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28/11/2021
24/09/2021
22/09/2021

सौभाग्य का दरवाजा बार-बार नही खटकता
प्रबल भाग्य उदय होने पर ही मनुष्य को दुर्लभः वस्तुयें प्राप्त होती है ! आज मैं येसी साधना का जिक्र करने जा रहा हूँ
"जिसकी साधना लक्ष्मी जी और कुबेर ने भी की"
फ़िर आप वंचित क्यों रहें !
सम्पूर्ण जीवन का सौभाग्य है रुद्रयामल तंत्र के अनुसार
रुका हुआ काम और आकस्मिक धन संपत्ति, दरिद्रता निवारक स्थाई लक्ष्मी प्राप्ति के लिए करें 3 दिवसीय स्वर्ण आकर्षण भैरव साधना
स्वर्णाकर्षण भैरव साधना
स्वर्णाकर्षण भैरव काल भैरव का सात्त्विक रूप हैं, जिनकी पूजा धन प्राप्ति के लिए की जाती है।
इनकी साधना वैसे तो आप कभी भी किसी भी मंगलवार को कर सकते है लेकिन नवरात्रि और दीवाली के बीच आने वाले किसी भी मंगलवार या अष्टमी श्रेय कर है ,

स्वर्ण आकर्षण भैरव साधना मैने जिसे भी दिया है वो आज सुख सौभाग्य युक्त जीवन व्यतीत कर रहे है, आज उनकी संज्ञा धनाढ़्य व्यक्तियों में होती है !

स्वर्ण आकर्षण भैरव हमेशा पाताल में रहते हैं, जैसे सोना धरती के गर्भ में होता है।
इनका प्रसाद दूध और मेवा है। इनकी साधना में मदिरा-मांस सख्त वर्जित है। भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं। इस कारण इनकी साधना का समय मध्य रात्रि यानी रात के 11 से 3 बजे के बीच का है।
इनकी उपस्थिति का अनुभव गंध के माध्यम से होता है। शायद यही वजह है कि कुत्ता इनकी सवारी है। कुत्ते की गंध लेने की क्षमता जगजाहिर है।
इनकी साधना से अष्ट-दारिद्य्र समाप्त हो जाती है। जो साधक इनकी साधना करता है,उसके जीवन मे कभी आर्थिक हानी नही होती एवं सिर्फ आर्थिक लाभ देखने मिलता है। इस साधना मे जितना महत्व मंत्र का है उतना ही महत्व यंत्र और माला एवं गुटिका का है। स्वर्णाकर्षण भैरव यंत्र स्थापन करने से बहुत सारे लाभ है,जिनको यहा पर लिखना भी सम्भव नही है !
भगवान स्वर्ण आकर्षण भैरव के बारे में जितना भी लिखा जाये उतना कम है -

जैन धर्म में भगवान सवर्ण आकर्षण भैरव को नाकोड़ा भैरव के नाम से पुकारा गया है ..!!

मेरा मानना है इस साधना को हर गृहस्थ और संन्यासी को करना ही चाहिये बहुत ही सरल विधि विधान है जिसे आसानी से कोई भी 18 वर्ष से ऊपर का स्त्री - पुरुष कोई भी कर सकता ..!!

प्रामाणिक ज्ञान , प्रामाणिक पूजा और प्रामाणिक साधना को किसी भी जाति धर्म का व्यक्ति प्राप्त कर सकता है
जाती धर्मो से मुक्त

मंत्र सिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त साधना सामग्री, स्वर्ण आकर्षण भैरव यंत्र , भैरव आकर्षण माला , स्वर्ण आकर्षण गुटिका मात्र - 3300/- rs

Note- रुद्रमाल्य तंत्र के अनुसार साधना विधान साधना सामग्री के साथ भेजा जायेगा ..!

जिनको भी चाहिए शीघ्र संपर्क करें , सिद्ध सामग्री लिमिटेड है ..!!

Calling - 6375304953
Watsup - 9414163286

03/08/2021

सूर्य साधना....

अनेक जीवन के पुण्य उदय होने पर ही हम सूर्य साधना कर पाते है
तत्सवितुवर्रेण्यम्
सूर्य हमारे जीवन को प्रकाशित करें

राजा के घर मैं जन्म लेने वाले बालक के जीवन मैं यदि सूर्य की प्रखरता और तेजस्विकता व्याप्त न हो तो ऐसा बालक तमाम श्रेष्ठ प्रयासों के बाबजूद भी आगे चलकर दरिद्र अभावी और रंक के सामान जीवन यापन करने के लिए विवश होता है बाध्य होता है !

रंक (दरिद्र ) के घर मैं जन्म लेने वाले बालक के जीवन में यदि सूर्य की प्रखरता और तेजस्विकता पूरी तरह विधमान हो तो निशिचत ही ऐसा बालक दरिद्र घर में जन्म लेने के बाबजूद भी आगे चलकर अपने तुच्छ प्रयासों और सूर्य के प्रताप से राजसी जीवन यापन करता ही है !
ये परम सत्य है !

