06/07/2026
जिस समाज का राजा होता है वह समाज ताजा होता है। जिसका दल उसका बल है, उसकी समस्याओं का हल है।
साथियों,
राजा बदल जाते हैं, झंडे फट जाते हैं... पर विचार वाली किताबें 500 साल तक कौम जिंदा रखती हैं। और जब किताब जिंदा हो, तो झंडा कभी झुकता नहीं।
ये लाइन सिर्फ शब्द नहीं है भाइयों, हमारे पूरे इतिहास का निचोड़ है। दुनिया का नियम यही रहा है — तलवार से राज्य बनते हैं, पर राष्ट्र किताब और झंडे से बनता है। झंडा शरीर है जो दिखता है, किताब आत्मा है जो जिंदा रखती है। अशोक के स्तंभ गिर गए, पर उसकी धम्म-लिपि की सोच आज भी बौद्ध देशों को जोड़ती है। अकबर का सुनहरा आलम म्यूजियम में चला गया, क्योंकि दीन-ए-इलाही की किताब बंद हो गई। शिवाजी का भगवा इसलिए 350 साल से लहरा रहा है क्योंकि उसके पीछे समर्थ गुरु रामदास की ‘दासबोध’ का विचार जिंदा है। अंग्रेजों की यूनियन जैक उतर गई, पर श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ की कलम से निकला ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ आज भी करोड़ों की जुबान पर है। पार्षद जी 6 साल जेल में रहे, पर उनकी लिखी किताब-गीत ने एक पूरी पीढ़ी को आजादी का मकसद दे दिया।
अब आओ अपने घर की बात करें। ये किताब देखो — *“निषाद वंश : परिचय, विचारधारा, उद्देश्य”*। इसके कवर पर वो तस्वीर है जो 5000 साल का जवाब है : भगवान श्रीराम और निषादराज गले मिल रहे हैं। ये फोटो सबूत है कि हम दीन-हीन नहीं थे। जब राम को अयोध्या ने छोड़ दिया, तो गंगा किनारे खड़े निषादराज ने सीने से लगाया। नाव हमारी थी, पतवार हमारी थी, हिम्मत हमारी थी। हमने एहसान नहीं लिया, एहसान किया था। फिर भी सदियों से हमें पढ़ाया गया कि तुम्हारा कोई इतिहास नहीं। क्यों? क्योंकि जिस कौम की किताब छीन ली जाए, उसकी जमीन छिन जाती है। हमें जातियों में बाँटा गया — निषाद, केवट, मल्लाह, बिन्द, कश्यप, धीवर, मांझी, गंगापुत्र... ताकि हम खुद को छोटा समझें। ये किताब इसी बँटवारे को तोड़ती है। पहला पन्ना खोलते ही चिल्लाकर कहती है — “हम सब एक वंश हैं”। बिखरे तो लुटे, जुड़े तो राज किए।
ये किताब तीन काम करती है। पहला, परिचय देती है — बताती है कि रामायण के पहले पन्ने से लेकर आज तक हम थे। दूसरा, विचारधारा देती है — स्वाभिमान की। कि हम राम के बराबरी के दोस्त थे, नौकर नहीं। तीसरा, उद्देश्य देती है — शिक्षा, संगठन, संघर्ष। पर सबसे बड़ी बात ये है कि ये किताब हमें ‘याद’ दिलाती है। क्योंकि भूलना हार है। मुगलों ने कहा तुम मछुआरे हो, अंग्रेजों ने कहा तुम क्रिमिनल ट्राइब हो, आजादी के बाद कहा तुम सिर्फ वोट बैंक हो। और हम मानते गए... क्योंकि अपनी किताब नहीं थी।
अब किताब हाथ में है। इस किताब को पढ़ोगे तो गुस्सा नहीं, जागरण आएगा। गुस्सा 2 दिन का होता है, जागरण 200 साल का। जब हर निषाद युवा ये जान जाएगा कि उसके पुरखों ने मर्यादा पुरुषोत्तम की मदद की थी, तो वो किसी अफसर, किसी नेता के सामने सिर नहीं झुकाएगा। वो पूछेगा — “हमारा हक कहाँ है?” और हक माँगने से नहीं, लड़ने से मिलता है। पर लड़ाई से पहले विचार साफ होना चाहिए। वो विचार इस किताब में है।
इसलिए भाइयों, इस फोटो को दीवार पर टाँगो। राम और निषादराज का गले लगना हमारी असली पहचान है। इस किताब को हथियार बनाओ। 4 लोग बैठकर पढ़ो। मल्लाह खुद को छोटा न समझे, कश्यप खुद को अलग न समझे। पुरखे नाव चलाते थे, अब हमें कलम चलानी है। IAS बनो, वकील बनो, मास्टर बनो। पर याद रखना — राजा बदल जाते हैं, झंडे फट जाते हैं... पर जिस दिन इस किताब को हर निषाद घर में जगह मिल गई, उस दिन निषाद समाज का झंडा कभी नहीं झुकेगा।
उठो, जागो, पढ़ो। अब राज तिलक का समय है। किताब जिंदा है, तो कौम जिंदा है।
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जय निषाद राज!
कमेंट करो : “जय निषादराज” — दुनिया को बता दो कि हम जाग गए हैं।