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मुझे अपने बेटे की शादी में जाने में शर्म आ रही थी क्योंकि मेरी साड़ी पुरानी थी लेकिन जब मेरी बहू ने मेरे शरीर पर वह हरी ...
05/12/2025

मुझे अपने बेटे की शादी में जाने में शर्म आ रही थी क्योंकि मेरी साड़ी पुरानी थी लेकिन जब मेरी बहू ने मेरे शरीर पर वह हरी साड़ी देखी, तो उसकी प्रतिक्रिया ने पूरे हॉल को रुला दिया।......!!
मेरा नाम सुमित्रा देवी है, 58 वर्ष। मैं एक साधारण माँ हूँ, सब्जी मंडी में सब्जी बेचती हूँ, और अपने बेटे रोहन की अकेली अभिभावक हूँ। रोहन की शादी उस लड़की से हो रही थी जिससे वह बहुत प्यार करता था।

प्रिया जो एक बड़े और रईस खानदान से थी और एक सफल डॉक्टर थी।....!!

शादी से तीन महीने पहले, मुझे हर दिन घबराहट होने लगती थी। दावत या खर्च की वजह से नहीं, बल्कि एक छोटी सी बात की वजह से: मेरे पास पहनने के लिए कुछ नहीं था।.....!!

मेरी जवानी के दिनों में, मेरे पास एक साड़ी थी जिसे मैं हर खास मौके पर पहनती थी हरे रंग की, जिस पर साधारण सी कढ़ाई थी। समय के साथ उसका रंग फीका पड़ गया था, जैसे उस कपड़े में कोई इतिहास छिपा हो। यही साड़ी मैंने तब पहनी थी जब रोहन पैदा हुआ था, और यही साड़ी मैंने तब पहनी थी जब उसने कॉलेज से ग्रेजुएशन पास किया था।.....!!

इसलिए जब उसकी शादी का दिन आया, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या वही साड़ी दोबारा पहनना ठीक होगा। वह बहुत पुरानी हो चुकी थी, थोड़ी घिस गई थी, लेकिन मेरी हैसियत बस इतनी ही थी। मैंने किसी से मांगने की कोशिश की, लेकिन मैं दिखावा नहीं कर सकती थी। मैं बस वही बन सकती थी जो मैं हूँ एक माँ।

शादी का दिन आ गया। बैंक्वेट हॉल मेहमानों से भरा था, रोशनी, संगीत और हंसी-ठहाके गूंज रहे थे। सबने महंगे और डिज़ाइनर कपड़े पहने थे। सिर्फ मैं ही थी जो वहां बेमेल लग रही थी।.....!!

जब मैं हॉल में दाखिल हुई, मैंने महसूस किया कि लोग मुझे घूर रहे हैं कुछ मुस्कुरा रहे थे; कुछ फुसफुसा रहे थे। “शायद ये दूल्हे की माँ है।” “बेचारी, अपने बेटे की शादी में तो ढंग के कपड़े पहन लेती।”

मैंने जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे बेटे को मेरी शर्मिंदगी महसूस हो। लेकिन जब मैं पीछे की सीट की तरफ जा रही थी, एक लड़की मेरे पास आई प्रिया, मेरी होने वाली बहू।

वह अपने दुल्हन के लाल जोड़े में किसी परी जैसी लग रही थी। वह पास आई, होंठों पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में आँसू। उसने मेरा हाथ थाम लिया मेरा वह हाथ जो मिट्टी, पसीने और सब्जी बेचने से सख्त हो गया था।

“माँ,”..........उसने धीरे से कहा, “क्या यह वही साड़ी है जो आपने तब पहनी थी जब रोहन पैदा हुआ था?”

मैं सन्न रह गई। “तुम्हें कैसे पता?”.......!!

वह मुस्कुराई, उसकी आँखों से आँसू छलक आए। “रोहन ने बताया था। उसने कहा था, जब वह याद करना चाहता है कि उसकी माँ उससे कितना प्यार करती हैं, तो वह बस आपको याद करता है इसी हरी साड़ी में, उसे गोद में लिए हुए, दर्द में रोते हुए भी मुस्कुराते हुए।”.....!!

पूरा हॉल शांत हो गया। मेहमान भी अब हमारी बातें सुन रहे थे।....!!

“माँ,” उसने आगे कहा, “मैं नहीं चाहती कि आप कोई और कपड़ा पहनें। क्योंकि यह साड़ी उन सभी बलिदानों का प्रतीक है जिन्होंने रोहन को बड़ा किया है। इससे ज्यादा खूबसूरत कपड़ा दुनिया में कोई नहीं हो सकता।”

उसने सबके सामने मुझे कसकर गले लगा लिया। और उस गले मिलने में, मैंने रोहन को गहरी सांस लेते सुना मेरा बेटा जो आज दूल्हा बना था। वह हमारे पास आया, और मेरी आँखों से आँसू पोंछते हुए, धीरे से बोला: “माँ, इस हरी साड़ी के लिए शुक्रिया। क्योंकि जब भी मैं इसे देखता हूँ, मुझे याद आता है कि आपके प्यार के रंग से सुंदर कोई रंग नहीं है।”

रस्मों के बाद, कई लोग मेरे पास आए। आलोचना करने के लिए नहीं, बल्कि बधाई देने के लिए। “आप बहुत सुंदर लग रही हैं, सुमित्रा जी।” “हरा रंग आप पर बहुत जंच रहा है बिल्कुल जिंदगी के रंग जैसा।”

और रिसेप्शन में, एक बात ने सबको चौंका दिया। जब संगीत बज रहा था, प्रिया माइक के पास गई और बोली:

“आज, मुझे इस महिला पर गर्व है।” “इन्होंने कोई डिज़ाइनर साड़ी नहीं पहनी है, लेकिन यही वो वजह हैं कि आज मेरी जिंदगी में एक ऐसा आदमी है जो सच में प्यार करना जानता है। अगर एक पत्नी के रूप में मुझे किसी के नक्शेकदम पर चलना है, तो वह माँ सुमित्रा का दिल है।”

पूरा हॉल खड़ा हो गया और तालियां बजाने लगा। मैं बीच में खड़ी रो रही थी। और अपनी जिंदगी में पहली बार, मुझे अपनी पुरानी हरी साड़ी पर शर्म नहीं आई क्योंकि उस दिन, वह प्यार का सबसे महंगा लिबास थी।

माँ, चाहे कुछ भी पहने, हमेशा सुंदर होती है क्योंकि उसके कपड़ों के हर रेशे में, त्याग की यादें होती हैं, और निस्वार्थ प्रेम की कहानी होती है।

और अगर माँ के प्यार का कोई रंग होता है, तो वह लाल या सफेद नहीं बल्कि हरा होता है, जीवन का वह रंग जो तब भी छाया देता है जब वह खुद थक चुका हो !!
😊😢☺️😢😊

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30/11/2025

✨ SITE UPDATE – 1137 URBAN ESTATE ✨
🏗️ Brick Work Started! 🔥🧱

We’re excited to share another big milestone at Site No. 1137, Urban Estate.
The brick work has officially begun, and every brick laid is bringing us one step closer to turning our dream structure into reality. 💫

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🔹 Foundation Completed
🔹 Structure Raised
🔹 Brick Work in Progress 🧱

⏳ Next Steps:
Interior & finishing work to follow soon — stay connected for real-time updates! 📡

✨ Your support and blessings mean a lot during this journey.
We’ll keep updating every stage until the final handover. 🙌

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शहर की पुरानी गलियों के बीचों-बीच एक दोमंज़िला घर था। कभी यह घर हँसी–मज़ाक, आवाज़ों और चहल-पहल से भरा रहता था। लेकिन अब ...
17/11/2025

शहर की पुरानी गलियों के बीचों-बीच एक दोमंज़िला घर था। कभी यह घर हँसी–मज़ाक, आवाज़ों और चहल-पहल से भरा रहता था। लेकिन अब उसी घर की पहली मंज़िल के आख़िरी कमरे में 82 साल की दादी रहती थीं। उनका दरवाज़ा हमेशा आधा खुला रहता, जैसे वे आज भी किसी का इंतज़ार करती हों, और कमरे में ऐसा सन्नाटा था जो उम्र के साथ इंसान को चुपचाप घेर लेता है।

कभी यही दादी पूरे घर की धड़कन थीं। सुबह चार बजे उठना, पूजा की घंटी बजाना, रसोई की खनक, बच्चों की हँसी, बहुओं की बातें—सबमें उनकी मौजूदगी थी। उनकी कहानियों में पूरा मोहल्ला बसता था और उनकी रसोई में प्यार पकता था। लेकिन वक़्त बदलता है, और कुछ बदलाव ऐसे चुपचाप आते हैं कि इंसान कब अकेला हो गया, उसे पता भी नहीं चलता।

धीरे-धीरे घर में सब व्यस्त हो गए। बेटे नौकरी में, बहुएँ मीटिंग्स और मोबाइल में, और पोते-पोतियाँ दादी की कहानियों से ज़्यादा मोबाइल गेम्स में दिलचस्पी लेने लगे। दादी वही थीं, घर वही था, पर रिश्ते बदलने लगे।

अब उनकी दुनिया बस उनके कमरे में सिमट गई थी—एक चारपाई, पुरानी अलमारी, तस्वीरों वाला एक एलबम और एक खिड़की जो बाहर की दुनिया दिखाती थी। दादी के पास जीवन का लंबा अनुभव था, लेकिन उसे सुनने वाला कोई नहीं था।