उच्चता श्रेष्ठता और एश्वर्यता प्राप्ति के लिए जीवन में सूर्य की तेजस्विकता का विधमान होना परम आवश्यक है, और सूर्य की तेजस्विकता कुछ मनुष्यों / स्त्रियाँ के जीवन में पुर्जन्म के अच्छे कर्मफलों के परिणाम स्वरुप जन्मजात / स्वत: विधमान रहती करना पड़ता है !
सूर्य की प्रखरता और तेजस्विता प्राप्त करने के लिए हर स्त्री पुरुष को सूर्य साधना करनी ही चाहिये

सूर्य को वेदों में जगत की आत्मा और ईश्वर का नेत्र बताया गया है। सूर्य को जीवन, स्वास्थ्य एवं शक्ति के देवता के रूप में मान्यता हैं। सूर्यदेव की कृपा से ही पृथ्वी पर जीवन बरकरार है। ऋषि-मुनियों ने उदय होते हुए सूर्य को ज्ञान रूपी ईश्वर बताते हुए सूर्य की साधना-आराधना को अत्यंत कल्याणकारी बताया है। प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना शीघ्र ही फल देने वाली मानी गई है। जिनकी साधना स्वयं प्रभु श्री राम ने भी की थी।

ऊर्ध्र्वमुखी जीवन का प्रारम्भ और सिद्धि की उपलब्द्धि गुरु की प्राप्ति और गुरु की कृपा होने पर ही हो पाती है ! जीवन में जो गुरु का महत्व है, ठीक वही महत्व नक्षत्र मण्डल में सूर्य का है ! यही कारन है की साधना क्रम में कहा गया है की व्यक्ति सबसे पहले सूर्य और उसके बाद क्रमश:गणेश, दुर्गा, रूद्र, और भगवन विष्णु की कृपा का पात्र बनते हुए अंत में गुरु तत्व का ज्ञाता बनकर पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त कर पता है !
पंच देवो की उपासना और उसमें भी सर्वप्रथम सूर्य की उपासना का प्रतिपादन तथा किसी अन्य गृह की उपासना का पंच देवों की उपासना में उल्लेख न होना अपने आप में सूर्य के अद्दुतिया महत्व को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है ! इतना ही नहीं सूर्य को प्राण कहा गया है, नारायण गया ह ! यहाँ तक की भगवान शिव को भी जब ब्रह्म हत्या का शाप लगा तब उससे मुक्ति के लिए सूर्य आराधना ही करनी पड़ी !
यह भी सत्य है की वर्तमान युग में सर्वाधिक उन्नतिशील एवं सत्ता तथा धन के वैभव से संपन्न ईसामसीह के अनुयायी इसलिए इतने सफल हो सके है, की उनकी आराधना का आधार सूर्य का ही दिवस ---- अर्थात रविवार है !
'सूर्य पुराण' , 'भविष्य पुराण' आदि तो मनो सूर्य की सत्ता के अतिरिक्त और किसी के महत्त्व को स्वीकार ही नहीं करते ! सूर्य की महत्वता तो इतनी है, की जब भगवन शिव ने सबसे महत्वपूर्ण अवतार धारण किया तब हनुमान के रूप में सूर्य को गुरु बनाया ! इससे यह स्पष्ट है की सूर्य आराध्य भी ह और पूर्ण समर्थ गुरु के गन भी सूर्य में पूर्णतया के साथ विधमान है !

सिद्धाश्रम मैं इस तथ्य को सर्वाधिक बल दिया जाता है ! भगवत पूज्यपाद दादागुरुदेव स्वामी सच्चिदानन्द जी ने जब सिद्धाश्रम के एक महायोगी, अपने प्रिय शिष्य गुणातीतानन्द जी को ग्रहस्त आश्रम में आने के लिए और संसार में साधनाओं प्रचार के लिए भगवान श्री कृष्ण को गुरु संदीपन ने कराया,…

इससे में यह प्रामाणिक जाती है की यदि व्यक्ति दैहिक, दैविक, भौतिक, प्रकार की तांत्रिक साधनाओं में निष्णात चाहता हो , पूर्ण ऐश्वर्या का स्वामी बनकर नर से नारायण हो, उसकी पूर्ति सूर्य की साधना से ही संभव है !

सूर्य साधना से लाभ………
1 , इसके द्धारा साधनाओं में सफलता मिलती है
2 , पौरुष, सम्मोहन के क्षेत्र में सूर्य साधना अनुकूल है
3 , काल पर विजय सूर्य साधना संभव है
4 , मृत्युपर विजय निवारण के लिए सूर्य साधना राम बन की तरह अचूक है
5 , ऐश्वर्य या संपत्ति प्राप्ति सूर्य साधना से संभव हैं
6 , हर प्रकार के संकट निवारण के लिए सूर्य सहायक होते हैं, क्युकी सूर्य संकटमोचक हनुमान जी के भी गुरु है
7 , कुष्ठ रोग या शरीर की विकलांगता से मुक्ति या नेत्रों की ज्योति सूर्य साधना से ही संभव है
8 , किसी देवी या देवता के श्राप जन्य कष्ट निवारण भी सूर्य की ही साधना से संभव है
9 , निर्धनता किसी भी कारण से हो, सूर्य साधना से उसका निदान होता ही है
१०, संतानहीनता, नपुंसकता का नाश सूर्य की कृपा से होता हैं
11 , सूर्य प्रज्ञा के पति है , अत: शोध या नविन विचार की जहां आवश्यकता है, सूर्य साधना अनुकूल होती है
12, अध्यात्म का तो सूर्य आधार ही है ,अतएव कुण्डलिनी जागरण तथा सातों चक्रों के पूर्ण जागरण मैं सूर्य साधना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है
13, मठ, मंदिर , विधालय या किसी ऐसी संस्था प्रारम्भ करने की यदि अभिलाषा हो, जिससे मानव मात्र का कल्याण हो और ऐसी सस्था दीर्धकाल तक बिना बाधा कार्य कर सके, तो सूर्य साधना से ही ऐसा संभव हो सकता हैं
14 , समाज के कमजोर वर्ग के लिए कार्य करने वाले कार्यकरताओं के मनीवाल बढ़ने और पूर्ण यशस्वी बनने के लिए सूर्य साधना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है ,
15, शासन सत्ता का तो आधार ही सूर्य है !

