सेब किवी बागवानी एवं मत्स्य पालन कि और अग्रसर युवा किसान समूह

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सेब किवी बागवानी एवं मत्स्य पालन कि और अग्रसर युवा किसान समूह सेब, किवी और मछली पालन करने वाले किसानों/बागवानों के लिए "बायो" या जैविक स्तर पर सहयोग मुख्य उद्देश्य

ये कोई तुक्का नहीं, Science है! 🥝 प्र”**सिर्फ पौधा लगाना और खाद देना काफी नहीं है, असली खेल तो तब शुरू होता है जब फूल झड...
28/05/2026

ये कोई तुक्का नहीं, Science है! 🥝 प्र”**
सिर्फ पौधा लगाना और खाद देना काफी नहीं है, असली खेल तो तब शुरू होता है जब फूल झड़ने के बाद फल का आकार बढ़ना शुरू होता है! 🚀
अक्सर बागवान भाई सोचते हैं कि फल अपने आप बड़ा हो जाएगा, लेकिन अगर आप कीवी का **Jumbo Size** और **Premium Quality** चाहते हैं, तो आपको इसके पीछे की साइंस और मैनेजमेंट को समझना होगा! 🧤
**नतीजा क्या रहा? 👇**
👉 फल का साइज हर बीतते दिन के साथ बढ़ता दिखा 📈
👉 मार्केट में मिलने वाला सबसे बेहतरीन International Size मिला 🥝
👉 फल की शेल्फ लाइफ और चमक एकदम लाजवाब रही ✨
**सवाल ये है कि कीवी का साइज बढ़ता कैसे है? 👇**
कीवी के फल का आकार दो सबसे महत्वपूर्ण स्टेज से होकर गुजरता है:
✔️ **Cell Division (कोशिका विभाजन):** फूल आने के शुरुआती 3 से 4 हफ्तों में फल के अंदर सेल्स का विभाजन होता है। इस समय आप जितना बेहतर न्यूट्रिशन मैनेजमेंट रखेंगे, फल के अंदर उतने ही ज्यादा सेल्स बनेंगे। यही आपके फल के बड़े साइज की असल बुनियाद है! 🧪
✔️ **Cell Expansion (कोशिका का फैलाव):** एक बार सेल्स बन जाने के बाद, बारी आती है उनको बड़ा करने की। इस स्टेज में सेल्स पानी और न्यूट्रिएंट्स को सोखकर फैलते हैं। अगर इस समय सही मैनेजमेंट न हो, तो पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है। ⚖️
**सक्सेस के 4 Pillar: 👇**
✔️ **Day by Day Irrigation:** कीवी पानी का दीवाना है। सेल एक्सपेंशन के दौरान जरा सा भी मॉइस्चर स्ट्रेस (सूखापन) फल के विकास को रोक देता है। हर दिन सही मात्रा में सिंचाई ही फल को लगातार बड़ा और रसीला बनाए रखती है। 💧
✔️ **Nutrient Management:** सही समय पर सही खुराक। पौधे को इस दौरान पोटैशियम और अन्य जरूरी तत्व चाहिए होते हैं ताकि सेल्स का साइज लगातार बढ़ता रहे। 🌾
✔️ **Orchard Thinking (बागवान की सोच):** पारंपरिक सोच को छोड़कर मॉडर्न तरीके अपनाना जरूरी है। जब आपकी थिंकिंग साइंटिफिक होगी, तभी बगीचे का रिजल्ट भी वर्ल्ड-क्लास होगा। 🧠
✔️ **Quality vs Quantity:** ज्यादा फल लेने के चक्कर में क्वालिटी से समझौता न करें। सही थिनिंग और मैनेजमेंट से ही हर एक फल को बराबर पोषण मिलता है। 💯
👉 **याद रखिए: 👇**
सेल डिवीज़न और सेल एक्सपेंशन का यह तालमेल ही आपके कीवी को बाजार में सबसे अलग खड़ा करता है। अगर यहाँ चूक गए, तो फल छोटा रह जाएगा।
अच्छी मेहनत और सही सोच ही अच्छी कमाई का रास्ता है। ⚠️
ये कोई किताबी ज्ञान नहीं है —
ये **Alpine Orchard** के बगीचे का सीधा अनुभव है। 🎬
⚠️ **चेतावनी:** अगर इस क्रिटिकल पीरियड में सिंचाई में लापरवाही हुई या न्यूट्रिशन मैनेजमेंट बिगड़ा, तो साइज बढ़ने की रफ्तार हमेशा के लिए थम जाएगी! 😳
🎬 **Kiwi Size & Quality Guide – Success Secrets 🥝**
👉 क्या आपके कीवी का साइज भी समय के साथ सही बढ़ रहा है या कोई दिक्कत आ रही है?
Comment में अपनी राय जरूर दें! 👇
👉 **Follow kre Alpine Sauhta Suraj Shimla**

