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"बहू हर गुरुवार पुराने डिब्बे में दो रोटियाँ रखकर घर से निकल जाती थी... ससुर ने एक दिन पीछा किया तो जो देखा, उससे उनकी आ...
02/08/2026

"बहू हर गुरुवार पुराने डिब्बे में दो रोटियाँ रखकर घर से निकल जाती थी... ससुर ने एक दिन पीछा किया तो जो देखा, उससे उनकी आँखें भर आईं..."

सुबह के सात बजे थे। कानपुर की एक शांत कॉलोनी में रहने वाले रिटायर्ड बैंक मैनेजर हरिशंकर जी रोज़ की तरह बरामदे में अख़बार पढ़ रहे थे।

उनकी छोटी बहू, नंदिनी, रसोई में सबके लिए नाश्ता बना रही थी।

लेकिन पिछले चार महीनों से हर गुरुवार एक बात हरिशंकर जी को परेशान कर रही थी।

नंदिनी दो गरम रोटियाँ, थोड़ा सा गुड़, आलू की सूखी सब्ज़ी और एक स्टील का पुराना डिब्बा लेकर बिना किसी को बताए घर से निकल जाती।

करीब आधे घंटे बाद लौट आती।

जब भी पूछा जाता, वह मुस्कुराकर सिर्फ़ इतना कहती—

"बाबूजी, किसी का उधार चुका रही हूँ।"

हरिशंकर जी को यह बात समझ नहीं आती।

उन्होंने कभी किसी से उधार लिया ही नहीं था।

फिर यह किसका उधार?

एक गुरुवार उन्होंने चुपचाप उसका पीछा करने का निश्चय किया।

नंदिनी घर से निकली।

वह बाज़ार नहीं गई...

मंदिर नहीं गई...

बल्कि शहर के पुराने रेलवे यार्ड के पीछे बनी एक जर्जर झोपड़ी के सामने जाकर रुक गई।

अंदर लगभग अस्सी वर्ष का एक बूढ़ा व्यक्ति चारपाई पर लेटा था।

नंदिनी ने उसके पैर छुए।

डिब्बा खोला।

रोटियाँ छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर अपने हाथों से उसे खिलाने लगी।

बूढ़े की आँखों से आँसू बह निकले।

वह बार-बार कह रहा था—

"बेटी... भगवान तुझे कभी खाली हाथ न रखे।"

यह देखकर हरिशंकर जी हैरान रह गए।

घर लौटते ही उन्होंने नंदिनी से पूछा—

"तुम उस आदमी को जानती हो?"

नंदिनी कुछ देर चुप रही।

फिर अलमारी से एक पुराना, पीला पड़ चुका बटुआ निकालकर उनके हाथ में रख दिया।

बटुए के अंदर एक धुंधली तस्वीर थी।

तस्वीर में एक युवा हरिशंकर जी खड़े थे...

और उनके साथ वही बूढ़ा आदमी।

हरिशंकर जी के हाथ काँपने लगे।

"ये... रामदास?"

उनकी आवाज़ भर्रा गई।

करीब चालीस साल पहले जब हरिशंकर जी कॉलेज में पढ़ते थे, तब गाँव से शहर आने पर उनके पास रहने और खाने का कोई ठिकाना नहीं था।

उसी रामदास ने उन्हें अपने छोटे से कमरे में जगह दी थी।

अपनी आधी रोटी बाँटकर खिलाई थी।

पहली नौकरी मिलने तक हर महीने उनकी मदद की थी।

नौकरी लगने के बाद भागदौड़ में संपर्क टूट गया।

समय बीतता गया...

रामदास कहीं खो गया।

हरिशंकर जी ने भी उसे ढूँढने की कभी कोशिश नहीं की।

नंदिनी बोली—

"बाबूजी, शादी के कुछ दिन बाद मैं आपकी पुरानी अलमारी साफ़ कर रही थी। तभी यह बटुआ मिला। पीछे आपकी लिखावट थी—"

'जिस दिन मैं इस इंसान का कर्ज़ चुका दूँगा, उस दिन खुद को सफल मानूँगा।'

"मैंने उसी दिन ठान लिया कि इन्हें ढूँढूँगी।"

"तीन महीने तक खोजती रही।"

"आख़िर एक चाय वाले ने बताया कि रेलवे लाइन के पास एक बूढ़ा रहता है, जिसे सब रामदास कहते हैं।"

"जब मैं पहुँची तो ये कई दिनों से ठीक से खाना भी नहीं खा पाए थे।"

"मैंने सोचा... आपका अधूरा वादा शायद आपकी बहू पूरा कर सके।"

हरिशंकर जी की आँखों से आँसू बह निकले।

अगले ही दिन वे खुद रामदास के पास पहुँचे।

उन्हें देखते ही रामदास मुस्कुराए।

"बड़े आदमी बन गए हो हरि..."

हरिशंकर जी फूट-फूटकर रो पड़े।

"बड़ा तो बन गया रामदास...

लेकिन इंसान छोटा हो गया था।"

उन्होंने रामदास के पैर पकड़ लिए।

कुछ ही दिनों में रामदास को अपने घर ले आए।

अब वह मेहमान नहीं, परिवार के सबसे बड़े सदस्य थे।

रात के खाने पर हरिशंकर जी ने सबके सामने कहा—

"मैंने ज़िंदगी भर कमाई की...

लेकिन मेरी बहू ने मुझे मेरा चरित्र वापस दिला दिया।"

नंदिनी मुस्कुरा दी।

उसने सिर्फ़ इतना कहा—

"रिश्ते खून से नहीं, निभाने से बनते हैं।"

उस दिन के बाद उस घर में एक नई परंपरा शुरू हुई।

हर महीने परिवार उस एक इंसान को ढूँढता, जिसे किसी सहारे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो।

क्योंकि उन्हें समझ आ गया था—

ईश्वर मंदिरों में कम, किसी भूखे की दुआ में ज़्यादा मिलते हैं।

Vandna Tripathi ✍️

धुआं था। आग थी। और एक मां थी जो तीसरी मंजिल से कूद गई।अपने बच्चे को सीने से लगाकर।नीचे गद्दे थे।एक गद्दे वाले ने बिछाए थ...
04/06/2026

धुआं था। आग थी। और एक मां थी
जो तीसरी मंजिल से कूद गई।
अपने बच्चे को सीने से लगाकर।

नीचे गद्दे थे।
एक गद्दे वाले ने बिछाए थे।
बिना सोचे। बिना रुके। बिना किसी से पूछे।

बुधवार की सुबह।
दिल्ली के मालवीय नगर में।
Flourish Stay B&B होटल में आग लगी।

इक्कीस लोग नहीं बचे।
अट्ठावन बचे, क्योंकि कुछ लोग दौड़े।

बिना हेलमेट के।
बिना यूनीफॉर्म के।
बिना किसी ऑर्डर के।

मोहम्मद अफजल और उसके दस भाई-भतीजे।
पिता का फोन आया 'वहां आग लगी है।'
बस इतना काफी था।

वो पहुंचे। गेट तोड़ा। अंदर घुसे।
धुएं में। अंधेरे में।
एक बच्चे को उन्होंने ऊपरी मंजिल से कूदते हुए थाम लिया।

अफजल के कपड़े काले हो गए थे।
उसने कहा-
'हम बस जानें बचाना चाहते थे।
एक पल भी नहीं रुके।'

रियाज़ुद्दीन मंसूरी और उनका बेटा अरमान।
पास में गद्दे की दुकान है उनकी।

उन्होंने खिड़कियों से लोगों को कूदते देखा।
सोचा नहीं।
हिसाब नहीं लगाया।
दुकान खाली कर दी।

सड़क पर गद्दे बिछा दिए।

एक औरत थी-बच्चा गोद में था।
तीसरी मंजिल से कूदी।
गद्दे पर गिरी।
बच गई।
बच्चा बच गया।

