Ajeet Kumar Pandey

Ajeet Kumar Pandey Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Ajeet Kumar Pandey, Real Estate, Delhi.

03/07/2026

अमेरिका हजारों डॉलर खर्च करने के बाद भी नवग्रह ही पता किया और यहां लाखों वर्ष पहले दिन के ही नाम नवग्रह पर रख दिया है

02/07/2026
02/07/2026

यदि आरक्षण का लाभ लेकर कोई व्यक्ति डीएम sp बन जाता है उसके बाद भी उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए कि नहीं?

19.2.2025          "आज का व्यक्ति इतना अधिक स्वार्थी होता जा रहा है, कि अपने स्वार्थ के सामने उसे ईश्वर धर्म-कर्म पुनर्ज...
19/02/2025

19.2.2025
"आज का व्यक्ति इतना अधिक स्वार्थी होता जा रहा है, कि अपने स्वार्थ के सामने उसे ईश्वर धर्म-कर्म पुनर्जन्म आदि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। ऐसा व्यवहार करना मानवता के विरुद्ध है।"
उदाहरण के लिए -- एक व्यक्ति ने आम का वृक्ष लगाया। बहुत वर्षों तक उस वृक्ष ने आम खिलाए। जब वह वृक्ष बूढ़ा हो गया, उस पर आम लगने बंद हो गए, तो वृक्ष लगाने वाले व्यक्ति ने सोचा, कि "अब यह वृक्ष आम तो देता नहीं, तो इसे कटवा देना चाहिए।" उसका ऐसा सोचना गलत है। क्योंकि यह संसार का नियम है, कि "जो भी वस्तु उत्पन्न होती है, धीरे-धीरे उसमें घिसावट होती है, वृद्धावस्था आती है। और पहले जैसी शक्ति उसमें नहीं रहती।" इसी नियम के अनुसार "अनेक वर्षों तक उस वृक्ष ने उसको आम खिलाए। अब वृद्धावस्था में यदि वृक्ष, आम के फल नहीं देता, तो कम से कम छाया तो देता है। तब इतने में ही उसे संतोष रखना चाहिए। उसकी छाया का लाभ ही लेना चाहिए।" "यदि उसे काट दिया जाए, तो यह वृक्ष के साथ उचित व्यवहार नहीं है, अन्याय है।"
"उसे भी ईश्वर ने जन्म दिया है। वह भी अपना जीवन पूरा जीना चाहता है। उसे भी जीने का पूरा अधिकार है। उसमें भी आप जैसी ही आत्मा है। इसलिए वृद्धावस्था में भी छाया देने वाले जीवित वृक्ष को काटना नहीं चाहिए। ऐसे वृक्ष को काटना अधर्म है।" "परंतु स्वार्थी लोग इस धर्म अधर्म की परवाह नहीं करते, और वृक्ष को काट देते हैं।"
