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मुझे गर्व है,विश्व के सबसे बड़े राष्ट्रवादी राजनैतिक परिवार "भारतीय जनता पार्टी" की फिर से सदस्यता ग्रहण कर गौरवान्वित ह...
03/09/2024

मुझे गर्व है,
विश्व के सबसे बड़े राष्ट्रवादी राजनैतिक परिवार "भारतीय जनता पार्टी" की फिर से सदस्यता ग्रहण कर गौरवान्वित हूं। आमजन को राष्ट्र प्रथम की भावना, जनसेवा के संकल्प, अंत्योदय के प्रण और 'विकसित भारत-आत्मनिर्भर भारत' के विजन के साथ जोड़ने का आंदोलन है।

आइए, आदरणीय प्रधानमंत्री श्री जी के द्वारा प्रदत्त 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास' मंत्र को आत्मसात कर हम सभी कार्यकर्ता पूरी ऊर्जा और प्रतिबद्धता से इस राष्ट्रीय कार्य को सफल बनाएं।

मैं आप सभी से सविनय निवेदन करती हूं कि आप भी संगठन सर्वोपरि व राष्ट्र प्रथम के संकल्प के साथ विकसित भारत के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान देने हेतु भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता प्राप्त करें। इसके लिए आप 8800002024 पर एक मिस्ड कॉल करके या नमो एप के माध्यम से सरलतापूर्वक भाजपा के सक्रिय सदस्य बनकर राष्ट्र के पुनर्निर्माण की यात्रा में सहभागी बनें।

भारत माता की जय
#भाजपा_सदस्यता_अभियान

हनुमान चालीसा की रचना की कथा ,,,,ऐसा माना जाता है कि कलयुग में हनुमान जी सबसे जल्दी प्रसन्न हो जाने वाले भगवान हैं। बाबा...
24/08/2024

हनुमान चालीसा की रचना की कथा ,,,,

ऐसा माना जाता है कि कलयुग में हनुमान जी सबसे जल्दी प्रसन्न हो जाने वाले भगवान हैं। बाबा तुलसीदास ने हनुमान जी की स्तुति में कई रचनाएँ रची जिनमें हनुमान बाहुक, हनुमानाष्टक और हनुमान चालीसा प्रमुख हैं। हनुमान चालीसा की रचना के पीछे एक बहुत जी रोचक कथा है

आइये जानते हैं हनुमान चालीसा की रचना की कहानी :- हनुमान चालीसा की रचना,,,भगवान को अगर किसी युग में आसानी से प्राप्त किया जा सकता है तो वह युग है :- कलियुग। इस कथन को सत्य करता एक दोहा रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है :-

* कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना॥
सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि॥

भावार्थ:-कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है,॥

* कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।
गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास॥

भावार्थ:-यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है, (क्योंकि) इस युग में श्री रामजी के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार (रूपी समुद्र) से तर जाता है॥

कलियुग केवल नाम अधारा ,
सुमिर सुमिर नर उतरहि पारा।

जिसका अर्थ है की कलयुग में मोक्ष प्राप्त करने का एक ही लक्ष्य है वो है भगवान का नाम लेना। तुलसीदास ने अपने पूरे जीवन में कोई भी ऐसी बात नहीं लिखी जो गलत हो। उन्होंने अध्यात्म जगत को बहुत सुन्दर रचनाएँ दी हैं।

गोश्वामी तुलसीदास और अकबर,,,ये बात उस समय की है जब भारत पर मुग़ल सम्राट अकबर का राज्य था। सुबह का समय था एक महिला ने पूजा से लौटते हुए तुलसीदास जी के पैर छुए। तुलसीदास जी ने नियमानुसार उसे सौभाग्यशाली होने का आशीर्वाद दिया। आशीर्वाद मिलते ही वो महिला फूट-फूट कर रोने लगी और रोते हुए उसने बताया कि अभी-अभी उसके पति की मृत्यु हो गई है।

इस बात का पता चलने पर भी तुलसीदास जी जरा भी विचलित न हुए और वे अपने आशीर्वाद को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थे। क्योंकि उन्हें इस बात का ज्ञान भली भाँति था कि भगवान राम बिगड़ी बात संभाल लेंगे और उनका आशीर्वाद खाली नहीं जाएगा। उन्होंने उस औरत सहित सभी को राम नाम का जाप करने को कहा। वहां उपस्थित सभी लोगों ने ऐसा ही किया और वह मरा हुआ व्यक्ति राम नाम के जाप आरंभ होते ही जीवित हो उठा।