रियाजुद्दीन ने बाद में कहा-
'नुकसान का खयाल ही नहीं आया।
बस यही दिखा कि लोगों को नीचे आना है।'

दस पुलिसवाले भी थे।
करतार, हरग्यान, प्रेमचंद, जितेंद्र, दिनेश।
रविरंजन, संदीप, विक्रम, दीपक, रामपाल।

धुएं में घुसे।
एम्स में भर्ती हुए।
लेकिन जब तक ऑपरेशन पूरा नहीं हुआ
वहां से नहीं हटे।

हमारे न्यूजरूम में एक कहावत है —
'खबर में हीरो ढूंढो तो मिलता है।
भीड़ में नहीं-उस एक चेहरे में
जो सबसे आगे था।'

मनोविज्ञान कहता है -
खतरे में इंसान के दो रास्ते होते हैं।
फाइट या फ्लाइट।
लड़ो या भागो

लेकिन कुछ लोग होते हैं
जिनमें एक तीसरा रास्ता होता है
केयर।

वो रुकते नहीं।
वो भागते नहीं।
वो दौड़ते हैं-उस तरफ
जहां से बाकी सब भाग रहे हैं।

वे गद्दे बिछाते हैं
अपनी दुकान से उठाकर
बिना कुछ सोचे

इस दुनिया में तकलीफ बहुत है।
नफरतें बहुते है। सियासत है।
यह सच है।

लेकिन यह भी सच है
कि जब एक मां तीसरी मंजिल से कूदती है
तो नीचे कोई न कोई गद्दा बिछाने वाला नेक इंसान होता है।

हमेशा।

यही इंसानियत है।
यही बचाती है हमें।
हर बार।
🙏

Site Update – 1137 Urban EstateMalbiu Town✨ Major Construction Progress Achieved! ✨We are excited to share the latest pr...
26/05/2026

Site Update – 1137 Urban Estate
Malbiu Town
✨ Major Construction Progress Achieved! ✨
We are excited to share the latest progress update from Site No. 1137, Urban Estate. The project is advancing rapidly, with several important milestones successfully completed.
🔨 Work Completed So Far:
✅ Italian Marble Work Completed on All Floors
✅ Complete Electrical Work Finished ⚡
✅ Air Conditioner Pipework Completed ❄️
✅ POP False Ceiling Work 90% Completed ✨
✅ Tile Work to Begin Soon 🧱
✅ Wooden Work to Start Soon 🪵
✅ Interior Work in Progress 🏠✨
Each stage reflects quality craftsmanship, dedicated ex*****on, and attention to detail. The project is now entering its exciting finishing phase and steadily moving toward completion.
⏳ Stay tuned for more updates as the transformation continues!

International Nurses Day 🙏🙏आज हम भारत की सभी नर्सों को दिल से नमन करते हैं,जो अपनी सेवा, ममता और समर्पण सेहर मरीज को नया...
12/05/2026

International Nurses Day 🙏🙏
आज हम भारत की सभी नर्सों को दिल से नमन करते हैं,
जो अपनी सेवा, ममता और समर्पण से
हर मरीज को नया जीवन देने का कार्य करती हैं। ❤️
एक नर्स केवल दवाई नहीं देती,
बल्कि एक माँ की तरह मरीज का दर्द समझती है,
उसे संभालती है, हिम्मत देती है और
हर पल उसकी देखभाल करती है।
जिस तरह एक माँ अपने बच्चे की रातों की नींद छोड़कर सेवा करती है,
उसी तरह नर्सें भी अनगिनत मरीजों के लिए
दिन-रात बिना थके खड़ी रहती हैं। 🙏
युद्ध हो, महामारी हो या कोई बड़ी आपदा —
हमारी नर्सें अपने परिवार से दूर रहकर भी
देश और मानवता की सेवा में हमेशा सबसे आगे रहती हैं।
घायल सैनिकों की सेवा हो या ICU में किसी की जिंदगी बचाना,
हर परिस्थिति में उनका साहस, त्याग और बलिदान
पूरे देश को गर्व महसूस कराता है।
मैं तो यह मानता हूँ कि
डॉक्टर इस दुनिया में भगवान का दूसरा रूप होते हैं,
लेकिन नर्सें भी किसी माँ, बहन और बेटी से कम नहीं होतीं।
उनके हाथों में सेवा होती है,
आँखों में करुणा होती है
और दिल में हर मरीज के लिए सच्ची ममता होती है। ❤️
“भगवान हर जगह नहीं हो सकते,
इसलिए उन्होंने माँ और नर्स को बनाया…”
आज International Nurses Day पर
उन सभी नर्सों को हमारा शत-शत नमन,
जो अपने प्यार, धैर्य, त्याग और सेवा से
दुनिया को बेहतर बना रही हैं। 🙏❤️
🇮🇳

“आवाज़ की कीमत” 🙏🙏वह एक डिलीवरी बॉय था। ज़्यादातर शाम की शिफ्ट में काम करता था।उस रात करीब 9 बजे उसने अपना आख़िरी ऑर्डर ...
06/05/2026

“आवाज़ की कीमत” 🙏🙏

वह एक डिलीवरी बॉय था। ज़्यादातर शाम की शिफ्ट में काम करता था।
उस रात करीब 9 बजे उसने अपना आख़िरी ऑर्डर उठाया। पैकेट छोटा था—सादी खिचड़ी, दही और दो केले।
पता शहर के पुराने हिस्से का था। जर्जर-सी बिल्डिंग, तीसरी मंज़िल।
उसने डोरबेल बजाई।
दरवाज़ा एक बुज़ुर्ग अम्मा ने खोला। सफेद बाल, काँपते हाथ, आँखों पर मोटा चश्मा।
आवाज़ में थकान थी, मगर मिठास भी—
“बेटा, ज़रा अंदर रख दो… हाथ काँपते हैं।”
वह खाना रखकर लौटने ही वाला था कि अम्मा ने धीरे से कहा—
“दो मिनट बैठोगे बेटा? अकेले खाना अच्छा नहीं लगता।”
वह ठिठक गया। शिफ्ट ख़त्म हो चुकी थी, थकान भी थी… लेकिन न जाने क्यों, वह बैठ गया।
कमरे में सन्नाटा था। घड़ी की टिक-टिक, दीवार पर टंगी पुरानी तस्वीरें, और एक कोने में भगवान की छोटी-सी तस्वीर।
अम्मा धीरे-धीरे खिचड़ी खाने लगीं। हर दो कौर के बाद उसकी तरफ देख मुस्कुरा देतीं।
“आज खाना इसलिए मँगाया… कि किसी इंसान की आवाज़ सुन सकूँ,” उन्होंने कहा।
फिर तस्वीरों की ओर इशारा किया—
“ये मेरे पति… पाँच साल पहले चले गए।”
“ये मेरा बेटा… कनाडा में है, बहुत अच्छा है, हर महीने पैसे भेजता है… बस समय नहीं भेज पाता।”
“और ये बेटी… अपनी दुनिया में खुश है।”
आवाज़ में शिकायत नहीं थी—बस एक खालीपन था।
फिर उन्होंने पूछा—
“तुम्हारी माँ है?”
“हाँ,” उसने धीरे से कहा।
“फोन करते हो रोज़?”
वह चुप हो गया।

सच ये था कि वह भी कई-कई दिन घर फोन नहीं करता था।
थकान, काम, भागदौड़…
हर बार यही सोचकर टाल देता था कि कल कर लेगा।

