05/09/2024
"कर्मों की गठरी"
मृत्यु के द्वार पर खड़े छोटे भाई ने अपने पिता समान बड़े भाई के हाथों में कुछ जरूरी कागजात देते हुए कहा..
"भैया मेरे जीवन का अब कोई भरोसा नहीं है, किराए पर दिए हुए कुछ कमरों से, मेरी बीवी और छोटे छोटे बच्चों का गुजारा तो हो जायेगा लेकिन साथ ही मैने एक दुकान भी खरीदी है जिसकी रजिस्ट्री अभी होनी बाकी है"...
ये उसी दुकान के कागज है, आप बस ये दुकान मेरी बीवी के नाम करा देना वो बेचारी कम से कम इस दुकान के सहारे जीवन यापन कर लेगी और भविष्य में मेरे बच्चों को भी काम आयेगी और कुछ समय बाद छोटा भाई काल के गाल में समा गया... वक्त बीतता गया बड़े भाई को भयानक कोढ़ हो गया हर समय जख्मों से मवाद रिसता रहता, उसके खुद के बच्चों और बीवी ने उससे मुंह मोड़ लिया और एक दिन भूखा प्यासा, दर्द से छटपटाता हुआ छोटे भाई के दरवाजे पर जा बैठा.. जेठ जी को ऐसी हालत में देख छोटे भाई की बीवी ने उन्हें अपने बच्चों की सहायता से अंदर बिठाया, खाना खिलाया और उनके जख्मों को साफ कर दवाई लगाने लगीं तो पिता समान जेठ उसके पैर पकड़कर रोने लगे और बोले.. "मुझे माफ कर दे बेटा मैं तेरी सेवा और सहानुभूति का हकदार नहीं हूं, अरे मैने तो अपने मरे हुए भाई के साथ ही धोखा कर दिया, मैं तो "आस्तीन का वो सांप निकला" जिसने तेरी और तेरे बच्चों की हक की दुकान धोखे से अपनी बीवी के नाम करा दी थी और देख मेरी करनी का फल भी मुझे आज मिल गया...
छोटे भाई की गरीब बीवी जिसका गुजारा बहुत मुश्किल से चल रहा है, खड़ी हुईं सोच रही है की ऐसे "आस्तीन के सांप" की सेवा करे या घर से निकाल दे।।।।।
स्वराचित मौलिक रचना
Manikya Chandra ...apni kalam se...