02/06/2025
वर्ष 2003, कश्मीर के शोपियां ज़िले में—एक युवा कश्मीरी लड़का, इफ्तिखार भट्ट, कंधे तक लंबे बालों और पारंपरिक कश्मीरी फेरन में लिपटा हुआ, खतरनाक आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के शिविर में शामिल होने पहुँचा। जब उससे पूछा गया कि वह भारतीय सेना से क्यों लड़ना चाहता है, तो उसने शुद्ध कश्मीरी भाषा में सेना को भला-बुरा कहते हुए बताया कि एक पथराव के दौरान हुई सैन्य कार्रवाई में उसके भाई की मौत हो गई थी, और वह इसका बदला लेना चाहता है।
उसके भीतर भरे गुस्से और भारतीय सेना के प्रति नफरत को देखकर आतंकियों ने उसे एक ‘उपयोगी’ युवक समझा और सैन्य प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान भेज दिया गया। वहां उसने अन्य प्रशिक्षुओं से कहीं अधिक अनुशासन, कट्टरता और युद्धक क्षमता का प्रदर्शन किया। जल्द ही वह नेतृत्व प्रशिक्षण के लिए चुना गया और पूरी तैयारी के बाद उसे नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय चौकियों पर हमले के लिए भेजा गया।
उसकी प्रतिभा देखकर हिजबुल कमांडर अबू सबजार और अबू तोरा जैसे वरिष्ठ आतंकियों ने उसे अपना दाहिना हाथ बना लिया ताकि उसकी योजना और युद्ध कौशल को और निखारा जा सके। 2004 में इफ्तिखार ने दोनों वरिष्ठ कमांडरों को विश्वास दिलाया कि वह भारतीय सेना की एक चौकी पर घातक हमला कर सकता है। वह उन्हें उस स्थान पर ले गया जहां हमला करना था और उन्हें विस्तार से अपनी योजना समझाई।
लेकिन अबू सबजार को शक हुआ—कोई नौसिखिया लड़का इतनी सूक्ष्म और जटिल सैन्य रणनीति कैसे बना सकता है? उन्होंने उससे उसकी पृष्ठभूमि और कहानी के बारे में सवाल करने शुरू कर दिए। इस पर इफ्तिखार भट्ट ने अपनी AK-47 उन्हें थमाते हुए कहा, “अगर आप मुझ पर भरोसा नहीं करते, तो गोली मार दीजिए,” और कुछ कदम पीछे हट गया।
लेकिन उसके पहले कि वे कुछ समझ पाते, उस युवक ने बिजली की गति से अपनी TT-30 पिस्टल निकाली और दोनों आतंकियों को तीन-तीन गोलियों से ढेर कर दिया — दो छाती पर और एक सिर में। यह थी पैरा स्पेशल फोर्सेज के एक ऑपरेटर की विशिष्ट कार्रवाई।
वह युवक असल में इफ्तिखार भट्ट नहीं, बल्कि भारतीय सेना के मेजर मोहित शर्मा थे — 1 पैरा एसएफ, मद्रास रेजिमेंट। इसके बाद उन्होंने आतंकियों के हथियार जुटाए और पूरी शांति से पास के आर्मी कैंप की ओर रवाना हो गए।
वर्ष 2009 में, एक सर्च ऑपरेशन के दौरान मेजर मोहित शर्मा ने मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके अंतिम शब्द अपने सेकेंड इन कमांड को थे — “सुनिश्चित करो कि कोई भी बचकर न निकल पाए।”
सच्चाई यही है — असली नायक बड़े पर्दे की चमक में नहीं, वीरता के मैदान में होते हैं।
माँ भारती के ऐसे सच्चे सपूत को शत-शत नमन। 🇮🇳