उन्होंने उसकी चुप्पी पढ़ ली।

अम्मा मुस्कुराईं—
“माँ-बाप पैसे नहीं गिनते बेटा… आवाज़ गिनते हैं।”
उसके भीतर कुछ गहराई से हिल गया।
खाना खत्म होने पर अम्मा ने 500 रुपये उसकी ओर बढ़ाए—
“ये उस आधे घंटे की कीमत है… जिसमें तुमने मुझे अकेले नहीं खाने दिया।”
वह मना करता रहा, लेकिन अम्मा ने प्यार से कहा—
“आज तुमने खाना नहीं, साथ पहुँचाया है।”
जाते-जाते उन्होंने कहा—
“आज घर जाकर माँ को फोन ज़रूर करना।”
उस रात उसने बिल्डिंग के नीचे बाइक स्टार्ट नहीं की।
पहले माँ को फोन लगाया।
उधर से आवाज़ आई
“आज अचानक? सब ठीक है ना बेटा?”
बस इतना सुनते ही गला भर आया।
उसने कहा “हाँ माँ…
बस आपकी आवाज़ सुननी थी।”
उधर कुछ सेकंड ख़ामोशी रही।
फिर माँ बोली
“खाना खाया?”
और वह सड़क किनारे खड़ा रो पड़ा।
और उस दिन के बाद यह उसकी आदत बन गई।
हर डिलीवरी अब उसके लिए सिर्फ़ ऑर्डर नहीं रही।

किसी घर में दवा जाती है।
किसी घर में अकेलापन।
किसी घर में इंतज़ार।
किसी घर में बस एक आवाज़ की ज़रूरत होती है।

वह अब दरवाज़ा खुलने पर जल्दी नहीं करता।
चेहरा देखता है।
आवाज़ सुनता है
कभी पूछ लेता है
“और सब ठीक?”

ज़्यादातर लोग बस “हाँ” कहते हैं।
कुछ लोग मुस्कुरा देते हैं।
और कुछ के चेहरे बता देते हैं कि उन्होंने पूरे दिन किसी से बात नहीं की।

करीब दो महीने बाद….......

एक दिन उसकी ड्यूटी उसी पुराने इलाके में लगी।
अचानक उसे अम्मा की याद आई। उस दिन कोई ऑर्डर नहीं था, फिर भी उसने सोचा—चलकर अम्मा का हाल-चाल ही पूछ लिया जाए।
वह उसी बिल्डिंग पहुँचा। तीसरी मंज़िल पर गया।
डोरबेल बजाई।
दरवाज़ा पड़ोस वाली आंटी ने खोला।
उन्होंने उसे पहचान लिया—
“ अरे, तुम वही डिलीवरी वाले भैया हो ना… जो उस दिन अम्मा के साथ बैठे थे?”
उसने सिर हिला दिया।
आंटी की आँखें हल्की-सी भर आईं—
“ बेटा, अम्मा तो पिछले हफ्ते भगवान को प्यारी हो गईं… और घर के रिश्तेदार लोग आये थे समय नहीं होने से वे सब चले गये”
मन द्रवित हो गया । वह चुप खड़ा रह गया।
आंटी अंदर गईं और एक छोटा-सा लिफाफा लेकर आईं—
“ये तुम्हारे लिए छोड़ गई थीं। कई दिन से कह रही थीं—अगर वो डिलीवरी वाला लड़का कभी आए, तो ये उसे दे देना।”
उसने काँपते हाथों से लिफाफा खोला।
अंदर 500 रुपये थे… और एक पर्ची—
“बेटा, अगर ये पढ़ रहे हो, तो मैं जा चुकी हूँ।
धन्यवाद उस रात मेरे साथ बैठने के लिए।
तुमने मुझे खाना नहीं, सम्मान दिया।
और हाँ—माँ को फोन करते रहना।
—अम्मा”
उसकी आँखें नम हो गईं।
आज भी वह 500 रुपये उसने संभालकर रखे हैं।
क्योंकि उस रात उसने समझा था—
हर दरवाज़े के पीछे सिर्फ़ एक ग्राहक नहीं होता।
कभी एक माँ होती है,
कभी एक इंतज़ार…
और कभी एक आख़िरी बातचीत।

हम सब अपनी-अपनी भूख लेकर जी रहे हैं—
किसी को रोटी चाहिए,
किसी को दवा…
और किसी को बस थोड़ा-सा साथ।
इंसान को हमेशा पैसों की नहीं,
कभी-कभी सिर्फ़ *“मौजूदगी”* की डिलीवरी चाहिए।

प्रीपेड मृत्यु 🙏🙏Pune के एक बड़े श्मशान घाट में दोपहर के 3 बजे थे।‘रोहन’ (उम्र 35 वर्ष),जो अमेरिका की एक बड़ी सॉफ्टवेयर ...
04/04/2026

प्रीपेड मृत्यु 🙏🙏
Pune के एक बड़े श्मशान घाट में दोपहर के 3 बजे थे।
‘रोहन’ (उम्र 35 वर्ष),
जो अमेरिका की एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था,
अभी-अभी फ्लाइट से उतरकर सीधे श्मशान घाट पहुँचा था।
उसके पिता,
‘सदाशिवराव’ (उम्र 75 वर्ष),
कल रात गुजर गए थे।
रोहन के हाथ में महंगा लैपटॉप बैग था और आँखों पर रेबैन का चश्मा।
उसे पसीना आ रहा था और वह बार-बार घड़ी देख रहा था।
वहाँ ‘मोक्ष इवेंट मैनेजमेंट’ (अंतिम संस्कार करने वाली एजेंसी) का कर्मचारी
‘सुमित’ खड़ा था।
सुमित ने सारी तैयारी कर रखी थी।
लकड़ियाँ सजा दी थीं,
पंडित बुला लिया था, और सदाशिवराव के पार्थिव शरीर को स्नान कराकर तैयार रखा था।
रोहन आया।
उसने पिता के चेहरे की ओर एक नजर डाली।
आँखों से एक-दो आँसू निकल आए।
उसने सुमित से पूछा:
“मिस्टर सुमित,
सब तैयार है ना?
मुझे 6 बजे की रिटर्न फ्लाइट पकड़नी है।
कल मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है।
प्लीज़ जल्दी कराइए।”
सुमित को आश्चर्य हुआ।
जिस पिता ने इस बेटे को पाल-पोशकर बड़ा किया,
उस पिता की चिता के पास रुकने के लिए इस बेटे के पास तीन घंटे भी नहीं थे।
सुमित ने शांत होकर सिर हिलाया।
विधि पूरी हुई।
रोहन ने मुखाग्नि दी।
धुएँ के गुबार आसमान में उठ गए।
रोहन ने सुमित को अलग ले जाकर चेकबुक निकाली।
“सुमित, धन्यवाद।
आपने अच्छी व्यवस्था की।
आपका बिल कितना हुआ? 50 हजार? 1 लाख?
राशि बताइए,
मैं अभी चेक दे देता हूँ।
मैं दोबारा नहीं आ पाऊँगा,
अस्थि विसर्जन भी आप ही करवा दीजिए।”
सुमित ने रोहन की ओर देखा।
उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।
उसने जेब से एक पुरानी फाइल निकाली और रोहन के हाथ में दी।
“साहब, बिल देने की जरूरत नहीं है।
आपका बिल ‘पेड’ है।”
रोहन चौंक गया।
“पेड?
किसने भरा पैसा?
क्या मेरे चाचा ने?”
सुमित बोला:
“नहीं साहब।
पाँच साल पहले सदाशिवराव जी (आपके पिता) हमारे ऑफिस आए थे।
वे बहुत बीमार थे, ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे।
उन्होंने मुझसे पूछा था —
‘आपका पैकेज क्या है?
मेरे बेटे को तकलीफ न हो, सब इंतज़ाम कर देंगे ना?’
हमने उन्हें पैकेज बताया।
उन्होंने उसी दिन 50,000 रुपये एडवांस जमा कर दिए थे।
और यह ‘चिट्ठी’ मुझे देकर कहा था —
‘मेरा बेटा आए तो उसे यह दे देना।
और अगर वह न आ सके,
तो आप ही मेरा अंतिम संस्कार कर देना।’”
सुमित ने वह चिट्ठी रोहन को दी।
रोहन ने काँपते हाथों से चिट्ठी खोली।
उसमें सदाशिवराव के काँपते अक्षरों में लिखा था:
“प्रिय रोहन,
बेटा,
मुझे पता है तुम बहुत व्यस्त हो।
अमेरिका में तुम्हें साँस लेने की भी फुर्सत नहीं होती।
मुझे मालूम है कि
मेरी मृत्यु की खबर सुनकर तुम्हें चिंता होगी।
‘छुट्टी मिलेगी या नहीं?
टिकट मिलेगा या नहीं?
मीटिंग का क्या होगा?’
ये सवाल तुम्हारे मन में आएँगे।
बेटा, तुम्हारा समय और तुम्हारा करियर बहुत महत्वपूर्ण है।
मैंने तुम्हें इसलिए पाला है कि तुम दुनिया जीत सको।
एक बूढ़े की लाश के लिए तुम अपना नुकसान मत करना।
इसलिए मैंने अपनी मृत्यु की व्यवस्था पहले ही कर दी है।
एजेंसी को पैसे दे दिए हैं।
वे सब कर देंगे।
तुम आ सको तो अच्छा है,
न आ सको तो भी मुझे कोई शिकायत नहीं।
बस एक विनती है —
जब मैं तुम्हें बचपन में स्कूल छोड़ने जाता था,
तो तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ा था।
आज जब तुम मुझे अग्नि दो,
तो तुम्हारा हाथ काँपना नहीं चाहिए।
जल्दी वापस चले जाना।
तुम्हारी पत्नी इंतज़ार कर रही होगी।
तुम्हारा,
पापा।”
चिट्ठी पढ़ते ही रोहन के हाथ से चेकबुक कीचड़ में गिर गई।
उस श्मशान में,
जहाँ लकड़ियों के जलने की आवाज आ रही थी…
वहाँ अब रोहन का अहंकार और करियर का घमंड जलकर राख हो चुका था।
वह घुटनों के बल बैठ गया।
चिल्लाया —
“पापा…!! मुझे माफ कर दीजिए!”
उसने सुमित के पैर पकड़ लिए।
“सुमित,
मुझे अमेरिका नहीं जाना।
मुझे अपने पापा के साथ रहना है!
मैंने करोड़ों रुपये कमाए,
पर मैं तो असली भिखारी निकला!
मेरे पापा ने मरते समय भी मेरी मीटिंग की चिंता की…
और मैं उनके अंतिम दर्शन का भी हिसाब लगा रहा था?”
उस दिन रोहन फ्लाइट नहीं पकड़ सका।
वह वहीं,
जलती चिता के सामने रात भर बैठा रहा।
क्योंकि उसे समझ आ गया था —
‘प्री-पेड’ सिर्फ सिम कार्ड हो सकता है,
पिता का प्रेम नहीं।
पिता का प्रेम ‘अनलिमिटेड’ होता है,
और उसकी कीमत दुनिया की कोई भी करंसी नहीं चुका सकती।
आप दुनिया में कितने भी बड़े बन जाएँ,
कितना भी पैसा कमा लें…
लेकिन जिन माता-पिता ने आपका बचपन सँवारा,
उनके अंतिम सफर में साथ देने से कभी पीछे मत हटिए।
एजेंसी अंतिम संस्कार कर सकती है,
लेकिन आँसू एजेंसी के नहीं होते —
वे अपने खून के रिश्तों के ही होते हैं।

