Ajeet Kumar Pandey

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19.2.2025          "आज का व्यक्ति इतना अधिक स्वार्थी होता जा रहा है, कि अपने स्वार्थ के सामने उसे ईश्वर धर्म-कर्म पुनर्ज...
19/02/2025

19.2.2025
"आज का व्यक्ति इतना अधिक स्वार्थी होता जा रहा है, कि अपने स्वार्थ के सामने उसे ईश्वर धर्म-कर्म पुनर्जन्म आदि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। ऐसा व्यवहार करना मानवता के विरुद्ध है।"
उदाहरण के लिए -- एक व्यक्ति ने आम का वृक्ष लगाया। बहुत वर्षों तक उस वृक्ष ने आम खिलाए। जब वह वृक्ष बूढ़ा हो गया, उस पर आम लगने बंद हो गए, तो वृक्ष लगाने वाले व्यक्ति ने सोचा, कि "अब यह वृक्ष आम तो देता नहीं, तो इसे कटवा देना चाहिए।" उसका ऐसा सोचना गलत है। क्योंकि यह संसार का नियम है, कि "जो भी वस्तु उत्पन्न होती है, धीरे-धीरे उसमें घिसावट होती है, वृद्धावस्था आती है। और पहले जैसी शक्ति उसमें नहीं रहती।" इसी नियम के अनुसार "अनेक वर्षों तक उस वृक्ष ने उसको आम खिलाए। अब वृद्धावस्था में यदि वृक्ष, आम के फल नहीं देता, तो कम से कम छाया तो देता है। तब इतने में ही उसे संतोष रखना चाहिए। उसकी छाया का लाभ ही लेना चाहिए।" "यदि उसे काट दिया जाए, तो यह वृक्ष के साथ उचित व्यवहार नहीं है, अन्याय है।"
"उसे भी ईश्वर ने जन्म दिया है। वह भी अपना जीवन पूरा जीना चाहता है। उसे भी जीने का पूरा अधिकार है। उसमें भी आप जैसी ही आत्मा है। इसलिए वृद्धावस्था में भी छाया देने वाले जीवित वृक्ष को काटना नहीं चाहिए। ऐसे वृक्ष को काटना अधर्म है।" "परंतु स्वार्थी लोग इस धर्म अधर्म की परवाह नहीं करते, और वृक्ष को काट देते हैं।"
"ऐसे स्वार्थी लोगों का स्वार्थ जब और अधिक बढ़ता जाता है, तो वे धर्म अधर्म की, कर्म फल की, पुनर्जन्म की भी कोई चिंता नहीं करते। केवल अपना स्वार्थ ही देखते हैं। यहां तक कि वे अपने वृद्ध माता-पिता की भी परवाह नहीं करते।"
