अरशिता

अरशिता अरशिता पापा अरविंद ताम्रकार
दुर्ग छत्तीसगढ़
(1)

27/09/2026

ेरा #रंग #दे #बसंती #चोला.....!!💪🔥
कितना विराट होता होगा वह जीवन जिसके
सामने काल का क़द बौना सिद्ध हो जाए !

कितने जुनून से जी जाती होगी वह ज़िंदगी
जिसे मृत्यु जैसे अपावन तत्व का असमय स्पर्श भी
अमर होने से न रोक पाये।

आज, एक ऐसे ही विलक्षण व्यक्तित्व की जयंती है।
भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में संघर्ष, उत्साह,
शौर्य व चिंतन की समग्रता को परिभाषित
करने वाले क्रांति के पर्याय-पुरूष,
अमर शहीद भगत सिंह को
जयंती पर सादर प्रणाम।
🇮🇳🙏🙏🙏🇮🇳
अरशिता

इश्क की चोट का दिल पे असर होना ही चाहिए दर्द कम हो या ज्यादा हो मगर होना ही चाहिए...!!❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
27/09/2026

इश्क की चोट का
दिल पे असर होना ही चाहिए

दर्द कम हो या ज्यादा हो
मगर होना ही चाहिए...!!
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️

पत्नी नाराज होती है तो मायके चली जाती है पति नाराज हो जाए तो कहां जाए...!! 🥺
27/09/2026

पत्नी नाराज होती है
तो मायके चली जाती है
पति नाराज हो जाए तो कहां जाए...!! 🥺

'जोधा' अकबर की तीसरी बीवी थी जिन की प्रेम कहानी अमर हुई ।'मुमताज़' शाहजहाँ की आठवीं बीवी थी जिसको वो जान से ज़्यादा प्या...
27/09/2026

'जोधा' अकबर की तीसरी बीवी थी
जिन की प्रेम कहानी अमर हुई ।

'मुमताज़' शाहजहाँ की आठवीं बीवी थी
जिसको वो जान से ज़्यादा प्यार करता था

'मस्तानी' बाजीराव की दूसरी बीवी थी
जिसको वो बेहद प्यार करता था ।

इतिहास गवाह है.......
किसी ने पहली बीवी से प्यार नहीं किया
😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

सुनो न...!!तुम ही हो और कौन हो सकता है प्रार्थना के पहले शब्द की तरह पवित्र हो तुम बगियन के हरी पत्ती की तरह ताज़ा हो तु...
27/09/2026

सुनो न...!!
तुम ही हो
और कौन हो सकता है
प्रार्थना के पहले शब्द की तरह
पवित्र हो तुम
बगियन के हरी पत्ती की तरह
ताज़ा हो तुम
प्रेम का शुभ संकेत हो तुम
सदा ही विराजो मेरे अंतर्मन मे
रुह ए आईना बनकर
तुम मेरी भक्ति में
तुम हो या मेरी भावना में ही
तुम हो कुछ नहीं सिर्फ फेर है
शब्दों का
मेरा रोम रोम में तुम ही तुम हो...!!

अरशिता

 #सुहागन की  #बिंदी....!!*_______/\_______ ्रेम❤ #नमन🙏बाहर फेरीवाला आया हुआ था कई तरह का सामान लेकर। बिंदिया, कांच की चू...
27/09/2026

#सुहागन की #बिंदी....!!*
_______/\_______
्रेम❤ #नमन🙏
बाहर फेरीवाला आया हुआ था
कई तरह का सामान लेकर।

बिंदिया, कांच की चूड़ियां, रबर बैंड, हेयर बैंड,
कंघी, काँच और भी बहुत सारे सामान थे।

आस पड़ोस की औरतें उसे घेर कर खड़ी हुई थी।
काफी देर तक बाबा गेट पर अपनी लाठी टेककर खड़े रहे, जैसे ही औरतों की भीड़ छठी बाबा अपनी लाडली टेकते हुए फेरी वाले के पास पहुंच गए और फेरी पर सामान देखने लगे।

शायद कुछ ढूंढ रहे थे। कभी सिर ऊंचा करके
देखते तो कभी नीचा। जो देखना चाह रहे थे,
वह दिख नहीं रही था।
हैरान परेशान बाबा को फेरी वाले ने देखा तो पूछा,
" कुछ चाहिए था बाबा आपको?"

