07/11/2023
प्रॉपर्टी में निवेश कर सकता है मालामाल
आम धारणा यह है कि प्रॉपर्टी में निवेश हर हाल में फायदे का सौदा है और इसमें लगा पैसा बढ़ेगा ही। हालांकि यह निवेश जितना आकर्षक है, इससे जुड़े जोखिम और पेचीदगियां भी कम नहीं हैं। रीयल एस्टेट में निवेश से जुड़े कुछ सवाल या उलझनें लोगों के मन में हमेशा बनी रहती हैं। मकान खरीदना बेहतर है या प्लाट या फिर कॉमर्शियल प्रॉपर्टी में पैसा लगाया जाए। कितने दिनों बाद बेचने पर अच्छा रिटर्न मिलेगा। ऐसी उलझनों को दूर करने के लिए प्रॉपर्टी निवेश से जुड़ी कुछ बातों पर गौर करना जरूरी है।
खरीदना अपनी मर्जी बेचना बाजार पर निर्भर
रीयल एस्टेट में निवेश से पहले एक बात ध्यान में रखें कि प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त अब भी ज्यादातर परंपरागत तरीके से ही होती है। इसलिए शेयर या म्यूचुअल फंड की तरह आप इसे जब मर्जी आए, तभी बाजार भाव बेच कर तुरंत रिटर्न हासिल नहीं कर सकते। अच्छी कीमत हासिल करने के लिए आपको खरीदार की तलाश करनी होगी।
अपने मनमुताबिक दाम पाने के लिए आपको अच्छा खासा इंतजार भी करना पड़ सकता है। इसलिए प्रापर्टी में निवेश करने वाले के पास धैर्य होना बहुत जरूरी है। इसके अलावा कई बार प्रॉपर्टी खरीदते समय और बेचते वक्त बाजार की स्थिति बिल्कुल अलग दिखाई पड़ सकती है। किसी खास समय या फेज में मांग में कमी से प्र्रॉपर्टी की कीमतें कम भी होती दिखती हैं। इसलिए अकसर प्रॉपर्टी बाजार में सही कीमत मिलने के इंतजार में प्रॉपर्टी को रोककर रखना पड़ता है।
कम से कम पांच साल इंतजार जरूरी
हालांकि वर्ष 2008 से पहले खासकर महानगरों में प्रॉपर्टी की कीमतें हर महीने या दो महीनें में भी बढ़ा करती थीं, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। प्रॉपर्टी में अच्छा रिटर्न लोकेशन, डेवलपमेंट और प्रॉपर्टी की मांग में बढ़ोतरी पर टिका है। कुछ अपवादों को छोड़कर अच्छा रिटर्न पाने के लिए कम से कम पांच-सात साल का इंतजार जरूरी है। अगर आप अपनी बचत को प्रॉपर्टी में लगाने जा रहे हैं तो इस समय सीमा को ध्यान में रखकर ही अपनी फाइनेंस प्लानिंग करें।
बेचने के दाम अलग खरीदने का भाव अलग
प्रॉपर्टी बाजार पर चूंकि असंगठित क्षेत्र का बोलबाला है। इसलिए यहां जमीनी हकीकत और दावों में अकसर बड़ा फर्क देखने को मिलता है। प्रॉपर्टी खरीदते समय कीमतों को बढ़ाचढ़ा कर बताया जाता है और फिर उसी के आधार पर बिक्री के भाव स्थापित होते जाते हैं। इसके विपरीत बेचते वक्त मार्केट में ठहराव और आपूर्ति अधिक, खरीदार कम होने जैसी बाते कह कर कीमत कम से कम लगाने की कोशिश की जाती है।
आप यह जानकर खुश हो सकते हैं कि समय के साथ आपकी प्रॉपर्टी की कीमत इतनी बढ़ गई है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि बढ़ी हुई इस कीमत पर खरीदार मिलने में दिक्कत आ सकती है। इसलिए लोकेशन, प्रॉपर्टी का वैल्यूएशन संपर्क और इलाके के विकास जैसे बुनियादी पहलुओं को देखकर ही किसी प्रॉपर्टी को खरीदने का फैसला लें।