"जवानी में उनके माता-पिता ने उन्हें बहुत सा धन दिया, संपत्ति दी, पढ़ाया लिखाया खिलाया पिलाया, बहुत वर्षों तक उनकी सेवा की। अब वे वृद्ध हो गए, अशक्त हो गए। तो स्वार्थी लोगों ने उनको भी घर से निकाल दिया, और कहीं वृद्ध आश्रम में या सड़क पर ही छोड़ दिया। ऐसा करना अनुचित और बहुत बड़ा अपराध है।" "ऐसी नास्तिकता और विकृत मानसिकता से बचें।"
"वृद्धावस्था में माता-पिता यदि धन आदि सुविधाएं नहीं दे पा रहे, तो कम से कम अपने जीवन का अमूल्य अनुभव तो आपको दे रहे हैं। उनके जीवन का अनुभव बहुत अमूल्य है। धन से तो उसका मूल्य आंक ही नहीं सकते।" "जैसे वृक्ष वृद्धावस्था में फल न देकर छाया देता है, उसका भी लाभ है। ऐसे ही माता-पिता और गुरुजन वृद्धावस्था में धन न देकर अपने जीवन का अमूल्य अनुभव तो देते हैं। उसका भी बहुत अधिक लाभ है।" "जो व्यक्ति उनके अनुभव का मूल्य जानता है, वह सदा अपने माता-पिता और गुरुजनों की रक्षा करता है। उनके अनुभव से लाखों करोड़ों रुपया भी कमाता है। अनेक क्षेत्रों में ठोकरें खाने से भी बच जाता है। व्यापार में लाखों रुपए की हानि से भी बच जाता है। इस तरह उनका अनुभव बहुत ही मूल्यवान और लाभकारी होता है।"
"इसलिए हे सज्जनो! आप अपने माता-पिता और गुरुजनों की वृद्धावस्था में सेवा और सम्मान अवश्य करें। उनका आशीर्वाद लें। उनके अनुभव से आप को बहुत अधिक लाभ मिलेगा।"
"चेतावनी -- और यदि आपने ऐसा नहीं किया, तो याद रखना, कल आपके जीवन में भी वृद्धावस्था आने वाली है। तब आपके बच्चे भी आपको इसी प्रकार से किसी वृद्धाश्रम में अथवा सड़क पर छोड़ देंगे, जैसा कि आप अपने माता-पिता के साथ आज व्यवहार कर रहे हैं।" "तब आपको पता चलेगा कि वृद्धावस्था में घर से बाहर निकालने का क्या अर्थ होता है?"
"इसलिए सावधान! अपनी वृद्धावस्था में अपनी दुर्गति से बचने के लिए, अपने स्वार्थ की सुरक्षा के लिए ही सही, आप अपने बड़े बुजुर्गों माता-पिता एवं गुरुजनों आदि का सम्मान और सेवा आज अवश्य ही करें।"
----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"

