19/02/2025
19.2.2025
"आज का व्यक्ति इतना अधिक स्वार्थी होता जा रहा है, कि अपने स्वार्थ के सामने उसे ईश्वर धर्म-कर्म पुनर्जन्म आदि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। ऐसा व्यवहार करना मानवता के विरुद्ध है।"
उदाहरण के लिए -- एक व्यक्ति ने आम का वृक्ष लगाया। बहुत वर्षों तक उस वृक्ष ने आम खिलाए। जब वह वृक्ष बूढ़ा हो गया, उस पर आम लगने बंद हो गए, तो वृक्ष लगाने वाले व्यक्ति ने सोचा, कि "अब यह वृक्ष आम तो देता नहीं, तो इसे कटवा देना चाहिए।" उसका ऐसा सोचना गलत है। क्योंकि यह संसार का नियम है, कि "जो भी वस्तु उत्पन्न होती है, धीरे-धीरे उसमें घिसावट होती है, वृद्धावस्था आती है। और पहले जैसी शक्ति उसमें नहीं रहती।" इसी नियम के अनुसार "अनेक वर्षों तक उस वृक्ष ने उसको आम खिलाए। अब वृद्धावस्था में यदि वृक्ष, आम के फल नहीं देता, तो कम से कम छाया तो देता है। तब इतने में ही उसे संतोष रखना चाहिए। उसकी छाया का लाभ ही लेना चाहिए।" "यदि उसे काट दिया जाए, तो यह वृक्ष के साथ उचित व्यवहार नहीं है, अन्याय है।"
"उसे भी ईश्वर ने जन्म दिया है। वह भी अपना जीवन पूरा जीना चाहता है। उसे भी जीने का पूरा अधिकार है। उसमें भी आप जैसी ही आत्मा है। इसलिए वृद्धावस्था में भी छाया देने वाले जीवित वृक्ष को काटना नहीं चाहिए। ऐसे वृक्ष को काटना अधर्म है।" "परंतु स्वार्थी लोग इस धर्म अधर्म की परवाह नहीं करते, और वृक्ष को काट देते हैं।"
"ऐसे स्वार्थी लोगों का स्वार्थ जब और अधिक बढ़ता जाता है, तो वे धर्म अधर्म की, कर्म फल की, पुनर्जन्म की भी कोई चिंता नहीं करते। केवल अपना स्वार्थ ही देखते हैं। यहां तक कि वे अपने वृद्ध माता-पिता की भी परवाह नहीं करते।"
"जवानी में उनके माता-पिता ने उन्हें बहुत सा धन दिया, संपत्ति दी, पढ़ाया लिखाया खिलाया पिलाया, बहुत वर्षों तक उनकी सेवा की। अब वे वृद्ध हो गए, अशक्त हो गए। तो स्वार्थी लोगों ने उनको भी घर से निकाल दिया, और कहीं वृद्ध आश्रम में या सड़क पर ही छोड़ दिया। ऐसा करना अनुचित और बहुत बड़ा अपराध है।" "ऐसी नास्तिकता और विकृत मानसिकता से बचें।"
"वृद्धावस्था में माता-पिता यदि धन आदि सुविधाएं नहीं दे पा रहे, तो कम से कम अपने जीवन का अमूल्य अनुभव तो आपको दे रहे हैं। उनके जीवन का अनुभव बहुत अमूल्य है। धन से तो उसका मूल्य आंक ही नहीं सकते।" "जैसे वृक्ष वृद्धावस्था में फल न देकर छाया देता है, उसका भी लाभ है। ऐसे ही माता-पिता और गुरुजन वृद्धावस्था में धन न देकर अपने जीवन का अमूल्य अनुभव तो देते हैं। उसका भी बहुत अधिक लाभ है।" "जो व्यक्ति उनके अनुभव का मूल्य जानता है, वह सदा अपने माता-पिता और गुरुजनों की रक्षा करता है। उनके अनुभव से लाखों करोड़ों रुपया भी कमाता है। अनेक क्षेत्रों में ठोकरें खाने से भी बच जाता है। व्यापार में लाखों रुपए की हानि से भी बच जाता है। इस तरह उनका अनुभव बहुत ही मूल्यवान और लाभकारी होता है।"
"इसलिए हे सज्जनो! आप अपने माता-पिता और गुरुजनों की वृद्धावस्था में सेवा और सम्मान अवश्य करें। उनका आशीर्वाद लें। उनके अनुभव से आप को बहुत अधिक लाभ मिलेगा।"
"चेतावनी -- और यदि आपने ऐसा नहीं किया, तो याद रखना, कल आपके जीवन में भी वृद्धावस्था आने वाली है। तब आपके बच्चे भी आपको इसी प्रकार से किसी वृद्धाश्रम में अथवा सड़क पर छोड़ देंगे, जैसा कि आप अपने माता-पिता के साथ आज व्यवहार कर रहे हैं।" "तब आपको पता चलेगा कि वृद्धावस्था में घर से बाहर निकालने का क्या अर्थ होता है?"
"इसलिए सावधान! अपनी वृद्धावस्था में अपनी दुर्गति से बचने के लिए, अपने स्वार्थ की सुरक्षा के लिए ही सही, आप अपने बड़े बुजुर्गों माता-पिता एवं गुरुजनों आदि का सम्मान और सेवा आज अवश्य ही करें।"
----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"