21/03/2026

किसान भाइयों नमस्कार! आज हम एक बेहद महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं, जो सीधे आपकी फसल की पैदावार, गुणवत्ता और मुनाफे से जुड़ा हुआ है। अक्सर देखा गया है कि हमारे देश के लगभग 90% किसान NPK खाद के सही उपयोग और उनके सही समय को पूरी तरह नहीं समझ पाते। ज्यादातर किसान केवल 19:19:19 या 00:52:34 जैसे कुछ सीमित NPK पर ही निर्भर रहते हैं और यह मान लेते हैं कि इन्हीं के उपयोग से फसल की पैदावार बढ़ जाएगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि हर फसल को अलग-अलग अवस्थाओं में अलग-अलग पोषक तत्वों की जरूरत होती है, और यदि हम यह समझ लें, तो कम लागत में भी उत्पादन को कई गुना तक बढ़ाया जा सकता है।

सबसे पहले हमें यह समझना जरूरी है कि NPK का मतलब होता है नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) और पोटाश (K)। ये तीनों तत्व पौधे की वृद्धि, विकास और उत्पादन के लिए बेहद आवश्यक होते हैं। लेकिन इनका सही संतुलन और सही समय पर उपयोग ही असली सफलता की कुंजी है। उदाहरण के लिए, NPK 19:19:19 और 20:20:20 को संतुलित खाद माना जाता है और यह फसल की शुरुआती अवस्था के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं। जब पौधा छोटा होता है, जड़ें विकसित हो रही होती हैं और पौधे में नई शाखाएं बन रही होती हैं, तब इस प्रकार के संतुलित पोषण से पौधे की नींव मजबूत होती है।

इन खादों के उपयोग से पौधे में क्लोरोफिल की मात्रा बढ़ती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया तेज होती है और पौधे को अधिक ऊर्जा मिलती है। इसके परिणामस्वरूप पौधा तेजी से बढ़ता है, अधिक शाखाएं निकलती हैं और आगे चलकर अधिक फूल आने की संभावना बनती है। लेकिन यहां पर सबसे बड़ी गलती यह होती है कि कई किसान इन खादों का उपयोग पूरे सीजन में करते रहते हैं, जबकि जैसे ही पौधे में फूल और कलियां आना शुरू होती हैं, उसकी पोषण की जरूरत बदल जाती है।

फूल आने की अवस्था में पौधे को अधिक फॉस्फोरस की जरूरत होती है। इस समय NPK 12:61:00 जैसे खाद का उपयोग बहुत फायदेमंद होता है। इसमें फॉस्फोरस की मात्रा अधिक होती है, जो पौधे में अधिक से अधिक फूल बनने में मदद करता है। यह फूलों के ढांचे को मजबूत करता है और उनकी संख्या बढ़ाता है। लेकिन ध्यान रखने वाली बात यह है कि इस खाद को किसी अन्य कैल्शियम युक्त खाद के साथ मिलाकर नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे रासायनिक प्रतिक्रिया हो सकती है और पौधे को नुकसान पहुंच सकता है।

इसके बाद आता है फूल से फल बनने का चरण, जो कि सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस समय NPK 00:52:34 का उपयोग किया जाता है। यह खाद फॉस्फोरस और पोटाश का अच्छा स्रोत है और फूलों को फलों में बदलने में मदद करता है। यह फल की क्वालिटी को भी सुधारता है और पौधे की अनावश्यक बढ़वार को नियंत्रित करता है। लेकिन यदि आप केवल इसी खाद पर निर्भर रहते हैं, तो आप फसल की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाते।

अब बात करते हैं उन NPK खादों की जिनका उपयोग बहुत कम किसान करते हैं, लेकिन जिनका असर बेहद शानदार होता है। NPK 13:00:45 और 13:40:13 ऐसे ही खाद हैं। ये खासतौर पर उन स्थितियों में उपयोगी होते हैं जब आप फसल में दोबारा फ्लावरिंग लाना चाहते हैं या उत्पादन को बढ़ाना चाहते हैं। जैसे टमाटर, मिर्च, बैंगन, लौकी और अन्य सब्जी फसलों में पहली तुड़ाई के बाद इनका उपयोग करने से पौधे में नई ऊर्जा आती है और दोबारा अच्छी मात्रा में फूल और फल लगते हैं।