“माँ कैसी हैं अब?” 🙏🙏 नेहा ने घर में कदम रखते ही अपने बड़े भाई आदित्य से पूछा।आदित्य ने गहरी साँस ली, चेहरे पर थकान और म...
14/02/2026

“माँ कैसी हैं अब?” 🙏🙏
नेहा ने घर में कदम रखते ही अपने बड़े भाई आदित्य से पूछा।
आदित्य ने गहरी साँस ली, चेहरे पर थकान और मन में चिंता साफ झलक रही थी —
“पहले जैसी नहीं रहीं, नेहा। कुछ महीने से तो जैसे उनमें कोई जान ही नहीं बची। खामोश रहती हैं, किसी से बात नहीं करतीं। डॉक्टर कह रहे हैं, यह कोई शारीरिक बीमारी नहीं है, शायद ‘माइंड से जुड़ा मामला’ है।”
“माइंड से जुड़ा मतलब?” नेहा चौंक गई।
“मतलब, वो अंदर से टूट गई हैं। मैंने मनोवैज्ञानिक से भी बात की, उन्होंने कहा — इनसे प्यार से बात करो, इन्हें खुश रखो। पर ये तो किसी से बात ही नहीं करतीं।”
नेहा को माँ के कमरे की ओर जाते हुए डर सा लगा।
वो वही माँ थी, जो कभी पूरे घर की जान हुआ करती थीं — हर वक्त मुस्कुरातीं, सबका ख्याल रखतीं। जिनके हाथ के खाने पर पड़ोस तक की महिलाएँ तारीफ करती थीं। वही माँ अब चुप थीं, सूनी आँखों से छत को देखती रहतीं।
नेहा ने पास जाकर धीरे से पुकारा —
“माँ… मैं आई हूँ।”
माँ, यानी कि सुनीता देवी, ने बस नज़र उठाकर देखा, फिर धीरे से मुस्कुराईं — एक ऐसी मुस्कान जिसमें दर्द ज़्यादा और सुकून बहुत कम था।
“कैसी हो माँ?”
“ठीक हूँ बिटिया,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “बस ज़रा थक गई हूँ ज़िंदगी से।”
नेहा की आँखें भर आईं। उसने माँ का हाथ अपने हाथ में लिया, जो अब बेहद कमजोर और ठंडा महसूस हो रहा था।
“माँ, कुछ हुआ है क्या? किस बात का बोझ है दिल में?”
पहले तो सुनीता देवी चुप रहीं। लेकिन नेहा के लगातार प्यार भरे सवालों के आगे आखिरकार उनका दिल टूट गया।
उन्होंने कहा, “नेहा, जब तुम्हारे पापा जिंदा थे, मैं खुद को ज़िंदा महसूस करती थी। उनके साथ हँसना, काम करना, सबकुछ आसान लगता था। उनके जाने के बाद मैंने सोचा, अब बच्चों के लिए जी लूँगी। पर अब लगता है कि मैं तो बस एक ‘ज़रूरत’ बनकर रह गई हूँ — आदित्य के घर की नौकरानी, बच्चों की आया, और घर की पुरानी चीज़।”
नेहा सन्न रह गई।
“माँ, भैया तो आपसे बहुत प्यार करते हैं।”
“प्यार?” सुनीता देवी कड़वी मुस्कान के साथ बोलीं, “प्यार वो होता है जब किसी की बात सुनी जाए, उसकी इज़्ज़त की जाए। आदित्य सुबह ऑफिस जाता है, शाम को फोन में लगा रहता है। उसकी पत्नी रुचि को लगता है मैं उसकी ज़िम्मेदारी हूँ। घर का हर काम मुझसे करवाती है। ‘माँ जी, ये सब्जी काट दीजिए’, ‘माँ जी, बच्चे को होमवर्क करा दीजिए’ — बस यही बचा है मेरा रोल। किसी को मेरी तबीयत की परवाह नहीं।”
नेहा के दिल में टीस उठी।
उसे याद आया, कुछ महीनों पहले ही उसने सुना था कि भाभी की माँ आई थीं तो सब कुछ खुद संभाल रही थीं — खाना, सफाई, बच्चों की देखभाल — और माँ उस समय कोने में बैठी थीं, जैसे घर में होकर भी पराई हों।
नेहा धीरे से बोली,
“माँ, आप कबसे यूँ महसूस कर रही हैं?”
“जबसे मुझे ये एहसास हुआ कि मैं बोझ बन गई हूँ।” सुनीता देवी ने कहा, “मुझे याद नहीं कि आखिरी बार आदित्य ने मुझसे ऐसे बात की थी जैसे बेटा अपनी माँ से करता है। अब तो बस ‘माँ, खाना बना दो’, या ‘माँ, ये संभाल लो’। मैंने तो अपने बच्चों को खुश देखने के लिए जीया था। पर अब लगता है, शायद माँ का ‘जीना’ सिर्फ त्याग करना होता है, बदले में कुछ नहीं।”
नेहा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने धीरे से कहा,
“माँ, मैं कुछ नहीं कहूँगी अभी। बस आप थोड़ा आराम करो।”
अगले दिन नेहा ने आदित्य को बुलाया।
“भैया, एक बात कहूँ, बुरा मत मानना।”
“क्या बात है?”
“माँ बीमार नहीं हैं, माँ टूट गई हैं। और उनके टूटने की वजह आप हैं।”
“क्या?” आदित्य का चेहरा तमतमा गया, “नेहा, ये कैसी बात कर रही हो? मैंने माँ को कभी कमी नहीं दी — खाना, दवा, आराम — सब दिया है!”
“सब दिया है, पर वक्त नहीं दिया, भैया।” नेहा ने दृढ़ स्वर में कहा।
“माँ को पैसों की नहीं, अपनापन की ज़रूरत है। आपने उन्हें ‘माँ’ से ‘घर की मदद करने वाली महिला’ बना दिया है। वो दिनभर सबके लिए काम करती हैं, लेकिन कोई उनके लिए दो मिनट बात नहीं करता। आपको याद है आखिरी बार आपने उनके साथ बैठकर कुछ बातें कब की थीं?”
आदित्य कुछ बोल नहीं पाया।
नेहा आगे बोली,
“माँ हमेशा आपकी तारीफ करती हैं, भैया। कहती हैं, मेरा बेटा बड़ा समझदार है। लेकिन आपने कब सोचा कि आपकी माँ को भी कोई सुनने वाला चाहिए? उनकी भी एक जिंदगी है, एक अकेलापन है। पापा के जाने के बाद आप ही उनका सहारा थे, लेकिन आपने उन्हें साथ नहीं, बस जिम्मेदारी बना दिया। रुचि भाभी के भी अपने कारण होंगे, लेकिन माँ के साथ ऐसा बर्ताव सही नहीं है।”