बहू रोज़ खाना कमरे में रख देती—
“दादी, खा लीजिए, मुझे जल्दी है।”
दादी बिना कुछ बोले थाली को देखती रह जातीं।

कभी पोता जल्दी में आता—
“दादी, अभी नहीं, मेरा गेम चल रहा है।”

और कभी पूरा दिन बीत जाता, लेकिन किसी ने दादी से यह तक नहीं पूछा कि वे कैसी हैं।

दादी अक्सर सोचतीं कि मौत अचानक नहीं आती। वह धीरे-धीरे पास आती है। पहले इंसान को रिश्तों से दूर करती है, फिर आवाज़ों से, फिर यादों से। और एक दिन इंसान अपने ही घर में अनजान बन जाता है। उनके कमरे में अब घड़ी की टिक-टिक गूँजती रहती, और यह आवाज़ भी उन्हें याद दिलाती कि समय ही नहीं, लोग भी उनसे दूर हो गए हैं।

एक शाम दादी चारपाई पर बैठकर ढलते सूरज को देख रही थीं। बाहर रोशनी कम हो रही थी, और उनके दिल में भी उम्मीद का उजाला। उन्होंने धीरे से पुकारा, “कोई है?” लेकिन बाहर टीवी की आवाज़ थी, और दादी तक कोई जवाब नहीं पहुँचा।

अगले दिन उनकी पोती कमरे में आई, हाथ में मोबाइल लिए हुए।
“दादी, आपने सुबह फोन किया था? मैं क्लास में थी।”
दादी ने मुस्कुराकर कहा, “बस तुमसे थोड़ी बात करनी थी।”
पोती बोली, “अच्छा, अभी क्लास है, बाद में बात करती हूँ,” और चली गई।
दादी ने कुछ नहीं कहा, पर अंदर कुछ टूट गया।

दिन बीतते गए। उनकी सहेलियाँ चली गईं, रिश्तेदार कम होते गए, और उनकी दुनिया दवाइयों और यादों में सिमट गई। वे रात को एलबम खोलकर तस्वीरों से बातें करतीं, क्योंकि तस्वीरें उन्हें कभी टालती नहीं थीं।

एक सर्द रात, दादी की तबियत थोड़ी बिगड़ गई। हड्डियाँ दर्द कर रही थीं और आवाज़ भी धीमी पड़ गई थी। उन्होंने पानी के लिए पुकारा—“किसी को पानी दे दो…” लेकिन कोई नहीं आया। सब अपने कमरे में थे—टीवी, मोबाइल, मीटिंग, काम… पर दादी का कमरा पहले से भी ज़्यादा अकेला हो गया था।

उन्हें महसूस हुआ कि अकेलापन शरीर को नहीं, आत्मा को मारता है। और जब आत्मा थक जाती है, शरीर खुद ही हार मान लेता है।

सुबह बहू ने कमरे का दरवाज़ा खोला। दादी अपने तकिये के सहारे बिल्कुल शांत लेटी थीं। चेहरे पर गहरी शांति थी, लेकिन आँखों में हल्की नमी—जैसे वे किसी का इंतज़ार करते-करते सो गई हों।

उस दिन पूरे घर में रोना-धोना मच गया। सबको लगा दादी आज चली गईं। लेकिन सच यह था कि दादी शायद उसी दिन चली गई थीं जब घरवालों ने उनसे बातें करना कम कर दी थीं।

82 साल की दादी का सबसे बड़ा दर्द यह नहीं था कि उनका शरीर कमजोर हो रहा था, बल्कि यह था कि रिश्तों ने उनका साथ छोड़ दिया था। उनके पास जीवन था, पर अपनापन नहीं। साँसें थीं, पर सुनने वाला कोई नहीं।

आज जो बुज़ुर्ग हमारे घर में हैं, वही कल हमारा भविष्य हैं। उन्हें अनदेखा मत कीजिए, वरना कल हमारी आवाज़ भी इसी सन्नाटे में खो जाएगी।

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29/09/2025

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सेवा का असली अर्थ 🙏🙏आज मैं आप सबके सामने एक प्रश्न रखना चाहता हूँसेवा का असली अर्थ क्या है?बचपन से हम सबने सुना है कि “स...
05/09/2025

सेवा का असली अर्थ 🙏🙏

आज मैं आप सबके सामने एक प्रश्न रखना चाहता हूँ
सेवा का असली अर्थ क्या है?

बचपन से हम सबने सुना है कि “सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।”
लेकिन जब इस वाक्य को जीवन में उतारने की बारी आती है,
तो हममें से बहुत-से लोग यह समझ ही नहीं पाते कि
आख़िर सेवा किसे कहते हैं?

पहले मुझे लगता था कि सेवा वही है—
जब हम मंदिर जाकर पूजा करें,
दीपक जलाएँ, आरती करें,
या फिर लंगर में बर्तन धोकर, भोजन परोसें।
निस्संदेह यह भी सेवा है।
पर जीवन ने धीरे-धीरे सिखाया कि
सेवा का दायरा बहुत बड़ा है।

सेवा तब भी होती है, जब कोई अस्पताल जाकर मरीजों का दुख बाँटता है।
सेवा तब भी होती है, जब कोई वृद्धाश्रम में जाकर बुज़ुर्गों के पास बैठता है।
सेवा तब भी होती है, जब कोई समाज के लिए संस्थान खड़ा करता है,
जिसका लाभ आने वाली पीढ़ियों को मिलता है।
यहाँ तक कि अपने माता-पिता की सच्चे मन से देखभाल करना भी सेवा ही है।

मेरे दादाजी, श्री सोहनलाल बजाज जी
उन्होंने अग्रवाल धर्मशाला का निर्माण कार्य समाज की मदद से पूरा करवाया।
लगभग 17 वर्षों तक वे अग्रवाल सभा के प्रधान रहे।
वे मानते थे कि मनुष्य वही है जो दूसरों के काम आए।
शायद इसीलिए उनके हर कार्य में सेवा का भाव झलकता था।

बचपन में मैं पढ़ाई में बहुत अच्छा नहीं था।
विशेषकर अंग्रेज़ी में मैं कमजोर रहा।
पिताजी हमेशा कहते थे—
“बेटा, पढ़ ले। नौकरी कर ले।”
पर मेरा मन पढ़ाई में कभी नहीं लगा।
मुझे तो व्यवसाय करना था।
ईश्वर की कृपा से जो भी व्यवसाय किया, उसमें सफलता मिली।

लेकिन पढ़ाई में कमजोरी का अनुभव मेरे दिल में हमेशा रहा।
शायद इसी वजह से आज मुझे बच्चों की शिक्षा और उनके संस्कार की अहमियत ज़्यादा समझ आती है।

समय बीता।
बच्चों को मैंने धीरे-धीरे काम की जिम्मेदारी दे दी।
और एक दिन अचानक मुझे स्कूल की सेवा की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

शुरुआत में मैंने वही किया जो मेरी पोस्ट के हिसाब से आवश्यक था।
लेकिन जैसे-जैसे मैं स्कूल से जुड़ता गया,
मेरे दिल में एक नया बदलाव आता गया।
इस सफ़र में मेरी मैनेजमेंट टीम, प्रिंसिपल, सभी अध्यापक और पूरा स्टाफ हमेशा मेरे साथ खड़ा रहा।
उन्होंने मुझे सही सलाह दी, मेरा मार्गदर्शन किया।

धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि
बच्चों की पढ़ाई, उनकी सुविधाएँ और उनके संस्कार सँवारना भी उतनी ही बड़ी सेवा है, जितनी मंदिर में पूजा करना।

धीरे-धीरे मेरे दिल के पुराने घाव भी भरने लगे।
मन को सहारा मिला।
और समझ आया कि असली ईश्वर तो इन्हीं बच्चों की आँखों में छिपा है।

कुछ दिन पहले मैंने 12वीं कक्षा के 30 बच्चों से अकेले मुलाक़ात की।
मैंने उनसे कुछ सवाल पूछे और उनके उत्तर लिखने को कहा—

आपका पहला गुरु कौन है?

घर से निकलते समय आप बड़ों को कैसे आदर करते हैं?

क्या आप कभी अपने माता-पिता से ऊँची आवाज़ में बोलते हैं?

आपको जीवन में क्या बनना है?

आप कितने घंटे फ़ोन का उपयोग करते हैं?

आपके नज़र में सबसे अच्छे शिक्षक कौन हैं?

हम आपकी पढ़ाई में और अच्छे अंक लाने में कैसे मदद कर सकते हैं?

स्कूल में आपकी परेशानियाँ क्या हैं?

अगर आप प्रिंसिपल होते तो स्कूल के हित में क्या करते?

