15/10/2015
1941 का समय था। 5वीं कक्षा के उस छात्र के घर में बिजली नहीं थी। दूसरे विश्वयुद्ध का समय था। कैरोसीन के लैम्प सिर्फ शाम को 7 से रात 9 बजे तक ही जलाए जाते थे, क्योंकि युद्ध के कारण कैरोसीन बाजार से गायब था। युद्ध के असर के कारण पूरे देश में पैसों और अनाज की तंगी थी। उसके बड़े संयुक्त परिवार में पांच बेटे और पांच बेटियां थीं। इनमें से भी तीन के अपने परिवार थे। इस आखिरी और छोटे बेटे ने अपने घर में हमेशा तीन पलने देखे थे। उसकी दादी और मां इस बड़े कुनबे को चलाती थीं। घर में कभी खुशी तो कभी गम का माहौल रहता था।
छोटे लड़के को गणित की पढ़ाई में मदद की जरूरत थी, लेकिन परिवार के पास ट्यूशन के लिए पैसे नहीं थे। फ्री ट्यूशन हर साल सिर्फ पांच बच्चों को दी जाती थी और वह भी सुबह 4.15 बजे शुरू हो जाती थी। इतनी सुबह पढ़ाने के पीछे कारण यह था कि सिर्फ गंभीर छात्र ही इसमें आएं और क्लास में शामिल हों। क्लास में आने की पहली और सबसे जरूरी शर्त यह थी कि किसी भी छात्र को बिना नहाए आने कि इजाजत नहीं थी। इतनी सुबह बच्चे को क्लास में भेजने के लिए जरूरी था कि मां और जल्दी जाग जाए। ठंड के दिनों में बालक के लिए पानी गर्म करे और समय पर क्लास पहुंचने के लिए उसे तैयार करे। और मां अपनी इस जिम्मेदारी को पूरी करने में कभी फेल नहीं हुई। बच्चे ने तो तपस्या करने का पूरा संकल्प कर लिया था, लेकिन उसके साथ मां की भी तपस्या शुरू हुई।
5.30 बजे जब बालक ट्यूशन से वापस आ जाता तो पिता उसे नमाज़ और कुरान शरीफ की पढ़ाई के लिए अरेबिक स्कूल ले जाते। इसके बाद बालक रेलवे स्टेशन की और दौड़ पड़ता, जो उसके घर से तीन किलोमीटर दूर था। वह ट्रेन का इंतजार करता। अखबार का बंडल उसके लिए मद्रास-धनुषकोडी मेल से फेंक दिया जाता। युद्ध का समय था, इसलिए ट्रेन वहां रुकती नहीं थी। बालक अखबार का बंडल उठा लेता और पूरे कस्बे में अखबार बांटता। उसके बड़े भाई के पास अखबार की एजेंसी थी और वही उसे काम में ले आया था। बाद में बेहतर रोजगार की तलाश में भाई श्रीलंका चला गया। अखबार बांटने के बाद बालक 8 बजे घर आ जाता। तब तक मां नाश्ता बनाकर रखती, जो हमेशा सादा, लेकिन अच्छा होता। इसमें उसे ज्यादा हिस्सा मिलता, क्योंकि वह सबसे छोटा तो था ही इसके अलावा पढ़ाई और काम दोनों करता था। कठोर परिश्रम, समय प्रबंधंन, नियम, भाव, गरीबी, चीजें साझा करने की भावना, प्रेम , करुणा, अन्य धर्मों के प्रति सम्मान और त्याग की भावना के बीच वह बालक बड़ा हुआ। महान इंसान बनने की यही सबसे अच्छी रेसिपी है। उस लड़के को हम अब्दुल कलाम के नाम से जानतें हैं। पूर्व दिवंगत राष्ट्रपति का आज 84वां जन्मदिन है।
(मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन )
महान वैज्ञानिक एवं पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए. पी. जे.अब्दुल कलाम जी की जयंती पर Ramesh Chouhary Pathmeda र की और से शत शत नमन.....