आदित्य की आँखें झुक गईं। उसे अहसास हुआ, वह सच में माँ को “पारिवारिक फ़ंक्शन” की तरह निभा रहा था, महसूस नहीं कर रहा था।
उस रात उसने माँ के कमरे में जाकर धीमे से कहा,
“माँ, चलिए, हम दोनों थोड़ा बाहर चलते हैं।”
“कहाँ?” माँ ने हैरानी से पूछा।
“जहाँ आप चाहें — मंदिर, पार्क, या बस थोड़ी हवा खाने। अब मैं आपको कैद नहीं रखूँगा।”
सुनीता देवी ने पहली बार मुस्कराने की कोशिश की।
अगले कुछ दिनों में आदित्य ने छोटे-छोटे बदलाव शुरू किए —
माँ की पसंद का संगीत सुबह बजाने लगा,
कभी उनके साथ बाजार जाने लगा,
और रविवार को खाना उन्होंने बनाया, ताकि माँ को छुट्टी मिल सके।
रुचि ने भी धीरे-धीरे बदलाव महसूस किया। उसने पहली बार सुनीता देवी से कहा,
“माँ जी, मैं जानती हूँ आप बहुत कुछ झेल चुकी हैं। अब घर आप पर नहीं, हम सब पर टिका रहेगा।”
धीरे-धीरे माँ की आँखों की चमक लौटने लगी। उन्होंने फिर से अपने पौधों की देखभाल शुरू की, बच्चों को कहानियाँ सुनाने लगीं।
एक दिन आदित्य ने उन्हें पुराने एल्बम दिखाते हुए कहा,
“माँ, अब मैं आपको फिर से वैसे ही हँसते देखना चाहता हूँ, जैसे इन तस्वीरों में हैं।”
सुनीता देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा,
“बेटा, अब तू समझ गया, तो मैं फिर से वही बन जाऊँगी।”
माँ के चेहरे पर मुस्कान लौट आई — एक सच्ची, आत्मीय मुस्कान, जो हर कोने को रोशन कर गई।
कभी-कभी रिश्ते निभाने के लिए सिर्फ शब्दों की नहीं, महसूस करने की ज़रूरत होती है।
हर माँ को सम्मान चाहिए, न कि सिर्फ जिम्मेदारी का एहसास।
क्योंकि जब माँ मुस्कुराती है — तब ही घर ‘घर’ बनता है।

SITE UPDATE – 1137 URBAN ESTATE MALBIU TOWN Major Milestones Achieved! We’re proud to share a significant progress updat...
11/01/2026

SITE UPDATE – 1137 URBAN ESTATE
MALBIU TOWN

Major Milestones Achieved!
We’re proud to share a significant progress update at Site No. 1137, Urban Estate. With multiple critical stages successfully completed, the project is moving ahead at full speed and taking solid shape day by day.
Work Completed So Far:
✅ All Floors Slab Casting Completed 🧱
✅ Brick Work Finished 🧱
✅ 1st Floor Internal Electrical Work Completed
✅ 1st Floor Air Conditioning Pipework Installed
✅ 1st Floor Internal Plumbing Work Completed 🚿🚰

Each milestone reflects quality workmanship, careful planning, and dedicated ex*****on. The structure is now ready to move into the next exciting phases of finishing and detailing. 🏠✨
⏳ What’s Next:
Plastering, finishing, and further interior development coming up soon — stay tuned for more exciting updates!

आंटी, आप बारबार मुझे इस तरह क्यों घूर रही हैं?’’ मेघा ने जब एक 45 साल की प्रौढ़ा को अपनी तरफ बारबार घूरते देखा तो उस से ...
05/01/2026

आंटी, आप बारबार मुझे इस तरह क्यों घूर रही हैं?’’
मेघा ने जब एक 45 साल की प्रौढ़ा को अपनी तरफ बारबार घूरते देखा तो उस से रहा न गया.
उस ने आगे बढ़ कर पूछ ही लिया, ‘‘क्या मेरे चेहरे पर कुछ लगा है?’’

‘‘नहीं बेटा, मैं तुम्हें घूर नहीं रही हूं. बस, मेरा ध्यान तुम्हारी मुसकराहट पर आ कर रुक जाता है.
तुम तो बिलकुल मेरी बेटी जैसी दिखती हो, तुम्हारी तरह उस के भी हंसते हुए गालों पर गड्ढे पड़ते हैं,’’ इतना कह कर सुनीता पीछे मुड़ी और अपने आंसुओं को पोंछती हुई मौल से बाहर निकल गई. तेज कदमों से चलती हुई वह घर पहुंची और अपने कमरे में बैड पर लेट कर रोने लगी. उस के पति महेश ने उसे आवाज दी, ‘‘क्या हुआ, नीता?’’ पर वह बोली नहीं. महेश उस के पास जा कर पलंग पर बैठ गया और सुनीता का सिर सहलाता रहा, ‘‘चुप हो जाओ, कुछ तो बताओ, क्या हुआ? किसी ने कुछ कहा क्या तुम से?’’

‘‘नहीं,’’ सुनीता भरेमन से इतना ही कह पाई और मुंह धो कर रसोई में नाश्ता बनाने के लिए चली गई. महेश को कुछ समझ में नहीं आया. वह सुनीता से बहुत प्यार करता है और उस की जरा सी भी उदासी या परेशानी उसे विचलित कर देती है. वह उसे कभी दुखी नहीं देख सकता. वह प्यार से उसे नीता कहता है. वह उस के पीछेपीछे रसोई में चला गया और बोला, ‘‘नीता, देखो, अगर तुम ऐसे ही दुखी रहोगी तो मेरे लिए बैंक जाना मुश्किल हो जाएगा. अच्छा, ऐसा करता हूं कि आज मैं बैंक में फोन कर देता हूं छुट्टी के लिए. आज हम दोनों पूरे दिन एकसाथ रहेंगे. तुम तो जानती ही हो कि जब तुम्हारे होंठों की मुसकान चली जाती है तो मेरा भी मन कहीं नहीं लगता.’’