पर बाबा ने सुनकर अनसुना कर दिया। धीरे-धीरे लाठी टेकते हुए फेरी के ही चक्कर लगाने लग गए। कही तो दिखे वो जो देखना चाहते हैं। फेरी वाले ने दोबारा पूछा,
" बाबा कुछ चाहिए था क्या?"अबकी बार बाबा ने फेरीवाले से कहा,

" हां बेटा"" क्या चाहिए था? बताओ मुझे, मैं ढूंढ देता हूं"
"मुझे है ना वो बिंदिया चाहिए थी"
"बिंदिया क्यों चाहिए बाबा?"

बाबा ने अम्मा की तरफ इशारा करते हुए बताया,
"अरे! मेरी पत्नी के लिए चाहिए समझदार"

बाबा का जवाब सुनकर फेरीवाला हँस दिया।
"किस तरह की बिंदिया चाहिए"
" बड़ी-बड़ी गोल बिंदिया चाहिए।
बिल्कुल लाल रंग की"
फेरीवाले ने बिंदिया का पैकेट निकाल कर दिया,
" यह देखो बाबा, ये वाली?"

" अरे नहीं नहीं, ये वाली नहीं। बिल्कुल लाल सी"

फेरीवाले ने वो पैकेट रखा और दूसरा पैकेट
निकाल कर दिया,
" बाबा ये वाली?"
" अरे तुझे समझ में नहीं आता क्या?
बिल्कुल लाल लाल बिंदिया चाहिए"

फेरी वाले ने सारे पैकेट निकालें और फेरी के
एक तरफ फैला कर के रख दिए
" आप खुद ही देख लो बाबा कौन सी बिंदिया चाहिए"
बाबा ने अपने कांपते हाथों से बिंदियों के पैकेट को इधर-उधर किया और उसमें से एक पैकेट निकाला,
" हां हां, ये वाली"

बाबा के हाथ में बिंदी का पैकेट देखकर फेरीवाला मुस्कुरा दिया। बाबा ने तो मेहरून रंग की बिंदी उठाई थी।
" कितने की है?"
" 10 रुपये की है बाबा"
" अच्छा?"
कीमत सुनकर बाबा का दिल बैठ गया,
पर फिर बोले,
" ठीक है, अभी लेकर आता हूं"

बाबा लाठी टेकते हुए पलट कर जाने लगे कि घर में से बहू आती दिखी। उसे देखकर बाबा बोले,

" अरे बहू, जरा 10 रुपये तो देना।
फेरी वाले को देने हैं"
" अब क्या खर्चा करा दिया आप लोगों ने?"
बहू ने लगभग चिल्लाते हुए कहा।
"अम्मा के लिए बिंदिया खरीदी थी।
उसकी बिंदिया खत्म हो गई थी।
कई बार बोल चुकी है" बाबा ने धीरे से कहा।

" बस आप लोगों को और कोई काम नहीं है।
बेवजह का खर्चा कराते रहते हैं।
सत्तर साल की हो चुकी है अम्मा,
अभी भी क्या बिंदिया लगाएगी?
इस उम्र में भी ना जाने क्या-क्या शौक है?"