इसी तरह अंतिम अवस्था में NPK 00:00:50 का उपयोग किया जाता है, जिसे पोटाश का प्रमुख स्रोत माना जाता है। यह फसल की गुणवत्ता सुधारने में मदद करता है। इससे फलों का आकार, रंग, चमक और वजन बढ़ता है, जिससे बाजार में बेहतर कीमत मिलती है। कई किसान इस स्टेज को नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यही वह समय होता है जब फसल की असली क्वालिटी बनती है।
इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि NPK खादों का उपयोग सही मात्रा में ही करना चाहिए। अधिक मात्रा में उपयोग करने से पौधे को नुकसान हो सकता है और उत्पादन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। सामान्यतः स्प्रे के लिए 3 से 5 ग्राम प्रति लीटर पानी की मात्रा उपयुक्त होती है, जबकि फर्टिगेशन के माध्यम से 2 किलो प्रति एकड़ की मात्रा 5 से 7 दिन के अंतराल में दी जा सकती है। हालांकि, यह मात्रा फसल और मिट्टी के प्रकार के अनुसार बदल सकती है।

किसान भाइयों, यह समझना बहुत जरूरी है कि खेती अब केवल अनुभव का नहीं बल्कि विज्ञान का विषय बन चुकी है। यदि आप सही समय पर सही पोषण देते हैं, तो आपकी फसल न केवल अधिक उत्पादन देगी बल्कि उसकी गुणवत्ता भी बेहतर होगी। इससे आपको बाजार में अच्छा भाव मिलेगा और आपकी आमदनी में सीधा इजाफा होगा।

आज के समय में जो किसान वैज्ञानिक तरीके अपनाते हैं, वही सबसे ज्यादा सफल होते हैं। इसलिए जरूरी है कि आप भी अपनी खेती में बदलाव लाएं, नई तकनीकों को अपनाएं और सही जानकारी के आधार पर निर्णय लें।
अगर आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो, तो इस पोस्ट को लाइक जरूर करें, अपने किसान मित्रों के साथ शेयर करें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक यह महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचे। साथ ही कमेंट में जरूर बताएं कि आप अपनी फसल में कौन सा NPK सबसे ज्यादा उपयोग करते हैं और क्या आपको इससे अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। ऐसी ही उपयोगी और वैज्ञानिक खेती से जुड़ी जानकारी पाने के लिए हमारे पेज को फॉलो करना न भूलें।

कीट (Insects) और माइट (Mites) में अंतर पहचानें – सही दवा का करें प्रयोग।कई बार किसान कीट (Insects) और माइट (Mites) में अ...
18/03/2026

कीट (Insects) और माइट (Mites) में अंतर पहचानें – सही दवा का करें प्रयोग।
कई बार किसान कीट (Insects) और माइट (Mites) में अंतर नहीं पहचान पाते और माइट (मकड़ी) के नियंत्रण के लिए कीटनाशकों का प्रयोग कर देते हैं। ऐसी स्थिति में दवा प्रभावी नहीं होती और किसानों को अनावश्यक आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए किसी भी दवा के प्रयोग से पहले यह पहचानना बहुत जरूरी है कि समस्या कीट की है या माइट की।

कीट (Insects) की पहचान-
कीट का शरीर तीन भागों में विभाजित होता है (सिर, वक्ष और उदर), कीटों में तीन जोड़ी (कुल 6) टांगें होती हैं।अधिकांश कीटों में पंख भी पाए जाते हैं। जैसे– थ्रिप्स, सफेद मक्खी, जैसिड, एफिड, (चेपा) वीटिल आदि।

कीट के प्रकोप के लक्षण-
मिर्च व अन्य सब्जी फसलों की पत्तियाँ ऊपर की ओर नाव के आकार में मुड़ने लगती हैं।पौधों की बढ़वार प्रभावित होती है।

कीट नियंत्रण -
कीटों के नियंत्रण के लिए कीटनाशक दवाओं का प्रयोग किया जाता है, जैसे –मैलाथियॉन, नुवान (डाइक्लोर्वोस), साइपरमेथ्रिन , इमिडाक्लोप्रिड आदि।