‘‘मुसकान तो कब की हमें छोड़ कर चली गई है,’’ सुनीता के इन शब्दों से महेश को पलभर में ही उस की उदासी का कारण समझ में आ गया. आखिरकार, जिंदगी के 20 साल दोनों ने एकसाथ बिताए थे, इतना तो एकदूसरे को समझ ही सकते थे.

‘‘उसे तो हम मरतेदम तक नहीं भूल सकते पर आज अचानक, ऐसा क्या हो गया जो तुम्हें उस की याद आ गई?’’

सुनीता ने मौल में मिली लड़की के बारे में बताया, ‘‘वह लड़की हमारी मुसकान की उम्र की ही होगी, यही कोई 16-17 साल की. पर जब वह मुसकराती है तो एकदम मुसकान की तरह ही दिखती है. वही कदकाठी, गोरा रंग. मैं तो बारबार चुपकेचुपके उसे देख रही थी कि उस ने मेरी चोरी पकड़ ली और पूछ लिया, ‘आंटी, आप ऐसे क्या देख रहे हैं?’ मैं कुछ कह नहीं पाई और घर वापस आ गई,’’ सुनीता ने फिर कहा, ‘‘चलो, अब तुम तैयार हो जाओ. मैं तुम्हारा खाना पैक कर देती हूं. अब मैं ठीक हूं,’’ और वह रसोई में चली गई. महेश तैयार हो कर बैंक चला गया पर सुनीता को रहरह कर बेटी मुसकान का खयाल आता रहा. एक जवान बेटी की मौत का दर्द क्या होता है, यह कोई सुनीता व महेश से पूछे. मुसकान खुद तो चली गई, इन से इन के जीने का मकसद भी ले गई. 4 साल पहले उन्होंने अपनी इकलौती बेटी को एक दुर्घटना में खो दिया था. हर समय उन के दिमाग में यही खयाल आता था कि क्यों किसी ने मुसकान की मदद नहीं की? अगर कोई समय रहते उसे अस्पताल ले गया होता तो शायद आज वह जिंदा होती. उस पल की कल्पना मात्र से सुनीता के रोंगटे खड़े हो गए और वह फफकफफक कर रोने लगी.

जी भर कर रो लेने के बाद सुनीता जब उठी तो अचानक उसे चक्कर आ गया और वह सोफे का सहारा ले कर बैठ गई. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ. थोड़ी कमजोरी महसूस हो रही थी तो वह बैडरूम में जा कर पलंग पर ढेर हो गई और फिर उसे याद नहीं कि वह कब तक ऐसे ही पड़ी रही. दरवाजे की घंटी की आवाज से वह उठी और बामुश्किल दरवाजे पर पहुंची. महेश उस के लिए उस का मनपसंद चमेली के फूलों का गजरा लाया था. चमेली की खुशबू उसे बहुत अच्छी लगती थी. पर आज ऐसा न था. आज उसे कुछ अच्छा न लग रहा था, चाह कर भी वह उस गजरे को हाथों में न ले पाई. जैसे ही महेश उस के बालों में गजरा लगाने के लिए आगे बढ़ा तो उस ने उसे रोक दिया, ‘‘प्लीज महेश, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है.’’

‘‘क्या हुआ? क्या तुम अभी तक सुबह वाली बात से परेशान हो?’’ महेश ने कहा और उस का हाथ पकड़ कर उसे सोफे पर अपने पास बैठा लिया. ‘‘आज सुबह से ही कमजोरी महसूस कर रही हूं और चाह कर भी उठ नहीं पा रही हूं,’’ सुनीता ने बताया. महेश ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘अरे कुछ नहीं है. वह सुबह वाली बात ही तुम सोचे जा रही होगी और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि तुम ने खाना भी नहीं खाया होगा.’’सुनीता चुपचाप अपने पैरों को देखती रही.

‘‘अच्छा चलो, आज बाहर खाना खाते हैं. बहुत दिन हुए मैं अपनी बीवी को बाहर खाने पर नहीं ले कर गया.’’ महेश सुनीता को उस उदासी से छुटकारा दिलाना चाहता था जो हर पल उसे डस रही थी. उस के लिए शायद यह दुनिया की आखिरी चीज होगी जो वह देखना चाहेगा – सुनीता का उदास चेहरा. उस के तो दो जहान और सारी खुशियां सुनीता तक ही सिमट कर रह गई थीं, मुसकान के जाने के बाद. दोनों तैयार हो कर पास के होटल में खाना खाने चले गए. महेश ने उन सभी चीजों को मंगवाया जो सुनीता की मनपसंद थीं ताकि वह उदासी से बाहर आ सके.

‘‘अरे बस करो, मैं इतना नहीं खा पाऊंगी,’’ जब महेश बैरे को और्डर लिख रहा था तो उस ने बीच में ही कह कर रोक दिया.

‘‘अरे, तुम अकेले थोडे़ ही न खाओगी, मैं भी तो खाऊंगा. भैया, तुम जाओ और फटाफट से सारी चीजें ले आओ. मैं अपनी बीवी को अब और उदास नहीं देख सकता.’’ एक हलकी मुसकान सुनीता के होंठों पर फैल गई. यह सोच कर कि महेश उस से कितना प्यार करता है और अपनेआप पर उसे गर्व भी हुआ ऐसा प्यार करने वाला पति पा कर. खाना खाने के बाद सुनीता की तबीयत कुछ संभल गई. दोनों मनपसंद आइसक्रीम खा कर घर लौट आए. इतनी गहरी नींद में सोई सुनीता कि सुबह देर से आंख खुली. उस ने खिड़की से बाहर झांक कर देखा तो बादल घिरे हुए थे. फिर उस ने पास लेटे महेश को देखा. वह चैन की नींद सो रहा था. एक रविवार को ही तो उसे उठने की जल्दी नहीं होती बाकी दिन तो वह व्यस्त रहता है. फ्रैश हो कर वह रसोई में चली गई चाय बनाने. जब तक चाय बनी, महेश उठ कर बैठक में अखबार ले कर बैठ गया. रोज का उन का यही नियम होता था-एकसाथ सुबहशाम की चाय, फिर अपनेअपने काम की भागदौड़. बाहर बादल गरजने लगे और फिर पहले धीरे, फिर तेज बारिश होने लगी. अचानक सुनीता को लगा कि कोई बाहर खड़ा है. उस ने खिड़की में से झांका. एक लड़की खड़ी थी. उस ने जल्दी से दरवाजा खोला तो देखा वह वही मौल वाली लड़की थी. उसे दोबारा देख कर सुनीता बहुत खुश हुई, ‘‘अरे बेटा, तुम आ जाओ, अंदर आ जाओ.’’

‘‘नहीं आंटी, मैं यहीं ठीक हूं,’’ उस ने डरते हुए कहा. वह कौन सा उसे जानती थी जो उस के घर के अंदर चली जाती. सुनीता ने बड़े प्यार से उस का हाथ पकड़ा और उसे खींच कर अंदर ले आई.

‘‘आंटी, आप यहां रहती हैं? मैं तो कई बार इधर से गुजरती हूं पर मैं ने आप को नहीं देखा.’’ ‘‘हां बेटा, मैं जरा घर में ही व्यस्त रहती हूं.’’

‘‘आंटी, आई एम सौरी. शायद मैं ने आप का दिल दुखाया,’’ मेघा ने कहा.

महेश एक पल को मेघा को देख कर हतप्रभ रह गया. उसे अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि वह मौल वाली लड़की ही है, ‘‘आओ बेटा बैठो, हमारे साथ चाय पियो.’’ उस ने घबराते हुए महेश से नमस्ते की और बोली, ‘‘अंकल, मैं चाय नहीं पीती.’’