यह बात पूरे राज्य में जंगल की आग की तरह फैल गयी। जब यह बात बादशाह अकबर के कानों तक पहुंची तो उसने अपने महल में तुलसीदास को बुलाया और भरी सभा में उनकी परीक्षा लेने के लिए कहा कि कोई चमत्कार दिखाएँ। ये सब सुन कर तुलसीदास जी ने अकबर से बिना डरे उसे बताया की वो कोई चमत्कारी बाबा नहीं हैं, सिर्फ श्री राम जी के भक्त हैं।

अकबर इतना सुनते ही क्रोध में आ गया और उसने उसी समय सिपाहियों से कह कर तुलसीदास जी को कारागार में डलवा दिया। तुलसीदास जी ने तनिक भी प्रतिक्रिया नहीं दी और राम का नाम जपते हुए कारागार में चले गए। उन्होंने कारागार में भी अपनी आस्था बनाए रखी और वहां रह कर ही हनुमान चालीसा की रचना की और लगातार 40 दिन तक उसका निरंतर पाठ किया।

हनुमान चालीसा चमत्कार,,,चालीसवें दिन एक चमत्कार हुआ। हजारों बंदरों ने एक साथ अकबर के राज्य पर हमला बोल दिया। अचानक हुए इस हमले से सब अचंभित हो गए। अकबर एक सूझवान बादशाह था इसलिए इसका कारण समझते देर न लगी। उसे भक्ति की महिमा समझ में आ गई। उसने उसी क्षण तुलसीदास जी से क्षमा मांग कर कारागार से मुक्त किया और आदर सहित उन्हें विदा किया। इतना ही नहीं अकबर ने उस दिन के बाद तुलसीदास जी से जीवनभर मित्रता निभाई।

इस तरह तुलसीदास जी ने एक व्यक्ति को कठिनाई की घड़ी से निकलने के लिए हनुमान चालीसा के रूप में एक ऐसा रास्ता दिया है। जिस पर चल कर हम किसी भी मंजिल को प्राप्त कर सकते हैं।

इस तरह हमें भी भगवान में अपनी आस्था को बरक़रार रखना चाहिए। ये दुनिया एक उम्मीद पर टिकी है। अगर विश्वास ही न हो तो हम दुनिया का कोई भी काम नहीं कर सकते।
जय जय सियाराम जी

क्या करोगे ऐसी पढ़ाई का जब  #मांबाप से मिलने का वक्त नहीं हैक्या काम ऐसी उच्च शिक्षा का ??कहाँ जा रहे हम ?????एकलौते बेटे...
23/08/2024

क्या करोगे ऐसी पढ़ाई का जब #मांबाप से मिलने का वक्त नहीं है

क्या काम ऐसी उच्च शिक्षा का ??कहाँ जा रहे हम ?????

एकलौते बेटे ने सालभर माँ से बात तक नही,घर लौटा तो कमरे में माँ का कंकाल मिला।

भौतिक सुख सुविधाओं की अंधी दौड़ में हम इतने आगे निकल गए कि हमारा जमीर, माँ_बाप सब पीछे रह गए।।

अंग्रेजी शिक्षा का हश्र आपकी आंखों के सामने है। शिक्षा वही होती है जो हम अपने बच्चो को संस्कार दे सके। यह उन माता पिता के लिये सबक है जो कॉन्वेट स्कूलों में अकेले छोड़कर अपनी ड्यूटी पूरी समझते है। जिन बच्चो को आप लोग बचपन से लेकर उसके अपना कैरियर बनाने तक संभालते नही जुड़ते नही ओर उसके बाद आप इनसे साथ रहने का सपना पालते हो.... फिर वह सपना सपना ही रहता है।
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आज के सन्तानों की सच्चाई चाहे वो बेटा हो या बेटी
आशा सहनी की मौत की रूह कांपने वाली खबर अधिकतर ने नहीं पढ़ी होगी। क्योंकि उस खबर में मसाला नहीं था। खबर नहीं पढ़ने या पढ़कर इग्नोर करने की एक और वजह थी- उसमें हम सब आईने में अपनी तस्वीर देखने का साहस न उठा पाते। वैसे ये खबर २०१६ की है पर मैं आज साझा कर रही हूं आपसे।हर बेटा बेटी ऐसे नही होते जैसा कहानी में कहा है ,पर हा अभी भी कुछ घरों में ऐसा है।