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ईएमआई की वैल्यू घटेगी, किराया बढ़ेगा
अगर आप दीर्घकालीन मुनाफे के साथ लगातार आमदनी के मकसद से प्रॉपर्टी में निवेश करना चाहते हैं, तो ऐसा मकान खरीदना सबसे बेहतर है, जिसे आसानी से अच्छे किराए पर दिया जा सके। इससे आपको अपने निवेश पर सालाना तीन से चार फीसदी तक किराया भी मिलेगा, जो हर साल 5-10 फीसदी बढ़ सकता है। मेट्रो शहरों में आमतौर पर पचास लाख का फ्लैट 12-15 हजार रुपये महीना किराया देता है। फ्लैट की कीमत सालाना 15 फीसदी तक आराम से बढ़ जाती है। इस तरह अगर आप होम लोन लेकर भी फ्लैट खरीदते हैं तो ईएमआई की वैल्यू महंगाई बढ़ने के साथ कम महसूस होगी, जबकि किराया और प्रॉपर्टी की कीमत हर साल बढ़ती जाएगी।
क्या खरीदें: प्लॉट या मकान
150 से 250 गज का प्लॉट उन लोगों के लिए अच्छा विकल्प है, जो उभरते टियर टू या थ्री शहरों में प्रॉपर्टी में लंबे समय के लिए निवेश करना चाहते हैं। अगर आप इस पर मकान नहीं बना रहे हैं तो इस निवेश पर आयकर छूट का फायदा नहीं मिलेगा और तुरंत कोई आमदनी भी यह आपको नहीं देगा। उधर, होम लोन के ब्याज पर आपको सालाना डेढ़ लाख रुपये की आयकर छूट का फायदा मिलता है। हालांकि कई बार प्लॉट के दाम मकान के मुकाबले तेजी से बढ़ते हैं क्योंकि पुराना होने पर मकान को मरम्मत की जरूरत पड़ती है और इसकी वैल्यू कम हो जाती है, लेकिन प्लॉट के साथ ऐसे कोई दिक्कत नहीं होती।
अटका प्रोजेक्ट बिगाड़ सकता है प्लानिंग
हाउसिंग और कमर्शियल प्रोजेक्ट का अटक जाना अब आम बात है। इस जोखिम को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। अच्छी लोकेशन और प्रतिष्ठित बिल्डर के प्रोजेक्ट में बुकिंग करने के बाद लोग पजेशन से पहले भी इसे बेचकर भी अच्छा मुनाफा कमा जाते हैं, लेकिन महज इस इरादे से प्रॉपर्टी खरीदना मुनासिब नहीं होता, क्योंकि कई बार पैसा फंसने का जोखिम भी रहता है।
छुपे खर्चों के बारे में जरूर जान लें
मकान या जमीन के सपने को पूरा करने के लिए लोग जीवन भर की कमाई लगा देते हैं। ऐसे में प्रॉपर्टी या घर खरीदते समय इसके साथ आने वाले अतिरिक्त खर्चों के बारे में भी जानना जरूरी है। अमूमन, एक एजेंट प्रॉपर्टी खरीदते समय जो खर्च आपको बताता है, उसके अलावा भी उसमें कई दूसरे खर्चे शामिल रहते हैं। यह आपके बजट को करीब 25 फीसदी बढ़ा सकते हैं। इसलिए बेहतर रहेगा कि घर या प्रापर्टी खरीदते समय अतिरिक्त खर्चों के बारे में जानकारी प्राप्त कर उनके लिए तैयार रहा जाए।
रजिस्ट्रेशन लागत
प्रॉपर्टी की कुल लागत में से रजिस्ट्रेशन लागत का एक बहुत बड़ा हिस्सा होता है। ज्यादातर राज्यों में सभी कानूनी शुल्क जैसे स्टॉम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस कुल प्रॉपर्टी की कीमत का 7 से 10 फीसदी होता है। सामान्य तौर पर स्टॉम्प ड्यूटी 5-7 फीसदी होती है, जिसका मतलब है कि अगर आपने 50 लाख रुपये की प्रॉपर्टी खरीदी है, तो इसके लिए स्टॉम्प पेपर की लागत 3.60 लाख रुपये होगी, जिस पर सेल डीड लिखी जाएगी।