16, येसे बच्चें जो कठिन मेहनत करने के बाद भी परीक्षाओं में असफल होते है , उनका पढ़ाई में मन नही लगता है उनको अवश्य ही करनी चाहिए
17, शरीर में आलस बना रहता हो, घर से निकले की इच्छा नही होती हो, बार-बार नींद आती हो , शरीर मोटा हो रहा हो , बार-बार भूख लगती हो उन्हें अवश्य ही करनी चाहिए
सूर्य साधना से अनेक फ़ायदे मिलते है

साधना विधान

किसी भी रविवार को सूर्य उदय के समय स्नानादि से निवृत होकर पूर्व दिशा की और मुख करके बैठ जाये , अपने सामने एक बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाएं , एक छोटी सी तांबे की प्लेट में मंत्र सिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त सूर्य यंत्र को स्थापित करें, उसके सामने हल्दी मिले हुये चावल की ढेरी बनायें , उस पर मंत्र सिद्ध सूर्य रत्न को स्थापित करें , धूप दीप प्रज्वलित करें ,
निम्न मंत्र बोलते हुये यंत्र पर अर्क दें , ( पानी में कुमकुम मिला कर चढ़ाये )

रोही सूर्यदेव सहस्त्रोंशो तेजो राशि जगत्पते
अनुकम्पय मा भक्त्या ग्रहणाधर्य दिवाकर
सूर्याय नमः आदित्याय नमः
नमो भास्कराय नमः अर्ध्य समर्पयामि

यंत्र को साफ कपड़े से पोछ लें , उसके बाद पंचोपचार पूजन करें ,

उसके बाद निम्न श्लोक बोलते हुये प्रार्थना करें ,

सुख-सौभाग्य की वृद्धि के लिए, दुःख-दारिद्र्‌य को दूर करने के लिए, रोग व दोष के शमन के लिए इस मैं यह साधना कर रहा हूँ ,

आवित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने !
जन्मांतर सहस्रेषु दारिद्रय नाम जापेत !!

इसके बाद प्राणायाम , 5 मिनिट लोम-विलोम करने के बाद मंत्र सिद्ध सूर्य माला से निम्न मंत्र की 11 माला 11 दिन तक जाप करे,

मंत्र -

'ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ..!!"

साधना समाप्ति पर यंत्र माला को जल में प्रवाहित करदें ,
छोटी बच्चियों को , भोजन कराएं, अगर भोजन नही करा सकते तो फल दे दें
सूर्य रत्न को चांदी में लॉकेट या अंगूठी बना कर पहन लें !

आप के जीवन का मंगल हो यही कामना

मंत्र सिद्ध साधना सामग्री - सूर्य यंत्र , सूर्यकांत, सुर्य माला, सहयोग राशि मात्र - 2100/-

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01/08/2021

जिसे लक्ष्मी जी और कुबेर ने भी की
तो आप वंचित क्यों रहें !
सम्पूर्ण जीवन का सौभाग्य है स्वर्णाकर्षण भैरव साधना, रुका हुआ काम और आकस्मिक धन प्राप्ति के लिए करें 3 दिवसीय स्वर्ण आकर्षण साधना
स्वर्णाकर्षण भैरव साधना
स्वर्णाकर्षण भैरव काल भैरव का सात्त्विक रूप हैं, जिनकी पूजा धन प्राप्ति के लिए की जाती है। यह हमेशा पाताल में रहते हैं, जैसे सोना धरती के गर्भ में होता है। इनका प्रसाद दूध और मेवा है। यहां मदिरा-मांस सख्त वर्जित है। भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं। इस कारण इनकी साधना का समय मध्य रात्रि यानी रात के 11 से 3 बजे के बीच का है। इनकी उपस्थिति का अनुभव गंध के माध्यम से होता है। शायद यही वजह है कि कुत्ता इनकी सवारी है। कुत्ते की गंध लेने की क्षमता जगजाहिर है।

इनकी साधना से अष्ट-दारिद्य्र समाप्त हो जाती है। जो साधक इनका साधना करता है,उसके जीवन मे कभी आर्थिक हानी नही होती एवं सिर्फ आर्थिक लाभ देखने मिलता है। इस साधना मे जितना महत्व मंत्र का है उतना ही महत्व यंत्र और माला का है। स्वर्णाकर्षण भैरव यंत्र स्थापन करने से बहुत सारे लाभ है,जिनको यहा पर लिखना भी सम्भव नही है।

नोट - साधना में बैठने से पूर्व मोटी रोटी बनायें उसे घी से चुपड़ दें और उस पर गुड़ रखदे , और पूजा स्थान में एक प्लेट में रख दें

साधना विधि:-सर्वप्रथम रात्री मे 11 बजे स्नान करके उत्तर दिशा की और मुख करके पिले आसान पर बैठ जायें अपने सामने बाजोट पर पीले रंग का वस्त्र विछाये , भगवान स्वर्णाकर्षण भैरव की तस्वीर स्थापित करें, उसके सामने हल्दी मिले हुये चावल की ढेरी बनायें , ढेरी पर मंत्र सिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त स्वर्णाकर्षण यंत्र को स्थापित करें, यंत्र के सामने स्वर्णाकर्षण गुटिका रख दें, मंत्र सिद्ध स्फेटिक माला को भी बाजोट पर रख दें , धूप, दीप जलायें , पीले पुष्प चढ़ायें पंचोपचार पूजन करें !