माइट (Mites) की पहचान-
माइट का शरीर एक ही भाग जैसा दिखाई देता है। इनमें चार जोड़ी (कुल 8) टांगें होती हैं। ये बहुत सूक्ष्म होते हैं और अक्सर पत्तियों की निचली सतह पर पाए जाते हैं। उदाहरण – रेड स्पाइडर माइट (लाल माइट)।

माइट के प्रकोप के लक्षण-
पत्तियाँ नीचे की ओर छतरी या कप के आकार में मुड़ने लगती हैं।पत्तियों का रंग पीला या भूरा पड़ सकता है।

नियंत्रण-
माइट के नियंत्रण के लिए माइटनाशी (Acaricides) का प्रयोग करें जैसे –प्रोपरजाइट, फेनपायरोक्सिमेट, स्पाइरोमेसीफेन, डायकोफोल आदि।

सलाह-
दवा का प्रयोग करने से पहले कीट और माइट की सही पहचान अवश्य करें, तभी सही दवा का चयन करें। इससे फसल की सुरक्षा के साथ अनावश्यक खर्च से भी बचा जा सकता है।

कृषि, बागवानी, ग्रामीण विकास तथा सामाजिक विषयों से संबंधित ऐसी उपयोगी जानकारी से जुड़े रहने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद
साभार - Negi Bhai Sava GreatestHighlights

Pink bud spray schedule for apple farming
16/03/2026

Pink bud spray schedule for apple farming

बाग लगाते समय फेसिंग/पहाड़ी की दिशा का विशेष ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक होता है।उत्तर दिशा वाले बगीचे अपेक्षाकृत अधिक ठंडे...
08/02/2026

बाग लगाते समय फेसिंग/पहाड़ी की दिशा का विशेष ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक होता है।

उत्तर दिशा वाले बगीचे अपेक्षाकृत अधिक ठंडे होते हैं तथा इनमें धूप और सूर्य का प्रकाश कम समय तक रहता है।

दक्षिण दिशा वाले बगीचों में सूर्य की रोशनी अधिक समय तक रहती है, जिसके कारण यहाँ तापमान भी अधिक रहता है।

पूर्व दिशा वाले बगीचों में प्रातःकाल सूर्य की रोशनी मिलती है, जबकि पश्चिम दिशा वाले बगीचों में दोपहर के समय सूर्य का प्रकाश अधिक होता है।

बगीचे की फेसिंग/दिशा जानने के कई तरीके हैं। इसके लिए आप कम्पास का उपयोग कर सकते हैं, सूर्य की स्थिति का अवलोकन कर सकते हैं, अथवा ऑनलाइन मानचित्रों (Google Maps आदि) की सहायता ले सकते हैं।

सेब के पौधों को किस्मों के अनुसार अच्छी उपज के लिए 800 से 1600 घंटे चिलिंग (अर्थात 7° सेल्सियस से कम तापमान) की आवश्यकता होती है।

उत्तराखंड की पहाड़ियों में 6000 फीट से कम ऊँचाई पर स्थित दक्षिण दिशा वाले बगीचों में सेब के बागों में अनेक प्रकार के रोग एवं बीमारियाँ देखने को मिलती हैं।अतः ऐसे स्थानों पर सेब के बाग लगाने से बचना चाहिए। इन क्षेत्रों में सेब के स्थान पर अन्य फलदार पौधे जैसे आड़ू, प्लम, खुबानी, कीवी, पर्सिमोन, अखरोट आदि का रोपण अधिक उपयुक्त रहता है।

बगीचे की फेसिंग/दिशा जानने या नया बगीचा स्थापित करने हेतु संपर्क करें एवं लाइक,फोलो, और शेयर जरुर करें 🙏🙏🙏🙏🙏

पर्वतीय फल शोध केंद्र चौबटिया का स्वर्णिम इतिहासपर्वतीय फल शोध केंद्र (Hill Fruit Research Station), जिसे वर्तमान में औद...
08/02/2026

पर्वतीय फल शोध केंद्र चौबटिया का स्वर्णिम इतिहास
पर्वतीय फल शोध केंद्र (Hill Fruit Research Station), जिसे वर्तमान में औद्यानिक प्रशिक्षण एवं परीक्षण केंद्र के नाम से जाना जाता है, की स्थापना ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1932 में की गई। इसका उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों में फल उत्पादन से संबंधित वैज्ञानिक ज्ञान का विकास एवं प्रसार करना था, जिसमें पौधों का रोपण, प्रसारण, मृदा विज्ञान, खाद एवं सिंचाई प्रबंधन, कटाई-छंटाई, कीट एवं रोग नियंत्रण आदि प्रमुख विषय सम्मिलित थे। यह केंद्र चौबटिया, (रानीखेत) जनपद अल्मोड़ा में स्थापित किया गया।