इसके साथ ही इसके रजिस्ट्रेशन के लिए कोर्ट में फीस दी जाएगी जो कुल प्रॉपर्टी का 1 से 2 फीसदी होगा। इन सबके अलावा खरीदार को और भी बहुत से खर्च उठाने पड़ते हैं जैसेकि नोटरी की फीस और वकील की फीस जो अदालत में आपके लिए काम करेगा। प्रॉपर्टी के वेरिफिकेशन और रजिस्ट्रेशन के लिए जो काउंसिल होती है वह भी प्रॉपर्टी की कुल लागत का करीब 1 फीसदी शुल्क लेती है। इन सब खर्चों को अपने बजट में शामिल करना बहुत जरूरी होता है।
पार्किंग स्पेस का खर्च
पिछले कुछ सालों से बड़े आवासीय कॉम्पलेक्स में पार्किंग के लिए अलग से फीस वसूलने का चलन चल पड़ा है। यह प्रॉपर्टी, लोकेलिटी और दिए गए पार्किंग स्पेस के मुताबिक 2-5 लाख रुपये के बीच हो सकता है। हालांकि, मार्च 2012 के बाद से सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक आवासीय कॉम्पलेक्स में पार्किंग स्पेस के लिए अलग से कोई अतिरिक्त राशि नहीं वसूली जा सकती है। यह अलग बात है कि ज्यादातर डेवलपर प्रॉपर्टी की लागत में अतिरिक्त कीमत जोड़कर इसकी भरपाई कर लेते हैं।
इंटीरियर की लागत
प्रॉपर्टी खरीदने के बाद उसमें आंतरिक साज सज्जा के ऊपर कुछ खर्च करना जरूरी हो जाता है। इस खर्च को आरंभिक लागत में नहीं जोड़ा जाता है लेकिन घर खरीदने की लागत में इसका बहुत बड़ा हिस्सा होता है। देखा जाए तो यह कुल प्रॉपर्टी की लागत का करीब 1 फीसदी हो सकता है।
ब्याज का नुकसान
देश में प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट का लंबित होना एक आम बात है। इस देरी से ना सिर्फ प्रॉपर्टी की लागत बढ़ती है बल्कि खरीदार को इसके तहत अतिरिक्त खर्चे भी उठाने पड़ते हैं। जैसेकि, होम लोन लेने वाले ग्राहक को अतिरिक्त ब्याज का भुगतान करना पड़ता है।
रीयल्टी प्रोजेक्ट में 6 महीने से 1 साल की देरी सामान्य बात है और इसे अपने खर्चों की प्लानिंग में सोचकर चलना चाहिए। इसके अलावा इस देरी से मकान मालिक को किराये में देरी का नुकसान उठाना पड़ता है। साथ ही जब तक प्रॉपर्टी बनकर तैयार नहीं हो जाती और मकान मालिक को दी नहीं जाती तब तक उसे टैक्स में छूट का फायदा भी नहीं मिल पाता है।
जानिएः क्या है मतलब इन बातों का
कॉरपेट एरिया- कॉरपेट एरिया से मतलब है कि मकान के अंदर एक दीवार से दूसरी दीवार तक इस्तेमाल करने योग्य एरिया।
बिल्ड अप एरिया- बिल्ड अप एरिया में कॉरपेट एरिया, अंदर और बाहर की दीवारों का एरिया और अथारिटी की ओर से अनिवार्य फ्लावर बेड, ड्राई बॉलकनी जैसे एरिया शामिल होते हैं।
सुपर बिल्ड अप एरिया- सुपर बिल्ड अप एरिया में बिल्ड अप एरिया और लॉबी, सीढ़ी और लिफ्ट के कॉमन स्पेस के आने वाले एरिया शामिल होते हैं।
डाटा होने न देगा घाटा
हमारे देश में आम निवेशक आज भी रीयल एस्टेट को सबसे सुरक्षित मानते हैं। निवेश का पसंदीदा विकल्प होने के बावजूद दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आमतौर पर लोग फोन पर बात करके या दूसरों की बातों पर यकीन करके प्रॉपर्टी में पैसा लगा देते हैं, जिसमें रिटर्न पर निवेश (आरओआई) की बात बहुत बढ़ा-चढ़ा कर बताई जाती हैं।