" बेटा, बात शौक की नहीं है।
अम्मा भी सुहागन है
इसलिए उसका मन नहीं मानता।
सिर्फ 10 रुपये ही तो मांग रहा हूं।
अंदर जाकर दे दूंगा"

" कहां से दे दोगे? वो जो पैसे दोगे,
वो भी तो मेरे पति की कमाई है।
मेरे पास कोई पैसे नहीं है"

इतना कहकर बहु बढ़बढ़ाती हुई अंदर आ गई।
अम्मा ने अपनी खाट पर लेटे लेटे ही बाबा को इशारा किया। बाबा ने पलटकर बिंदी फेरी में वापस रख दी
और लाठी टेकते हुए अम्मा के पास आकर बैठ गए। बाबा ने देखा अम्मा की आंखों में आंसू थे।

" माफ करना पार्वती।
मैं तेरी छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर पाया"

" रहने दो जी,
बेचारी बहू भी परेशान हो जाती होगी।
काहे दिल पर ले कर बैठे हो।
बिंदी ही तो थी"
" हां बिंदी ही तो थी।
कौन सी हजारों रुपए की आ रही थी"
बाबा ने व्यंग से हंसते हुए कहा।

" बिंदी ही तो लगानी है जी।
एक काम करो पूजा घर में से हिंगलू ले आओ।
उसी से लगा देना।
पर आज अपने हाथों से ही बिंदी लगा दो"

बाबा ने अम्मा की बात सुनी और फिर लाठी टेकते हुए पूजा घर में गये। थोड़ी देर बाद बाबा हाथ में हिंगलू लिए अम्मा के पास पहुंचे,

" लो पार्वती उठो, मैं तुम्हें बिंदी लगा देता हूं"

पर अम्मा ने कोई हलचल ना दिखाई।
बाबा ने दोबारा कहा,

" पार्वती, ओ पार्वती। सो गई क्या?
तेरी बड़ी इच्छा थी ना बड़ी सी लाल बिंदी लगाने की।
ले देख मैं हिंगलू ले आया हूं।
अब बड़ी सी लाल बिंदी लगा दूंगा।
पर तू बैठ तो सही"

पर अम्मा बिल्कुल शिथिल पड़ी हुई थी।
शरीर में कोई हलचल ना थी।
बाबा का दिल बैठ गया।
हाथ में हिंगलू लिए अम्मा के पास ही बैठ गए।
आंखों में से झर झर आंसू बह रहे थे,
पर एक भी बोल ना फुटा।
अम्मा जा चुकी थी हमेशा के लिए।

थोड़ी देर में रोना-धोना मच गया। आस पड़ोस के लोग आ गए। बेटे को बुलाया गया और अम्मा को अंतिम यात्रा के लिए तैयार किया गया। अम्मा को नहला धुला कर, सुहागन की तरह तैयार कर, अर्थी पर लेटा कर बाहर लाया गया।

बाबा ने देखा अम्मा के माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी लगी थी। बाबा उठे और घर में गए। थोड़ी देर बाद बाहर आए और धीरे-धीरे अम्मा की अर्थी के पास गये।
और अम्मा के माथे पर से बिंदी हटा दी,

" बाबा क्या कर रहे हो? अम्मा सुहागन थी।
आप बिंदी क्यों हटा रहे हो?" बेटे ने कहा।

" बेटा! उसका पति बिंदी खरीदने की
औकात नहीं रखता था।
इसलिए हटा रहा हूं"

सुनकर सब लोग अवाक रह गए। बहू शर्मसार हो गई। सब ने देखा बाबा अपने हाथ में लाए हिंगलू से एक बड़ी सी लाल बिंदिया अम्मा के माथे पर लगा रहे हैं।

थोड़ी देर बाद बहू की चित्कार छूट गई।
बाबा भी अम्मा के साथ हमेशा हमेशा के लिए
लंबी यात्रा पर रवाना हो गए थे।

इस भावनात्मक,
हृदय स्पर्शी कहानी बहुत कुछ संदेश दे रहा है।
अपने समाज मे सिर्फ 2-4 प्रतिशत ही बुजुर्गों की
स्थिति परिवार में सम्मान जनक है।
इसका मूल कारण कही संयुक्त परिवार का एकल परिवार में रूपांतरित होकर नाते ,
रिश्ते की समाप्ति,
धन की लिप्सा में अंधी दौड़ एवं लड़के,
लड़कियों का अधिक पढ़ कर सभी से
अधिक जानकारी व बुद्धिमान होने का झूठा अभिमान,किताबी ज्ञान का होना परन्तु व्यवहारिक
ज्ञान की कमी।

