Pawan Kumar

Pawan Kumar I supervise building and other facility constructed Under Bihar education project council, Madhubani

17/10/2024

I am on a new journey on Facebook.

04/10/2023
20/08/2023

यह पोस्ट अखिलेश जी के वाल से कापी किया गया है |
आज मैं लंकेश के छोटे भाई विभीषण पर बात करूंगा। उनके कार्य को आज का समाज पूरी तरह स्वीकारने में हिचकता है। कुछ लोगों का कहना है कि अपने बड़े भाई के विरुद्ध उनके द्वारा शत्रु खेमे की मदद करना अनुचित था। आज भी लोग अपने घर में किसी का नाम विभीषण नहीं रखना चाहते!

क्या विभीषण का प्रभु श्रीराम का शरणागत बनना सही नहीं था?
अगर सही नहीं था तो क्यों?
कुछ लोगों का मानना है कि भाई चाहे जैसा हो...असत्य के रास्ते पर चलने वाला भी हो, तब भी उसका साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
क्या परस्त्री का हरण करने वाला हो तब भी?
हाँ तब भी..इसलिए क्योंकि वो अपना भाई है।

विभीषण ने लंकेश का साथ यूं ही नहीं छोड़ा था। उसने अपने बड़े भाई को बार-बार समझाया कि वो माता सीता को लौटा दें। विभीषण ने कहा कि जिसे आप सामान्य जन समझते हैं वो वास्तव में ब्रह्म स्वरूप हैं। अहंकारी रावण पर इस बात का भी कोई असर नहीं हुआ। यहां तक कि उसने अपने पैर से प्रहार करके विभीषण को लंका से निकल जाने के लिए कहा।

अगर विभीषण का सत्य के लिए युद्धरत भगवान राम का साथ देना गलत था, तो अर्जुन का अपने भाइयों और बंधु-बांधवों के साथ युद्ध करने का निर्णय भी गलत माना जाना चाहिए। जब अपने को पंडित मानने वाले लोग विभीषण की निंदा करते हैं तो बड़ा अचरज होता है! जो सारा दिन सत्य और धर्म की ही बातें करते हैं वो किस मुख से विभीषण के निर्णय को गलत बताते हैं?

मतलब जब आपका स्वार्थ होगा तो आप सत्य और धर्म को ताख पर रख दोगे! सत्य और धर्म दोनों चीजें शाश्वत हैं।भगवान राम और योगीराज कृष्ण ने हमेशा इस पथ पर चलने की सलाह अपने अनुयायियों को दी है। विभीषण लंकापति से अपमानित हुए क्योंकि उन्होंने सत्य और धर्म की बात की थी। वो राजा बनने की इच्छा के साथ प्रभु श्री राम के पास नहीं गए थे। सत्य का साथ देने के लिए उन्होंने श्रीराम का पथ चुना था। गीता की दृष्टि में उनके कार्य को निष्काम कर्म की श्रेणी में रखा जा सकता है। जब भी इतिहास या समाज विभीषण को कटघरे में खड़ा करेगा, तो ये माना जाएगा वो राम और कृष्ण का अनुगामी नहीं है। जो विभीषण के पथ को सही नहीं ठहराता उसे सत्य और धर्म की बात करने का कोई हक नहीं है।

व्यक्तिगत रूप से मैं सत्य और धर्म का समर्थक हूँ, इसीलिए विभीषण के पथ को सही मानता हूँ। इस विषय पर मैं उन लोगों का आलोचक हूँ जो स्वयं को सत्य और धर्म की धुरी बताते हैं, लेकिन विभीषण का राम की मदद करना उन्हें रास नहीं आता। ऐसा विरोधाभास मुझे भी पता नहीं क्यों बिल्कुल ही रास नहीं आता!
🙏🏻❤️

अखिलेश ✍️
बस्ती - उत्तर प्रदेश

18/08/2023

यह पोस्ट मैंने अखिलेश जी वाल से कापी किया है |
माननीय प्रधानमंत्री ने देश को आश्वस्त किया है कि उनके अगले टर्म में भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बन जायेगा। आप जानते ही हैं कि हम इस समय दुनिया में अर्थव्यवस्था की साइज के अनुसार पांचवें नंबर पर हैं। बड़े पैमाने पर बेरोजगारी होने के बावजूद भी हमारी अर्थव्यवस्था उछाल पर है। अभी करीब दस दिन पहले मैंने लिखा था कि सरकार को यह भी बताना चाहिए कि प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया में हमारा नम्बर कौन सा है? जब आप उत्तर खोजेंगे तो आपका चेहरा उतर जाएगा! आप चाहे जितना विकास कर लें, उसका लाभ अधिकांश आबादी को तभी मिलेगा जब उसकी अपनी आय ज्यादा होगी।

सरकार के संकेतों को आप समझें। आपको स्वरोजगार में हाथ आजमाना होगा। डिग्रियों के भरोसे बैठे रहेंगे तो नोन-तेल-लकड़ी के भी मोहताज हो जाएंगे। कमाई का रास्ता स्वयं तलाशिये। इतना कमाइये कि कुछ रिज़र्व में भी रख सकें। भविष्य को देखते हुए यह बेहद जरूरी है। किसी आपदा के समय सरकार के द्वारा दी जाने वाली फ़ौरी राहत ऊंट के मुँह में जीरा होती है। इस जीरे के भरोसे कभी न रहें... अपना हाथ जगन्नाथ।