जाहिर है कि इस तरह किया गया निवेश निवेशक की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है। इसलिए ऐसी स्थिति से बचने के लिए आंकड़ों या डाटा पर नजर डालकर उसके आधार पर निवेश की रणनीति बनाना मुनासिब रहता है, क्योंकि निवेशक के लिए यह यथार्थपरक साबित होता है।
अलग-अलग शहरों, यहां तक कि एक ही शहर के विभिन्न इलाकों में मांग और आपूर्ति की स्थिति भिन्न-भिन्न होती है। इसलिए जिस जगह प्रॉपर्टी खरीदी जा रही है वहां मांग कैसी है और प्रॉपर्टी की उपलब्धता कितनी है। यह आंकड़ा देखने के बाद निवेश करने में ही समझदारी रहती है। यह आंकड़ा प्रॉपर्टी में किए गए निवेश पर रिटर्न की संभावनाओं को भी स्पष्ट कर देता है।
संभावनाओं वाले शहरों का रुख
रीयल एस्टेट में निवेश में ऐसे शहरों में ज्यादा फायदेमंद रहता है, जहां उद्योग और रोजगार के विस्तार की संभावनाएं अधिक हों। दिल्ली और मुंबई जैसे शहर कई दशकों तक रोजगार तलाशने वालों को अपनी ओर खींचते रहे, पर आज वह स्थिति नहीं रह गई है।
आज के दौर में बंगलूरू, हैदराबाद, पुणे और एक हद तक चेन्नई जैसे शहर रोजगार व उद्योग के लिहाज से बेहतर माने जा रहे हैं। नामी-गिरामी कंपनियां इन शहरों की ओर रुख कर रही हैं। ऐसे में इन शहरों में प्रॉपर्टी खरीदना ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। आंकड़ों के मुताबिक शहरों में वर्ष 2009 के बाद अबतक मांग में 43 फीसदी की तेजी दर्ज की गई है, जबकि आपूर्ति में करीब 8 फीसदी की कमी देखी जा रही है।
जाहिर है कि मांग में तेजी और आपूर्ति में कमी की यह स्थिति निवेशकों के लिए मजबूत रिटर्न की संभावनाएं पैदा करती है। ऐसे में अगर आज की तारीख में भी रोजगार व उद्योग के लिहाज से बेहतर संभावनाओं वाले शहरों में वाजिब दामों में प्रॉपर्टी मिल जाती है, तो लंबे समय (लांग टर्म) के दृष्टिकोण से इसमें किया गया निवेश आगे चलकर काफी शानदार रिटर्न दे सकता है।
निवेशकों का रुझान टीयर-2 व टीयर-3 शहरों की ओर
रीयल एस्टेट सेक्टर में टीयर-1 शहरों का प्रभुत्व करीब एक दशक से बना हुआ है। यहां प्रापर्टी की कीमत और उसकी सालाना ग्रोथ ने निवेशकों को खासा आकर्षित किया। धीरे-धीरे अब तेजी से बढ़ती कैपिटल वैल्यू के चलते टीयर-2 और टीयर-3 के शहर भी सक्षम निवेशकों का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं।
व्यावसायिक और आवासीय, रीयल्टी के दोनों सेगमेंट में टीयर-1 शहरों में भारी मांग रही, जिसके चलते निवेशकों को यहां प्रापर्टी से अच्छा खासा ग्रोथ हासिल हुआ। हालांकि, अब इन शहरों में भूमि की कमी के चलते रीयल एस्टेट का विस्तार और रफ्तार पहले की तरह तेज नहीं रह गई है। यही वजह है कि अब रीयल्ट एस्टेट के लिए टीयर- 2 और टीयर- 3 शहरों में मांग तेजी से बढ़ रही है।
गुड़गांव, अहमदाबाद, इंदौर, पुणे, विशाखापट्टनम और कोच्चि जैसे टीयर-2 शहरों में प्रापर्टी की वैल्यू पिछले पांच सालों में औसतन करीब 33 फीसदी बढ़ी है। दिल्ली के निकट सैटेलाइट शहर के रूप में विकसित गुड़गांव में कीमतों में सबसे अधिक बढ़ोतरी हुई। गुड़गांव में पिछले पांच साल के दौरान कैपिटल वैल्यू में 50 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई।