प्रारंभिक वर्षों में इस शोध केंद्र के अंतर्गत उद्यान, भू-रसायन, कीट विज्ञान एवं पादप रोग विज्ञान अनुभाग स्थापित किए गए। यहां बागवानी विशेषज्ञों की एक सशक्त टीम कार्यरत रही, जिसमें आर. एस. सिंह (हॉर्टिकल्चरिस्ट), एन. के. दास (सॉइल केमिस्ट), यू. बी. सिंह (मायकोलॉजिस्ट) तथा आर. एन. सिंह (एंटोमोलॉजिस्ट) प्रमुख थे। बाद के वर्षों में,पौध दैहिकी (Plant Physiology), पादप अभिजनन (Plant Breeding), भेषज, मशरूम तथा कला एवं प्रचार-प्रसार जैसे अतिरिक्त अनुभाग स्थापित किए गए।

भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए पर्वतीय क्षेत्रों के विकास का सपना देखा और उसे मूर्त रूप देने के लिए वर्ष 1953 में माल रोड, रानीखेत (अल्मोड़ा) में किराए के भवनों में उद्यान निदेशालय एवं फल उपयोग विभाग, उत्तर प्रदेश की स्थापना की। यह उत्तर प्रदेश सरकार का एकमात्र निदेशालय था, जिसका मुख्यालय पर्वतीय क्षेत्र रानीखेत में स्थित था। डा० विक्टर साने इसके प्रथम निदेशक बने। लंबे समय तक संपूर्ण उत्तर प्रदेश का उद्यान निदेशालय रानीखेत में ही कार्यरत रहा।

वर्ष 1972 में चौबटिया फल शोध केंद्र के अधीन विभिन्न उप- अनुसंधान केंद्रों की स्थापना की गई, जिनमें पौड़ी गढ़वाल (श्रीनगर, कोटद्वार), चमोली (कोटियाल सैंण), टिहरी (सिमलासू), उत्तरकाशी (डुंडा), देहरादून (ढकरानी, चकरौता), नैनीताल (ज्योलिकोट, रुद्रपुर), अल्मोड़ा (मटेला) तथा पिथौरागढ़ (गैना-अंचुली) शामिल हैं। इन केंद्रों पर शीतोष्ण एवं समशीतोष्ण फलों, सब्जियों एवं मसाला फसलों से संबंधित किसानों की समस्याओं के समाधान हेतु शोध कार्य किए गए।

वर्ष 1988 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निदेशालय भवन को चौबटिया में स्थापित करने का निर्णय लिया गया तथा वर्ष 1992 में यह भवन पूर्ण रूप से तैयार हुआ। वर्ष 1990 में निदेशालय का नाम परिवर्तित कर “उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग, उत्तर प्रदेश” कर दिया गया।

राज्य गठन से पूर्व शोध केंद्र की स्थिति-

A चौबटिया (रानीखेत) शोध केंद्र -

कार्यरत प्रमुख अनुभाग थे—
उद्यान Horticulture
प्लांट ब्रीडिंग Plant Breeding
भू-रसायन Soil Chemistry
पादप रोग विज्ञान (Plant Pathology)
कीट विज्ञान (Entomology)
प्लांट फिजियोलॉजी
भेषज (Medicinal Plants)
मशरूम
कला एवं प्रचार-प्रसार

यहां एक मौसम विज्ञान वेधशाला (Meteorological Observatory) भी स्थापित की गई, जिसके माध्यम से पाला, ओलावृष्टि, आंधी-तूफान आदि मौसमीय परिवर्तनों का आंकलन किया जाता था।

