07/07/2026
वाणिज्य के प्रांगण में मर्मज्ञ होना सहज हो सकता है, किंतु व्यापार के साथ विवेक का संधान केवल एक स्थितप्रज्ञ और उदात्त चेतना ही कर सकती है।
जहाँ स्वाभिमान की अडिगता और विनम्रता का विलक्षण समत्व हो, वहाँ अहम् का लेशमात्र भी अस्तित्व नहीं बचता।
ज्ञान के ऐसे ऊर्जस्वी पुंज का सान्निध्य, व्यावसायिक क्षेत्र में कुशल नेतृत्व देता है और व्यक्तिगत जीवन में सदैव एक अग्रज की भाँति संबल और मार्गदर्शक का शाश्वत स्रोत बनता है।"
ऐसे ही अनुकरणीय, अग्रज दिवाकर गैरोला जी को जन्मदिवस की मंगलकामनाएं🎉🎁🎂🙏