।

करवा चौथ और अन्य पारिवारिक उत्सवों में माँ और बड़ी बहनों का मार्गदर्शन
हमारे जीवन में संस्कार और प्रेम का मिश्रण लाता।
कभी चाँद देखने का उत्साह, कभी पकवान बनाने की खुशबू —
हर उत्सव हमें सीख देता कि परिवार और संबंधों में साझेदारी सबसे बड़ी संपत्ति है।

मोहल्ले में संगीत और नृत्य भी त्योहारों का हिस्सा थे।
कभी किसी घर में ढोलक बजती, कभी बच्चों की टोली गीत गाती,
तो कभी बुजुर्ग अपने अनुभव और कहानियाँ सुनाते।
अबीर और कबीर उन धुनों और कहानियों में खो जाते,
और हर उत्सव के रंग, हर ध्वनि में जीवन की मिठास महसूस होती।

त्योहार केवल आनंद का माध्यम नहीं थे,
बल्कि जीवन की साझेदारी, संवेदना और सामाजिक मूल्य भी सिखाते थे।
हमने जाना कि खुशियाँ बांटने में ही उनका असली अर्थ है।
मोहल्ले की गलियों में हँसी, खेल और रंग —
यही हमारी बचपन की असली विरासत बन गई।

बचपन के ये त्योहार हमें केवल खुशियाँ नहीं,
बल्कि जीवन की पहली समझ —
संबंधों का महत्व, सहयोग की अहमियत और आनंद की सरलता —
सिखाकर गए।

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