"ऐसे स्वार्थी लोगों का स्वार्थ जब और अधिक बढ़ता जाता है, तो वे धर्म अधर्म की, कर्म फल की, पुनर्जन्म की भी कोई चिंता नहीं करते। केवल अपना स्वार्थ ही देखते हैं। यहां तक कि वे अपने वृद्ध माता-पिता की भी परवाह नहीं करते।"
"जवानी में उनके माता-पिता ने उन्हें बहुत सा धन दिया, संपत्ति दी, पढ़ाया लिखाया खिलाया पिलाया, बहुत वर्षों तक उनकी सेवा की। अब वे वृद्ध हो गए, अशक्त हो गए। तो स्वार्थी लोगों ने उनको भी घर से निकाल दिया, और कहीं वृद्ध आश्रम में या सड़क पर ही छोड़ दिया। ऐसा करना अनुचित और बहुत बड़ा अपराध है।" "ऐसी नास्तिकता और विकृत मानसिकता से बचें।"
"वृद्धावस्था में माता-पिता यदि धन आदि सुविधाएं नहीं दे पा रहे, तो कम से कम अपने जीवन का अमूल्य अनुभव तो आपको दे रहे हैं। उनके जीवन का अनुभव बहुत अमूल्य है। धन से तो उसका मूल्य आंक ही नहीं सकते।" "जैसे वृक्ष वृद्धावस्था में फल न देकर छाया देता है, उसका भी लाभ है। ऐसे ही माता-पिता और गुरुजन वृद्धावस्था में धन न देकर अपने जीवन का अमूल्य अनुभव तो देते हैं। उसका भी बहुत अधिक लाभ है।" "जो व्यक्ति उनके अनुभव का मूल्य जानता है, वह सदा अपने माता-पिता और गुरुजनों की रक्षा करता है। उनके अनुभव से लाखों करोड़ों रुपया भी कमाता है। अनेक क्षेत्रों में ठोकरें खाने से भी बच जाता है। व्यापार में लाखों रुपए की हानि से भी बच जाता है। इस तरह उनका अनुभव बहुत ही मूल्यवान और लाभकारी होता है।"
"इसलिए हे सज्जनो! आप अपने माता-पिता और गुरुजनों की वृद्धावस्था में सेवा और सम्मान अवश्य करें। उनका आशीर्वाद लें। उनके अनुभव से आप को बहुत अधिक लाभ मिलेगा।"
"चेतावनी -- और यदि आपने ऐसा नहीं किया, तो याद रखना, कल आपके जीवन में भी वृद्धावस्था आने वाली है। तब आपके बच्चे भी आपको इसी प्रकार से किसी वृद्धाश्रम में अथवा सड़क पर छोड़ देंगे, जैसा कि आप अपने माता-पिता के साथ आज व्यवहार कर रहे हैं।" "तब आपको पता चलेगा कि वृद्धावस्था में घर से बाहर निकालने का क्या अर्थ होता है?"
"इसलिए सावधान! अपनी वृद्धावस्था में अपनी दुर्गति से बचने के लिए, अपने स्वार्थ की सुरक्षा के लिए ही सही, आप अपने बड़े बुजुर्गों माता-पिता एवं गुरुजनों आदि का सम्मान और सेवा आज अवश्य ही करें।"
----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"

