05/07/2013
ऐसे बदल सकते हैं उत्तराखण्ड की तकदीर
उत्तराखण्ड की त्रासदी का पखबाड़ा बीत चुका है। बचाव दल ने अपना काम बाखूबी किया और जितनी जानें बच सकती थीं बचाईं। रेस्क्यू टीम का काम था, बंद हो चुके रास्तों में फंसे मुसाफिरों को ऐसी जगह पहुंचाना, जहां से वे अपने घर जा सकें। ये बात हुई मुसाफिरों की। लेकिन जिनके घर वहीं थे, वे जान बचने के बाद भी कहां जाएं। सबकुछ उजडऩे के बाद अजीविका से लेकर जिंदगी की तमाम समस्याएं सामने खड़ी हैं। न घर हैं न स्कूल और न अस्पताल। जीवन के लिए जरूरी हर तरह का ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। मानवता के नाते सेना के बाद अब समाज के कंधों पर बहुत बड़ी जबाबदारी आती है। उत्तराखण्ड को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए केवल वहां की राज्य सरकार के प्रयास नाकाफी होंगे। सरकार के प्रयासों से विकास में एक दशक भी लग सकता है। हम यहां जापान, अमरीका जैसे देशों की दुहाई देकर नहीं बच सकते, जहां सरकार त्रासदी के बाद कुछ घंटों में सड़क, मकान बना देती है। वहां हर थाने में पुलिस के पास अपने हेलीकॉप्टर होते हैं और हमारे यहां राज्य सरकार के पास ही एक या दो हेलीकॉप्टर होते हैं। आबादी कम और संसाधन ज्यादा वाले विकसित देशों से तुलना करने की बजाए देश के प्रत्येक राज्य के नागरिकों के प्रयास क्या हो सकते हैं? ये सोचना और करना जरूरी है। इसके लिए हर राज्य के सक्षम नागरिकों को पूरे उत्तराखण्ड को पैरों पर खड़ा करने के लिए ऐसा प्रयास करना होगा, जो मिसाल बन जाए। सरकारी मशीनरी की अपनी सीमाएं, आदतें और कार्यप्रणाली है। उसकी लानत-मलानत की जगह खुद कुछ करना होगा।
यहां वैसे ही सोचना होगा, जैसे हम लाख व्यस्तताओं के बावजूद अपना घर बनाने समय निकाल लेते हैं। साल में एक या दो बार घूमने के लिए समय निकालना या कुछ जरूरी कामों के लिए अपने रिश्तेदारों की मदद लेते हैं। ये प्रयास भी इसी जज्बे के साथ समय और धन देकर करना होगा। यहां हम हर आम आदमी से मदद की दरकार नहीं कर रहे, बल्कि हर राज्य के कुछ चुनिंदा खास लोगों की मदद की बात कर रहे हैं। इसे ऐसे समझा जा सकता है-
आवास, शिक्षा के लिए स्कूल, व्यवसाय, अस्पताल, आवागमन, पीने के पानी, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं पूरी तरह तहस-नहस हो चुकी हैं। ऐसे में हम खुद क्या कर सकते हैं, ये सोचना और फिर करना जरूरी है।
1. देश के सभी राज्य अपने संसाधनों से 25 गांवों को खुद की देख-रेख में विकसित करने का बीड़ा उठाएं। इस तरह 28 राज्य और 7 केंद्र शासित यानि कुल 35 राज्यों के प्रयास से 875 गांवों की तकदीर बदल सकेगी। राज्य सरकारें खुद अपने अधिकारियों की देख-रेख में ये काम करवाए। कोई भी राज्य उत्तराखण्ड को नगद राशि न दे।
2. देश में आईपीएस 4720, आईएएस 6154, आईएफएस 670, आईआरएस 700 अफसर हैं। यानि लगभग 12 हजार से ज्यादा। इनको मासिक वेतन में करीबन 1 लाख रुपए मिलते हैं। ये साल में एक माह के वेतन पर एक परिवार को गोद लें तो 12 हजार परिवारों की जिंदगी बदल जाएगी। नगद न देकर अपने किसी अधीनस्थ की देखरेख में इन परिवारों को अजीविका चलाने लायक खड़ा कर सकते हैं। मोटे तौर पर करीबन 15 गांव के लोगों को सहारा मिल जाएगा।
3. कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा जैसी पार्टियों के फण्ड में घोषित तौर पर करोड़ों रुपए है। इसका 10
फीसदी उत्तराखण्ड के लोगों के लिए समर्पित कर दें तो करीबन 50 गांवों का भला होगा।
4. सिंधिया घराना, कमलनाथ, नितिन गडकरी, जूदेव घराना सहित देश में करीबन 100 देश के बड़े-बड़े उद्योगपति जो राजनीति के शिखर पर हैं वो इतने सक्षम हैं कि एक गांव की तकदीर एक महीने में बदल सकते हैं। ऐसे में 100 गांव एक साल में फिर से मुख्य धुरी में लौट आएंगें।
5. अम्बानी जैसे देश के बड़े-बड़े उद्योगपति घराने जैसे अपने कर्मचारियों की सुविधा के लिए पूरी बस्ती बसा देते हैं, वैसे ही उत्तराखण्ड के गांवों को भी अपने संसाधनों और देखरेख में बसा सकते हैं।
6. लायन्स क्लव जैसी करीबन दर्जन भर संस्थाएं हैं, जो मजबूत ढांचे के कारण आर्थिक रूप से सक्षम हैं। ये संस्थाएं रुपया जुटाकर उत्तराखण्ड सरकार को न भेजकर खुद कुछ परिवार या गांव को पुर्नजीवित करने कदम उठाएं।
उत्तराखण्ड सरकार क्या मदद करेगी
1. विकास में जो राशि लगाई जाए, वो टैक्स फ्री हो। साथ ही ये ना देखा जाए कि रुपया किस स्त्रोत से आया। सकारात्मक सोच के साथ केवल विकास पर ध्यान दिया जाए।
2. नगद कोई भी मदद स्वीकार न की जाए। जिसे मदद करनी हो वो एक सदस्य, एक परिवार, एक गांव को गोद ले लें। फिर अपने हिसाब से जरूरत के मद्देनजर मदद करे।
3. सरकार चाहे तो मदद करने वाले लोगों के साथ हिस्सेदार बन सकती है। गांवों के विकास में 50 फीसदी राशि की हिस्सेदारी कर सकती है, लेकिन काम कराने वाली एजेंसी सरकार नहीं रहेगी।
4. सरकार पूरा ध्यान सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, अस्पताल और रेल्वे पर लगाए। अपनी पूरी ताकत और रुपया बाहरी संसाधनों को खड़ा करने में झोंक दे।
अगर ऐसा होता है तो लोग भूल जाएंगे कि फलां देश में कुछ घंटों में सड़क बन जाती है। बल्कि ये याद रखेंगे कि त्रासदी में हिंदुस्तान एक हो जाता है और अपने किसी भी हिस्से को खुद अपनी दम पर खड़ा करने का दम रखता है। सकारात्मक सोच के साथ प्रयास जरूरी हैं। हालात खुद व खुद बदल जाएंगें।
**द्वारा- प्रमोद त्रिवेदी, एडीटर सिटी भास्कर, जबलपुर
9425442579