मुझे लगा था बच्चे कुछ पंक्तियाँ लिखेंगे।
लेकिन उन्होंने 2 से 4 पन्नों में अपने दिल की बातें लिख दीं।
कुछ बच्चों ने यह तक लिखा कि—
“मैं अपनी माँ से कई बार ऊँची आवाज़ में बोल जाती हूँ।”

लगभग सभी बच्चों ने यह भी लिखा कि
“सर, आप हमसे इस तरह बार-बार मिलते रहिए। हमें आपसे बातें करके अच्छा लगता है।”
कुछ ने तो मुझे “दोस्त” भी कहा।
उस पल मुझे लगा कि मैं इन बच्चों का सिर्फ़ चेयरमैन नहीं,
बल्कि उनका दोस्त भी बन सकता हूँ।

तीन दिन तक मैं लगातार वे पत्र पढ़ता रहा।
और यही सोचता रहा—
आज के बच्चों में संस्कार कहाँ खोते जा रहे हैं?
हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है?
यह भी सच है कि आज कुछ माता-पिता अपने ही बच्चों से डरने लगे हैं।

तभी मैंने महसूस किया कि
इन बच्चों के लिए कुछ बेहतरीन करना ही मेरी सबसे बड़ी सेवा है।

कल ही मैंने नर्सरी के 72 छोटे-छोटे बच्चों के साथ भोजन किया।
उन्हें गोद में लिया, अपने हाथों से खिलाया।
ऐसा लगा जैसे भगवान मेरे सामने बैठे हों।
उनकी हँसी और मासूमियत ने मेरे दिल को अपार शांति दी।
उस क्षण मुझे लगा कि
ईश्वर कहीं बाहर नहीं,
यही हमारे बीच इन बच्चों में है।

इस पूरे सफ़र में मेरी पत्नी और मेरे दोनों बेटों ने मुझे पूरा साथ दिया।
कभी शिकायत नहीं की कि पापा स्कूल जाते हैं तो हमारे काम में दिक्कत होती है।
बल्कि हमेशा यही कहा—
“पापा, जहाँ आपको खुशी मिले, वही काम कीजिए। हमारे लिए आप पहले ही बहुत कुछ कर चुके हैं।”
उनके इन शब्दों ने मुझे और मज़बूत बना दिया।

आज मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ

👉 भगवान मंदिर की मूर्ति में भी हैं और बच्चों की मुस्कान में भी।
👉 भगवान भजन और आरती में भी हैं और शिक्षा व संस्कार में भी।
👉 भगवान दीपक की लौ में भी हैं और किसी भूखे को रोटी खिलाने में भी।

सेवा का असली अर्थ यही है—
अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर,
दूसरों के जीवन में खुशियाँ और रोशनी भरना।

और जब यह सेवा बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य से जुड़ जाती है,
तो यह केवल सेवा नहीं रहती…
यह पूजा से भी बड़ी साधना बन जाती है।

तो मैं आप सब से पूछना चाहता हूँ—
👉 क्या इस सेवा से ईश्वर प्रसन्न नहीं होंगे?
👉 क्या यह बच्चों की मुस्कान ही भगवान की सबसे सच्ची आरती नहीं है?

मेरा विश्वास है कि
मंदिर की घंटी और बच्चों की हँसी,
दोनों में वही ईश्वर विराजते हैं।

धन्यवाद। 🙏

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31/08/2025

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"दिल की बात 🙏🙏📖 पुराने पन्ने खो गए, पर यादें दिल में लिखी रह गईं।"खामोशी ही अब मेरी सबसे गहरी कहानी है।कुछ दिनों से मन फ...
18/08/2025

"दिल की बात 🙏🙏

📖 पुराने पन्ने खो गए, पर यादें दिल में लिखी रह गईं।
"खामोशी ही अब मेरी सबसे गहरी कहानी है।

कुछ दिनों से मन फिर से लिखने को कह रहा है,
वे पुराने पृष्ठ स्मृतियाँ जगाने लगे हैं।

१९९६ से २०१२ तक शब्द मेरे सहचर रहे,
हर एहसास, हर पीड़ा, कागज़ पर उतारे गए।

फिर सोहना से दूर, गुरुग्राम की राहों में चला आया,
अपने लिखे स्वप्न, अपने पृष्ठ, सभी पीछे छोड़ आया।

जब पुनः जन्म-स्थल के घर गया स्मृतियाँ खोजने,
कुछ न मिला, केवल नीरवता थी आत्मा से जुड़ने।

व्यथा हुई, कुछ माह आँसुओं में बीत गए,
फिर सोचा, शायद उचित है, क्यों हृदय उजागर किए जाएँ।

संतानों के स्वप्न और अपनी स्मृतियों की छाया,
इन्हीं के मध्य दिन-रात का जीवन बिताया।

पर अब मन पुनः कह रहा है — कलम उठाओ,
जो खो गया था कहीं मार्ग में, उस उत्साह को फिर से जगाओ।

क्या हमने अपने माता-पिता से कभी ऊँची आवाज़ में बात की थी?

मुझे आज भी याद है —
हमारी इतनी भी हिम्मत नहीं होती थी कि अपने माता-पिता के सामने ऊँची आवाज़ में बोल सकें।
उनसे बहस करना तो दूर की बात थी, हम तो उनकी पसंद का पहनते थे, वही खाते थे जो उन्हें अच्छा लगे।
हमें तो ये तक नहीं पता होता था कि हम अपने मन से कुछ "कर" भी सकते हैं।

संस्कार कह लो या डर — पर वो मर्यादा, वो आदर हर बच्चे में था।

आज जब देखता हूँ कि बच्चे माता-पिता से ऊँची आवाज़ में बोलते हैं, जवाब देते हैं —
तो मन कांप उठता है।
क्या यही बदलाव है? क्या यही प्रगति है?
मेरे पार्क में कई दोस्त मिलते हैं, सब एक ही बात कहते हैं:
"समय बदल गया है, भाई जी। अब तो बच्चों में मां-बाप का भी डर नहीं रहा।"

क्या ये वही देश है, जहां बेटा घर से निकलते समय मां के पैर छूता था?
जहां बेटियां पिता की आंखों के भाव पढ़ लेती थीं?
जहां बुज़ुर्गों के सामने बैठते समय भी बच्चे सावधान मुद्रा में बैठते थे?

मैं आज भी अपनी मां के चरणों में सिर रखकर माथा टेकता हूँ।
जो सुकून वहां मिलता है, वो दुनिया की किसी दौलत में नहीं।
और मुझे खुशी है कि मेरा पोता विहान भी मेरे और मेरी मां के चरणों में वैसे ही सिर रखता है।
क्यों? क्योंकि उसने देखा है, सीखा है — संस्कार आगे बढ़ते हैं, शब्दों से नहीं, कर्मों से।

क्या ये सच नहीं है?

बच्चे अच्छा-बुरा हमसे ही सीखते हैं।
अगर हम अपने बुज़ुर्गों को आदर देंगे, तो बच्चे भी वही करेंगे।
अगर हम अपशब्द, गुस्सा, और उपेक्षा दिखाएंगे — तो वही वापस मिलेगा।

समय बदला है —
पर अगर हम चाहें, तो संस्कारों की लौ को बुझने से बचा सकते हैं।
क्योंकि ये सिर्फ परंपरा नहीं, हमारी पहचान हैं।

क्या वसीयत बनाई है पापा ने 🙏🙏घर, ज़मीन—कुछ भी हमारा नहीं। सब में मम्मी की हिस्सेदारी... जब तक वह जिंदा हैं, तब तक हम कुछ...
14/08/2025