कृपया हम सभी एक छोटा प्रयास से अपने घर के
बुजुर्गों का उचित सम्मान करें,
सभी को एक दिन बूढ़ा होना है।
माता पिता के नही रहने पर उनका महत्व
मालूम पड़ता है।
पश्चिमी देशों का अनुसरण नही कर
अपनी भारतीय संस्कृति का अनुसरण करें......!!
🙏🙏🙏

 #छत्तीसगढ़_में_जन्म_के_बाद_विवाह  #का_बहुत_प्रमुख_संस्कार_है। और इस संस्कार में सबसे पहले चुलमाटि, अर्थात गांव के तालाब...
27/09/2026

#छत्तीसगढ़_में_जन्म_के_बाद_विवाह
#का_बहुत_प्रमुख_संस्कार_है।
और इस संस्कार में सबसे पहले चुलमाटि, अर्थात गांव के तालाब से स्रियाँ मिट्टी लाती है, और घर में चुल्हा बनाती है। जिसमें शादी में खाना बनाया जाता है लोगों के लिये।

उसके बाद तेल चढ़ी का संस्कार होता है। गांव भर को निमन्त्रण दिया जाता है। तेल में हल्दी घोलकर कन्या की बुआ या बहन ये लगाती है - दुल्हन दुल्हा के तोल और हल्दी लगाती। ये लड़के के घर में भी होता है और लड़की के घर में भी होता है ये संस्कार।

इसका बाद, एक रिवाज है माप मौड़ी - इसमें सुआसिनी (बुआ या बहन) रोटी बनाती है जिसे दुल्हा दुल्हन के हाथ में रखकर धागे से बाँध देती है - दुल्हे के लिय पाँच बार और दुल्हन के लिये सात बार। दुल्हा के हाथ में पाँच रोटी और दुल्हन के हाथ मे सात रोटी रखी जाती है। दुल्हा दुल्हन मड़वे के पास रोटी रख देते है और स्रियाँ फिर गीत गाती है - पूर्वजो को निमन्त्रण करते हुये गीत गाती है।

इसके बाद नहधोलि का कार्य होता है। नहधोलि अर्थात नहाना। बारात विदा के पहले होती है। दुल्हा को नहला कर नये वस्र पहनाये जाते है, और कन्या के घर में कन्या को नहलाकर नये वस्र पहनाये जाते है। मन्डप में परिक्रमा करवाते है। लड़की की शादी में पाँच बार परिक्रमा और लड़के को सातबार परिक्रमा की जाती है, उसके शरीर को कपड़े से ढक दिया जाती है, हाथ में कंकन, पवित्र धाग, बाँधा जाता है, स्रियाँ गीत गाती हैं।

उसके बाद एक रिवाज़ होता है - परधनी - अगर लड़की की शादी हो रही है, तो बारात आती है, बारात का स्वागत किया जाता है जिसे छत्तीसगढ़ी में परधनी कहते है। बारात आगमन के समय स्रियाँ गीत गाते हुए बारात के परधनी करती है अर्थात स्वागत करती है।

उसके बाद भाँवरे पड़ती है, भाँवर के समय भी गीत गाया जाता है, सप्तपदी गाई जाती है छत्तीसगढ़ी में। और गाली गाने के भी रिवाज है जो सम्बन्ध या बारातियों को लक्ष्य करके इंगित करके जो गाये जाते है गालियाँ, वैसे गीत भी गाने का रिवाज है।

उसके बाद जब लड़की विदा होती है, तो विदा गीत भी गाये जाते है और इस प्रकार से शादी सम्पन्न हो जाती है।

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