18/06/2025
प्रभु श्री निलमाधव और प्रभु श्री जगन्नाथ जी के कथा...
प्रचीनकाल में मालवा प्रदेश में इंद्रद्युम्न नाम के एक राजा थे। जिनके पिता का नाम भारत और माता सुमति था। राजा विष्णुजी के परम भक्त थे। एक रात भगवान विष्णु ने उनको सपने में दर्शन दिए और कहा नीलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है उसे नीलमाधव कहते हैं। तुम एक मंदिर बनवाकर उसमें मेरी यह मूर्ति स्थापित कर दो।
राजा ने ऐसा ही किया पुरी के समुद्र तट पर भगवान का भव्य मंदिर बनाया जिसमें उन्हें कई मुश्किलों का सामान करना पड़ा।
मंदिर बनने के बाद उसमें मूर्ति स्थापना करने का समय आया तो भगवान श्रीहरि ने पुन: सपना दिया और संकेत में कहा कि तुम कुछ लोगों को मेरे पवित्र विग्रह को ढूंढने के लिए भेजों। राजा ने विधिवत पूजा करने के बाद श्रेष्ठ मुहूर्त में अपने भाई विद्यापति सहित सभी लोगों को अलग-अलग दिशा में श्रीहरि के विग्रह को ढूंढने के लिए भेजा।
विद्यापति जिस दिशा में कमल का फूल लेकर चले उस दिशा में नीलांचल पर्वत के आसपास घने आम्रकानन जंगल और पहाड़ों की श्रृंखलाएं थी। विद्यापति एक ऐसी जगह गए जहां पर सबर नाम से आदिवासी जाती के लोग रहते थे। कबिले का मुखिया एक गुप्त स्थान पर जाकर भगवना नील माधव की उपासना करता था जहां पर नील माधव का विग्रह रखा हुआ था। वहां वह किसी को भी नहीं आने देता था। कबीले के सरदार की एक सुंदर लड़की ललिता थी, जिसने विद्यापति को जंगली जानवरों से बचाया था जो घायल हो गए थे।
वह लड़की ललिता विद्यापति को अपने घर ले आई और कबीले के सरदार जिसका नाम विश्ववसु था वह उसका पिता था। ललिता ने पिता को सारा किस्सा बताया कि यह व्यक्ति जंगल में भटक गया है और जानवरों ने इसे घायल कर दिया था तो मैं इसे यहां ले आई। विश्ववसु ने भी विद्यापति को आश्रय दिया और घायल विद्यापति का उपचार किया। विद्यापति ने दोनों को यह नहीं बताया कि मैं यहां किस उद्देश्य से आया हूं क्योंकि विद्यापति को पता चल गया था कि विश्ववसु और उसकी जाति के लोग ही भगवान नील माधव के विग्रह की पूजा करते हैं और अब मुझे जानना है कि वह विग्रह कहां रखा है।
बहुत दिन वहां रुककर विद्यापति कबीले के लोगों के बीच घुलमिल गया और एक दिन उसका विवाह कबीले के मुखिया विश्ववसु की लड़की से हो गया। फिर एक दिन विद्यापति ने अपने श्वसुर से नील माधव के दर्शन करने की इच्छा व्यक्त की। श्वसुर विश्ववसु ने शर्त रखी कि मैं तुम्हें वहां तक आंखों पर पट्टी बांध कर ले जाऊंगा। विद्यापति ने कहा कि पिताजी जैसा आप उचित समझे।
चतुर विद्यापति ने वहां जाते समय अपनी धोती में एक पोटली में राईं के दाने बांध लिए और जब उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर उसे ले जाया गया तो रास्ते भर में उसने उन राईं के दानों को रास्ते में बिखेरता गया। अंतत: एक पहाड़ी की एक गुफा में जब उसके आंखों की पट्टी खोली गई तो उसके सामन प्रभु श्री नील माधव का विग्रह था जिसमें से तेज प्रकाश निकल रहा था। जिसे देखकर विद्यापति अति प्रसन्न हो गया।
फिर जब वे दर्शन कर लौट आए तो कुछ समय बाद जब वे राईं के दाने पौधों में बदल गए तो विद्यापति को वहां तक पहुंचना का मार्ग मिल गया। फिर एक दिन प्रात: जल्दी उठकर विद्यापति उस मार्ग पर जाने लगे तो उनकी पत्नि ने पूछा इतनी सुबह कहां जा रहे हो। विद्यापति ने कहा कि फूल एकत्रित करने जा रहा हूं ताकि भगवान को अर्पित कर सकूं और तुम्हारे लिए वैणी बना सकूं। यह सुनकर पत्नी प्रसन्न हो गई।
