18/02/2021
जिन्ह मोहिं मारा ते मैं मारे।
तेहि पर बांधेउ तनय तुम्हारे।।
रावण ने प्रश्न किया था- मारेहु निसिचर केहि अपराधा ..? तूने राक्षसों को किस अपराध में मारा ..?
सो हनुमानजी उत्तर दे रहे हैं,पर थोड़ा सम्मान देकर - हे स्वामी! मुझे जिसने मारा,मैं बस उसी को मारा ।
अगर विश्वास न हो तो पूछ लीजिए...किसी दर्शक को चोट आई है क्या?(हनुमानजी जिधर देखे उधर डर से सिट्टी पीट्टी बंद,
किसी कि इतनी हिम्मत कहां है कि हनुमानजी के बारे में कुछ बोल सके ..)
आगे हनुमानजी कहते हैं- परंतु तुम्हारा जो ये पुत्र है ! (नाम मालूम नहीं) ,..
रावण - ये इन्द्रजीत है..इन्द्रजीत !
इसने देवराज इन्द्र को जीता है।
अरे मूर्ख बंदर! तूने इसके बारे में भी नहीं सुनी है ?
रावण हनुमानजी को बालक की तरह पढ़ा रहा है,पर हनुमानजी उसकी ऐसी करेंगे कि फिर वह इन्द्रजीत नहीं कहलायेगा।सिर्फ मेघनाद ( जो गरजता है वह बरसता नहीं) आगे कभी भी यही नाम रहेगा।
हनुमानजी - जो हो ! इन्द्रजीत हो या कुछ और हो, पर इसने ब्रह्मास्त्र के सहारे मुझे बाँध लिया ,
परंतु - मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा...
हे रावण ,तुम यदि सोचते हो कि मैं बाँधे जाने पर शर्मिन्दा हूँ,पर ऐसी बात नहीं है।
मैं तो बस - करन चहऊँ..निज प्रभु कर काजा। -मैं अपने प्रभु का कार्य करना चाहता हूँ।( हनुमानजी रावण को भी प्रभु,स्वामी कह दिए थे,सो स्पष्ट कर रहे हैं और स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि होनी हो कर रहेगा) परंतु थोड़ा प्रयत्न कर रहे हैं कि शायद विनाश रूक जाय।सो बोले - विनती करऊँ जोरि कर रावन - हे रावण! मैं आपको हाथ जोड़कर विनती कर रहा हूँ कि तुम - सुनहुँ मान तजि...मोर सिखावन - अपना मान अभिमान को थोड़ी देर के लिए त्याग दीजिए और मेरी बात सुनिए।
देखहुँ तुम निज कुलहिं बिचारी..?
अरे कम से कम पुलतस्य कुल का सम्मान रखिए,
आप उत्तम वंश के हैं।
अतः -भ्रम तजि - आप इस भ्रम में मत रहिए कि आप राक्षस कुल से हैं।
कभी अपनी ललाट भी आइने में देख लेते , कि कितना तेज है।
सो अब भी समय है ,अतः - भजहु ..ब्राह्मण का कार्य है स्वयं सन्मार्ग पर चलकर दूसरों को भी प्रेरित करना ..सो भक्ति शुरू करिए - भगत भय हारी - आप जैसे ही भक्ति शुरू करेंगे राम जी आप के भय (मृत्यु भय,पाप भय) को दूर कर देंगे। अरे श्री राम जी का स्वभाव ही है-
सन्मुख होइ जीव मोहिं जबहिं। जन्म कोटि अघ नासऊँ तबहिं।।
इस जन्म का छोड़िए,मेरे प्रभु करोड़ों जन्म के संचित पापों का भी नाश कर देते हैं। जरा देखिए - जाके डर - जिसके डर से,अतिकाल- जो भयानक काल है वो भी - डेराई - मेरे राम जी से डरता है।( काल सबको एक न एक दिन खा जाता है पर प्रभु भक्त उससे नहीं डरते) हे रावण!- तासो बयर..कबहुँ नहिं कीजै..? उनके भूलकर भी,स्वप्न में भी बैर मत करिए।और मेरी बात मान कर श्रीराम जी को उनकी सीताजी को ससम्मान वापस कर दीजिए( मोरे कहा जानकी दीजै) आपके उत्तम कल्याण का एक यही मार्ग है। हनुमानजी रावण को बहुत सुंदर,लाभप्रद उपदेश दिए पर वह मरूभूमि में कल्प वृक्ष....
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सीताराम जय सीताराम
सीताराम जय सीताराम