दहिने हाथ मे जल लेकर विनियोग मंत्र बोलकर जमीन पर छोड़ दिजीये ।

विनियोग -

।। ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षणभैरव महामंत्रस्य श्री महाभैरव ब्रह्मा ऋषिः , त्रिष्टुप्छन्दः , त्रिमूर्तिरूपी भगवान स्वर्णाकर्षणभैरवो देवता, ह्रीं बीजं , सः शक्तिः, वं कीलकं मम् दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः।

अब बाए हाथ मे जल लेकर दहिने हाथ के उंगलियों को जल से स्पर्श करके मंत्र मे दिये हुए शरिर के स्थानो पर स्पर्श करे।

ऋष्यादिन्यासः

श्री महाभैरव ब्रह्म ऋषये नमः शिरसि।
त्रिष्टुप छ्न्दसे नमः मुखे।
श्री त्रिमूर्तिरूपी भगवान
स्वर्णाकर्षण भैरव देवतायै नमः ह्रदिः।
ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये।
सः शक्तये नमः पादयोः।
वं कीलकाय नमः नाभौ।
मम्‍ दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं
स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगाय नमः
सर्वांगे।

मंत्र बोलते हुए दोनो हाथ के उंगलियों को आग्या चक्र पर स्पर्श करे। अंगुष्ठ का मंत्र बोलते समय दोनो अंगुष्ठ से आग्या चक्र पर स्पर्श करना है।

करन्यासः

ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः।
ऐं तर्जनीभ्यां नमः।
क्लां ह्रां मध्याभ्यां नमः।
क्लीं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः।
क्लूं ह्रूं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
सं वं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

अब मंत्र बोलते हुए दाहिने हाथ से मंत्र मे कहे गये शरिर के भाग पर स्पर्श करना है।

हृदयादि न्यासः

आपदुद्धारणाय हृदयाय नमः।
अजामल वधाय शिरसे स्वाहा।
लोकेश्वराय शिखायै वषट्।
स्वर्णाकर्षण भैरवाय कवचाय हुम्।
मम् दारिद्र्य विद्वेषणाय नेत्रत्रयाय वौषट्।
श्रीमहाभैरवाय नमः अस्त्राय फट्।
रं रं रं ज्वलत्प्रकाशाय नमः इति दिग्बन्धः।

अब दोनो हाथ जोड़कर ध्यान करे।

(ध्यान मंत्र का उच्चारण करें। जिसका हिन्दी में सरलार्थ नीचे दिया गया है। वैसा ही आप भाव करें।)

ॐ पीतवर्णं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं पीतवाससम्।
अक्षयं स्वर्णमाणिक्य तड़ित-पूरितपात्रकम्॥
अभिलसन् महाशूलं चामरं तोमरोद्वहम्।
सततं चिन्तये देवं भैरवं सर्वसिद्धिदम्॥
मंदारद्रुमकल्पमूलमहिते माणिक्य सिंहासने, संविष्टोदरभिन्न चम्पकरुचा देव्या समालिंगितः।
भक्तेभ्यः कररत्नपात्रभरितं स्वर्णददानो भृशं, स्वर्णाकर्षण भैरवो विजयते स्वर्णाकृति : सर्वदा॥

हिन्दी भावार्थ: श्रीस्वर्णाकर्षण भैरव जी मंदार(सफेद आक) के नीचे माणिक्य के सिंहासन पर बैठे हैं। उनके वाम भाग में देवि उनसे समालिंगित हैं। उनकी देह आभा पीली है तथा उन्होंने पीले ही वस्त्र धारण किये हैं। उनके तीन नेत्र हैं। चार बाहु हैं जिन्में उन्होंने स्वर्ण — माणिक्य से भरे हुए पात्र, महाशूल, चामर तथा तोमर को धारण कर रखा है। वे अपने भक्तों को स्वर्ण देने के लिए तत्पर हैं। ऐसे सर्वसिद्धिप्रदाता श्री स्वर्णाकर्षण भैरव का मैं अपने हृदय में ध्यान व आह्वान करता हूं उनकी शरण ग्रहण करता हूं। आप मेरे दारिद्रय का नाश कर मुझे अक्षय अचल धन समृद्धि और स्वर्ण राशि प्रदान करे और मुझ पर अपनी कृपा वृष्टि करें।

मानसोपचार पुजन के मंत्रो को मन मे बोलना है।

मानसोपचार पूजन:

लं पृथिव्यात्मने गंधतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं गंधं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।

हं आकाशात्मने शब्दतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं पुष्पं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।

यं वायव्यात्मने स्पर्शतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं धूपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।

रं वह्न्यात्मने रूपतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं दीपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।

वं अमृतात्मने रसतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं अमृतमहानैवेद्यं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।

सं सर्वात्मने ताम्बूलादि सर्वोपचारान् पूजां श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम:।

निम्न मंत्र मंत्र सिद्ध स्फेटिक माला से मात्र 11 माला जाप करें,

मंत्र -

ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं स: वं आपदुद्धारणाय अजामलवधाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण भैरवाय मम् दारिद्रय विद्वेषणाय ॐ ह्रीं महाभैरवाय नम:।

om aim klaam kleem klum hraam hreem hoom sah vam aapaduddhaaranaay ajaamalawadhaay lokeshwaraay swarnaakarshan bhairawaay mam daaridrya vidhweshanaay om hreem mahaabhairawaay namah

मंत्र जाप के बाद स्तोत्र का एक पाठ अवश्य करे।

श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत्र

।। श्री मार्कण्डेय उवाच ।।

भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम !
पूर्वमुक्तस्त्वया मन्त्रं, भैरवस्य महात्मनः ।।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि, तस्य स्तोत्रमनुत्तमं ।
तत् केनोक्तं पुरा स्तोत्रं, पठनात्तस्य किं फलम् ।।
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि, ब्रूहि मे नन्दिकेश्वर !।।

