15/10/2017
शंका :- क्या आर्य समाज हिन्दू धर्म से अलग कोई नया पंथ या सम्प्रदाय है ?
समाधान :- पहली बात तो ये है कि आर्य समाज न तो सम्प्रदाय या पंथ या अलग कोई धर्म है । आर्य समाज प्राचीन वैदिक धर्म की रक्षा करने वाली एक हिन्दू संस्था है, जैसे बाकी की संस्थाएँ विहिप, बजरंगदल आदि हैं ठीक वैसे ही आर्य समाज भी है । बाकी संस्थाओं से आर्य समाज का अंतर केवल इतना ही है कि आर्य समाज वेद और वैदिक ग्रंथों पर आधारित जो हमारे ऋषि मुनियों और महापुरुषों का प्राचीन वैदिक धर्म था उसे पुनः स्थापित करने की बात कहता है । क्योंकि उस प्राचीन वैदिक धर्म को स्थापित किये बिना हिन्दू समाज अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पायेगा । आर्य समाज का मानना है कि हिन्दू अपने मूल प्राचीन वैदिक धर्म से दूर जा चुका है इसी कारण इसके हाथ से बहुत सी भूमी खिसकती चली गई है और पूरे विश्व का चक्रवर्ती शासन चला गया है । वही प्राचीन काल की आर्य जनता आज हिन्दू नाम से बदनाम हुई पड़ी है ।
हिन्दू समाज के लिये धर्म मात्र मंदिर जाकर प्रतिमाओं पर माथा टेकना, श्राध, व्रत आदि करना मात्र ही रह गया है इसीलिये आर्य समाज ये कहता है कि वेद, दर्शन, उपनिषद्, ब्राह्मण, वेदांग, स्मृति आदि सत्य शास्त्रों का पढ़ना पढ़ाना हिन्दू समाज में पुनः चालू हो और इसी आधार पर गुरुकुल शिक्षा, योगाभ्यास आदि परम्पराएँ पुनः स्थापित हो जाएँ । जिससे कि ये हिन्दू समाज अपने खोए हुए वैभव को पुनः प्राप्त कर पाए और शीघ्र ही पूरे विश्व का चक्रवर्ती शासन प्राप्त करने का प्रयास करे । अब आप बताएँ इसमें कौनसे नए धर्म या पंथ की बात कह दी गई है ?
आप ही बताइए क्या गुरुकुल शिक्षा, योगाभ्यास, आर्ष ग्रंथों का पठन पाठन, अग्निहोत्र, मनुस्मृति आधारित राजतंत्र आदि ये सब क्या हिन्दू कहे जाने वाले धर्म में नहीं आते ? क्या ये सब किसी नए पंथ से संबंधित हैं ?
ऋषि दयानंद ने जितने भी ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि लिखे हैं उनमें स्थान स्थान पर वेदमंत्र, मनुस्मृति, दर्शनों के सूत्रादि के प्रमाण चप्पे चप्पे पर दिए हैं । ऋषि ने अपना कोई मत न रखते हुए वेद और प्राचीन ऋषियों के ही मत सामने रखे जिनके द्वारा हमारा प्राचीन आर्यावर्त सुखों से परिपूर्ण था । तो क्या ऐसा करके ऋषि दयानंद जी ने कोई नया पंथ चला लिया ?
यदि इस स्पष्टिकरण के बाद भी हिन्दू समाज आर्य समाज को शंकित दृष्टि से देखना चाहता है या तो हिन्दू समाज वेद, दर्शन, स्मृतियों आदि वैदिक ग्रंथों का पूरा बहिष्कार कर दे और ऐसा नहीं कर सकता तो आर्य समाज के मन्तव्य को समझ ले ।