18.2.2025        अपने घर के सदस्यों को आप 'अपना' कहते हैं और मानते भी हैं। "वे आपके घर के सदस्य आपको सुख भी देते हैं और ...
18/02/2025

18.2.2025
अपने घर के सदस्यों को आप 'अपना' कहते हैं और मानते भी हैं। "वे आपके घर के सदस्य आपको सुख भी देते हैं और दुख भी।" "बाहर के लोग अथवा दूर के लोग भी आपको सुख और दुख देते हैं।" यह एक सामान्य नियम है, कि "घर परिवार के सदस्य या संबंधी लोग आपको सुख अधिक और दुख कम देते हैं।" परन्तु कभी-कभी इसके विपरीत भी देखा जाता है, अर्थात "घर के सदस्यों में से कोई कोई व्यक्ति दुख अधिक देते हैं, और बाहर के मित्र आदि लोग आपको सुख अधिक देते हैं।"
यदि आप ईमानदारी से इस बात पर विचार करेंगे और सत्य को स्वीकार करेंगे, तो आपको यह बात समझ में आ जाएगी, कि "कभी-कभी घर के या संबंधी लोग अधिक दुख देते हैं।" क्यों? इसका कारण क्या है? इसका कारण है "स्वार्थ और अविद्या।" संसार में कोई भी व्यक्ति जब किसी दूसरे व्यक्ति को दुख देता है, तो उसके यही दो कारण प्रमुख होते हैं, "स्वार्थ और अविद्या।"
परंतु जो घर के सदस्य हैं, या निकट रिश्तेदार संबंधी आदि हैं, वे अपने स्वार्थ और अविद्या के कारण तो आपको दुख देते ही हैं। परन्तु इसका तीसरा एक और कारण यह भी है, कि "वे आपसे कुछ संबंध रखते हैं। इस संबंध के कारण वे आप पर अपना अधिकार मानते हैं। रिश्तेदारी के बहाने से वे आप तक बहुत आसानी से पहुंच सकते या पहुंच जाते हैं। उनके साथ संबंध होने के कारण आप उनका अधिक विरोध भी नहीं कर पाते। इसलिए उनकी पहुंच आप तक आसान होने से, तथा अपने स्वार्थ और अविद्या के कारण आपको समय-समय पर अन्यों की अपेक्षा आपको और अधिक दुख देते रहते हैं। क्योंकि आपका उनके साथ रिश्ता है, इसलिए समाज के लोग भी उनकी आप तक पहुंच का अधिक विरोध नहीं करते।" और वे भी इस बात को मान लेते हैं, कि "ये तो आपके घर के लोग या रिश्तेदार हैं, ये तो आपकी मदद ही करते होंगे। ये आपको क्या दुख देंगे?" "इस बात का गलत लाभ उठाते हुए वे रिश्तेदार आपको अधिक नुकसान कर जाते हैं। वे लोग हानि भी अधिक करते हैं, धोखा भी देते हैं, और सभ्यता पूर्वक माफी भी नहीं मांगते। यदि कभी माफी मांगें भी, तो माफी मांगने का नाटक करते हैं, अपनी गलती को हृदय से स्वीकार नहीं करते, उसे दूर नहीं करते।"
"अपरिचित लोगों से यदि कभी कोई छोटी सी गलती हो भी जाए, रेल बस या बाज़ार आदि में थोड़ा सा धक्का लग भी जाए, तो वे तत्काल हाथ जोड़कर सभ्यता पूर्वक माफी भी मांग लेते हैं।" "वे लोग आपको इतनी हानि नहीं करते। उनसे जो भी हानि हो जाती है, प्रायः अनजाने में होती है, वे जानबूझकर हानि नहीं करते।" "घर के सदस्य और रिश्तेदार लोग तो जानबूझकर भी आपकी हानियां करते हैं। इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है।" "इसलिए सदा सबसे सावधान रहें।" कहने का सार यह है कि "परिचित हो या अपरिचित, कोई भी व्यक्ति कभी भी आपकी या किसी की भी हानि कर सकता है।" "जो जितना अधिक निकट संबंधी है, उससे उतना ही अधिक सावधान रहें।"
"मैं यह नहीं कहना चाहता, कि आप उनकी हर बात या हर व्यवहार में संशय करें।" मैं तो यह कहना चाहता हूं कि "उनके व्यवहारों का ठीक-ठीक अध्ययन करके उनकी नीयत को अच्छी तरह से समझें। जिन रिश्तेदारों की नीयत अच्छी हो, उन पर विश्वास करें, भरोसा रखें, और उनके साथ मिलजुलकर प्रेम से, सुख से जीवन जिएं। और जिनकी नीयत खराब हो, उनसे सदा सावधान रहें, चाहे वे आपके घर के सदस्य ही क्यों न हों?" "इसी प्रकार से बाहर के लोगों से भी सावधान रहें। उनकी नीयत को भी पहचानें। तभी आप उनसे सुरक्षित रहेंगे और अधिक सुखमय जीवन जी सकेंगे।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