।। श्री नन्दिकेश्वर उवाच ।।

इदं ब्रह्मन् ! महा-भाग, लोकानामुपकारक !
स्तोत्रं वटुक-नाथस्य, दुर्लभं भुवन-त्रये ।।
सर्व-पाप-प्रशमनं, सर्व-सम्पत्ति-दायकम् ।
दारिद्र्य-शमनं पुंसामापदा-भय-हारकम् ।।
अष्टैश्वर्य-प्रदं नृणां, पराजय-विनाशनम् ।
महा-कान्ति-प्रदं चैव, सोम-सौन्दर्य-दायकम् ।।
महा-कीर्ति-प्रदं स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः ।
न वक्तव्यं निराचारे, हि पुत्राय च सर्वथा ।।
शुचये गुरु-भक्ताय, शुचयेऽपि तपस्विने ।
महा-भैरव-भक्ताय, सेविते निर्धनाय च ।।
निज-भक्ताय वक्तव्यमन्यथा शापमाप्नुयात् ।
स्तोत्रमेतत् भैरवस्य, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मनः ।।
श्रृणुष्व ब्रूहितो ब्रह्मन् ! सर्व-काम-प्रदायकम् ।।

विनियोगः- ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-स्तोत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-देवता, ह्रीं बीजं, क्लीं शक्ति, सः कीलकम्, मम-सर्व-काम-सिद्धयर्थे पाठे विनियोगः ।

ध्यानः-

मन्दार-द्रुम-मूल-भाजि विजिते रत्नासने संस्थिते ।
दिव्यं चारुण-चञ्चुकाधर-रुचा देव्या कृतालिंगनः ।।
भक्तेभ्यः कर-रत्न-पात्र-भरितं स्वर्ण दधानो भृशम् ।
स्वर्णाकर्षण-भैरवो भवतु मे स्वर्गापवर्ग-प्रदः ।।

।। स्तोत्र-पाठ ।।

ॐ नमस्तेऽस्तु भैरवाय, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मने,
नमः त्रैलोक्य-वन्द्याय, वरदाय परात्मने ।।
रत्न-सिंहासनस्थाय, दिव्याभरण-शोभिने ।
नमस्तेऽनेक-हस्ताय, ह्यनेक-शिरसे नमः ।
नमस्तेऽनेक-नेत्राय, ह्यनेक-विभवे नमः ।।
नमस्तेऽनेक-कण्ठाय, ह्यनेकान्ताय ते नमः ।
नमोस्त्वनेकैश्वर्याय, ह्यनेक-दिव्य-तेजसे ।।
अनेकायुध-युक्ताय, ह्यनेक-सुर-सेविने ।
अनेक-गुण-युक्ताय, महा-देवाय ते नमः ।।
नमो दारिद्रय-कालाय, महा-सम्पत्-प्रदायिने ।
श्रीभैरवी-प्रयुक्ताय, त्रिलोकेशाय ते नमः ।।
दिगम्बर ! नमस्तुभ्यं, दिगीशाय नमो नमः ।
नमोऽस्तु दैत्य-कालाय, पाप-कालाय ते नमः ।।
सर्वज्ञाय नमस्तुभ्यं, नमस्ते दिव्य-चक्षुषे ।
अजिताय नमस्तुभ्यं, जितामित्राय ते नमः ।।
नमस्ते रुद्र-पुत्राय, गण-नाथाय ते नमः ।
नमस्ते वीर-वीराय, महा-वीराय ते नमः ।।
नमोऽस्त्वनन्त-वीर्याय, महा-घोराय ते नमः ।
नमस्ते घोर-घोराय, विश्व-घोराय ते नमः ।।
नमः उग्राय शान्ताय, भक्तेभ्यः शान्ति-दायिने ।
गुरवे सर्व-लोकानां, नमः प्रणव-रुपिणे ।।
नमस्ते वाग्-भवाख्याय, दीर्घ-कामाय ते नमः ।
नमस्ते काम-राजाय, योषित्कामाय ते नमः ।।
दीर्घ-माया-स्वरुपाय, महा-माया-पते नमः ।
सृष्टि-माया-स्वरुपाय, विसर्गाय सम्यायिने ।।
रुद्र-लोकेश-पूज्याय, ह्यापदुद्धारणाय च ।
नमोऽजामल-बद्धाय, सुवर्णाकर्षणाय ते ।।
नमो नमो भैरवाय, महा-दारिद्रय-नाशिने ।
उन्मूलन-कर्मठाय, ह्यलक्ष्म्या सर्वदा नमः ।।
नमो लोक-त्रेशाय, स्वानन्द-निहिताय ते ।
नमः श्रीबीज-रुपाय, सर्व-काम-प्रदायिने ।।
नमो महा-भैरवाय, श्रीरुपाय नमो नमः ।
धनाध्यक्ष ! नमस्तुभ्यं, शरण्याय नमो नमः ।।
नमः प्रसन्न-रुपाय, ह्यादि-देवाय ते नमः ।
नमस्ते मन्त्र-रुपाय, नमस्ते रत्न-रुपिणे ।।
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, सुवर्णाय नमो नमः ।
नमः सुवर्ण-वर्णाय, महा-पुण्याय ते नमः ।।
नमः शुद्धाय बुद्धाय, नमः संसार-तारिणे ।
नमो देवाय गुह्याय, प्रबलाय नमो नमः ।।
नमस्ते बल-रुपाय, परेषां बल-नाशिने ।
नमस्ते स्वर्ग-संस्थाय, नमो भूर्लोक-वासिने ।।
नमः पाताल-वासाय, निराधाराय ते नमः ।
नमो नमः स्वतन्त्राय, ह्यनन्ताय नमो नमः ।।
द्वि-भुजाय नमस्तुभ्यं, भुज-त्रय-सुशोभिने ।
नमोऽणिमादि-सिद्धाय, स्वर्ण-हस्ताय ते नमः ।।
पूर्ण-चन्द्र-प्रतीकाश-वदनाम्भोज-शोभिने ।
नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, स्वर्णालंकार-शोभिने ।।
नमः स्वर्णाकर्षणाय, स्वर्णाभाय च ते नमः ।
नमस्ते स्वर्ण-कण्ठाय, स्वर्णालंकार-धारिणे ।।
स्वर्ण-सिंहासनस्थाय, स्वर्ण-पादाय ते नमः ।
नमः स्वर्णाभ-पाराय, स्वर्ण-काञ्ची-सुशोभिने ।।
नमस्ते स्वर्ण-जंघाय, भक्त-काम-दुघात्मने ।
नमस्ते स्वर्ण-भक्तानां, कल्प-वृक्ष-स्वरुपिणे ।।
चिन्तामणि-स्वरुपाय, नमो ब्रह्मादि-सेविने ।
कल्पद्रुमाधः-संस्थाय, बहु-स्वर्ण-प्रदायिने ।।
भय-कालाय भक्तेभ्यः, सर्वाभीष्ट-प्रदायिने ।
नमो हेमादि-कर्षाय, भैरवाय नमो नमः ।।
स्तवेनानेन सन्तुष्टो, भव लोकेश-भैरव !
पश्य मां करुणाविष्ट, शरणागत-वत्सल !
श्रीभैरव धनाध्यक्ष, शरणं त्वां भजाम्यहम् ।
प्रसीद सकलान् कामान्, प्रयच्छ मम सर्वदा ।।

