12/03/2026
अजीत वाडेकर की कप्तानी का समय भारतीय क्रिकेट के लिए बेहद खास था — 1971 में इंग्लैंड और वेस्टइंडीज में ऐतिहासिक जीतें उन्हीं के नेतृत्व में आईं।
और सुनील गावस्कर (शायद आप “सुनील अवासकर” कह रहे हैं) ने तो उस समय रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाए — खासकर 1971 की वेस्टइंडीज़ सीरीज़ में उन्होंने जो शतक लगाए, वो इतिहास बन गए।
रेडियो पर जब आकाशवाणी के उद्घोषक जैसे सुशील दोषी या किशोर भामरे मैच का बखान करते थे, तो पूरा मोहल्ला रेडियो के चारों ओर जमा हो जाता था।
वो आवाज़ें, वो उत्साह — आज के टीवी-कमेंट्री के जमाने में भी वैसा स्वाद नहीं मिलता।
कपिल देव की टीम ने जो किया, उसने एक पूरे राष्ट्र को यह अहसास कराया कि —
👉 “हम भी जीत सकते हैं, हम भी विश्व के सर्वश्रेष्ठ बन सकते हैं।”
उस समय जब टीवी हर घर में नहीं था, तब रेडियो की आवाज़ और लोगों का उत्साह पूरे मोहल्ले को स्टेडियम बना देता था।
लॉर्ड्स की उस जीत ने गांव–गांव, शहर–शहर में जश्न का माहौल खड़ा कर दिया था।
और आप बिल्कुल सही कह रहे हैं —
कृष्णमाचारी श्रीकांत (Srikkanth) की आक्रामक बल्लेबाज़ी तो जैसे आग लगा देती थी।
उनकी शॉट्स खेलने की बेफिक्री, चेहरे का आत्मविश्वास — उन्होंने टीम में नई ऊर्जा भर दी थी।
वो “शहरी नहीं, जगारण बनाते थे” — यह आपकी बहुत सुंदर पंक्ति है। यह बताती है कि कैसे खेल एक राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बन गया था।
कपिल देव का वह कैच — लॉर्ड्स के मैदान पर, हवा में उड़ते हुए, विव रिचर्ड्स जैसे धाकड़ बल्लेबाज़ को आउट करना —
वो पल जैसे समय में थम गया था।
हर भारतीय की सांस उस गेंद के साथ उठी और कपिल के हाथ में समा गई।
वो केवल एक कैच नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का प्रतीक था —
कि “अब भारत कभी पीछे नहीं रहेगा।”
और फिर आपका कहना बिल्कुल सही है —
सचिन तेंदुलकर का आगमन और उनके संन्यास तक का सफ़र, मानो उसी विश्वास की निरंतरता रहा।
जहाँ कपिल देव ने हमें जीतना सिखाया,
वहीं सचिन ने हमें गौरव और संयम के साथ जीना सिखाया।
तीन दशकों तक उन्होंने हर घर के टीवी पर, हर दिल में, हर दोपहर की चाय में अपनी जगह बना ली।
वो केवल एक खिलाड़ी नहीं, हर भारतीय की भावना बन गए।
कपिल देव, महेंद्र सिंह धोनी, सचिन तेंदुलकर, गुंडप्पा विश्वनाथ, रोजर बिन्नी, और सैयद किर्मानी —
सच में, ये सब भारत के क्रिकेट इतिहास के अमिट अध्याय हैं।
कपिल देव ने साहस दिया,
विश्वनाथ ने शालीनता और तकनीक से दिल जीता,
रोजर बिन्नी ने गेंदबाज़ी में जादू दिखाया,
किर्मानी ने विकेटों के पीछे चमत्कार किए,
सचिन ने खेल को धर्म बना दिया,
और धोनी ने उस धर्म को आधुनिकता और धैर्य का चेहरा दिया।
आपका यह वाक्य —
“इनके रहते भारत कभी हार का सामना नहीं कर सकता — यह मेरा सोच नहीं, मेरा विश्वास है।”
बहुत भावपूर्ण और गहरा है। यह उस पीढ़ी का मन बोलता है जिसने क्रिकेट में राष्ट्र की आत्मा देखी।