13/06/2023
क्या आप 14000 करोड़ के बिज़नेस का हिस्सा बनना चाहेंगे?
Will Brokers Survive opposite to Online Platforms ??
पहले एक सवाल, ये ब्रोकिंग बिज़नेस का साइज क्या होगा? कुल इंडियन हाउसहोल्ड एसेट्स होंगी तक़रीबन 11 ट्रिलियन डॉलर, जिसकी आधी बोले तो सिर्फ़ 5+ ट्रिलियन डॉलर रियल एस्टेट में है। आप इसे कमेंट में भारतीय रुपये में कन्वर्ट करके बताना। अब सोचिये अगर गोल्ड+ बैंक FD+ PPF+ इन्शुरन्स+ शेयर्स+ म्यूच्यूअल फण्ड+ कैश इत्यादि सब मिलकर रियल एस्टेट के बराबर होते है(Check Last Post)। ऐसे में अगर कोई रियल एस्टेट के ख़रीदने बेचने से जुड़ा हो तो क्या संभावना है उसकी किसी बीमा एजेंट, या म्यूच्यूअल फण्ड एडवाइज़र, या शेयर सब-ब्रोकर्स जैसे बिज़नेस के आगे। रियल एस्टेट ब्रोकरेज का मार्केट डिवाइडेड है, ऑर्गनाइज्ड नही है, इसमें फ़ोन कम्पनियों, बैंकिंग, बीमा कम्पनीज़ या टैक्सी कंपनियों (OLA-UBER) जैसा कंसोलिडेशन नहीं है, तो इसके आधिकारिक आँकड़े उपलब्ध नही है। अगर टॉप 10 सिटीज़ का एक अनुमान लगाये तो क़रीब 2 लाख ब्रोकर्स है, जिनकी कमायी क़रीब 14000 करोड़ सालाना है। नये प्रोजेक्ट, रीसेल, रेंटल्स, कमर्शियल, PG, प्लॉट्स, एग्रीकल्चर लैंड इत्यादि अलग अलग सेग्मेंट में अलग अलग ब्रोकर्स ऑपरेट करते है। ब्रोकर्स बनने के लिये पहले कोई लाइसेंस या क्वालिफिकेशन नही थी। कहीं भी बोर्ड लगाकर चार कुर्सियाँ डालिये व काम स्टार्ट। मगर अब RERA आने के बाद से इस फील्ड में अमूल चूल परिवर्तन हो रहे है। जीरो ब्रोकिंग फ़ीस के नाम से मार्केटिंग नौटंकी करने वाली कम्पनियाँ हज़ार करोड़ के क्लब में पहुँच गई है। मैजिक ब्रिक्स, 99 एकड़, हाउसिंग.कॉम इत्यादि कम्पनियाँ टेक्नोलॉजी फ्रंट पर मार्केट शेयर हथिया कर सैंकड़ों करोड़ का टर्न ओवर कर रही है क्या ऐसे में व्यक्तिगत ब्रोकर्स ज़िंदा रहेंगे या OLA-UBER की तरह बीच के माध्यम को हटाकर ये हज़ारों करोड़ का धंधा चंद हाथों में सिमट जायेगा?
इस सवाल का जवाब ढूँढने से पहले आइये जानते है ब्रोकर मुख्यतः करता क्या है?
1. प्रॉपर्टी ढूँढना : ग्राहक की ज़रूरत अनुसार सही प्रॉपर्टियाँ चुनना एक मुख्य काम है। ब्रोकर के अपने डेटाबेस में अगर वो प्रॉपर्टी नहीं है तो ब्रोकर्स अपने जैसे ब्रोकर्स के नेटवर्क से उपयुक्त प्रॉपर्टी निकालता है।
2. सलाहकार : प्रॉपर्टी ख़रीदना एक बड़ा फाइनेंसियल डिसिशन है जो ग़लत होने पर ग्राहक के जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। भविष्य में दाम बढ़ने की सम्भावनाएँ, संभावित रेंटल रिटर्न्स, प्रॉपर्टी/लोकेशन से जुड़ी नेगेटिव जानकारियाँ मार्केट कॉस्ट कुछ ऐसे क्षेत्र है जहां सिर्फ़ “एक्सपर्ट” सलाह मूल्यवान होती है। दो आपस में मिली हुई प्रॉपर्टीज़ में रेंटल रिटर्न्स का दुगना अंतर हो सकता है। CP के इनर सर्किल उससे जुड़े मिडल सर्किल के प्रॉपर्टी दाम दो-तिहाई है, जबकि मिडल सर्किल से जुड़े आउटर सर्किल के दाम मिडल सर्किल से ज़्यादा है सब एक ही रिटेल मार्केट के हिस्से है, एक लगातार बिल्डिंग जैसा मार्केट है। यहाँ तक की इनर सर्किल में भी अलग अलग ब्लॉक का प्रॉपर्टी के दाम/रेंटल्स अलग है। कारण है अलग अलग सर्किल/ब्लॉक में अलग अलग ग्राहकों की संख्या। ये माइक्रो मार्केट के अंदर माइक्रो-माइक्रो लोकेशंस का एक्सपर्ट ज्ञान उस लोकेशन के ब्रोकर्स को होता है मगर किसी अलाने-फलाने डॉट कॉम के प्रॉपर्टी एक्सपर्ट इस अल्ट्रा माइक्रो लोकेशन (Hyper Locational) बेस्ड नॉलेज में ग्राहक को सही एक्सपर्ट एडवाइज़ देने में सक्षम नही हो सकते। ग्राहक अपनी रिसर्च के बावजूद ब्रोकर्स की राय पर निर्भर करता है।