क्या वसीयत बनाई है पापा ने 🙏🙏
घर, ज़मीन—कुछ भी हमारा नहीं। सब में मम्मी की हिस्सेदारी... जब तक वह जिंदा हैं, तब तक हम कुछ नहीं कर सकते," —बहू प्रिया ने नाक सिकोड़ते हुए कहा।
"मैं भी यही सोच रहा हूं। मम्मी को पापा की पेंशन तो मिलती ही रहेगी, पापा के जाने के बाद भी। जानकर भी ऐसी वसीयत बनाना... मैं खुद हैरान हूं," —बेटे आदित्य ने चिंता व्यक्त की।
शिवनाथ जी का देहांत हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था और बेटा-बहू अपने रंग दिखाने लगे थे। सुधा जी कुछ नहीं बोलती थीं, लेकिन सब समझ रही थीं कि अचानक बच्चों का व्यवहार कैसे बदल गया।
वह मन ही मन भगवान का धन्यवाद करतीं—"अच्छा हुआ, शिवनाथ जी ने अपनी सोच के मुताबिक सब कुछ तय कर लिया। उन्हें अपनी बेटियों की कोई चिंता नहीं थी—दोनों अपने घरों में खुश थीं, उनका कोई लेन-देन नहीं था। उनकी पेंशन थी, जिससे उन्हें कभी बच्चों के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।"
"वो मुझे अकेला छोड़ गए, लेकिन ऐसा इंतजाम कर गए कि मैं कभी किसी पर निर्भर नहीं रहूं," —सुधा जी का आंचल आंसुओं से भीग गया।
जिंदगी के इस मोड़ पर जब साथी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब उसका अचानक चले जाना बहुत तकलीफदेह होता है। फिर यदि बच्चे स्वार्थी हों और व्यवहार बदल जाए, तो यह असहनीय हो जाता है।
प्रियंका और आदित्य इस सोच से परेशान थे कि बिना मम्मी के हस्ताक्षर के कोई भी प्रॉपर्टी का हिस्सा नहीं बेचा जा सकता। वे जानते थे कि मम्मी अपने साथ पूरी प्रॉपर्टी लेकर नहीं जाएंगी—आगे-पीछे सभी चीजें उन्हीं की हैं। फिर भी उन्हें गुस्सा था अपने स्वर्गवासी पिता से कि क्यों उन्हें मम्मी पर निर्भर बना दिया।
"मम्मी, वृद्धाश्रम से कुछ लोग आए हैं, चंदा मांग रहे हैं, दे दीजिए," —प्रियंका की आवाज में गुस्सा और नाराजगी झलक रही थी।
वृद्धाश्रम के लोग एक-दूसरे को देखने लगे। सुधा जी आकर उनके बीच बैठी और कहा—
"भैया, शिवनाथ जी एक नेक इंसान और समाजसेवी थे। वह अपनी मेहनत से हमारी संस्था को इस मुकाम पर ले आए कि हमें चंदा मांगने की जरूरत ही नहीं। हमारी संस्था में होने वाले कार्यक्रमों को बड़े स्पॉन्सर मिल जाते हैं, और इससे इतनी रकम आती है कि हमारे बुजुर्गों का जीवन आराम से चल रहा है।"
"आपकी बहू ने बिना हमारी बात सुने आपको आवाज़ दी," —आश्रम का एक सदस्य बोला।
"जी, मैं अपनी बहू की तरफ से माफी मांगती हूं। उसे यह नहीं पता था कि उसके ससुर इस संस्था के कोषाध्यक्ष थे। उसने हमेशा उन्हें पैसे गिनते देखा, वह शायद नासमझ है," —सुधा जी ने बहू की तरफ से सफाई दी।
"हम तो शिवनाथ जी की याद में एक छोटी सी प्रतिमा संस्था में लगा रहे हैं। उसके अनावरण के लिए हम आपको निमंत्रण देने आए हैं। अगर आप इसे अपने हाथों से करें, तो हमें खुशी होगी। वह अपने नाम को सार्थक करके अमर हो गए हैं।"
सुधा जी की आंखें छलक पड़ीं—"वह इंसान जो समाज के लिए इतना कुछ कर गया, और यहां पराए लोग उसकी सराहना कर रहे हैं, वहीं अपनी ही औलाद उसे गलत समझ रही है।"
सुधा जी मन ही मन सोचती हुई निमंत्रण पत्र ले गईं।
आदित्य उन लोगों के जाने के बाद बाहर आया—
"कितना लिया? पेमेंट चेक से किया या कैश से?"
सुधा जी बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गईं। प्रियंका और आदित्य निमंत्रण पत्र देख रहे थे, सोच रहे थे कि संस्था में प्रतिमा स्थापित करने से पहले मम्मी ने बताया क्यों नहीं।
"हां भाई, अब मम्मी को किसी से पूछने की जरूरत नहीं—मम्मी तो मालिक हैं," —प्रियंका जोरों से बोली।
अगले दिन सुधा जी बेटे-बहू के साथ संस्था पहुंचीं। वहां शिवनाथ जी की प्रतिमा का अनावरण सुधा जी के हाथों से हुआ। प्रतिमा के नीचे पत्नी के नाम के साथ बेटे और बहू का नाम भी अंकित था।
जब संस्था के कार्यकर्ताओं ने शिवनाथ जी के सत्कर्मों के बारे में बताया, तो पूरा हॉल भावुक हो गया। बुजुर्गों को आत्मनिर्भर बनाने, गरीब लड़कियों के सामूहिक विवाह, विधवा विवाह जैसे नेक कार्यों में उनका नाम हमेशा याद किया जाएगा।
प्रियंका और आदित्य कुछ कहने लायक नहीं थे—क्योंकि मां के साथ उन्हें मिल रहा यह सम्मान सिर्फ और सिर्फ उनके पिता की वजह से था। उनकी नजर में तो पिता सिर्फ एक सरकारी कर्मचारी थे, जो अक्सर टूर पर रहते थे।
घर लौटने के बाद प्रियंका और आदित्य मां के पास शर्मिंदा होकर आए—
"मां, हमें नहीं पता था कि वह प्रतिमा संस्था की तरफ से लग रही है, इसलिए हम ज्यादा बोल गए।"
"बच्चों, मतभेद होने में कोई बुराई नहीं, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। पापा के पास कभी इतना पैसा नहीं था, फिर भी तुम दोनों को महंगे स्कूलों में पढ़ाया, तुम्हारी शादियां कीं। विचारों में भी तुम पिता-पुत्र में मतभेद रखते थे, पर वह पीढ़ी का अंतर हो सकता है। लेकिन वसीयत को लेकर जो तुम दोनों ने बर्ताव किया, मैं उससे दुखी हुई।"
"तुम लोग इस कमरे और ऑफिस में बैठकर, सब कुछ ऑनलाइन कर लेते हो—लेकिन इसका पीछे वह इंसान था जिसने छोटी सी नौकरी से हमें पढ़ाया, बढ़ाया। तुम्हें वह पिता गलत लग रहा है, क्योंकि उन्होंने मुझे तुम्हारे सामने मोहताज नहीं किया।"
"बेटा, कमी तुममें थी, जो तुम अपने पिता का विश्वास नहीं जीत पाए। देखो, तुम्हारी बहनें तो किसी पर निर्भर नहीं हैं। वह खुद भी आत्मनिर्भर थीं। और पापा ने इस संस्था को भी आत्मनिर्भर बना दिया," —सुधा जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा।
प्रियंका पानी लेकर आई—
"बस करो, अब समझ आ गया है हमें। अब और मत बोलिए, वरना तबियत खराब हो जाएगी," —आदित्य शर्मिंदगी से बोला।
"अच्छा ही है, मर जाऊंगी तो सब कुछ तुम्हारा हो जाएगा। मुझे पर निर्भरता ही तुम्हें अखर रही है? समझ नहीं आता, हमारे समय में मां के पैरों में स्वर्ग और पापा में अपनी दुनिया दिखती थी। अब आज की पीढ़ी को हम बुजुर्ग बोझ लगते हैं।"
"जब तुम छोटे थे, तो मेरे पल्लू से बंधे रहते थे। गहरी नींद से उठाकर पानी भी मेरे हाथ से लेते थे—वह निर्भरता सही थी। अब एक हस्ताक्षर की निर्भरता तुम्हें इतनी बुरी लग रही है," —सुधा जी ने कहा, जबकि उनकी आंखों में आंसू थे।
आदित्य मां के पैरों में गिर पड़ा—
"मां, आज संस्था में जाकर समझ आया कि मेरे पिता क्या थे। आज जो उनके बारे में सुना, तब समझ आया कि इंसान की असली पहचान क्या है। मरकर भी लोग कैसे दिलों में जीवित रहते हैं। अब मैं वादा करता हूं, तुम्हारा यह बेटा तुम्हें कभी शर्मिंदा नहीं करेगा और पिताजी के रास्ते पर चलने की पूरी कोशिश करेगा।"
सुधा जी अपने बेटे को सीने से लगाकर आंसुओं में डूब गईं।

"स्मिता... लॉकर्स की चाबी कहां है?" भावेश ने सख्त लहजे में पूछा।स्मिता बोली, "आज अचानक आपको लॉकर्स की चाबी की क्या ज़रूर...
04/08/2025

"स्मिता... लॉकर्स की चाबी कहां है?" भावेश ने सख्त लहजे में पूछा।

स्मिता बोली, "आज अचानक आपको लॉकर्स की चाबी की क्या ज़रूरत पड़ गई?"

"वो तुम्हारा विषय नहीं है... चाबी दो..."

"आज सुबह-सुबह इस तरह गुस्से में बोलने की वजह?"

"वजह तुम अच्छी तरह जानती हो स्मिता... मैं घर की छोटी बातों में दखल नहीं देता, लेकिन जिस बात के लिए मना कर दूं, उसका उल्लंघन मैं बर्दाश्त नहीं करता, ये तुम जानती हो... फिर भी तुमने..."

"लेकिन उसमें ऐसा क्या आसमान टूट पड़ा कि आप अपनी पत्नी से इस तरह व्यवहार करें?" स्मिता ने कहा।

"स्मिता, अगर किसी इंसान का अतीत न जानो, तो कोई भी फैसला नहीं लेना चाहिए।"

"तुम क्या जानती हो मेरी मां के बारे में?"

"मेरी मां के स्वर्गवासी होने के बाद मैं उनकी पीतल की थाली, कटोरी और चम्मच में खाना खाता था — वो तुम्हें पसंद नहीं था। तुम बार-बार कहती थी कि उन्हें कबाड़ में दे दूं। तुम्हारे नज़रिए में वो सिर्फ़ एक पुरानी थाली-कटोरी थी।"

"मैंने तुम्हें साफ़ शब्दों में कहा था कि तुम इन बर्तनों को लेकर कोई फैसला मत लेना, फिर भी तुमने वो थाली-कटोरी और चम्मच कबाड़ी को बेच दिए?"

"अगर तुम्हें मेरी मां की थाली पसंद नहीं थी, तो उनके पुराने गहनों पर भी तुम्हारा कोई हक़ नहीं है। चाबी दो, वो गहने मैं किसी गरीब को दान करना चाहता हूं।"

स्मिता बस देखती रह गई।

तभी अंदर से बेटा श्याम आया, "पापा, आप इतने गुस्से में कभी नहीं होते, आज क्या हुआ?"

मैंने आंखों में आंसू लिए कहा, "तेरी दादी और मेरी मां की एक याद को तेरी मां ने कबाड़ में बेच दिया — वो भी मेरी स्पष्ट मना करने के बाद।"

"लेकिन पापा, वो तो सिर्फ़ एक थाली..."

"बेटा, अगर उसका इतिहास जानना है तो चलो आज गांव चलते हैं... आज मैं ऑफिस नहीं जाऊंगा।"

मैं, श्याम और स्मिता — तीनों कार में बैठकर गांव की ओर निकल पड़े।

गांव के मंदिर के पास कार रोकी, अंदर गए। वहां पंडित पंड्या दादा दौड़ते आए, "अरे भिखा तू!"

स्मिता और श्याम हक्के-बक्के — एक बड़े कॉर्पोरेट कंपनी का जनरल मैनेजर, जिसकी तनख्वाह 2 लाख रुपये महीना है — उसे कोई "भिखा" कहे?

मैंने पंडितजी के चरण छुए।

उन्होंने कहा, "बहुत बड़ा आदमी बन गया बेटा..."

