11/05/2026
स्वामित्व में समाज की शिक्षा हार गई?
समाज सिर्फ इमारतों से नहीं बनता, उस भावना से बनता है जहां अगली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित हो।
इस बच्ची की आंखों से बहते आंसू.. और उसे सीने से लगाकर संभालती टीचर की नम आंखें.. शायद शब्दों में व्यक्त न हो।
लेकिन बच्ची शायद भवन, आदेश, स्वामित्व या विवाद नहीं समझती। उसे सिर्फ इतना पता है कि यही उसकी सपनों की दुनिया है…जिसे छीना जा रहा है।
समाज के दानवीरों ने ऐसी संस्थाएं और भवन बनाए ताकि आने वाली पीढ़ियां शिक्षित हों, आगे बढ़ें और समाज मजबूत बने। लेकिन वक़्त के साथ दान की भावना कमजोर पड़ गई, है और नई पीढ़ियां उस दान की भावना को विरासत में नहीं ले पाईं। इसीलिए जो कभी समाज को समर्पित था, वो आज अधिकार, स्वामित्व और विवाद का विषय बन गया।
सबके अपने तर्क हो सकते हैं, अपने अधिकार भी..
लेकिन उस मासूम बच्ची के आंसुओं का जवाब किसके पास है, जो बस इतना कह रही है.."मैडम, हमें तो आपके साथ इसी स्कूल में पढ़ना हैं"
क्या इस निर्णय से पहले किसी ने उन बच्चों के बारे में सोचा, जिनकी आंखों में अपना स्कूल और खुशियों का आंगन बचाने के लिए आंसू थे? शायद नहीं..
समाज में इमारतों और दीवारों के लिए फैसले इतने कठोर न हो कि कल की मुस्कान मुरझा जाए..।
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