फिर विद्यापति वहां से सीधे नीलांचल पर्वत पर उसे गुफा में चले गए। शंका होने पर उनकी पत्नी भी उनके पीछे आ गई और उसने देखा कि विद्यापति तो प्रभु नील माधव की मूर्ति चुराकर ले जा रहे हैं तो उसे बड़ा दु:ख हुआ। विद्यापति ने अपनी पत्नी को सारा किस्सा बताया कि मेरे भाई राजा इंद्रद्युम्न हैं और उन्होंने एक भव्य मंदिर बनाया है जिसमें प्रभु की इच्छा से ही वह यह विग्रह स्थापित करना चाहते हैं। विद्यापति की पत्नी ने कहा कि मैं तुम्हें रोकने पर विवश होऊं और मेरे पिता यहां आए इससे पहले तुम यहां से चले जाओ। तुमने हमें धोखा दिया है, परंतु तुम मेरे पति हो तो मैं अभी कुछ और कहूं उसे पहले यहां से चले जाओ। विद्यापति निराश होकर वहां से चला जाता है।
विश्ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दुखी हुआ। उसने सोचा कि इस चोरी में मेरी बेटी ने भी विद्यापति का साध दिया है तो उसे अपनी बेटी को कबीले से निष्काषित कर दिया। उसकी बेटी उस वक्त गर्भवती थी। वह वहां से चली गई और एक गुफा में रहने लगी।
उधर विद्यापति विग्रह लेकर अपने भाई राजा इंद्रद्युम्न के पास लौट आया। राजा उसे देखकर प्रसन्न हुए और जब उन्होंने अपने महल में विग्रह को रखा तो उसे देखकर वे और भी प्रसन्न हुए परंतु श्रीहरि प्रसन्न नहीं हुए क्योंकि उनके विग्रह को चुराकर लाया गया था। तब उन्होंने राजा को स्वप्न में कहा कि समुद्र तट पर 3 लकड़ी जो दारू हे मेरा उससे.. तुम मेरी मूर्ति बनाओ अगले दिन राजा पुरे सैन्य प्रजा के साथ समुद्र तट पर पहुंच कर पुरे श्रध्दा भाव से ला कर... जल्द श्रेष्ठ मूर्तिकार के खोज करने में लग गये... परंतु जीतने भी मूर्तिकार आए सब के सब लकड़ी के तना पर कोईमूर्ती का उल्लेख ना कर पाए उनके औजार टूट मुड़कर रह जाता था। फिर महाराज दुःख प्रकट कर आराधना करना सुरू कर दिया भगवान ने उसी समय भगवान विश्वकर्मा जी को आदेश दिए... है विश्वकर्मा तुम जाकर मेरी कल्की अवतार मूर्ती बना कर आओ... भगवान के आदेश पालन कर विश्वकर्मा जी तुरंत एक वृद्ध मिस्त्री रुप ले कर राजा के सामने प्रकट हुए...और पुछा की है राजन सुना है आपको मूर्तिकार की तलाश है... राजा ने हां कह कर वृद्ध मिस्त्री के ओर देख विश्वास न हुआ.. सोचा इतने नौजवान-नौजवान कारीगर मिस्त्री थक हार चले गये... ये साधारण एक वृद्ध मिस्त्री क्या कर पाएगा? कुछ देर बाद राजा ने मूर्तिकार को कहा ठीक हे तुम प्रारम्भ करो... वृद्ध मूर्तिकार ने एक शर्त रख कि मैं जब तक ना कहुँ गर्भ गृह के द्वार ना खोलना राजा ओर रानी दोनो कुछ आहार रख दरवाज़ा बन्द कर देने की आदेश दे दिए... राजा रानी नित्य आ कर मूर्तिकार के खट-पीट सुनकर चले जाते थे लेकिन एक दीन जब कोई आवाज ना आया तो... रानी अस्त-व्यस्त हो कर महाराज से कहा है... महाराज वह एक वृद्ध थे ओर आवाज भी नहीं आ रहा कोई... कुछ अनहोनी ना घट गया हो... महाराज कृपा कर द्वार खोलने की आदेश दे महाराज... राजा इंद्रद्युम्न ने सोच में पड़ कर अपने पत्नी कहा मान कर द्वार खुलवा दिए..द्वार खुलने पश्चात उस गर्भ गृह में कोई ना था... और मूर्ति सब आधे-आधे हुए स्थापित थे। तब भगवान को हाथ जोड़कर प्राण प्रतिष्ठा करा कर प्रभु श्री जगन्नाथ जी के पुजा करते आ रहे हैं...🙏Jay Jagannath🙏