विभिन्न अनुभागों का संचालन ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिकों द्वारा किया गया, जिनमें डा० सुनील कुमार बोस, डा० जितेंद्रनाथ सेठ, डा० आर. पी. श्रीवास्तव तथा डा० आर. के. पाठक प्रमुख रहे। इनके द्वारा किए गए शोध कार्यों का उल्लेख आज भी वैज्ञानिक जगत में किया जाता है। शोध केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा 500 से अधिक शोध पत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित किए गए। चौबटिया फल शोध केंद्र आगरा, कानपुर एवं कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. हेतु मान्यता प्राप्त केंद्र रहा है। अब तक 25 से अधिक शोधार्थियों ने यहां शोध कर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की है।लेखक स्वयं भी वर्ष 1971 से 1979 तक इस शोध केंद्र में ज्येष्ठ शोध सहायक के रूप में कार्यरत रहे तथा यहीं कार्य करते हुए वर्ष 1979-80 में कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।यहां एक समृद्ध पुस्तकालय की स्थापना की गई थी, जिसमें 12,000 से अधिक उच्चस्तरीय पुस्तकें एवं 15 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाएं नियमित रूप से उपलब्ध रहती थीं। चौबटिया शोध केंद्र से “Progressive Horticulture” नामक अंग्रेजी भाषा की त्रैमासिक पत्रिका भी नियमित रूप से प्रकाशित होती थी।

शोध केंद्र द्वारा हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, सिक्किम तथा पड़ोसी देशों भूटान, नेपाल एवं अफगानिस्तान को फल पौध रोपण सामग्री उपलब्ध कराई गई तथा वहां के प्रसार कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण भी प्रदान किया गया।

केंद्र की प्रमुख उपलब्धियां-

चौबटिया पेस्ट, बागवानों की पहली पसंद एवं प्रभावी फफूंदनाशक।

सेब, नाशपाती, गुठलीदार एवं गिरीदार फलों के लिए उपयुक्त मूलवृंतों का चयन।

सेब की चौबटिया प्रिंसेज, सेब की चौबटिया अनुपम, खुबानी की चौबटिया मधु एवं चौबटिया अलंकार जैसी उन्नत किस्मों का विकास।

सभी पर्वतीय जनपदों का सर्वेक्षण कर मृदा परीक्षण एवं सॉयल मैप का निर्माण।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सेवानिवृत्त प्रधान वैज्ञानिक डा० रतन सिंह चौहान ने भी चौबटिया शोध केंद्र को भारतीय उद्यान अनुसंधान का एक स्वर्णिम अध्याय बताया है और इसके संरक्षण एवं पुनर्जीवन की आवश्यकता पर बल दिया है।

चौबटिया शोध केंद्र की राज्य बनने के बाद की स्थिति-

वर्ष 2004 में चौबटिया सहित सभी शोध केंद्रों को गोविंद बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय, पंतनगर के अधीन कर दिया गया। पुनः वर्ष 2012–13 में इन शोध केंद्रों को उद्यान विभाग के अधीन वापस कर दिया गया। इस अवधि में अधिकांश वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अधिकारी सेवा- निवृत्त हो गए, किंतु उनके स्थान पर नए पदों का सृजन अथवा भराव नहीं किया गया परिणाम स्वरूप वैज्ञानिक पदों को सुनियोजित ढंग से समाप्त कर दिया गया और केंद्र की लगभग सभी गतिविधियाँ बंद होती चली गईं।

चौबटिया गार्डन, जो फल शोध केंद्र चौबटिया का प्रमुख प्रायोगिक प्रक्षेत्र था, में वर्षों की मेहनत से देश-विदेश एवं अन्य राज्यों से संकलित सेब, नाशपाती, आड़ू, प्लम, खुबानी, चेरी आदि की हजारों मूल्यवान किस्मों के फल वृक्षों को समूल काटकर नष्ट कर दिया गया। राज्य के नीति- निर्माताओं द्वारा इन बहुमूल्य एवं दुर्लभ फल प्रजातियों को कहीं भी संरक्षित अथवा सुरक्षित नहीं किया गया, जो एक अपूरणीय क्षति है।

B. प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र, श्रीनगर (गढ़वाल) -
इस केंद्र की स्थापना 1972–73 में उद्यान, भू-रसायन एवं मशरूम अनुभागों के साथ की गई। राजकीय पौधालय, श्रीनगर को इस शोध केंद्र का प्रायोगिक प्रक्षेत्र बनाया गया, जिसका उद्घाटन स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए वर्ष 1975 में किया।
वर्ष 1979 में इस केंद्र पर मुख्य उद्यान विशेषज्ञ का पद सृजित कर इसे मंडलीय शोध केंद्र का दर्जा दिया गया। डा० आर. एस. मिश्रा इस केंद्र के प्रथम मुख्य उद्यान विशेषज्ञ रहे। वर्ष 1992–93 में यहां प्लांट ब्रीडिंग, पादप रोग विज्ञान एवं कीट विज्ञान अनुभाग भी स्थापित किए गए।