।। फल-श्रुति ।।

श्रीमहा-भैरवस्येदं, स्तोत्र सूक्तं सु-दुर्लभम् ।
मन्त्रात्मकं महा-पुण्यं, सर्वैश्वर्य-प्रदायकम् ।।
यः पठेन्नित्यमेकाग्रं, पातकैः स विमुच्यते ।
लभते चामला-लक्ष्मीमष्टैश्वर्यमवाप्नुयात् ।।
चिन्तामणिमवाप्नोति, धेनुं कल्पतरुं ध्रुवम् ।
स्वर्ण-राशिमवाप्नोति, सिद्धिमेव स मानवः ।।
संध्याय यः पठेत्स्तोत्र, दशावृत्त्या नरोत्तमैः ।
स्वप्ने श्रीभैरवस्तस्य, साक्षाद् भूतो जगद्-गुरुः ।
स्वर्ण-राशि ददात्येव, तत्क्षणान्नास्ति संशयः ।
सर्वदा यः पठेत् स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः ।।
लोक-त्रयं वशी कुर्यात्, अचलां श्रियं चाप्नुयात् ।
न भयं लभते क्वापि, विघ्न-भूतादि-सम्भव ।।
म्रियन्ते शत्रवोऽवश्यम लक्ष्मी-नाशमाप्नुयात् ।
अक्षयं लभते सौख्यं, सर्वदा मानवोत्तमः ।।
अष्ट-पञ्चाशताणढ्यो, मन्त्र-राजः प्रकीर्तितः ।
दारिद्र्य-दुःख-शमनं, स्वर्णाकर्षण-कारकः ।।
य येन संजपेत् धीमान्, स्तोत्र वा प्रपठेत् सदा ।
महा-भैरव-सायुज्यं, स्वान्त-काले भवेद् ध्रुवं ।।

अब क्षमा प्रार्थना करते हुए भैरवजी से आशिर्वाद मांगें।
सुबह रोटी को काले कुत्ते या किसी भी सामान्य कुत्ते को ख़िलादें कुत्ते को (स्वान) कहा गया है
इतना विधान करने के बाद आपके समस्त प्रकार के आर्थिक समस्या से आपको 100% राहत मिलेगी
यंत्र को पुजा स्थान मे ही स्थापित रहेने दे और नित्य यंत्र का दर्शन करे, यह साधना 3 दिवसीय है, अगर जीवन में मौका मिले पवित्र , सिद्धि महुर्तों या शुभ मंगल दिवसों पर पर सिर्फ 1 दिवसीय करें और बार- बार दोहोराना चाहिये , जिससे पूर्व में कोई नियुन्ता रही हो तो पूर्ण हो जायें !

मंत्र सिद्ध प्राण-प्रतिष्ठा युक्त , शक्तिपात सहित स्वर्णाकर्षण यंत्र, स्वर्णाकर्षण गुटिका, शुद्ध स्फेटिक माला मात्र - 5100/ -

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यह राशि अनाथ ग़रीब लोगो के कल्याण के लिए उपयोग ली जायेगी !

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21/07/2021

श्रावण के महीने में मंत्र सिद्ध, छः मुखी रुद्राक्ष धारण किया जाये तो भगवान सदा शिव के साथ मिलती है कार्तिकेय, शुक्र की कृपा ओर शुक्र है तो सौभाग्य है !