मैंने कहा, "सब मां और भगवान की कृपा है।"

हम मंदिर में दर्शन के लिए गए। पंड्या दादा ने कहा, "बिना खाना खाए जाने नहीं दूंगा।"

उन्होंने पूछा, "बा साथ में नहीं आईं?"

मेरी नम आंखें देखकर वो समझ गए।

बोले, "तेरी मां में ग़ज़ब का आत्मविश्वास था। पढ़ी-लिखी कम थी, लेकिन तेरा पालन-पोषण बिना पिता के किया... ऐसा कोई पिता भी नहीं कर सकता।"

फिर उन्होंने मेरे परिवार से कहा, "भिखा का असली नाम भावेश है। लेकिन गांव में सब उसे 'भिखा' कहकर पुकारते थे। जानते हो क्यों?"

"शांता बा के तीन बच्चे पैदा होते ही मर जाते थे। जब चौथे नंबर पर ये भावेश पैदा हुआ, तो मां ने मन्नत ली कि उसका बेटा लंबी उम्र जिए, तो वो जीवनभर चप्पल नहीं पहनेगी और एक साल तक पांच घरों से भीख मांगेगी।"

"गर्मी, सर्दी, बरसात — नंगे पांव — भीख मांगकर बेटे के लिए भोजन जुटाना कोई आसान काम नहीं।"

"भिखा तो बच गया, लेकिन एक साल बाद उसका पिता चल बसा। उस टूटे हुए समय में भी शांता बा ने हार नहीं मानी।"

"गांव का हर काम करती, और बेटे को मंदिर में पढ़ने के लिए छोड़ जाती।"

"उसका सपना था — मेरा बेटा बड़ा साहब बने।"

मैं फूट-फूट कर रो रहा था। मेरा बेटा श्याम भी दादी की बातें सुनकर रो पड़ा। पत्नी स्मिता हाथ जोड़कर बोली, "मुझे माफ़ कर दो भावेश... मां को समझने के लिए दस जन्म कम हैं..."

भावेश ने चेकबुक निकाली और पंड्या दादा से कहा, "ये दो चेक हैं — एक लाख का मंदिर के लिए, एक लाख आपके लिए। लेकिन असली काम अभी बाकी है..."

"मां जिन पांच घरों से भीख मांगती थीं, उन घरों में चलो..."

पंड्या दादा ने मुझे पांचों घर दिखाए। मैं हर वृद्ध के चरणों में गिरा और एक-एक लाख का चेक दे दिया।

रास्ते में पंड्या दादा बोले, "बेटा, लोग तेरहवीं, अस्थि विसर्जन करते हैं... लेकिन आज तूने अपनी मां को सच्चे अर्थों में मुक्त कर दिया है। तू जैसा बेटा सबको मिले..."

हम लौटने लगे। घर के पास बर्तनों की दुकान आई तो स्मिता ने कार रुकवाई, दुकान के अंदर गई और थोड़ी देर बाद बाहर आई।

उसके हाथ में मां की वही पीतल की थाली, कटोरी और चम्मच थी।

स्मिता बोली, "कल मैंने इन्हें यहीं बेचा था, आज फिर से खरीद लाई... अगर ये सेट बिक गया होता तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाती।"

"भावेश, मुझे माफ़ कर दो... मैं इतनी छोटी और कमजोर निकली कि इन बर्तनों का मूल्य समझ नहीं पाई।"

"स्मिता, मैं कौन होता हूं माफ़ करने वाला? मैंने तो बस यह समझाने की कोशिश की कि भावनाओं के रिश्ते कितने गहरे होते हैं।"

"ठीक है, लेकिन एक शर्त पर गाड़ी में बैठूंगी — अब से रोज़ मैं इन्हीं बर्तनों में खाना खाऊंगी। यही मेरी प्रायश्चित है।"

भावेश बोला, "मुझे इतना ही काफी है कि तुम्हें अपनी गलती समझ आई। तुम खाओ या मैं, यह ज़रूरी नहीं... ज़रूरी ये है कि जो भी हो, हमारे रिश्ते में आदर और समझ बनी रहे।"

"प्रेम का बंधन इतना मजबूत होना चाहिए, कि कोई तोड़ने आए तो खुद ही टूट जाए..."

अगर इस सच्ची घटना ने आपकी आंखें नम की हों... तो इसे आगे ज़रूर साझा करें। 🙏🕉️

भारत में 10.38 करोड़ बुज़ुर्ग हैं...

हम चाहे जितना अपनी संस्कृति का गुणगान करें, लेकिन बुज़ुर्गों के सम्मान और देखभाल में हम कई देशों से बहुत पीछे हैं।

🔹 80% बुज़ुर्ग माता-पिता को अलग बैठाकर खाना दिया जाता है।

🔹 20% माता-पिता को सुविधा होते हुए भी घरवाली के डर से अलग रखा जाता है।

🔹 90% बेटे काम से आकर बच्चों को चूमते हैं, लेकिन मां-बाप से “कैसे हो बापूजी?” तक नहीं पूछते।

🔹 70% बुज़ुर्ग कुछ बोलें तो “आपको क्या पता?” कहकर चुप कर दिया जाता है।

🔹 90% बुज़ुर्ग माता-पिता को पैसे के लिए पूछना पड़े — जैसे भीख मांग रहे हों।

जो करोगे, वही भरोगे।

कई घरों में यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है।

बुज़ुर्ग माता-पिता बेचारों की तरह जीते हैं — जैसे पशुओं से भी बदतर हालात।

ऐसे परिवारों में संस्कार, शिष्टाचार और शिक्षा की गहरी कमी होती है।

सोचिए... समझिए... युवाओं...

60 साल तक पति-पत्नी साथ रहते हैं। जब एक स्वर्ग सिधारता है, तो दूसरे की पूरी ज़िंदगी अकेली हो जाती है।

बचपन के भाई-बहन, रिश्तेदार, दोस्त — एक-एक कर सब चले जाते हैं।

बचती है तो बस अकेलापन और एक बोझ बन चुकी ज़िंदगी।

शरीर साथ नहीं देता।

सुनाई नहीं देता। बदलती भाषा, तकनीक, फैशन, संस्कृति से तालमेल नहीं बैठता।

सब कुछ बोझ लगने लगता है...

और तब अगर बेटे बहुएं हरामी निकलें... तो जीवन नरक बन जाता है।

ऐसे वक्त पर बेटों को अपने बचपन को याद करना चाहिए।

जिन्होंने चलना, बोलना, खाना सिखाया... दुनिया दिखाई... उनके लिए आज इतने क्रूर क्यों?

माता-पिता को छोड़कर कोई सुखी नहीं हुआ — न कभी होगा।

अगर बुज़ुर्गों की सेवा नहीं कर सकते, तो कम से कम उन्हें अपमानित न करें।

"कैसे हो मां? कैसे हो पिताजी?" — ये चार शब्द भी उन्हें परमानंद दे सकते हैं

बुजुर्गों से हैरान-परेशानबढ़ती उम्र अक्सर कई बीमारियों और समस्याओं की वजह बन जाती है। कई बार ऐसी स्थितियां पैदा हो जाती ...
25/07/2025

बुजुर्गों से हैरान-परेशान
बढ़ती उम्र अक्सर कई बीमारियों और समस्याओं की वजह बन जाती है। कई बार ऐसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं कि घरवालों को लगता है कि बुजुर्ग पागल हो गए हैं या फिर उन्हें जानबूझ कर परेशान कर रहे हैं, जबकि असल में वे बीमार होते हैं और उन्हें सही देखभाल और प्यार की दरकार होती है।
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Edited by: प्रियंका सिंह
Updated: 1 Oct 2017, 3:34 pm|नवभारत टाइम्स
बढ़ती उम्र अक्सर कई बीमारियों और समस्याओं की वजह बन जाती है। कई बार ऐसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं कि घरवालों को लगता है कि बुजुर्ग पागल हो गए हैं या फिर उन्हें जानबूझ कर परेशान कर रहे हैं, जबकि असल में वे बीमार होते हैं और उन्हें सही देखभाल और प्यार की दरकार होती है। अगर घर में कोई ऐसी किसी बीमारी से पीड़ित है तो उससे कैसे निपटें, एक्सपर्ट्स से बात करके जानकारी दे रही हैं प्रियंका सिंह

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एक्सपर्ट्स पैनल
डॉ. विनय गोयल, प्रफेसर, न्यूरॉलजी, एम्स
डॉ. प्रवीण गुप्ता, एचओडी, न्यूरॉलजी, फोर्टिस हॉस्पिटल
जी. पी. भगत, फाउंडर, गुरु विश्राम वृद्ध आश्रम
डॉ. राजीव अग्रवाल, इन्चार्ज, न्यूरो फिजियो यूनिट, एम्स