17/02/2025
17.2.2025         ईश्वर ने सबको कुछ न कुछ दिया है। किसी को कम दिया, और किसी को अधिक। यह पक्षपात नहीं है। यह सब कर्मों का...
17/02/2025

17.2.2025
ईश्वर ने सबको कुछ न कुछ दिया है। किसी को कम दिया, और किसी को अधिक। यह पक्षपात नहीं है। यह सब कर्मों का फल है। "जिसने पूर्व जन्म में अधिक अच्छे कर्म किए, उसको ईश्वर ने अधिक धन संपत्ति विद्या बल बुद्धि अच्छे माता-पिता परिवार आदि सब सुविधाएं दी।" "जिसने इतने अच्छे कर्म नहीं किये, सामान्य कर्म किए, उसको ये सब सुविधाएं सामान्य स्तर की दी।" "जिन लोगों ने बहुत ही कम मात्रा में अच्छे और कुछ बुरे कर्म भी किए, उनको ईश्वर ने बहुत ही कम सुविधाएं दी और कुछ समस्याएं भी दी। जैसे गरीबी भुखमरी रोग अशिक्षित माता-पिता इत्यादि। इस प्रकार से ईश्वर ने सबके साथ न्याय किया।"
"और जिन लोगों ने बहुत ही बुरे बुरे कर्म किए। जैसे चोरी डकैती लूटमार हत्याएं अपहरण रिश्वतखोरी स्मगलिंग ब्लैक मार्केटिंग इत्यादि, ऐसे-ऐसे पाप कर्म किए, उन्हें तो ईश्वर ने पशु पक्षी कीड़ा मकोड़ा शेर भेड़िया सांप बिच्छू वृक्ष वनस्पति इत्यादि ऐसी निम्न योनियों में जन्म देकर अच्छी तरह से दंडित किया।" यह सब कर्म फल व्यवस्था ईश्वर की है, और न्याय पूर्वक है। "इस सारी व्यवस्था को देखकर आप सबको अनुमान कर लेना चाहिए, कि "ईश्वर एक न्यायकारी राजा है। वह कर्मों के अनुसार सबको फल देता है।"
अब यदि आपको आपके पिछले कर्मों के आधार पर ईश्वर की कृपा से ऊपर बताई अच्छी संपत्तियां और सुविधाएं प्राप्त हुई हैं, तो आपको स्वयं को भाग्यशाली मानना चाहिए, कि "आपको ईश्वर ने ये सब संपत्तियां इसलिए दी हैं, कि अब आप इन संपत्तियों का सदुपयोग करें, अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी। इन संपत्तियों का दुरुपयोग बिल्कुल न करें। इनसे आप स्वयं भी सुख उठाएं और दूसरों को भी सुख दें।"
"यदि आप ऐसा करेंगे, तो आपका जीवन सफल होगा। ये सब संपत्तियां भी सार्थक हो जाएंगी। और भविष्य में भी ईश्वर आपको इसी प्रकार की सुख संपत्तियां फिर से देगा।"
जो लोग अपने पूर्व जन्म के कर्मों के कारण इन संपत्तियों से इस जन्म में वंचित हैं, गरीब हैं, अच्छी सुविधाओं से रहित हैं। वे भले ही आज पुरुषार्थ भी करते हैं, फिर भी उन्हें खर्चा पूरा नहीं पड़ता, धन वस्त्र मकान भोजन आदि वस्तुओं की कमियां रहती हैं। "यदि ऐसे पुरुषार्थी लोग आपको मिलें, जो सहयोग प्राप्त करने के पात्र कहलाते हैं, तो आप उनकी सहायता अवश्य करें। यही आपकी धन संपत्तियों आदि की सार्थकता एवं सदुपयोग है।" "उनका सहयोग करके आप स्वयं को फिर से भाग्यशाली मानें, और ईश्वर का बार-बार धन्यवाद करें, कि ईश्वर ने आपको "सहयोग देने वालों" की श्रेणी में रखा है, "सहयोग लेने वालों" की श्रेणी में नहीं। यह भी एक बड़े भाग्य की बात है।"
"अतः योग्य पात्रों को सहयोग देकर अपनी संपत्ति का भी सदुपयोग करें, और सुख से जीवन जीते हुए, अपने वर्तमान जीवन को सफल बनाएं। इससे आपका अगला जन्म भी सुखमय होगा।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

16.2.2025         "जो वस्तु उत्पन्न होती है, वह नष्ट भी होती है।" जैसे कार उत्पन्न होती है, वह नष्ट भी होती है। "जो वस्त...
16/02/2025