प्रायोगिक प्रक्षेत्र में किन्नू संतरा एवं अन्य नींबू वर्गीय फलों, साथ ही अनार, आंवला एवं लो-चिलिंग आड़ू की विभिन्न किस्मों का रोपण किया गया। इन प्रयोगों के अत्यंत उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त हुए। आड़ू, आंवला, संतरा एवं अनार की उन्नतशील किस्मों का चयन कर क्षेत्र में रोपण हेतु संस्तुति की गई।

केंद्र द्वारा स्थानीय कृषकों को उन्नतशील सब्जियों की पौध तथा फल पौध सामग्री उपलब्ध कराई जाती रही। मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में नियमित रूप से मृदा परीक्षण किया गया तथा मशरूम उत्पादन हेतु स्पॉन तैयार कर उत्पादकों को वितरित किया जाता रहा।

राज्य गठन के बाद वर्तमान में इस केंद्र के सभी अनुभाग बंद पड़े हैं।

C. डुंडा, उत्तरकाशी -
इस शोध केंद्र पर बादाम, पिक्कनट एवं अखरोट की विभिन्न किस्में बाहर से लाकर रोपित की गईं तथा उन पर शोध कार्य किया गया। डा० मनमोहन सिन्हा, जो बाद में उत्तर प्रदेश में उद्यान निदेशक भी रहे, ने यहां कई वर्षों तक उद्यान विशेषज्ञ के रूप में सेवाएँ दीं। आज भी इस फार्म में उनके कार्यकाल में रोपित पिक्कनट की उन्नत किस्में फलत में हैं।

राज्य बनने के बाद इस केंद्र की सभी गतिविधियां बंद पड़ी हैं , बादाम के सभी पौधे समाप्त हो चुके हैं।

D. पिथौरागढ़ – गैना / अंचोली -
इस शोध केंद्र पर बादाम, पिक्कनट एवं अखरोट की विभिन्न किस्मों को बाहर से लाकर रोपण किया गया तथा उन पर अनुसंधान कार्य किए गए। डा० हीरालाल, जो राज्य बनने के बाद कुछ समय के लिए उद्यान निदेशक भी रहे, द्वारा यहां अखरोट पौधों के प्रसारण पर महत्वपूर्ण शोध कार्य किया गया।

वर्तमान में इस केंद्र को कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) को हस्तांतरित कर दिया गया है।

अन्य सभी उप-शोध केंद्रों की स्थिति भी लगभग इसी प्रकार की है।

राज्य गठन के समय यह आशा जगी थी कि अपनी सरकारें पर्वतीय उद्यान विकास की उस आधारशिला को—जिसे हमारे पुरखों ने स्थापित किया था—आगे बढ़ाएँगी और बागवानों के हित में उसे सुदृढ़ करेंगी।
किंतु आज यह ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक धरोहर उपेक्षा के कारण बंद होने के कगार पर खड़ी है।

जबावदेही से बचने हेतु  उद्यान कार्डों में नहीं की जाती एन्ट्री।भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित योजना हार्टिकल्चर टेक्नोलॉज...
08/02/2026

जबावदेही से बचने हेतु उद्यान कार्डों में नहीं की जाती एन्ट्री।
भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित योजना हार्टिकल्चर टेक्नोलॉजी मिशन की MIDH की Operational Guidelines के अनुसार योजना में किसानों को दिये जाने वाले निवेशों यथा फल पौध, दवा, खाद,सब्जी बीज, अदरक हल्दी लहसुन बीज आदि की उद्यान कार्ड में एन्ट्री का होना जरूरी Mandatory है।

उद्यान विभाग में यह महत्वाकांक्षी योजना राज्य के सभी जनपदों में 2004-5 से चल रही है ।अभी तक कई किसानों के उद्यान कार्ड नहीं बने हैं यदि बने भी है तो उनमें अधिकांश अनुदान Subsidy पर मिलने वाले निवेशों की एन्ट्री नहीं की जाती।हिमाचल प्रदेश में विगत दस वर्षों से सभी योजनाओं में अनुदान Subsidy पर मिलने वाले निवेशों की एन्ट्री उद्यान कार्ड में अनिवार्य (Mandatory) है।