खैर,बात पहले आशा सहनी की।
80 साल की आशा सहनी मुंबई के पॉश इलाके में 10 वी मंजिल पर एक अपार्टमेंट में अकेले रहती थी। उसके पति की मौत चार साल पहले हो गयी। अकेले क्यों रहती थी? क्योंकि उसका अकेला बेटा अमेरिका में डॉलर कमाता था। बिजी था। उसके लिए आशा सहनी डेथ लाइन में खड़ी एक बोझ ही थी। उसके लाइफ फारमेट में आशा सहनी फिट नहीं बैठती थी।
ऐसा कहने के पीछे मजबूत आधार है। बेटे ने अंतिम बार 23 अप्रैल 2016 को अपनी मां को फोन किया था। ह्वाटसअपर पर बात भी हुई थी। मां ने कहा-अब अकेले घर में नहीं रह पाती हूं। अमेरिका बुला लो। अगर वहीं नहीं ले जा सकते हो तो ओल्ड एज ही होम ही भेज दो अकेले नहीं रह पाती हूं।
बेटे ने कहा-बहुत जल्द वह आ रहा है। कुल मिलकार डॉलर कमाते बेटे के लिए अपनी मां से बस इतना सा लगाव था कि उसके मरने के बाद अंधेरी का महंगा अपार्टमेंट उसे मिले। जाहिर है इसके लिए बीच-बीच में मतलब कुछ महीनों पर आशा सहनी की खैरियत ले लिया करता था जो उसकी मजबूरी थी। अंदर की इच्छा नहीं। हर महीने कुछ डॉलर को रुपये में चेंज कराकर जरूर बीच-बीच में भेज दिया करता था।

चूंकि उसे इस साल अगस्त में आना था, तो उसने 23 अप्रैल 2016 के बाद मां को फोन करने की जरूरत नहीं समझी। वह 6 अगस्त को मुंबई आया। कोई टूर टाइम प्रोग्राम था। बेटे ने अपना फर्ज निभाते हुए, आशा सहनी पर उपकार करते हुए उनसे मिलने का वक्त निकालने का प्रोग्राम बनाया। उनसे मिलने अंधेरी के अपार्टमेंट गये। बेल बजायी। कोई रिस्पांस नहीं... लगा, बूढी मां सो गयी होगी। एक घंटे तक जब कोई मूवमेंट नहीं हुई तो लोगों को बुलाया। पता चलने पर पुलिस भी आ गयी। गेट खुला तो सभी हैरान रहे। आशा सहनी की जगह उसकी कंकाल पड़ी थी। बेड के नीचे। शरीर तो गल ही चुका था, कंकाल भी पुराना हो चला था। जांच में यह बात सामने आ रही है कि आशा सहनी की मौत कम से कम 8-10 महीने पहले हो गयी होगी। यह अंदाजा लगा कि खुद को घसीटते हुए गेट खोलने की कोशिश की होगी लेकिन बूढ़ा शरीर ऐसा नहीं कर सका। लाश की दुर्गंध इसलिए नहीं फैली कि दसवें तल्ले पर उनका अपना दो फ्लैट था। बंद फ्लैट से बाहर गंध नहीं आ सकी।

बेटे ने अंतिम बार अप्रैल 2016 मे बात होने की बात ऐसे की मानो वह अपनी मां से कितना रेगुलर टच में था। जाहिर है आशा सहनी ने अपने अपार्टमेंट में या दूसरे रिश्तेदार से संपर्क इसलिए काट दिया होगा कि जब उसके बेटे के लिए ही वह बोझ थी तो बाकी क्यों उनकी परवाह करेंगे।
वह मर गयी। उसे अंतिम यात्रा भी नसीब नहीं हुई।

आशा सहनी की कहानी से डरये। जो अज आशा सहनी के बेटों की भूमिका में है वह भी डरें,क्योंकि कल वह आशा सहनी बनेंगे। और अगर आप किसी आशा सहनी को जानते हैं तो उन्हें बचा लें।
पिछले दिनों इकोनॉमिस्ट ने एक कवर स्टेारी की थी। उसके अनुसार इस सदी की सबसे बड़ी बीमारी और सबसे बड़ा कष्ट सामने आ रहा है-मृ़त्यू का इंतजार। उसके आंकड़ा देकर बताया कि किस तरह यूरोप,अमेरिका जैसे देशा में मृत्यू का इंतजार सबसे बड़े ट्रामा बन रहा है। मेडिकल-इलाज और दूसरे साधन से इंसान की उम्र बढ़ी लेकिन अकेले लड़ने की क्षमता उतनी ही रही। मृत्यू का इंतजार आशा सहनी जैसे लोगों के लिए सबसे बड़ा कष्ट है। लेकिन मृत्यू और जीवन सबसे बड़ा लेवल करने वाला फैक्टर है। यह एक साइकिल है। आशा सहनी एक नियति है। कीमत है विकास की। कीमत है अपग्रेडेशन की। कीमत है उस एरोगेंस की जब कई लोगों को लगता है कि वक्त उनके लिए ठहर कर रहेगा !!!!!!!
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 # #बाज़ार में "सिल्क" साड़ी महँगी देख छोड़ती , कीमती कप मेहमानों की खातिर सहेजती, माँ की कंजूसी के लतीफ़े बना  हम उसको ही ह...
23/08/2024