16.2.2025
"जो वस्तु उत्पन्न होती है, वह नष्ट भी होती है।" जैसे कार उत्पन्न होती है, वह नष्ट भी होती है। "जो वस्तु उत्पन्न नहीं होती, वह नष्ट भी नहीं होती।" जैसे कि परमात्मा उत्पन्न नहीं होता, वह नष्ट भी नहीं होता।
"इसी प्रकार से आत्मा भी एक ऐसी वस्तु है, जो न उत्पन्न होती है, और न ही नष्ट होती है। न उसका जन्म होता है, और न ही वह मरती है। फिर भी आलंकारिक भाषा में ऐसी बहुत सी बातें कह दी जाती हैं।" जैसे कि कवि लोग कहते हैं, "तुम कहो, तो मैं आसमान के तारे तोड़कर तुम्हारे कदमों में बिछा दूं।" "आसमान के तारे कोई तोड़ने की वस्तु नहीं है, और न ही कोई किसी के कदमों में उन तारों को बिछा सकता है।" फिर भी ऐसे आलंकारिक भाषा में लोग इस तरह की बातें कह देते हैं।
"इसी प्रकार से आत्मा भी न तो मरती है, और न ही वह भटकती है।" फिर भी तारे तोड़ने वाले इस उदाहरण के समान ही, लोग आलंकारिक भाषा में ऐसा कह देते हैं, कि "हे भगवान! अमुक व्यक्ति मर गया है, उसकी आत्मा भटक रही है। कृपया उस आत्मा को शांति देना।"
पहले तो लोग इस तरह की भाषा बोलते थे। परंतु अब कुछ इस प्रकार की भाषा बोलते हैं। कि "लोगों की आत्मा मर चुकी है, और लोग संसार में भटक रहे हैं." अर्थात "लोग धर्म के विरुद्ध आचरण करते हैं। उन्हें आत्मा के अंदर से जो उत्तम सुझाव मिलते हैं, वे उनका पालन नहीं करते।" इस भाव को बताने के लिए लोग ऐसा बोलते हैं, कि "आत्मा मर चुकी है।" और क्योंकि धर्म का ज्ञान लोगों को नहीं है, इसलिए "वे सही मार्ग से भटक चुके हैं।" अर्थात "अधर्म के मार्ग पर चल रहे हैं। झूठ छल कपट चोरी बेईमानी आदि के काम करते हैं। इस प्रकार से वे भटके हुए हैं।" इस भाव को कहने के लिए लोग इन शब्दों का प्रयोग करते हैं, कि "लोग संसार में भटक रहे हैं."
बस, मैं तो इतना कहना चाहता हूं, कि 'मरना और भटकना,' इन दो शब्दों का प्रयोग पहले कुछ और ढंग से होता था, अब कुछ और ढंग से होता है। पहले कहते थे कि "शरीर मर गया, और आत्मा भटक रही है." अब कहते हैं, कि"आत्मा मर गई, और शरीर भटक रहा है।" बस यही शब्द प्रयोग का अंतर बताने के लिए मेरा आज का संदेश है। और साथ ही साथ एक भ्रांति दूर करने का भी मेरा उद्देश्य है।
"वास्तव में न तो आत्मा मरती है, और न ही भटकती है।" यदि कोई ऐसा मानता हो, तो उसको भ्रांति है। उसे इस भ्रांति से बचना चाहिए, और सच्चाई को समझना चाहिए, कि "धर्म का आचरण करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति वेदोक्त धर्म का आचरण करता है, तो इसका अर्थ है कि वह भटक नहीं रहा। सही मार्ग पर चल रहा है। और उसकी आत्मा भी जीवित है, अर्थात वह अंदर से प्राप्त होने वाले उत्तम सुझाव का पालन करती है। यही आत्मा का जीवित रहना है।"
"और ये जो अंदर से उत्तम सुझाव प्राप्त होते हैं, वे भी वास्तव में ईश्वर की ओर से होते हैं, आत्मा के अपने नहीं हैं।" "क्योंकि आत्मा तो अल्पज्ञ है। वह तो ग़लत निर्णय ले सकती है। ईश्वर सर्वज्ञ है। वह सब कुछ सही सही जानता है, इसलिए आत्मा को अंदर से सही मार्ग दिखाता है।"
अतः इस संदेश को यदि आलंकारिक भाषा में कहें, तो ऐसे कहेंगे कि "अपनी आत्मा को मरने न दें, और संसार में भटकें नहीं। अर्थात ईश्वर के द्वारा जो आपको अंदर से उत्तम सुझाव प्राप्त होते हैं, उनका पालन करें। धर्म का आचरण करें, और अपने जीवन को सुखी एवं सफल बनाएं।" यही मेरा कहने का तात्पर्य है।
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

15.2.2025        स्वर्ग की कामना सब करते हैं, और बड़े-बड़े सपने देखते हैं, कि "स्वर्ग कहीं आसमान में है। मरने के बाद हम ...
15/02/2025