64 साल की माला वर्मा (बदला नाम) की बहू नीता ने अपनी कुछ फ्रेंड्स को घर बुलाया। माला भी उनसे मिलने ड्रॉइंग-रूम में आ गईं। नीता की एक फ्रेंड ने बातों ही बातों में पूछ लिया, 'अम्मा, आपके चाय पी?' इस पर माला गुस्से से बोलीं, 'बेटी, मुझे तो कई दिन से किसी ने चाय नहीं दी। मैं तो अब इन पर बोझ बन गई हूं ' यह सुनकर नीता बहुत नाराज हो गईं। वह अपनी सास पर चिल्लाने लगीं कि इनका कितनी भी ख्याल रखो, हमेशा बुराई ही करती रहती हैं। अभी थोड़ी देर पहले ही तो इन्हें चाय बनाकर दी थी। घर का माहौल बिगड़ता देख सहेलियों ने वहां से निकलने में ही भलाई समझी। शाम को पति ऑफिस से लौटा तो नीता ने उससे मां की शिकायत की। उसने भी मां पर काफी गुस्सा किया कि आप जान-बूझकर दूसरों के सामने हमें नीचा दिखाती हैं। घर में बहुत अशांति हो गई लेकिन किसी ने भी असल समस्या पर गौर नहीं किया। दरअसल, माया पिछले कुछ महीनों से अजीब-सा बर्ताव कर रही हैं। वह अक्सर लोगों के नाम भूल जाती हैं, सामान रखकर भूल जाती हैं, कभी-कभी जोर से बोलने या रोने भी लगती हैं। दिन में कई बार नहाती हैं और कभी-कभी कपड़े पहने बगैर बाथरूम से निकल आती हैं। घरवालों को लगता है कि वह जान-बूझ कर ऐसा कर रही हैं क्योंकि नीता से उनकी बनती नहीं है लेकिन माया बुढ़ापे की सबसे बड़ी बीमारियों में से एक डिमेंशिया से पीड़ित हैं। जानते हैं डिमेंशिया और बुढ़ापे की दूसरी बीमारियों के लक्षण और इलाज के बारे में ताकि बुढ़ापा पैरंट्स के साथ-साथ बच्चों के लिए बड़ी समस्या न बने।

डिमेंशिया
अगर किसी की याददाश्त इतनी कमजोर हो गई हो कि उसका असर रोजाना के काम पर पड़ रहा हो, मसलन वह भूल जाता हो कि कौन-सा महीना चल रहा है, किस शहर में रह रहा है, खाना खाया है या नहीं तो वह डिमेंशिया से पीड़ित हो सकता है। यह शब्द डीई (बिना) और मेंशिया (दिमाग) को जोड़कर बनाया गया है यानी दिमाग के काम करने की क्षमता का कम होना। इस बीमारी में दिमाग के कुछ खास सेल्स खत्म होने लगते हैं, जिससे उस शख्स की सोचने-समझने की क्षमता कम हो जाती है और बर्ताव में भी बदलाव आ जाता है। डिमेंशिया को दो कैटिगरी में बांटा जा सकता हैः एक, जिसका बचाव या इलाज मुमकिन है और दूसरा उम्र के साथ बढ़ने वाला। पहली कैटिगरी में ब्लड प्रेशर, डायबीटीज, स्मोकिंग, ट्यूमर, टीबी, स्लीप एप्निया, विटामिन की कमी आदि से होनेवाला डिमेंशिया आता है तो दूसरी कैटिगरी में अल्टशाइमर्स (Alzheimer's ), फ्रंटोटेंपोरल डिमेंशिया (FTD) और वस्कुलर डिमेंशिया आता है।

1. अल्टशाइमर्स सबसे कॉमन डिमेंशिया है। इसमें मेमरी लॉस के साथ-साथ मरीज का ओरिएंटेशन गड़बड़ा जाता है जैसे कि वह भूल जाता है कि घर में बाथरूम किधर है या फिर मार्केट में कौन-सी शॉप कहां है या कई बार तो वह अपने घर का रास्ता ही भूल जाता है।
2. FTD में भूलने के साथ-साथ मरीज के बर्ताव में बहुत बदलाव आ जाता है, मसलन वह बहुत जिद्दी हो जाता है, गुस्सा करने लगता है, चिड़चिड़ा हो जाता है।
3. वस्कुलर डिमेंशिया के लक्षण तो करीब-करीब अल्टशाइमर्स जैसे ही होते हैं लेकिन यह धीरे-धीरे नहीं, बल्कि स्ट्रोक के बाद अचानक होता है।

लक्षण
- किसी का नाम, चीज रखकर या शब्दों को भूल जाना
- अपने करीबियों को भी न पहचान पाना
- नई चीजें सीखने और फैसले लेने में दिक्कत होना
- एक ही बात को बार-बार दोहराना
- बेवजह गुस्सा आना, आक्रामक होना या परेशान रहना
- छोटे-मोटे काम जैसे कि ड्राइविंग, खाना पकाना, कपड़े पहनना, खाना खाना आदि में दिक्कत होना
- मतिभ्रम होना यानी किसी इंसान या जानवर आदि के होने का भ्रम होना
- उलटे-सीधे फैसले लेना जैसे कि गर्मियों में मोटा जैकेट पहन लेना या सर्दियों में भी जमीन पर सोना या कपड़े उतार देना

क्या हैं वजहें
- बढ़ती उम्र, आमतौर पर 60 साल से ज्यादा उम्र के लोग बनते हैं शिकार
- बहुत ज्यादा स्मोकिंग करना
- बिल्कुल एक्सरसाइज न करना
- ब्लड प्रेशर ज्यादा होना
- फैमिली हिस्ट्री होना
- जिनेटिक वजहों से पुरुष ज्यादा होते हैं शिकार
नोट: इस बीमारी की कोई एक वजह नहीं होती। हां, ऊपर दी गई वजहें बीमारी की आशंका को बढ़ा सकती हैं।

5 स्टेज होती हैं डिमेंशिया की
स्टेज 1: डिमेंशिया की शुरुआत में ऐसे कोई बदलाव नहीं आते, जिन्हें आसानी से पहचाना जा सके। मरीज अपनी जरूरतों और बातों का खयाल रख सकता है। हां, बातों को अक्सर भूलने लगता है।
स्टेज 2: दूसरी स्टेज है ज्यादा भूलना। ऐसे लोग अक्सर चीजों को रखकर भूल जाते हैं, लोगों का नाम भूल जाते हैं, समय-तारीख आदि भूल जाते हैं और क्या कर रहे हैं, यह भी भूल जाते हैं। इस स्टेज पर भी मरीज अपना खयाल बिना किसी की मदद के रख सकता है।
स्टेज 3: मरीज रोजाना के रास्तों में ही खो जाता है, बोलने में दिक्कत आने लगती है। उसका बर्ताव बदलने लगता है।
स्टेज 4: मरीज रुटीन के काम नहीं कर पाता। खाना खाने का तरीका उसे याद नहीं रहता, खुद से कपड़े नहीं पहन पाता, नहा नहीं पाता आदि। वह अपने परिवारवालों को नहीं पहचान पाता। उसे किसी की मदद की जरूरत पड़ती है।
स्टेज 5: डिमेंशिया की पांचवीं स्टेज बहुत खतरनाक होती है। मरीज की मेमरी बिल्कुल ही कम हो जाती है और उसे चीजें समझ नहीं आतीं। मरीज कोई भी काम बिना किसी की मदद के नहीं कर पाता।

डिमेंशिया के मरीजों की समस्या और समाधान
1. किसी चीज को रखकर भूल जाते हैं, लोगों के नाम से लेकर खाना खाना तक भूल जाते हैं और बाद की स्टेज में तो कपड़े पहनना भी याद नहीं रहता।
समाधान: सबसे पहले जान लें कि वे जान-बूझकर ऐसा नहीं कर रहे। जिस तरह किसी बीमार शख्स की देखभाल की जाती है, वैसे ही उनकी देखभाल की भी जरूरत है। कोशिश करें कि उनकी चीजों मसलन चाबी, वॉलेट, मोबाइल फोन आदि को हमेशा एक ही जगह पर रखें। उन्हें मोबाइल दें और रोजाना मोबाइल पर उनके बात करें ताकि उन्हें कॉल उठाने और फोन पर बात करने की आदत हो। उनके मोबाइल में ट्रैक मी ऐप डाउनलोड कर, उसे अपने फोन से सिंक कर लें। उनके हाथ में जीपीएस वाली घड़ी भी पहना सकते हैं। इससे उनकी लोकेशन की जानकारी आपको रहेगी। उनके गले में एक लॉकेट डालकर उस पर उनका नाम, घर का पता और परिवार के दो लोगों के मोबाइल नंबर लिख दें ताकि अगर वे कहीं भटक जाएं तो कोई आपको खबर कर दे।

2. गुस्सा बहुत आता है। मारपीट और गाली-गलौच पर उतारू हो जाते हैं। एक ही बात को बार-बार दोहराते हैं।
समाधान: उनसे बहस न करें, न ही चीखे-चिल्लाएं। याद रखें कि उन्हें आपकी बात समझ ही नहीं आ रही। आप गुस्सा ज्यादा करेंगे तो वे और भी गुस्सा करेंगे। यहां तक कि खुद को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। हो सके तो उस वक्त वहां से हट जाएं। उनकी हर बात को उस वक्त 'हां' करें। अगर गलत लगती है तो भी 'हां' कर दें। बाद में बेशक वह काम न करें क्योंकि वे भी अक्सर थोड़ी देर बाद भूल जाएंगे कि उन्होंने क्या कहा था। जो डिमांड पूरी करना मुमकिन है, वह पूरी भी कर दें। इससे वे खुश हो जाएंगे।

3. पेट भरा होगा लेकिन दूसरों को खाते देख दोबारा मांग लेते हैं। खाना ज्यादा खाते हैं या खाना बेकार कर देते हैं। खाने की चीजें और दूसरे सामान उठाकर अपने पास रख लेते हैं।
समाधान: उन्हें एक बार में कम खाना दें ताकि दोबारा मांगने पर आप फिर से दे सकें। अगर थोड़ा-बहुत खाना बेकार हो जाता है तो भी इसे सामान्य मानते हुए परेशान न हों। उनकी पसंद की चीजें बनाएं। गौर करें कि वे कौन-सी चीज कब और कितना खाना पसंद करते हैं। इससे आपको उनकी खुराक का अनुमान हो जाएगा। अगर ज्यादा सामान अपने पास उठाकर रखा है तो उसमें से कुछ सामान चुपचाप उठा लें लेकिन सारा सामान न उठाएं, न ही उनके सामने उठाएं।