टीयर-3 के शहरों में भी प्रापर्टी की कीमतों में अच्छी तेजी देखने को मिली है। गत पांच वर्षों के दौरान लखनऊ, नागपुर, मंगलूरू, कोयंबटूर, सोनीपत और भिवाड़ी जैसे टीयर-3 शहरों में रीयल एस्टेट की कैपिटल वैल्यू में औसतन करीब 26 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। मंगलूरू और नागपुर में सबसे अधिक 42-46 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।
पिछले तीन सालों की बात की जाए, तो इन शहरों की कैपिटल वैल्यू में अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई और निवेशकों ने भारी भरकम कमाई की। 2008-09 के दौरान लेमन ब्रदर्स संकट से उपजी मंदी के बाद कीमतों में तेजी से करेक्शन आया। 2010 और 2011 में आवासीय रीयल एस्टेट बाजार ने फिर से रफ्तार पकड़ी और कैपिटल वैल्यू में जोरदार तेजी आई। गत तीन सालों में टीयर-2 के शहरों में आवासीय प्रापर्टी की कीमतों में आए उछाल की बात की जाए, तो इनमें करीब 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
गुड़गांव इस मामले में सबसे आगे रहा और कैपिटल वैल्यू में करीब 129 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। गुड़गांव एक तरह से आत्मनिर्भर आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। दूसरी ओर, अहमदाबाद, पुणे और कोच्चि जैसे शहरों में भी कैपिटल वैल्यू में 25-30 फीसदी का इजाफा हुआ है। टीयर- 3 शहरों में आवासीय कैपिटल वैल्यू में करीब 33 फीसदी का इजाफा हुआ।
हालांकि, विकास की यह रफ्तार कुछ शहरों तक ही सीमित है। गुड़गांव की तरह तेजी से औद्योगिक शहर के रूप में उभर रहे भिवाड़ी में प्रापर्टी की कीमतें सबसे अधिक उछलीं। यहां आवासीय कैपिटल वैल्यू में करीब 70 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। भिवाड़ी में कीमतें बढ़ने की मुख्य वजह गुड़गांव में 40 लाख रुपये से नीचे के मकानों का उपलब्ध नहीं होना है। चूंकि, गुड़गांव में किफायती मकान उपलब्ध नहीं रह गए, इसलिए छोटे निवेशकों ने भिवाड़ी की ओर कदम बढ़ाया, जिसके चलते वहां प्रापर्टी की कीमतों में तेजी आई।
रोजगार के अवसर उपलब्ध होने के साथ-साथ बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर होने के चलते टीयर-2 और टीयर-3 के शहरों में मकानों की मांग में तेजी आई है। इस तरह, देखा जाए तो यह उल्लेखनीय है कि टीयर-2 और टीयर-3 के शहरों ने पिछले पांच सालों में निवेशकों को अच्छा खासा रिटर्न दिया है। इनमें गुड़गांव, मंगलूरू, भिवाड़ी और नागपुर सबसे आगे रहे। वहीं, पिछले तीन साल के आंकड़ों पर गौर करें, तो अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे, लखनऊ, कोयंबटूर और कोच्चि से भी निवेशकों को अच्छा रिटर्न मिला है।
प्रॉपर्टी में निवेश का टैक्स कनेक्शन
पांच साल से पहले बेचने की न सोचें