15.2.2025
स्वर्ग की कामना सब करते हैं, और बड़े-बड़े सपने देखते हैं, कि "स्वर्ग कहीं आसमान में है। मरने के बाद हम स्वर्ग में जाएंगे।"
"बंधुओ! स्वर्ग कहीं आसमान में नहीं है। यहीं इसी धरती पर है। आपके ही घरों में है। और हां, नरक भी यहीं पर है। वह भी आसमान में नहीं है। स्वर्ग नरक और महानरक सब कुछ यहीं पर है, इसी धरती पर।"
स्वर्ग कैसे बनता है? "जब कोई माता-पिता और अध्यापक अपने बच्चों और विद्यार्थियों को अच्छी-अच्छी बातें सिखाते हैं। वे बातें निश्चित रूप से अच्छी होती हैं, परंतु माता-पिता एवं बच्चे, अध्यापक तथा विद्यार्थी, यदि ये सब उन बातों पर आचरण करें, तो निश्चित रूप से इसी धरती पर आप ही के घरों में स्वर्ग देखने को मिल सकता है।"
परंतु यही तो समस्या है, कि "माता-पिता जो बातें बच्चों को सिखाते हैं, उनका वे स्वयं पालन नहीं करते, तो बच्चे कैसे करेंगे? क्योंकि बच्चे वही कुछ करते हैं, जो उनके माता-पिता के आचरण में देखते हैं। माता-पिता के आचरण को देखकर ही बच्चे सीखते हैं।" "यही नियम अध्यापक और विद्यार्थियों पर लागू होता है। जैसे कि माता-पिता और अध्यापक अपने बच्चों और विद्यार्थियों को बताते हैं कि गुस्सा मत करो, झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, नशा मत करो आदि।" "अब माता-पिता और अध्यापक इन बातों पर स्वयं आचरण नहीं करते। इसलिए बच्चे और विद्यार्थी भी इन बातों पर आचरण नहीं करते। परिणाम आपके सामने है। किसी का कोई सुधार नहीं दिखाई देता। वह स्वर्ग केवल सपनों में ही रह जाता है, धरती पर नहीं दिखाई देता।"
"यदि माता-पिता और अध्यापक, तथा बच्चे और विद्यार्थी, उन सब बातों पर आचरण कर लें, जो वे कहते और सुनते हैं। तो यहीं इसी धरती पर आपको स्वर्ग दिखाई दे जाएगा।"
स्वर्ग क्या है? "स्वर्ग का अर्थ है, जहां सभ्य सुशिक्षित धनवान बुद्धिमान अनुशासित सुखी लोग रहते हैं। वह यहीं इसी धरती पर आपके परिवारों में मिलेगा।"
और नरक क्या है? "नरक इससे उल्टा है। जहां असभ्य अशिक्षित गरीब मूर्ख अनुशासनहीन और दुखी लोग रहते हैं। असभ्यता करते हैं। गाली गलौच करते हैं। खाने को कोई अच्छा भोजन नहीं मिलता। पहनने के लिए अच्छे कपड़े, रहने के लिए अच्छे घर मकान नहीं होते। ऐसे ही फुटपाथों और सड़कों पर वे सोते हैं। वही नरक है।" "और जो यहां पशु पक्षी कीड़े मकोड़े आदि प्राणी दिखाई देते हैं, यह महानरक है। सब कुछ यहीं पर है, इसी धरती पर है, जो कि आजकल चारों ओर दिखाई दे रहा है।"
"अतः जो कुछ आप कहते बोलते हैं, उस पर आचरण भी पूरी शक्ति के साथ अवश्य करें, और इस धरती को स्वर्ग बनाएं। तभी यह धरती रहने के योग्य बनेगी।"
----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"

13.2.2025         आजकल भौतिकवाद का ज़माना है। सब लोग धन और भोगों के पीछे पड़े हैं। बच्चे भी और माता-पिता भी, सबका चिंतन ...
13/02/2025