4. घर में तोड़-फोड़ या खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं।
घर में उन्हें कभी भी अकेला न छोड़े। फर्नीचर भी कम कर दें ताकि टकराकर उन्हें चोट न लगे। सीढ़ियों और बाथरूम में मजबूत हैंडरेल लगवाएं। घर में शीशे कम लगवाएं क्योंकि इससे अल्टशाइमर्स के मरीज को कन्फ्यूजन होता है और कई बार डर भी जाते हैं। कई मरीज रात भर रोते-चिल्लाते हैं या हाथापाई पर उतार आते हैं। इस हाइपर बर्ताव का इलाज है। न्यूरॉलजिस्ट को दिखाएं। दो-तीन महीने दवा खाने से यह समस्या हल हो जाती है।

5. कपड़ों में शू-शू पॉटी करने लगते हैं।
यह बहुत बात की स्टेज है। ऐसे में उन्हें डायपर लगाकर रखें और दिन में 3-4 बार डायपर बदलें। अगर पॉटी कर दी है तो उसे फौरन साफ कर दें। इससे वे उसे फैलाएंगे नहीं।

जांच
- डॉक्टर कई तरह की जांच कराते हैं। इनमें विटामिन बी12, अमोनिया, थायरॉइड जांच आदि शामिल हैं। हर टेस्ट: 600 से 1000 रुपये
- सिर का CT स्कैन, कीमत: 2000 रुपये लगभग, सिर का MRI: 5000 रुपये लगभग
- मिनी-मेंटल स्टेट एग्जामिनेशनः दिमाग की स्थिति जांचने के लिए यह टेस्ट किया जाता है। कुल 30 सवाल होते हैं, जिनमें से 24 से कम का सही जवाब देने पर मरीज को डिमेंशिया से पीड़ित माना जाता है। इस टेस्ट को सायकॉलिस्ट करते हैं और 1-2 घंटे लगते हैं।

इलाज
- डिमेंशिया के इलाज के लिए न्यूरॉलजिस्ट से मिलें। अगर डिमेंशिया की वजह विटामिन की कमी या दवाओं का साइड इफेक्ट है तो वह इलाज के साथ बेहतर हो सकता है। लेकिन प्रोग्रेसिव यानी वक्त के साथ बढ़नेवाले डिमेंशिया में सुधार की गुंजाइश काफी कम होती है।
- मोटेतौर पर ब्रेन में एसिटाइल कोलिन (मेमरी का बेसिक ट्रांसमीटर) को बढ़ानेवाली दवाएं दी जाती हैं लेकिन इनका असर थोड़ा-बहुत ही होता है।

डिमेंशिया पर मूवी
Still Alice (2014): इस फिल्म में एक महिला प्रफेसर की डिमेंशिया के खिलाफ लड़ाई को बहुत मार्मिक तरीके से पेश किया गया है। इस बीमारी की चुनौतियों को समझने में यह मूवी काफी मददगार साबित हो सकती है। प्रफेसर का किरदार निभाने वाली जूलियन मूर ने इस रोल के लिए एक्टिंग की दुनिया के दो सबसे बड़े अवॉर्ड अकेडमी और गोल्डन ग्लोब जीते।
कहां देखें: डीवीडी उपलब्ध

पार्किंसंस
यह सेंट्रल नर्वस सिस्टम की बीमारी है, जिसमें मरीज के शरीर के अंगों में बेकाबू कंपन होता है। यह हाथों से शुरू होकर पूरे शरीर में फैल जाता है। इसकी वजह दिमाग का शरीर की गतिविधियों का सही कंट्रोल न होना है। यह समस्या अक्सर हाथ में एक हल्के झटके से शुरू होती है और शरीर के एक हिस्से पर इसका असर ज्यादा होता है। धीरे-धीरे बढ़ते हुए यह पूरे शरीर में फैल जाती है। फिर मरीज अपने अंगों पर से कंट्रोल खोने लगता है। इसमें मोटेतौर पर तीन चीजें सामने आती हैं: 1. हर काम में धीमापन, 2. हाथों में कंपन, 3. शरीर के हिस्सों का सख्त हो जाना।

लक्षण
- हाथ या पैर में कंपन या झटका
- वॉक करते हुए हाथों का नहीं हिल पाना
- मूवमेंट धीरे होना मसलन धीरे चलना या कुर्सी से उठने में वक्त लगना
- हाथ-पैर और बाकी हिस्से काफी कड़क हो जाते हैं
- ऑटोमैटिक मूवमेंट जैसे कि पलक झपकना, स्माइल करना, हाथ हिलाना आदि में दिक्कत होना
- धीरे-धीरे, अटककर और धीमे-धीमे बोलना
- लिखने में दिक्कत होना
- निगलने में दिक्कत होना
- ब्लड प्रेशर में अच्छा उतार-चढ़ाव होना
- किसी चीज की महक नहीं आना

वजह
- बढ़ती उम्र, 60 साल या ज्यादा के लोगों में आशंका बढ़ जाती है
- खतरनाक केमिकल्स और पेस्टिसाइड्स के संपर्क में रहना
- ड्रग्स लेना
- सिर में चोट लगना
- बॉक्सरों को खतरा ज्यादा
नोटः इस बीमारी की असली वजह क्या है, इस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन ये कुछ फैक्टर हैं, जो इसे बढ़ाते हैं।

जांच
- इसके लिए क्लीनिकल जांच होती है यानी डॉक्टर लक्षण देखकर बताते हैं कि पार्किंसंस है या नहीं।
- इसके अलावा TRODAT SPECT या F-Dopa PET टेस्ट से भी चेक कर सकते हैं। एम्स में एक टेस्ट की कीमत करीब 2000 रुपये है।

इलाज
- इस बीमारी का इलाज पूरी तरह मुमकिन नहीं है। हां, दवाओं से बीमारी की रफ्तार काफी धीमी की जा सकती है। दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर डोपामाइन को बढ़ाने के लिए लिवोडोपा (Levodopa) दवा दी जाती हैं। यह जेनरिक नाम है, जो मार्केट में अलग-अलग ब्रैंड नेम से मिलती है। इस दवा को लेने वाले मरीजों को प्रोटीन (दूध, दही, पनीर, अंडा, दाल आदि) दवा खाने से डेढ़-दो घंटे पहले या बाद में खाना चाहिए। साथ में बिल्कुल न खाएं, वरना दवा का असर कम हो जाएगा।
- साथ में अगर डिप्रेशन है या दूसरे इमोशनल मसले हैं, तो उनका इलाज किया जाता है। इसी तरह अगर यूरीन कंट्रोल नहीं होता, महक नहीं आती, कब्ज होती है या नींद की समस्या है तो उनके लिए अलग से दवा दी जाती है।
- डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) सर्जरी काफी फायदेमंद है। यह एक न्यूरो सर्जिकल प्रक्रिया है, जिसमें डॉक्टर दिमाग के अंदर न्यूरोस्टिमुलेटर (ब्रेन पेसमेकर) लगाते हैं, जो ट्रांसप्लांट की गई बैटरी के जरिए दिमाग के खास हिस्सों में इलेक्ट्रिक तरंगे पहुंचाते हैं। एक नॉन-चार्जेबल बैटरी 4-5 साल चलती है और इसकी कीमत 5-6 लाख रुपये होती है, जबकि चार्जेबल बैटरी 10-12 साल चल जाती है लेकिन उसकी कीमत 9.5-11 लाख रुपये होती है। प्राइवेट अस्पतालों में सर्जरी का खर्च अलग आता है।

ध्यान रखें
- इस बीमारी के मरीजों के लिए दवा गाड़ी में पेट्रोल की तरह है यानी पेट्रोल डालेंगे तो गाड़ी चलेगी। इसी तरह, दवा खाएंगे तो चल पाएंगे, वरना चलना-फिरना भी मुमकिन नहीं होगा।
- फल और सब्जियों को गुनगुने पानी में अच्छी तरह धोकर खाएं। हमारे देश में पार्किंसंस की औसत उम्र 49.2 साल है, जोकि विदेशों में करीब 60 साल है। आशंका है कि इसकी वजह हमारे खाने में ज्यादा पेस्टिसाइड्स का इस्तेमाल भी सकती है।
- इस बीमारी में फिजियोथेरपी और एक्सरसाइज का बहुत बड़ा रोल है। मरीज इस बीमारी में अक्सर गिर जाता है और उसे चलने में दिक्कत होती है, इसलिए उसे बैलेंस बनाने, चलने का तरीका सिखाने के साथ-साथ लचक और मजबूती बढ़ाने वाली एक्सरसाइज करनी होती है।
नोट: यहां दी गई दवाएं सिर्फ जानकारी बढ़ाने के लिए दी गई हैं। कोई भी दवा डॉक्टर से पूछे बिना इस्तेमाल न करें।

पार्किंसंस पर मूवी
AWAKENINGS (1990)
फिल्म में पार्किंसंस के शुरुआती इलाज के दौरान मरीज को कैसा लगता है, यह दिखाया गया है। यह सच्ची कहानी एक ऐसे डॉक्टर की है, जो पार्किंसंस के पैशंट्स के साथ काम करना शुरू करता है। पार्किंसंस के मरीजों के हालात और उनकी देखभाल पर काफी रोशनी डालती है यह मूवी।
कहां देखें: यू-ट्यूब पर उपलब्ध