18.2.2025        अपने घर के सदस्यों को आप 'अपना' कहते हैं और मानते भी हैं। "वे आपके घर के सदस्य आपको सुख भी देते हैं और ...
18/02/2025

18.2.2025
अपने घर के सदस्यों को आप 'अपना' कहते हैं और मानते भी हैं। "वे आपके घर के सदस्य आपको सुख भी देते हैं और दुख भी।" "बाहर के लोग अथवा दूर के लोग भी आपको सुख और दुख देते हैं।" यह एक सामान्य नियम है, कि "घर परिवार के सदस्य या संबंधी लोग आपको सुख अधिक और दुख कम देते हैं।" परन्तु कभी-कभी इसके विपरीत भी देखा जाता है, अर्थात "घर के सदस्यों में से कोई कोई व्यक्ति दुख अधिक देते हैं, और बाहर के मित्र आदि लोग आपको सुख अधिक देते हैं।"
यदि आप ईमानदारी से इस बात पर विचार करेंगे और सत्य को स्वीकार करेंगे, तो आपको यह बात समझ में आ जाएगी, कि "कभी-कभी घर के या संबंधी लोग अधिक दुख देते हैं।" क्यों? इसका कारण क्या है? इसका कारण है "स्वार्थ और अविद्या।" संसार में कोई भी व्यक्ति जब किसी दूसरे व्यक्ति को दुख देता है, तो उसके यही दो कारण प्रमुख होते हैं, "स्वार्थ और अविद्या।"
परंतु जो घर के सदस्य हैं, या निकट रिश्तेदार संबंधी आदि हैं, वे अपने स्वार्थ और अविद्या के कारण तो आपको दुख देते ही हैं। परन्तु इसका तीसरा एक और कारण यह भी है, कि "वे आपसे कुछ संबंध रखते हैं। इस संबंध के कारण वे आप पर अपना अधिकार मानते हैं। रिश्तेदारी के बहाने से वे आप तक बहुत आसानी से पहुंच सकते या पहुंच जाते हैं। उनके साथ संबंध होने के कारण आप उनका अधिक विरोध भी नहीं कर पाते। इसलिए उनकी पहुंच आप तक आसान होने से, तथा अपने स्वार्थ और अविद्या के कारण आपको समय-समय पर अन्यों की अपेक्षा आपको और अधिक दुख देते रहते हैं। क्योंकि आपका उनके साथ रिश्ता है, इसलिए समाज के लोग भी उनकी आप तक पहुंच का अधिक विरोध नहीं करते।" और वे भी इस बात को मान लेते हैं, कि "ये तो आपके घर के लोग या रिश्तेदार हैं, ये तो आपकी मदद ही करते होंगे। ये आपको क्या दुख देंगे?" "इस बात का गलत लाभ उठाते हुए वे रिश्तेदार आपको अधिक नुकसान कर जाते हैं। वे लोग हानि भी अधिक करते हैं, धोखा भी देते हैं, और सभ्यता पूर्वक माफी भी नहीं मांगते। यदि कभी माफी मांगें भी, तो माफी मांगने का नाटक करते हैं, अपनी गलती को हृदय से स्वीकार नहीं करते, उसे दूर नहीं करते।"
"अपरिचित लोगों से यदि कभी कोई छोटी सी गलती हो भी जाए, रेल बस या बाज़ार आदि में थोड़ा सा धक्का लग भी जाए, तो वे तत्काल हाथ जोड़कर सभ्यता पूर्वक माफी भी मांग लेते हैं।" "वे लोग आपको इतनी हानि नहीं करते। उनसे जो भी हानि हो जाती है, प्रायः अनजाने में होती है, वे जानबूझकर हानि नहीं करते।" "घर के सदस्य और रिश्तेदार लोग तो जानबूझकर भी आपकी हानियां करते हैं। इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है।" "इसलिए सदा सबसे सावधान रहें।" कहने का सार यह है कि "परिचित हो या अपरिचित, कोई भी व्यक्ति कभी भी आपकी या किसी की भी हानि कर सकता है।" "जो जितना अधिक निकट संबंधी है, उससे उतना ही अधिक सावधान रहें।"
"मैं यह नहीं कहना चाहता, कि आप उनकी हर बात या हर व्यवहार में संशय करें।" मैं तो यह कहना चाहता हूं कि "उनके व्यवहारों का ठीक-ठीक अध्ययन करके उनकी नीयत को अच्छी तरह से समझें। जिन रिश्तेदारों की नीयत अच्छी हो, उन पर विश्वास करें, भरोसा रखें, और उनके साथ मिलजुलकर प्रेम से, सुख से जीवन जिएं। और जिनकी नीयत खराब हो, उनसे सदा सावधान रहें, चाहे वे आपके घर के सदस्य ही क्यों न हों?" "इसी प्रकार से बाहर के लोगों से भी सावधान रहें। उनकी नीयत को भी पहचानें। तभी आप उनसे सुरक्षित रहेंगे और अधिक सुखमय जीवन जी सकेंगे।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

17.2.2025         ईश्वर ने सबको कुछ न कुछ दिया है। किसी को कम दिया, और किसी को अधिक। यह पक्षपात नहीं है। यह सब कर्मों का...
17/02/2025

