26/03/2026
इधर-उधर की बात न कर, तू बता ये कारवां क्यों लुटा।
पश्चिम एशिया के संकट पर संसद में प्रधानमंत्री का बयान सुना हो तो आप उस शख्स को पहचान नहीं पाएंगे, जिसे आपने पिछले 11 बरस में न जाने किस-किस मंच से सुना होगा। हुंकार, ललकार, फुंकार—सब गायब था। बस सरकार की बोझिल भाषा थी। बुझा हुआ चेहरा था। फीकी आंखें थीं। लिखे हुए भाषण को शब्दशः पढ़ने की चिंता थी। इस भाषण को आप एक मैनेजर की रिपोर्ट कह सकते हैं, या फिर मुनीम की बही अथवा रंगमंच से किनारे कर दिए गए अभिनेता का नेपथ्य में दिया एकालाप। यह एक नेता का संबोधन नहीं था।
नए दोस्त बने नहीं, पुराने जरूर छूट गए। ट्रंप की लल्लो-चप्पो के बावजूद घुटने टेकने पर भी जांच शुरू। ईरान अब भारत को प्रतिद्वंद्वी खेमे में गिनता है। रूस ने मुंह फेर लिया ।
जब पूरी दुनिया किसी संकट से जूझ रही हो, उस वक्त विश्वपटल पर नेतृत्व की जरूरत होती है। जब स्वेज नहर के मुद्दे पर ब्रिटेन और फ्रांस ने मिस्र पर हमला किया था, तब एक आर्थिक और सामरिक तौर पर कमजोर भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खुलकर मिस्र के समर्थन में जुबान खोलने की हिम्मत दिखाई थी। तब नेहरू की पहचान विश्वपटल पर एक नेता के रूप में बनी थी, भारत का सिर ऊंचा हुआ था।
जब बोलना जरूरी हो और कहने को कुछ न हो तो इधर-उधर की बात करनी पड़ती है। मानवता के हित की अमूर्त बात, युद्ध शुरू करने वालों का नाम लिए बिना शांति की वकालत। यह तो बताया कि भारत के पास तेल का कितना रिजर्व है लेकिन यह नहीं बताया कि यह सिर्फ एक हफ्ते लायक है। यह नहीं बताया कि चीन ने 3 महीने का रिजर्व बनाया और हमने तीन हफ्ते का भी नहीं।
जब पूरी दुनिया के सामने बड़ा संकट हो और एक नेता अपने छोटे फायदे के छोटे ब्यौरे पेश करे तो उससे पूरे देश का माथा नीचा होता है। विश्वगुरु के चुटकुले अब हंसने लायक भी नहीं रहे।
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