आप लोग इधर - उधर चीज़े धारण किये रहते हो , हमें क्या अवश्य है क्या नही उस पर ध्यान देना अति आवश्यक है ! और उसके धारण करने से हमें क्या फायदे है क्या नही इस बात पर जोर देना अति आवश्यक है

प्रकृति के मानव जीवन को आनंदित और पूर्ण सुखमय बनाने के लिए दुर्लभः उपहार दिये है , लेकिन बिना मार्गदर्शन या अज्ञानता वश हम उनका उपयोग नही ले पाते है !
अगर कोई भी स्त्री पुरुष ऐसी दुर्लभः वस्तुओं का उपयोग कर लेता है तो उसका जीवन धन्य बन जाता है
तंत्र का विभाजन एवं कार्य सिद्धियों व साधना सिद्धियों में सहायक
1, मंत्र-यंत्र-तंत्र
2, नाग तंत्र
3, वनस्पति तंत्र
प्रकृति बहुत दयालु है , प्रकृति ने हमें अनेक दुर्लभः , रहस्यों से भरी वस्तुयें वनस्पति तंत्र में प्रदान की गई है
जैसे -
A, हत्था जोड़ी - शक्ति और लक्ष्मी साधना में सहायक
B, अपामार्ग - सरस्वती , चेतना, ज्ञान अभिवृद्धि , वचन सिद्धि में सहायक
C, तेजबल- नकारात्मक शक्तियों को दूर करने में सहायक
D, रुद्राक्ष , रुद्राक्ष के बारे में कहना सागर को गागर में समाहित करने जैसा है ,

ये बनस्पतियाँ स्वयं सिद्ध होती है लेकिन अगर इनको समाजोपयोगीता, के अनुसार कार्य सिद्धि मंत्रों से सिद्ध कर दिया तो कहने ही क्या ..

आज मैं उस रुद्राक्ष का जिक्र करने जा रहा हूँ जो हर गृहस्त को भौतिक जीवन में सहायक होता है
मुख्यतः रुद्राक्ष 21 प्रकार के होते है उनमें भी आकृति के अनुसार अलग - अलग नाम से संबोधित किया जाता है,

छः मुखी रुद्राक्ष भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय का ही स्वरुप है। इस रुद्राक्ष का प्रतिनिधित्व शुक्र करता है।
और जो भी स्त्री पुरुष इसे धारण करता है उसे शुक्र आशीर्वाद प्राप्त होता है , उसका जीवन थिरक - थिरक कर नृत्यमय हो उठता है ,
*शुक्र ग्रह गुप्तेन्द्रिय, वीर्य, गला, स्री सुख, अर्थ काम, प्रेम, कला, संगीत आदि का कारक है।
*महाशिवपुराण के अनुसार इस रुद्राक्ष के प्रभाव से ब्रह्महत्या जैसे जघन्य पापों से मुक्ति मिलती है।
*जिन लोगों के वैवाहिक जीवन में प्रेम की कमी है या अ लगाव की स्थिति है तो उन्हें अपने वैवाहिक जीवन में स्थिरता और मधुरता लाने के लिए छः मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए।
*बुद्धि की तेजी के लिए यह रुद्राक्ष सहायक होता है। अगर आपकी किसी से शत्रुता है तो इस रुद्राक्ष के प्रभाव से शत्रुओं से आपका बचाव होता है।
* अकस्मात धन प्राप्ति में यह रुद्राक्ष सहायक होता है।
*इस रुद्राक्ष को धारण करने से सम्मोहन प्राप्त होता है , जो भी व्यक्ति आप को देखता है वह सम्मोहित हो जाता है !
इसके प्रभाव से वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है और समस्त जीवन ऐशोआराम से व्यतीत होता है।
छः मुखी रुद्राक्ष धारण करने से भौतिक जीवन थिरक-थिरक कर नृत्य में ही उठता है , भगवान श्री कृष्ण का भी प्रिय था , इस रुद्राक्ष को धारण करने से सम्मोहन शक्ति बढ़ती है !

*छात्रों के लिए तो यह रुद्राक्ष किसी वरदान से कम नहीं है। इसके प्रभाव से बुद्धि, ज्ञान, एकाग्रता तथा स्मरणशक्ति का विकास होता है।
इस रुद्राक्ष को छोटा बड़ा स्त्री - पुरुष समान रूप से धारण कर सकते है,

*जिस जातक की कुंडली में शुक्र ग्रह बलवान नहीं है या बलवान होकर भी अपना शुभ फल नहीं दे रहे, उनको 6 मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए।

*इस रुद्राक्ष के प्रभाव से वाणी में मधुरता आती है, नौकरी हो या व्यवसाय धन लाभ अवश्य होता है।
इसके प्रभाव से बुद्धि तेज होती है और ज्ञान की प्राप्‍ति होती है।

वृषभ और तुला राशि के जातकों को छह मुखी रुद्राक्ष धारण करना शुभ माना गया है।

जिन लोगों के वैवाहिक जीवन में प्रेम की कमी है या अलगाव की स्थिति है तो उन्‍हें छह मुखी रुद्राक्ष से अवश्‍य ही धारण करना चाहिये

इसके अलावा प्रेम विवाह की इच्‍छा रखने वाले और संगीत कला में लोकप्रियता हासिल करने की इच्‍छा रखने वाले लोगों को भी छह मुखी रुद्राक्ष से फायदा होगा।

जिस जातक की कुंडली में शुक्र ग्रह बलवान नहीं है या बलवान होकर भी अपना शुभ फल नहीं दे रहे, उनको 6 मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए।
इस रुद्राक्ष के प्रभाव से वाणी में मधुरता आती है, नौकरी हो या व्यवसाय धन लाभ अवश्य होता है।

याद रखे अगर कोई भी तंत्र में सहायक सामग्री जैसे यंत्र ,माला, गुटिका, या कोई प्रतीक चिह्न लें तो शुद्ध और मंत्र सिद्ध प्राण-प्रतिष्ठा युक्त ही लें,
अगर आप मंत्र सिद्ध और ओरिजनल सामग्री लेते है तो उसका प्रभाव आप को तुरंत देखने को मिलेगा और आप की कार्य सिद्धि और साधना सिद्धि के कई गुना प्रभाव बढ़ जाते है और कुछ ही दिनों में साकार रूप में देखने को मिलते है ,

जब भी आप छः मुखी रुद्राक्ष मंगवाये या कोई भी साधना सामग्री जैसे यंत्र, माला, गुटिका या अन्य साधनात्म सामग्रियां सिद्ध किया हुआ मंगवाये !