बाइक और फोरव्हीलर..इन दोनों में रिज़र्व का सिस्टम होता है। कहीं जाते समय जब आप को रिज़र्व का सिग्नल मिलता है, आप फ़ौरन सतर्क हो जाते हैं। इसके बाद जब आप गाड़ी चलाते हैं तो सड़क के दोनों ओर निहारते रहते हैं। क्योंकि आप को पेट्रोल पंप की तलाश होती है ताकि आप अपने वाहन में फ्यूल डलवा सकें। जब आप ऐसा कर लेते हैं तो आगे के सफ़र के लिए निश्चिन्त हो जाते हैं। लेकिन रिज़र्व की भी एक क्षमता होती है। वो अपनी क्षमता तक ही गाड़ी को खींच सकता है, फिर भी प्रतिकूलता में या पेट्रोल पंप दूर होने पर वो ही आप का सहारा बनता है।

ऐसा ही अर्थरूपी फ्यूल आप के जीवन में भी होना चाहिए। तभी आप सीमित समय के लिए ही सही, लेकिन जीवन में आने वाली अफ़रातफ़री से बच सकते हैं। याद कीजिए कोरोना का वो दौर। जिनके पास अपने कल के लिए कुछ नहीं था, उन्हें कितनी ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ा था! उस कठिन दौर की यादें आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। जिस समय लॉक डाउन लगा, बड़े पैमाने पर बड़े शहरों से लोगों का अपने गाँवों और घरों की ओर पलायन हुआ। जो मुसीबतें उन्होंने तब देखी थी उसे देखकर वो लौटते हुए कह रहे थे, कि अब वो जीवन में दोबारा यहां वापस लौटकर नहीं आएंगे।

उनको अपने घरों तक पहुंचने में जो पापड़ बेलने पड़े थे उसे उनके सिवा कोई और नहीं जानता। भूख और प्यास से विह्वल कामगारों ने उस काल में शासन-सत्ता और समाज की जो बेरुखी देखी, उसके बारे में हम जैसे लोग सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं। किसी तरह गिरते-पड़ते, दबते-कुचलते जिस दिन वो घर पहुंचे थे, उस दिन सामने घर वालों को देखकर उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े थे। कई तो घर वालों से लिपटकर ऐसे रोये थे जैसे लड़कियां शुरू-शुरू में अपने ससुराल जाने पर रोती हैं। जो घर पहुंचा उसे यूँ लगा कि जैसे नया जीवन मिला है। पैसे की आवक बंद होने के बावजूद दिल को सुकून था कि कम से कम इसी बहाने भगवान ने घर-परिवार के साथ थोड़ा समय गुजारने का मौका तो दिया।

पैसा जीवन का ऐसा सत्य है, जो अगर न हो तो जीवन की सब कड़वी यादें भूल जाती हैं। आदमी ज्यादा समय ख़ाली नहीं बैठ सकता। जेब भरी हो तो ख़ालीपन नहीं अखरता, किंतु जेब के खाली होने पर चुभन होती है। इस चुभन का पहला अहसास मस्तिष्क को होता है। वही मस्तिष्क जिसका ख़्याली पुलाव पकाने में कोई सानी नहीं है। कोरोनाकाल में पति के घर आने पर पत्नियां खूब बढ़िया-बढ़िया बनाती रहीं औऱ 'कमासुत' लोग छक कर खाते रहे। कमर और पेट के वृद्धि की रफ़्तार भी शानदार तरीके से बढ़ी।

जेब ढीली होते ही खाने वालों के चेहरे पर से रौनक उतरने लगी। ओंठों से गुनगुनाहट और चेहरे से मुस्कुराहट गायब हो गई। प्यार से बोलने वालों की आवाज अब पड़ोसी भी सुनने लगे थे। ये सब क्यों हो रहा था, इसे समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं था।
जब महीने में लगातार पैसे आ रहे थे तब भी सारी जरूरतें नहीं पूरी हो रही थीं और उस समय तो...सब 'ठनाठन' था! रिज़र्व भी ख़त्म होने ही वाला था। घरवाली के चेहरे में जिन्हें चांद और सितारे दिख रहे थे उन्हें अब दिन में ही तारे दिखने लगे थे। जो कभी रोकर लौटे थे उन्हें भी जीवन की हक़ीकत ने 'रिवर्स' के लिए मजबूर कर दिया।

कभी आने के लिये जितनी मारामारी थी, उससे कहीं ज्यादा व्यग्रता अब जाने की थी। टिकट के लिए रोज चक्कर काट रहे थे, किंतु वो भी नहीं मिल रहा था। दोबारा ट्रेनों की शुरुआत हो चुकी थी, पर उनकी संख्या भी सीमित थी। 'चालू' में लंबी दूरी का सफर वर्जित था। सीटों के अनुसार ही टिकट बुक किए जा रहे थे। लोग अब सरकार को कोस रहे थे। कह रहे थे कि दस लाख लोगों में सौ-दो सौ को अगर कोरोना हो रहा है तो क्या आप लाखों लोगों के रोजी-रोजगार-कारोबार को चौपट कर देंगे! लोगों का धीरज डोल रहा था। जरूरी ख़र्चे कम नहीं हो सकते थे। कुछ गिने-चुनों को छोड़कर बाकी की स्थिति दिनों दिन बदतर हो रही थी।

यह बात गांठ बांध लीजिए..पैसा जिंदगी की गाड़ी का ईंधन है। ईंधन के अभाव में पहले गाड़ी की रफ़्तार कम होती है और फिर थोड़ी देर बाद वो स्टेशन के पहले ही खड़ी हो जाती है। रिज़र्व लगते ही सावधान हो जाइए, ताकि आपकी गाड़ी खड़ी न हो।
सादर 🙏🏻

अखिलेश✍️
बस्ती - उत्तर प्रदेश

15/08/2023

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