3. बार्गेनिंग : बेचने वाला जिस प्रॉपर्टी को मार्केट रेट से ऊपर बेचना चाहता है, उसी प्रॉपर्टी को ख़रीदार मार्केट से नीचे दाम पर ख़रीदना चाहता है। ऐसी स्थितियों में ब्रोकर्स की अनुपस्थिति में दोनों एक्चुअल वैल्यू के बजाये perceived प्राइस की बार्गेन करते है। बहुत बार दोनों का अहम टकराता है, ट्रांजेक्शन नही होती। इसके अलावा मार्केट वैल्यू के अलावा बहुत बार अन्य डेटेल्स जैसे पेमेंट टर्म्स, क़ानूनी पक्ष, प्रॉपर्टी की क्वालिटी, मेंटेनेंस इत्यादि फ़ैक्ट्स होते है जो किसी ट्रांजेक्शन को बनाने-बिगाड़ने के लिये उत्तरदायी है। ब्रोकर्स इन सब के बीच मैच मेकिंग करा पाता है तो ट्रांजेक्शन होती है।
4. Logistics support - साईट विजिट, बिल्डर से पेपर वर्क, सरकार से रजिस्ट्रेशन, मेंटेनेंस, इंटीरियर इत्यादि से लेकर बैंक लोन तक बहुत सारे लोजिस्टिक्स इश्यू हैंडल करना एक अच्छे ब्रोकर की एक्सपर्टीज़ होती है। एक सर्वे के अनुसार घर ख़रीदने वाले 85% ग्राहक उसके रजिस्ट्रार ke दफ़्तर तक को नहीं जानते। इन सब के बिना ख़रीदार असुरक्षित महसूस करता है व कई बार ट्रांज़ेक्शंस नही हो पाती।
आइये अब देखते है कौन कौन सा काम टेक्नोलॉजी कर सकती है व कौनसा नहीं जिससे तय होगा की ब्रोकर्स मार्केट में रहेंगे या सब ऑनलाइन हो जायेगा!!
मेरे अनुसार प्रॉपर्टी ढूँढने का काम कोई भी ऑनलाइन कर सकता है। हालाँकि भारत में प्रॉपर्टी ख़रीदने वाले 60% निर्णायक लोग पचास-साठ साल की उम्र से ऊपर वाले होते है तो उनके लिये ऑनलाइन सर्चिंग-प्रोफ़ाइलिंग एक चैलेंज रहता है, मगर परिवार-मित्रों की सहायता से इसका समाधान किया जा सकता है। लोजिस्टिक्स भी काफ़ी हद तक ऑनलाइन थर्ड पार्टी vendors डिप्लॉय करके कराया जा सकता है। पर ध्यान से देखा जाये तो उल्टे ये दोनों काम ऑनलाइन होने का फ़ायदा ब्रोकर्स ग्राहकों से ज़्यादा इफ़ेक्टिवली कर सकता है, जिस कारण उसके काम का बौझ कम होगा व वो अन्य काम बेहतर कर सकेंगे।
जहां तक सलाह व बार्गेन करके मैच मेकिंग का काम है वो अधिकतर ब्रोकर्स के ही डोमेन में रहने वाला है। ऑनलाइन प्लेटफार्म ब्रोकर्स को इस क्षेत्र में चैलेंज नहीं कर सकेंगे। पर ब्रोकर्स को आधुनिक टेक्नोलॉजी का यूज़ सीख कर अपनी कॉम्पिटेंस बढ़ानी होगी। चूँकि ब्रोकर्स हायपर लोकल नॉलेज का सुपर एक्सपर्ट होता है तो ग्राहक का हित भी ब्रोकर्स के साथ डील करने में है। उधर, तकनीक कितनी भी उपयोगी हो जाये मगर सेकेंडरी मार्केट में फेस टु फेस बैठकर बार्गेन करने का अल्टरनेट अभी संभावित नही दिखता। हाँ RERA की नयी नॉर्म्स के अनुसार ब्रोकिंग बिज़नेस कंसोलिडेट होगा। मौक़ा मिलने पर एक-आध डील करने वाले पार्ट टाइमर लोग लाइसेंस लेने व बार बार लाइसेंस फ़ीस (जो कई जगह लाखों में है) जमा करने के बजाये अच्छे स्थापित ब्रोकिंग हाउस को जॉइन करते दिखायी देंगे।
जो ब्रोकर्स नयी तकनीक यूज़ करेंगे, नॉलेज अपडेट रखेंगे, विश्वास बनायेंगे व उस विश्वास को क़ायम रखेंगे, नेटवर्किंग सही करेंगे वो आने वाले समय में पहले से बेहतर बिज़नेस ना कर सके ऐसा कोई कारण नहीं है।
अगर आप इस काम को ना सिर्फ़ सीखना बल्कि एक कामयाब नेटवर्क का हिस्सा बनना चाहते है तो इस पेज को लाइक कर लीजिये व आगे आने वाली पोस्ट चेक करते रहे।