‘‘मुसकान भी चाय नहीं पीती थी. बस, कौफी की शौकीन थी. आजकल के बच्चे कौफी ही पसंद करते हैं,’’ ऐसा बोल कर सुनीता रसोई में चली गई. मेघा भी उस के पीछेपीछे रसोई में चली गई.

‘‘तुम्हारा घर पास में ही है शायद?’’ सुनीता ने पूछा.

‘‘हां आंटी, अगली गली में सीधे हाथ को मुड़ते ही जो तीसरा छोटा सा घर है वही मेरा है,’’ मेघा ने बताया. ‘‘अच्छा, वह नरेश शर्मा के साथ वाला?’’ महेश ने पूछा.

‘‘जी हां, वही. मैं रोज यहां से अपने कालेज जाती हूं. आज रविवार है सो अपनी सहेली से मिलने जा रही थी. बारिश तेज हो गई, इसलिए यहीं पर रुक गई.’’ ‘‘कोई बात नहीं बेटा, यह भी तुम्हारा ही घर है. जब मन करे आ जाया करना, तुम्हारी आंटी को अच्छा लगेगा,’’ महेश ने कहा, ‘‘जब से मुसकान गई है तब से इस ने अपनेआप को इस घर में बंद कर लिया है, बाहर ही नहीं निकलती.’’ ‘‘मेरा नहीं मन करता किसी से भी बात करने का. जब से मुसकान गई है…’’ इतना बोलते ही सुनीता की रुलाई छूट गई तो मेघा ने उस के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘आंटी, यह मुसकान कौन है?’’

‘‘मुसकान हमारी बेटी थी जिसे 4 साल पहले हम ने एक ऐक्सिडैंट में खो दिया.’’ मेघा ने देखा सुनीता आंटी लाख कोशिश करे अपना दुख छिपाने की पर फिर भी उदासी उन पर, अंकल पर और पूरे घर पर पसरी हुई थी.

इस बीच महेश बोले, ‘‘हौसला रखो नीता, मैं हूं न तुम्हारे साथ, बस मुसकान का इतना ही साथ था हमारे साथ.’’ इधर, मेघा ने अब जिज्ञासा जाहिर की, ‘‘आंटी, आप मुझे विस्तार से बताइए, क्या हुआ था.’’ ‘‘बेटा, हमारी शादी के 3 साल बाद मुसकान हमारे घर आई तो हमें ऐसा लगा कि इक नन्ही परी ने जन्म लिया है. हमारे घर में उस की मुसकराहट हूबहू तुम्हारे जैसी थी, ऐसे ही गालों में गड्ढे पड़ते थे.’’

‘‘ओह, तो इसलिए उस दिन आप मुझे मौल में बारबार मुड़मुड़ कर देख रही थीं.’’ ‘‘हां बेटा, अब तुम्हें सचाई पता चल गई, अब तो तुम नाराज नहीं होना अपनी आंटी से,’’ महेश ने कहा.

‘‘नहीं अंकल, वह तो मैं कब का भूल गई.’’

‘‘खुश रहो बेटा,’’ कहते हुए महेश चाय पीने लगे. सुनीता ने मेघा को बताना जारी रखा, ‘‘मुसकान को बारिश में घूमना बहुत पसंद था. हमारे लाड़प्यार ने उसे जिद्दी बना दिया था. इकलौती संतान होने से वह अपनी सभी जायजनाजायज बातें मनवा लेती थी. जब उस ने 10वीं की परीक्षा पास की तो स्कूटी लेने की जिद की. हम ने बहुत मना किया कि तुम अभी 15 साल की हो, 18 की होने पर ले लेना, पर वह नहीं मानी. खानापीना, हंसना, बोलना सब छोड़ दिया. हमें उस की जिद के आगे झुकना पड़ा और हम ने उसे स्कूटी ले दी. मैं ने उसे ताकीद की कि वह स्कूटी यहीं आसपास चलाएगी, दूर नहीं जाएगी. इसी शर्त पर मैं ने उसे स्कूटी की चाबी दी. वह मान गई और हम से लिपट गई. ‘‘उस दिन वह जिद कर के स्कूटी से अपनी सहेली के घर चली गई. हम उस का इंतजार कर रहे थे. उस दिन भी ऐसी ही बारिश हो रही थी. 2 घंटे बीत गए तब सिटी अस्पताल से फोन आया, ‘जी, हमें आप का नंबर एक लड़की के मोबाइल से मिला है. आप कृपया कर के जल्द सिटी अस्पताल पहुंच जाएं.’ ‘‘डर और घबराहट के चलते मेरे पैर जड़ हो गए. हम दोनों बदहवास से वहां पहुंचे. देखा, हमारी मुसकान पलंग पर लेटी हुई थी, औक्सीजन लगी हुई थी, सिर पर पट्टियां बंधी हुई थीं और साथ वाले पलंग पर उस की सहेली बेहोश थी. जब उसे होश आया तो उस ने बताया, ‘हम दोनों बारिश में स्कूटी पर दूर निकल गईं. पास से एक गाड़ी ने बड़ी तेजी से ओवरटेक किया, जिस से हमें कच्चे रास्ते पर उतरना पड़ा और उस गीली मिट्टी में स्कूटी फिसल गई. हम दोनों गिर गए और बेहोश हो गए. उस के बाद हम यहां कैसे पहुंचे, नहीं मालूम.’ ‘‘इसी बीच डाक्टर आ गए. उन्होंने मुझे और महेश को बताया कि सिर पर चोट लगने से बहुत खून बह गया है. हम ने सर्जरी तो कर दी है पर फिर भी अभी कुछ कह नहीं सकते. अभी 48 घंटे अंडर औब्जर्वेशन में रखना पड़ेगा. डाक्टर की बात सुन कर हम रोने लगे. ये भी परेशान हो गए. पलभर में हमारी दुनिया ही बदल गई. नर्स ने कहा, ‘घबराइए नहीं, सब ठीक हो जाएगा,’ तकरीबन 2 घंटे बाद मुसकान को होश आया,’’ बोलतेबोलते सुनीता का गला रुंध आया तो वह चुप हो गई.

‘‘फिर क्या हुआ अंकल? प्लीज, आप बताइए?’’ मेघा ने डरते हुए पूछा. महेश के चेहरे पर अवसाद की गहरी परत छा गई थी तो सुनीता ने कहा, ‘‘वह जब होश में आई तो उस से कुछ कहा ही नहीं गया. बस, अपने हाथ जोड़ दिए और हमेशा के लिए शांत हो गई.’’ और फिर सुनीता फूटफूट कर रोने लगी. उन का रुदन देख कर मेघा की भी रुलाई छूट गई. उसे समझ नहीं आया कि वह उन से क्या कहे. उस ने सुनीता और महेश का हाथ अपने हाथों में ले कर बस इतना ही कहा, ‘‘मुझे अपनी मुसकान ही समझिए और मैं पूरी कोशिश करूंगी आप की मुसकान बनने की.’’

उन दोनों के मुंह से बस इतना ही निकला, ‘‘खुश रहो बेटा.’’ बाहर बारिश थम चुकी थी और अंदर तूफान गुजर चुका था. मेघा वापस आने का वादा कर के वहां से चली गई. उस से बातें कर के दोनों बहुत हलका महसूस कर रहे थे. दोनों रविवार का दिन अनाथ आश्रम में गरीब बच्चों के साथ बिताते थे. दोनों कपड़े बदल कर वहां चले गए. मेघा जब भी कालेज जाती तो अकसर सुनीता और महेश को बाहर लौन में बैठे देखती तो कभी हाथ हिलाती, कभी वक्त होता तो मिलने भी चली जाती थी. वक्त गुजरने लगा. मेघा के आने से सुनीता अपनी सेहत को बिलकुल नजरअंदाज करने लगी. यदाकदा उसे चक्कर आते थे, कई बार आंखों के आगे धुंधला भी नजर आता तो वह सब उम्र का तकाजा समझ कर टाल जाती. इंतजार करतेकरते 10 दिन हो गए पर मेघा नहीं आई, न ही वह कालेज जाती नजर आई. दोनों को उस की चिंता हुई और जब दोनों से रहा नहीं गया तो वे एक दिन उस के घर पहुंच गए.दरवाजे की घंटी बजाई तो एक 49-50 साल की अधेड़ महिला ने दरवाजा खोला, ‘‘कहिए?’’