लोन की राशि के पुनर्भुगतान पर धारा 80 सी में अन्य कटौतियों के साथ अधिकतम एक लाख रुपये की कटौती मिलती है। ध्यान रहे यदि मकान पांच वर्ष से पहले बेचते हैं तो बेचने के वर्ष में उस समय तक इस तरह की सभी कटौतियां व्यक्ति की आय में जुट जाती हैं और उसे आयकर का लाभ नहीं मिल पाता। टैक्स के लिहाज से मकान में निवेश का अधिकतम फायदा इस समय के बाद ही मिल पाता है।
किराए पर दिए मकान में फायदा अधिक
इसके अलावा धारा 24(बी) के तहत होम लोन से अपने लिए मकान खरीदने पर 1.50 लाख रुपये तक की देय ब्याज की राशि को अपने आय से घटाया जा सकता है। यदि मकान में स्वयं न रह कर किराए पर दिया जाता है, तो और भी अधिक फायदा है। किराए पर दिए मकान पर ब्याज की राशि के लिए 1.50 लाख रुपये की लिमिट नहीं है। सारा ब्याज आय से घटेगा। इसके अलावा किराए पर 30 फीसदी की मानक कटौती भी मिलेगी।
एक बात और, मकान संयुक्त नाम से खरीदने पर सभी संयुक्त खरीदार मकान के हिस्से के अनुपात में लोन के पुनर्भुगतान व ब्याज पर धारा 80 सी और 24(बी) में अलग-अलग कटौती क्लेम कर सकते हैं। ध्यान रहे कि ये कटौतियां मकान के रहने लायक होने पर ही मिलती हैं। अत: कोशिश करके बना हुआ मकान खरीदें या जल्दी से जल्दी न्यूनतम निर्माण पूरा कर लें, जिससे टैक्स कटौतियों का लाभ ले सकें। निर्माण पूरा होने तक का ब्याज अगले पांच वर्षों की आय से समान किश्तों में आय से घटाया जा सकता है।
दीर्घकालीन पूंजीगत लाभ का लें फायदा
शुद्ध रूप से निवेश के लिए भी मकान में पैसा लगाना फायदेमंद है, लेकिन यह निवेश तीन साल से अधिक के लिए होना चाहिए। इससे कम समय में मकान बेचने पर लघुकालीन पूंजीगत लाभ होगा, जिसपर सामान्य आय की तरह ही टैक्स लगेगा। तीन वर्ष बाद बेचने पर दीर्घकालीन पूंजीगत लाभ होगा, जिसे विक्रय मूल्य से लागत (कॉस्ट इन्फ्लेशन इंडेक्स से बढ़ाकर) तथा खर्चे घटाकर निकाला जाता है।
उदाहरण के लिए अगर आप मार्च 2008 में 15 लाख रुपये में खरीदे मकान को अभी 25 लाख रुपये में बेचते हैं, तो आपको 25 लाख रुपये से इंडेक्स लागत (15 लाख गुणा 852 भाग 551) 23,19,419 रुपये घटाकर 1,80,581 रुपये का दीर्घकालीन पूंजीगत लाभ होता है। इसपर 20 फीसदी की दर से 36,116 रुपये टैक्स बनता है।
धारा 54 के तहत इस टैक्स की इस रकम को दूसरे मकान में निवेश कर या धारा 54ईसी के तहत इंफ्रा बांड में अधिकतम 50 लाख रुपये तक निवेश कर बचा सकते हैं। ऐसे निवेश का फायदा प्लाट में निवेश कर भी ले सकते हैं, लेकिन धारा 80सी तथा 24(बी) का फायदा लेने के लिए प्लाट पर न्यूनतम निर्माण अवश्य कर लें। एक खास बात यह कि लोन लेते समय प्लाट के साथ मकान बनाने के लिए भी लोन लें, जिससे कि होम लोन की कम ब्याज दर का अधिकतम फायदा मिल सके।
पत्नी या एचयूएफ के नाम खरीदें मकान
मकान किराए की आय अनअर्न्ड (बिना शारीरिक श्रम) श्रेणी में आती है। इसलिए घर के जो लोग नौकरी या रोजगार नहीं करते उनके नाम में (हाउसवाइफ, एचयूएफ) प्रॉपर्टी खरीदनी चाहिए। मकान किराए से आय लेने वालों के टैक्स प्लानिंग का यह बेहतरीन नुस्खा है