26/01/2021
कहां है स्त्रियों के हिस्से का गणतंत्र..
घर, दफ्तर, सफर, सरकार, समाज हर जगह स्त्रियों के लिए सिर्फ नसीहतें ही सुनने को मिलती हैं। यह आज से नहीं हो रहा। ये नसीहतें सदियों से बिना मांगे लुटाई जाती रही हैं। कोई कहता है कि स्त्रियों के खिलाफ अपराध इसलिए बढ़े हैं क्योंकि स्त्रियाँ रहन-सहन का सलीका भूल गई हैं। पंचायतें कहती हैं कि स्त्रियों को ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, वैसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए,यहाँ वहां वक्त-बेवक्त नहीं जाना चाहिए, फलां से नहीं बोलना चाहिए, ढिका को नहीं सुनना चाहिए। शुभचिंतक सलाह देते हैं जमाना खराब है। समय से घर पहुंच जाना चाहिए। ये तमाम नसीहतें लगभग वैसी ही हैं जैसी मां-बाप भी समय-समय पर स्त्रियों के कानों में फूंकते रहते हैं। क्या स्त्रियों को सिर्फ ये नसीहतें चाहिए? क्या तमाम जिम्मेदारियां सिर्फ स्त्रियाँ खुद ही उठाएं? भारत को गुमान है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, फिर भले यह विराट लोकतंत्र स्त्रियों को किसी भी किस्म की कोई आजादी नहीं देना चाहता है । 64 साल का हो गया गणतांत्रिक भारत, लेकिन स्त्रियों के हिस्से आज तक न तो आजादी आई और न जनतांत्रिक प्रभुसत्ता ही मिली। स्त्रियाँ कहने को आधी आबादी हैं, मगर स्त्रियों को अपने हिस्से का का गणतंत्र कब मिलेगा..?