13.2.2025
आजकल भौतिकवाद का ज़माना है। सब लोग धन और भोगों के पीछे पड़े हैं। बच्चे भी और माता-पिता भी, सबका चिंतन यही है, कि "खूब धन होना चाहिए। जितना अधिक धन होगा, उतना ही हम अधिक सुखी हो जाएंगे।"
यह चिंतन ग़लत है। इस ग़लत चिंतन के कारण बहुत से लोग अधिक धन कमाने के लोभ से भारत देश को छोड़कर विदेशों में चले जाते हैं। क्योंकि वहां धन अधिक मिलता है। विदेश जाने का बहाना यह होता है, कि "हम पढ़ाई करने के लिए जा रहे हैं। और फिर 2/4 वर्ष तक वहां पढ़ने के बाद, वहां का रहन सहन और वहां की कुछ सुविधाएं देखकर लोग जीवन भर वहीं रहना चाहते हैं, और रह भी जाते हैं।" "उनके माता-पिता भारतीय सभ्यता संस्कृति वाले होने के कारण वे विदेश में नहीं रह पाते। क्योंकि वहां की सभ्यता, भारत से अलग होती है।" इसका परिणाम यह होता है कि "बच्चे विदेश में रहते हैं, और उनके माता-पिता भारत देश में। दोनों अलग-अलग हो जाते हैं।"
जब माता-पिता की वृद्धावस्था आती है, तब उन्हें धन से अधिक बच्चों की सेवा की आवश्यकता होती है। उस समय बच्चे उनके पास नहीं होते। तब माता पिता भारत में दुखी होते हैं, और सोचते हैं, कि "हमने अपने बच्चों के लिए 20/22 वर्ष तपस्या की। उन्हें खिलाया पिलाया पढ़ाया लिखाया। उन पर 2/3 करोड़ रुपये का खर्चा भी किया। आज हमारी वृद्धावस्था में वे हमारे पास नहीं हैं। वे हमारी सेवा नहीं करते। जबकि हमें आज उनकी सेवा की आवश्यकता है। तो इतना सब कुछ करने के बाद भी हमें क्या मिला? कुछ नहीं। हमने उन्हें विदेश भेजकर बहुत बड़ी भूल की।" "तब बुढ़ापे में आकर माता-पिता को अपनी भूल समझ में आती है। और माता-पिता इस प्रकार से सोच-सोच कर दुखी होते हैं। उनकी वृद्धावस्था बहुत कष्टमय हो जाती है।"
"उधर बच्चे विदेश में अकेले होते हैं। माता-पिता की उनके ऊपर कोई रोक टोक नहीं होती। वे अधिक धन कमा लेने के कारण भौतिक सुखों को भोगने में पूरी तरह से डूब जाते हैं। इससे उन का मानसिक आध्यात्मिक चारित्रिक पतन ही होता है। क्योंकि वे वहां यज्ञ आदि पुण्य कर्म भी नहीं कर पाते। वहां इस प्रकार की सुविधाएं प्रायः नहीं हैं। वहां भारत जैसे धार्मिक संगठन भी विशेष नहीं होते, जिनकी सहायता से बच्चे प्रति सप्ताह आर्य समाज आदि संस्थाओं में जाकर कुछ विद्वानों के प्रवचन सुनकर अपनी आध्यात्मिक उन्नति कर सकें।"
"इस प्रकार से विदेशों में जाकर बच्चों ने यदि धन बहुत अधिक कमा भी लिया, और न वे माता पिता की सेवा कर सके, न ही कोई आध्यात्मिक उन्नति कर पाए, तो उनका जीवन भी सार्थक नहीं है, व्यर्थ है।" "क्योंकि पुण्य कर्म तो वे वहां विशेष कमा नहीं पाते, जो कि मनुष्य जीवन की असली पूंजी है। जो इस जन्म में भी काम आती है, और अगले जन्मों में भी। इस प्रकार से विदेशों में रहकर अधिक धन कमा कर भी, बच्चों को भी कोई विशेष लाभ नहीं होता।"
"अब यदि बच्चे विदेश में जाकर 30/ 40/50 लाख रुपया वार्षिक धन कमा कर भी, यदि अपने माता-पिता के साथ नहीं रहते, उनकी सेवा नहीं करते, उससे पुण्य नहीं कमाते, तो उस 30/40/50 लाख रुपया वार्षिक धन कमाने से क्या लाभ? कुछ नहीं। वह सार्थक नहीं, बल्कि व्यर्थ है। वह धन माता-पिता के लिए भी सुखदायक नहीं है, और बच्चों के लिए भी।"
यह एक गंभीर विषय है। इसलिए माता-पिता और बच्चे दोनों ही कृपया इस पर गंभीरता से चिंतन करें। "बच्चे भले ही धन थोड़ा कम कमाएं, परंतु वृद्धावस्था में अपने माता-पिता की सेवा अवश्य करें। उनके साथ रहें। चाहे भारत देश में भी रहें, तो भी माता-पिता के साथ रहकर उनकी सेवा करें। उनका आशीर्वाद लेवें। उनके मार्गदर्शन में चलें, तो आप बहुत अधिक पुण्य कमा पाएंगे। और तब आपको इस जीवन में सुख भी मिलेगा और पुण्य भी। इस प्रकार से वृद्धावस्था में अपने माता-पिता की सेवा करते हुए अपने जीवन और धन को सार्थक बनाएं।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."