अपने राज्य उत्तराखंड में किसानों का कहना है कि जो सामान योजनाओं में अनुदान Subsidy में दिया जाता है एक रजिस्टर मे नाम लिख़ कर साइन करवा लिए जाते है, फोन नम्बर भी लिए जाते है ,क्या सामान दिया गया यह बाद मे लिखा जाता है l सामान कम दिया जाता है पर ज्यादा दिखाया जाता है , अधिकतर सामान कर्मचारियों द्वारा बाजार मे बेच दिया जाता है।

एक रिपोर्ट -
उद्यान कार्ड, बागवानों के लिए पंजीकरण का प्रमाण-पत्र होता है, इस कार्ड के ज़रिए बागवानों को उद्यान विभाग की योजनाओं का लाभ मिलता है।

उत्तराखंड में उद्यान कार्ड के लिए, उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग में पंजीकरण कराना होता है. इसके लिए, ज़रूरी दस्तावेज़ जमा करने होते हैं।
ज़रूरी दस्तावेज़ -
आधार कार्ड।
खसरा खतौनी।
बैंक पासबुक की पहली पेज की कॉपी।
लघु सीमान्त कृषक (2 हेक्टेयर से कम ज़मीन वाले किसान) के लिए शपथ पत्र।
पंजीकरण के समय आधार से जुड़ा मोबाइल नंबर।

उद्यान कार्ड के फ़ायदे-
उद्यान विभाग की योजनाओं का लाभ मिलता है-
फल-पौध, सब्ज़ी बीज, अदरक, हल्दी, लहसुन बीज, दवाइयां, स्प्रे मशीन वगैरह की सहायता मिलती है।

भारत सरकार की योजनाओं जैसे कि पर ड्राप मोर क्रॉप, माइक्रोइरीगेशन, एकीकृत बागवानी विकास मिशन (एम.आई.डी.एच.), राष्ट्रीय कृषि विकास योजना वगैरह का लाभ मिलता है।

उद्यान विभाग, विभिन्न योजनाओं में बागवानों को अनुदान Subsidy पर फल पौध सब्जी बीज, अदरक हल्दी, लहसुन आलू बीज दवाइयां, स्प्रे मशीन आदि कई निवेश व उपकरण मुहैया कराता है योजनाओं में अनुदान Subsidy पर मिलने वाले निवेशों का सम्बन्धित बागवान के उद्यान कार्ड में अंकित होना अनिवार्य है।

जिन किसानों ने उद्यान कार्ड नहीं बनवाये है उनसे अनुरोध है कि वे अपने उद्यान सचल दल केन्द्र के प्रभारी से संपर्क कर अपना उद्यान कार्ड अवश्य बनवायें तथा योजनाओं के अन्तर्गत प्राप्त निवेशों यथा फल पौध, सब्जी बीज, अदरक, हल्दी, लहसुन आलू बीज, दवा, खाद आदि सभी प्राप्त निवेशों की एन्ट्री उद्यान कार्ड में अवश्य करवाएं एवं उद्यान कार्ड अपने पास ही रखें इससे योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता आयेगी ।

हिमाचल प्रदेश में विगत दस वर्षों से योजनाओं में अनुदान Subsidy पर मिलने वाले निवेशों की एन्ट्री उद्यान कार्ड में अनिवार्य (Mandatory) है। अपने राज्य उत्तराखंड में किसानों का कहना है कि जो सामान योजनाओं में दिया जाता है एक रजिस्टर मे नाम लिख़ कर साइन करवा लिए जाते है, फोन नम्बर भी लिए जाते है , क्या सामान दिया गया यह बाद मे लिखा जाता है l सामान कम दिया जाता है पर ज्यादा दिखाया जाता है अधिकतर सामान उद्यान विभाग के कर्मचारियों द्वारा बाजार मे बेच दिया जाता है।

उद्यान कार्ड में एन्ट्री होने से उद्यान विभाग की जबाव देही सुनिश्चित होगी साथ ही भविष्य में फल पौध बीज आदि निम्न स्तर निकलने पर किसान उपभोक्ता फोरम या नर्सरी एक्ट के तहत किसान अपना क्षति पूर्ति का दावा आसानी से कर सकते हैं। उद्यान कार्ड में इन्ट्री न होने के कारण क्षति पूर्ति का दावा पेश करने में कठिनाइयां हो सकती है।

अपनी जबाव देही से बचने हेतु उद्यान विभाग के कर्मचारी उद्यान कार्ड में एन्ट्री नहीं करते

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