मंत्र सिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त छः मुखी रुद्राक्ष की धारण करने की कोई विशेष विधान की आवश्यकता नही है ,

किसी भी सोमवार या शुक्रवार को आप गले या बाजू में धारण करते समय मंत्र 21 बार निम्न मंत्र का उच्चारण करें,

'ऊँ ह्रीं हुं नम: ..!!

इस मंत्र का आप चाहे तो नियमित रोजाना 21 बार या इससे अधिक जाप कर सकते है ,

मंत्र सिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त 6 मुखी सिद्ध रुद्राक्ष सहयोग राशि - 1500/- rs
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हमारा उद्देश्य आप खुश रहे, आनंदित रहे लोक कल्याण हो ,
पिछड़ों का सर्वांगीण विकास ही मेरे जीवन का मुख्य ध्येय है ..!!

17/07/2021

प्रक्षेपण शक्तिपात युक्त दीक्षा
इस बार 24 जुलाई 2021 गुरु पूर्णिमा के विशेष उपलक्ष्य पर तुम्हें भर देना चाहता हूँ , तुम्हारी उदासी को हटाना चाहता हूँ , साधनाओं में आने वाली असफलता को हटाना देना चाहता हूँ , साबित करना है कि तुम भी ज्ञानगंज - सिद्धाश्रम - सिद्ध लोक के अंश हो !
ऐसा कोई व्यक्ति नही जिसका इस जन्म या पिछले जन्म का भक्ति साधना अस्तित्व नही हो हर मनुष्य का होता है, वह समय के अनुसार अपना अपनी साधनात्मक अस्तित्व को खो चुका होता है , इस दीक्षा के माध्यम से में तुम्हें स्वयं से परिचय करना चाहता हूं !
पूर्व जन्म जन्मांतर की तुम्हारी खोई हुई शक्ति को जागृत करना चाहता हूँ , तुम्हारे तार जोड़ना चाहता हूँ

"पूर्ण शक्तिपात युक्त प्रक्षेपण साधना"

रामायण का एक प्रसंग तो आप को भली-भांति याद ही होगा, सीता माता की खोज में श्री राम, लक्ष्मण के साथ सम्पूर्ण वानर सेना हनुमान जी के साथ समुद्र तट पर खड़े होकर हनुमानजी को लंका पर भेजने की योजना बना रहे थे ! लेकिन कोई हल नही निकल रहा था तभी उसी सेना में एक वृद्ध जावन्त नामक सैनिक भी था जो बहुत ही विद्धवान और गुरु तुल्य सलाहकार थे !
भगवान राम सहित सभी निगाहें आशा पूर्वक जामवंत की तरफ थी, तभी जावन्त ने कहा हे हनुमान याद करो जब तुम बाल्य अवस्था में थे, तुमने एक बार खेल-खेल में सूर्य को निगल लिया था ! वो दिन याद करो , जागो अनुमान अंजनी पुत्र जागो ! जामवंत ने बजरंग बाण का उच्चारण किया , उनकी बाल लीलाओं का गुणगान किया !
बाल समय रवि भक्षी लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों .
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो .
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो .
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो .
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो……
जामवंत ने हनुमान का बजरंग वाण से प्रक्षेपण किया कहाँ है वो तुम्हारी शक्ति - उसी समय हनुमान का विशाल रूप बन गया सारी खोई शक्तियां वापस आ गई

जामवंत जी ने यही प्रक्षेपण हनुमान के साथ किया, आज गुरु कृपा से वही प्रक्षेपण इस गुरु पूर्णिमा पर विशेष गोपिणीय दुर्लभः मंत्रों के द्वारा सोई हुई , शक्ति साधनात्मक ऊर्जा जिसे आप भूल चूके हो उसी को आज जाग्रित करने का समय आ गया है,
पूर्व में कई गई किसी भी साधना केई ऊर्जा को एकत्रित कर देना ओर उसे अपने लक्ष्य पर प्रक्षेपित कर देना यही इस साधना का सामान्य शब्दों में सार है !
अन्य साधना भक्ति में प्रक्षेपण दीक्षा या साधना सहायक है !

तुम्हारी पूर्व जन्म या इस जन्म की खोई हुई शक्तियों को जागृत करने की क्रिया को प्रक्षेपण कहते है !

गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर सिर्फ 205 लोगों को विशेष फ़ोटो शक्तिपात क्रिया द्वारा प्रक्षेपण किया जायेगा, जिनको भी शक्तिपात युक्त प्रक्षेपण दीक्षा लेनी है वो अपना रजिस्ट्रेशन शीघ्र करा दें !

Note - 205 व्यक्ति महिला-पुरुष पूर्ण होने पर अनुमति नही दी जायेगी !

सहयोग राशि मात्र 1100/- rs होगी

हमारी संस्था पिछड़े जरूरत मंद बच्चें एवं वृद्ध विधवा माँ बहिनों के आर्थिक सामाजिक विकास पर कार्य करती है , यह पूर्ण राशि यही के कल्याण में खर्च होगी !

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