12.2.2025         "ईश्वर की दी हुई कुछ न कुछ विशेष संपत्ति सबके पास होती है। किसी के पास धन है, किसी के पास बल है, किसी ...
12/02/2025

12.2.2025
"ईश्वर की दी हुई कुछ न कुछ विशेष संपत्ति सबके पास होती है। किसी के पास धन है, किसी के पास बल है, किसी के पास विद्या है, किसी के पास कोई और कला है।"
"ये सारी संपत्तियां ईश्वर की कृपा से और ईश्वर की न्याय व्यवस्था से मिलती हैं।" परंतु जो लोग गंभीरता से विचार करना नहीं जानते, वे अविद्या में फंसकर ऐसा सोचते हैं, कि "ये सारी विद्याएं कलाएं शक्तियां धन बल बुद्धि शरीर आदि संपत्तियां हमारे ही द्वारा उत्पन्न की हुई हैं। हम ही इनके मालिक हैं। और हम ही अपनी इन संपत्तियों के इकलौते उपभोक्ता हैं।" इस प्रकार का मिथ्याज्ञान और अभिमान प्रायः लोगों को होता है। "ऐसा सोचना ऐसा मानना और ऐसा मानकर व्यवहार करना अनुचित और अत्यंत हानिकारक है।"
क्योंकि विद्वानों तथा गुरुजनों ने बताया है, कि "जब व्यक्ति में अभिमान आ जाता है, तो उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। जब किसी की बुद्धि नष्ट हो जाती है, तो उसका सर्वनाश हो जाता है।" इसलिए ऐसी अविद्या या भ्रांति से बचना चाहिए। और वास्तविकता को समझना चाहिए। वास्तविकता यही है, कि "जो भी आपके पास धन बल विद्या बुद्धि शरीर आदि संपत्तियां हैं, ये सब ईश्वर द्वारा दी गई हैं।"
यह ठीक है, कि "आपने भी कुछ अच्छे कर्म किए हैं, जिनके फलस्वरूप ईश्वर ने आपको ये सब संपत्तियां दी हैं।" "परंतु इन संपत्तियों की उत्पत्ति में आपका इतना योगदान नहीं है, जितना ईश्वर की कृपा का है। और इसके अतिरिक्त आपके माता-पिता गुरुजन संसार के अन्य विद्वान पड़ोसी मित्र इत्यादि तथा और भी बहुत से कारण हैं, जिनकी सहायता से आपको ये सारी योग्यताएं कलाएं प्राप्त हुई हैं।"
"इस सत्य को यदि आप स्वीकार कर लेंगे, तो कभी आपको अभिमान नहीं आएगा। आपकी बुद्धि ठीक काम करेगी, और आप सबके साथ उचित न्याय पूर्वक व्यवहार करेंगे।" "इसका बहुत अच्छा फल यह होगा कि जब आप सबके साथ न्यायपूर्वक उत्तम व्यवहार करेंगे, तो ईश्वर आपको आगे भी सब प्रकार से सुख शांति उन्नति और समृद्धि प्रदान करेगा। अन्यथा पशु पक्षी वृक्ष आदि योनियों में भयंकर दंड देगा।"
"इसलिए अविद्या और अभिमान से बचें। सत्य को पहचानें। सबके साथ न्यायपूर्वक उचित व्यवहार करें, और आनंद से जीते हुए अपने जीवन को सफल बनाएं।"
----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"

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