‘‘क्या मेघा यहीं रहती है?’’ महेश ने पूछा.

‘‘जी हां, आप सुनीता और महेशजी हैं?’’

सुनीता ने उत्सुकता से जवाब दिया, ‘‘हां, मैं सुनीता हूं और ये मेरे पति महेश हैं.’’

‘‘आप अंदर आइए. प्लीज,’’ बोल कर सुगंधा उन्हें कमरे में ले आई. पूरा घर 2 कमरों में सिमटा था. एक बैडरूम और एक बैठक, बाहर छोटी सी रसोई और स्नानघर. मेघा यहां अपनी मां सुगंधा के साथ अकेली रहती थी उस के पिताजी, जब वह बहुत छोटी थी तब ही संसार से जा चुके थे. सुगंधा एक स्कूल में अध्यापिका थी जिस से उन का घर का गुजारा चलता था. ‘‘मेघा कहां है? बहुत दिन हुए, वह घर नहीं आई तो हमें चिंता हुई. हम उस से मिलने आ गए,’’ सुनीता ने चिंता व्यक्त की.

‘‘वह दवा लेने गई है,’’ सुगंधा ने कहा.

‘‘आप को क्या हुआ बहनजी?’’ महेश ने पूछा.

सुगंधा उदास हो गई, ‘‘मेरी दवा नहीं भाईसाहब, वह अपनी दवा लेने गई है.’’

‘‘उसे क्या हुआ है?’’ दोनों ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘2-3 साल पहले की बात है. इसे बारबार यूरीन इनफैक्शन हो जाता था. डाक्टर दवा दे देते तो ठीक हो जाता पर बाद में फिर हो जाता. पिछले 10 दिनों से इनफैक्शन के साथ बुखार भी है. पैरों में सूजन भी आ गई है. मैं ने बहुत मना किया पर फिर भी जिद कर के दवा लेने चली गई. अभी आ जाएगी.’’

‘‘डाक्टर ने क्या कहा?’’ सुनीता ने पूछा.

‘‘डाक्टर को डर है कि कहीं किडनी फेल्योर का केस न हो,’’ कह कर वे रोने लगीं. सुनीता ने उठ कर उन्हें गले से लगा लिया और सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘सुगंधाजी, ऐसा कुछ नहीं होगा. सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘सुनीताजी, डाक्टर ने कुछ टैस्ट करवाए हैं. कल तक रिपोर्ट आ जाएगी,’’ सुगंधा ने बताया. इतने में मेघा आ गई. उस की मुसकान होंठों से गायब हो चुकी थी, रंग पीला पड़ गया था, आंखों के आसपास सूजन आ गई थी, वह बहुत कमजोर लग रही थी. सुनीता और महेश उसे देख कर सन्न रह गए. वे वहां ज्यादा देर न बैठ सके. चलते समय महेश ने मेघा के सिर पर हाथ रखा और सुगंधा से कहा, ‘‘बहनजी, कल हम आप के साथ रिपोर्ट लेने चलेंगे,’’ ऐसा कह कर वे दोनों अपने घर लौट आए. घर आ कर सुनीता सोफे पर ऐसी ढेर हुई कि काफी देर तक हिली ही नहीं. जब महेश ने उस से अंदर जा कर आराम करने को कहा तो वह अपनेआप को चलने में ही असमर्थ पा रही थी. महेश उसे सहारा दे कर अंदर ले गया, ‘‘परेशान न हो, सब ठीक हो जाएगा.’’ अगले दिन दोनों सुगंधा के साथ अस्पताल चले गए. उन पर पहाड़ टूट पड़ा जब डाक्टर ने बताया, ‘यह केस किडनी फेल्योर का है. अब मेघा को डायलिसिस पर रहना होगा जब तक डोनर किडनी नहीं मिल जाती.’ सुगंधा तो बेहोश हो कर गिर ही जाती अगर महेश ने उसे सहारा न दिया होता. उस ने उसे कुरसी पर बैठाया और पानी पिलाया, ‘‘हिम्मत रखिए सुगंधाजी, अगर आप ऐसे टूट जाएंगी तो मेघा को कौन संभालेगा? हम जल्दी मेघा के लिए डोनर ढूंढ़ लेंगे, आप चिंता न करें.’’

मेघा की बीमारी से दोनों परिवारों पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा. सुनीता तो अब ज्यादातर बीमार ही रहने लगी और अचानक एक दिन बेहोश हो कर गिर पड़ी. महेश अभी बैंक जाने के लिए तैयार ही हो रहा था कि धम्म की आवाज से रसोई में भागा तो देखा सुनीता नीचे फर्श पर बेहोश पड़ी हुई है. उस के हाथपैर फूलने लगे पर फिर हिम्मत कर के उस ने एंबुलैंस को फोन कर के बुलाया. इमरजैंसी में उसे भरती किया गया और सारे टैस्ट किए गए पर कुछ हासिल न हो सका. सुनीता हमेशा के लिए चली गई. डाक्टर ने जब कहा, ‘‘यह केस ब्रेन डैड का है, हम उन्हें बचा न पाए,’’ तो महेश धम्म से कुरसी पर गिर गया और सुनीता का चेहरा उस की आंखों के आगे घूमने लगा. पता नहीं वह कितनी देर वहीं पर उसी हाल में बैठा रहा कि अचानक वह फुरती से उठा और डाक्टर के पास जा कर बोला, ‘‘डाक्टर साहब, मैं सुनीता के और्गन डोनेट करना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि सुनीता की किडनी मेघा को लगा दी जाए.’’ डाक्टर ने फटाफट सारे टैस्ट करवाए और सुगंधा व मेघा को अस्पताल में बुला लिया. संयोग ऐसा था कि सुनीता की किडनी ठीक थी और वह मेघा के लिए हर लिहाज से ठीक बैठती थी. खून और टिश्यू सब मिल गए.औपरेशन के बाद डाक्टर ने कहा, ‘‘औपरेशन कामयाब रहा. बस, कुछ दिन मेघा को यहां अंडर औब्जर्वेशन रखेंगे और फिर वह घर जा कर अपनी जिंदगी सामान्य ढंग से जिएगी.’’

सुगंधा ने आगे बढ़ कर महेश के पांव पकड़ लिए और रोने लगीं. महेश ने उन्हें उठाते हुए कहा, ‘‘सुगंधाजी, आप रोइए नहीं. बस, मेघा का खयाल रखिए.’’ घर आ कर सब क्रियाकर्म हो गया. बारीबारी से लोग आते रहे, अफसोस प्रकट कर के जाते रहे. अंत में महेश अकेला रह गया सुनीता की यादों के साथ. उस ने उठ कर सुनीता की फोटो पर हार चढ़ाया. अपने चश्मे को उतार कर अपनी आंखों को साफ करते हुए बोला, ‘‘देखा नीता, हमारी मुसकान को तो मैं बचा नहीं पाया, पर इस मुसकान को तुम ने बचा लिया.’’ जैसे ही महेश पलटा तो उस ने देखा कि उस के पीछे मेघा खड़ी थी और उसी ‘डिंपल’ वाली मुसकान के साथ जैसे कह रही हो कि आप अकेले नहीं हैं, यह ‘मुसकान’ है आप के साथ.

अंजू शर्मा

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