डिप्रेशन और अकेलापन
अक्सर बच्चे अपनी लाइफ में बिजी हो जाते हैं तो पैरंट्स को अकेलापन कचोटने लगता है। यह अकेलापन धीरे-धीरे डिप्रेशन का रूप ले लेता है और बुजुर्गों को लगने लगता है कि वे बेकार हैं और उनकी किसी को जरूरत नहीं है। डिप्रेशन से निपटने के लिए कुछ तरीके कारगर हो सकते हैं:
पैरंट्स के लिए इतना तो बनता है...
- रोजाना पैरंट्स के साथ कुछ देर बैठें। उनका हाल-चाल पूछें। इसके लिए कोई टाइम तय कर लें और रुटीन बना लें तो अच्छा है।
- वीकएंड पर उन्हें अकेला छोड़कर घूमने न जाएं। अगर वे साथ जाना चाहें तो उन्हें भी अपने साथ जरूर ले जाएं। नहीं जाना चाहें तो कभी-कभार अपना प्रोग्राम कैंसल करके उनके साथ छुट्टी बिताएं।
- उनकी पसंद की जगहों पर घुमाएं। उनके दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलवाने ले जाएं और उन्हें भी अपने घर बुलाएं।
- घर के छोटे-मोटे फैसलों में उनकी सलाह लें। अगर उनकी कोई बात पसंद नहीं आए तो भी फौरन काटे नहीं। उनकी बात को आराम से सुने और अपनी बात भी प्यार से उनके सामने रखें।
- बच्चों से दादा-दादी के साथ खेलने के लिए कहें। अपने बचपन की बातें वे बहुत खुश होकर शेयर करते हैं। बच्चों को भी ऐसी बातें सुनने में मजा आता है।
- बच्चे दादा-दादी के साथ सुडोकू, लूडो, बिजनेस बडी जैसे गेम भी खेल सकते हैं।
- अगर दूसरे शहर में रहते हैं तो भी रोजाना कम-से-कम एक बार फोन पर उनसे बात जरूर करें।

डिप्रेशन और अकेलेपन पर मूवी
Nebraska (2013)
कैसे बुढ़ापे का अकेलापन इंसान को जीने का एक जरिए खोजने पर मजबूर करता है, चाहे फिर वह लॉटरी खरीद कर इनाम जीतने की ललक ही क्यों न हो? इस मूवी की खासियत है बुढ़ापे के अकेलेपन को मजाकिया अंदाज में पेश करना। फिल्म बुजुर्गों के लिए दया भाव जताने पर नहीं, बल्कि उन्हें समझने पर जोर देती नजर आती है।
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..ताकि न हो ऐसी बीमारियां
अगर पैरंट्स को कोई दिमागी दिक्कत नहीं है तो वे खुद को बिजी रखकर अकेलेपन को दूर कर सकते हैं। साथ ही, याददाश्त बढ़ाने के लिए कुछ एक्सरसाइज करें। वैसे भी मेमरी के बारे में कहा जाता है, Use it or loose it यानी अगर दिमाग का इस्तेमाल नहीं करेंगे तो उसे खो देंगे। इसके लिए आप अपने पैरंट्स को ये कुछ तरीके आजमाने की सलाह दे सकते हैं। आप खुद भी कम उम्र से ही इनमें से ज्यादातर चीजें कर सकें तो आगे जाकर भी सेहतमंद ही रहेंगे:
1. रोजाना 30-40 मिनट ब्रिस्क वॉक करें। साथ में योग और ध्यान भी करें। रेगुलर एक्सरसाइज और योग करने से किसी भी बीमारी की आशंका काफी कम हो जाती है। सूर्य प्राणायाम, कपालभाति और मेडिटेशन करें। मगर ताड़ासन, कटिचक्रासन, उत्तानपादासन, भुजंगासन, धनुआसन, मंडूकासन जैसे योग किसी योग्य एक्सपर्ट की देखरेख में करें। सूर्य नमस्कार डिप्रेशन से निपटने में काफी मददगार है। सूर्य नमस्कार करने का तरीका जानने के लिए देखें : nbt.in/suryanam
2. रिटायरमेंट के बाद भी अपना रुटीन सेट करें। रोजाना एक ही वक्त पर उठें। अपने लिए काम तलाशें। खुद को बिजी रखें। किसी सोशल कॉज यानी कामकाज से खुद को जोड़ लें, मसलन मेड के बच्चे को पढ़ाएं। अगर कुकिंग अच्छी है तो वह भी किसी को सिखा सकती हैं।
3. लोगों के साथ मेल-जोल बढ़ाएं। परिवारजनों और दोस्तों से मिलें। अगर रिश्तेदार या दोस्त पास में नहीं हैं तो कोई क्लब, कम्युनिटी या ऑर्गनाइजेशन जॉइन कर लें। वहां अपनी पसंद के लोगों के साथ टाइम बिताएं। पार्क जाएं और वहां अपने हमउम्र लोगों के साथ दोस्ती करें। उनके साथ ताश या शतरंज खेलें।
4. ऑनलाइन सोशल नेटवर्किंग भी टाइम पास करने का एक तरीका है। हालांकि यह किसी से सामने से मिलने-जुलने के बराबर अच्छा नहीं है। यहां आपको किसी पर भी भरोसा करने से पहले थोड़ा सोचना होगा। साथ ही, इसे हमेशा चेक करने के बजाय इसके लिए एक वक्त तय करें।
5. अगर कोई शौक था, जिसे जवानी के दिनों में पूरा नहीं कर पाए तो अब कर सकते हैं। मसलन गिटार या सितार बजाना, स्वीमिंग सीखना आदि। हमेशा कुछ-न-कुछ नया करें। कुछ ऐसा, जो आपने पहले न किया हो। हफ्ते में एक नया काम या चीज जरूर करें या सीखें।
6. अखबार और मैगजीन पढ़ें। अखबार के उन हिस्सों को पढ़ें, जिन्हें आमतौर पर छोड़ देते हैं। अपने आसपास के लोगों से खबरों के बारे में चर्चा करें।
7. अपनी पसंद का म्यूजिक सुनें। याद रखें, यह उदासी वाला न हो। बेहतर है कि एफएम सुनें। घर में टीवी पर कभी-कभार बाहर जाकर भी अपनी पसंद की फिल्में देखें।
8. ऑर्गनाइज्ड बनें। आमतौर पर चीजें फैली हों तो हम उन्हें जल्दी भूल जाते हैं। चीजों जैसे कि मोबाइल, चाबी, डायरी, पर्स आदि के लिए एक जगह तय करें और उन्हें वहीं पर रखें। अपने काम, अपॉइंटमेंट, इवेंट्स आदि को डायरी, प्लैनर या कैलेंडर में लिखकर रखें।
9. मल्टि-टास्किंग न करें। एक बार में एक ही काम करें। आप जो जानकारी हासिल करना चाहते हैं, अगर उसी पर फोकस करेंगे तो वह आपको जरूर याद रहेगी।
10. विजुअलाइजेशन भी दिमाग की कसरत का अच्छा तरीका है। आप जब भी जाम में फंसे हों, अपॉइंटमेंट के लिए इंतजार कर रहे हों या सोने की तैयारी कर रहे हों तो अपने बचपन से कोई घटना या जगह को सोचें। अपना कमरा, क्लास, कार... कुछ भी। इससे दिमाग ऐक्टिव होता है और तनाव से मुक्ति मिलती है।
11. रोजाना 7-8 घंटे सोने से मेमरी अच्छी रहती है।
12. डिप्रेशन, किडनी, थाइरॉयड, विटामिन बी-12 की कमी जैसी बीमारियों को हल्के में न लें। ये मेमरी पर खराब असर डालती हैं। इनका ढंग से इलाज कराएं।
13. घर की दीवारों को मजेदार और हटकर कलर करें या वॉलपेपर लगाएं। घर का डेकोर भी कलरफुल और दिलचस्प रखें। घर में खुशबूदार फूल सजाएं।
14. घर में कोई पेट रखें। डॉग अच्छा साथी हो सकता है।
15. पजल सॉल्व करें, जैसे कि सुडोकू, मैथ्स पजल या रीजनिंग पजल आदि। इनसे मेमरी अच्छी होती है।

डाइट पर दें ध्यान
- पोषण से भरपूर खाना खाएं, जिसमें कार्बोहाइड्रेट के साथ-साथ प्रोटीन और मिनरल भी भरपूर हों, जैसे कि ओट्स, गेहूं आदि अनाज, अंडे, दूध-दही, पनीर, हरी सब्जियां (बीन्स, पालक, मटर, मेथी आदि) और मौसमी फल।
- एंटी-ऑक्सिडेंट और विटामिन-सी वाली चीजें खाएं, जैसे कि ब्रोकली, सीताफल, पालक, अखरोट, किशमिश, शकरकंद, जामुन, ब्लूबेरी, कीवी, संतरा आदि।
- ओमेगा-थ्री को खाने में शामिल करें। इसके लिए फ्लैक्ससीड्स (अलसी के बीज), नट्स, सोयाबीन आदि खाएं।
- देखने में बदरंग खाने के बजाय रंगीन खाने पर फोकस करें जैसे कि गाजर, टमाटर, ब्लूबेरी, ऑरेंज आदि।
- दूध और दूध से बनी चीजें या अंडा खाएं। इनमें विटामिन बी12 अच्छी मात्रा में होता है। मछली भी बहुत फायदेमंद है।
- पानी खूब पिएं। नारियल पानी, छाछ आदि भी खूब पिएं।

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