17.2.2025
ईश्वर ने सबको कुछ न कुछ दिया है। किसी को कम दिया, और किसी को अधिक। यह पक्षपात नहीं है। यह सब कर्मों का फल है। "जिसने पूर्व जन्म में अधिक अच्छे कर्म किए, उसको ईश्वर ने अधिक धन संपत्ति विद्या बल बुद्धि अच्छे माता-पिता परिवार आदि सब सुविधाएं दी।" "जिसने इतने अच्छे कर्म नहीं किये, सामान्य कर्म किए, उसको ये सब सुविधाएं सामान्य स्तर की दी।" "जिन लोगों ने बहुत ही कम मात्रा में अच्छे और कुछ बुरे कर्म भी किए, उनको ईश्वर ने बहुत ही कम सुविधाएं दी और कुछ समस्याएं भी दी। जैसे गरीबी भुखमरी रोग अशिक्षित माता-पिता इत्यादि। इस प्रकार से ईश्वर ने सबके साथ न्याय किया।"
"और जिन लोगों ने बहुत ही बुरे बुरे कर्म किए। जैसे चोरी डकैती लूटमार हत्याएं अपहरण रिश्वतखोरी स्मगलिंग ब्लैक मार्केटिंग इत्यादि, ऐसे-ऐसे पाप कर्म किए, उन्हें तो ईश्वर ने पशु पक्षी कीड़ा मकोड़ा शेर भेड़िया सांप बिच्छू वृक्ष वनस्पति इत्यादि ऐसी निम्न योनियों में जन्म देकर अच्छी तरह से दंडित किया।" यह सब कर्म फल व्यवस्था ईश्वर की है, और न्याय पूर्वक है। "इस सारी व्यवस्था को देखकर आप सबको अनुमान कर लेना चाहिए, कि "ईश्वर एक न्यायकारी राजा है। वह कर्मों के अनुसार सबको फल देता है।"
अब यदि आपको आपके पिछले कर्मों के आधार पर ईश्वर की कृपा से ऊपर बताई अच्छी संपत्तियां और सुविधाएं प्राप्त हुई हैं, तो आपको स्वयं को भाग्यशाली मानना चाहिए, कि "आपको ईश्वर ने ये सब संपत्तियां इसलिए दी हैं, कि अब आप इन संपत्तियों का सदुपयोग करें, अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी। इन संपत्तियों का दुरुपयोग बिल्कुल न करें। इनसे आप स्वयं भी सुख उठाएं और दूसरों को भी सुख दें।"
"यदि आप ऐसा करेंगे, तो आपका जीवन सफल होगा। ये सब संपत्तियां भी सार्थक हो जाएंगी। और भविष्य में भी ईश्वर आपको इसी प्रकार की सुख संपत्तियां फिर से देगा।"
जो लोग अपने पूर्व जन्म के कर्मों के कारण इन संपत्तियों से इस जन्म में वंचित हैं, गरीब हैं, अच्छी सुविधाओं से रहित हैं। वे भले ही आज पुरुषार्थ भी करते हैं, फिर भी उन्हें खर्चा पूरा नहीं पड़ता, धन वस्त्र मकान भोजन आदि वस्तुओं की कमियां रहती हैं। "यदि ऐसे पुरुषार्थी लोग आपको मिलें, जो सहयोग प्राप्त करने के पात्र कहलाते हैं, तो आप उनकी सहायता अवश्य करें। यही आपकी धन संपत्तियों आदि की सार्थकता एवं सदुपयोग है।" "उनका सहयोग करके आप स्वयं को फिर से भाग्यशाली मानें, और ईश्वर का बार-बार धन्यवाद करें, कि ईश्वर ने आपको "सहयोग देने वालों" की श्रेणी में रखा है, "सहयोग लेने वालों" की श्रेणी में नहीं। यह भी एक बड़े भाग्य की बात है।"
"अतः योग्य पात्रों को सहयोग देकर अपनी संपत्ति का भी सदुपयोग करें, और सुख से जीवन जीते हुए, अपने वर्तमान जीवन को सफल बनाएं। इससे आपका अगला जन्म भी सुखमय होगा।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

Address

Delhi

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Ajeet Kumar Pandey posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share

Category