# #बाज़ार में "सिल्क" साड़ी महँगी देख छोड़ती ,
कीमती कप मेहमानों की खातिर सहेजती,
माँ की कंजूसी के लतीफ़े बना
हम उसको ही हँसाते /
त्यौहारों पर नही देखा तुमको
फुर्सत में हमारे संग खुशियाँ मनाते /
रही तुम हमेशा उलझी रसोई में
नित बंदोबस्त करती /
तब अक्सर सोचती थी मैं
तुम नही जानती "जिंदगी" का स्वाद लेना ,
सीखा नही उठाना लुत्फ़ जश्न का
लेकिन अब महसूस कर पाती हूँ मैं
जिंदगी की सुराही में "ज़िम्मेदारियों " के सुराख से
रिस जाता है धीरे धीरे मसखरी का पानी /

वक्त निकाल कभी सँवरते नही देखा /
मैं झुंझलाती थी सौ दफ़ा तुम्हारी
हड़बड़ भरी गड़बड़ियों पर /
कैसे गर्म कढ़ाही से चटका लेती हो हाथ ?
बुरे लगते है ये जले निशान ,
कैसे एड़ियां फट जाती है आपकी ?
सब्जी "चापर बोर्ड" पर क्यों नही काटती?
उँगलियों पर चाकू की निशानियाँ
अच्छी नही लगती /
बैंटेक्स मत पहना करो ,
हर साड़ी में काला ब्लाउज़ जँचता नही /
झिड़कती तुम्हें कि साड़ी के भीतर से झलकता है
तुम्हारा बेमेल रंग का लहंगा /
हमारे खारिज़ सामान
तुम्हारा फैशन बने /
शर्मिंदा करती मैं तुम्हें तमाम लापरवाहियों पर ..../

अब मेरी पारी आई खेल में /
मैं खुद उसी धुरी के केंद्र में खड़ी
समझने लगी हूँ कि
औरत खो देती है सुध-बुध ,रूप, श्रृंगार, शौक , तरुणाई
"परिवार" को पोर पोर में धारण करते हुए /

अब मैं जब गीले बालों से ही
दौड़ती रसोई में घुसती हूँ
तुम सी लगने लगती हूँ /
भगवान को हर सुबह ताली बजा
नींद से उठाती हूँ तो
तुम सी लगने लगती हूँ /
रीति रिवाज़ के प्रबन्ध करने में
जाने कब गुजर जाते है व्रत त्यौहार /
रसोई, छत, आँगन में चरखी सी फिरती और
दिन ढले तुम सी डूबी डूबी लगती हूँ /
आँखों से पानी आने तक नही हँसी कब से जाने
तुम सी उलझी उलझी लगती हूँ /

कोई सहेली भी जब स्नेह से
भिगो देती है /
उस लम्हा उसके प्रेम में
तुम झलकने लगती हो माँ /
दूर होकर भी मैं कभी खुद में तो ,
कभी किसी आत्मीय रिश्तों से मिले दुलार में ,
तुमको ही टटोला करती हूँ /
मेरी "माँ" तब मैं तुम सी लगती हूँ ...
....

22/08/2024

मोड़ पर वाहन की गति धीमी रखें।

22/08/2024
सही निर्णय लिया गया है,लेकिन बहुत देर से...लोगो ने तो फोटो  डाल डाल कर पूरा सोशल मीडिया भर दिया है ,.... दोषी को वायरल क...
22/08/2024

सही निर्णय लिया गया है,लेकिन बहुत देर से...लोगो ने तो फोटो डाल डाल कर पूरा सोशल मीडिया भर दिया है ,.... दोषी को वायरल करना था लोगो ने उस बच्ची को ही वायरल कर दिया
हमारे पेज पे इसीलिए उस बच्ची की फोटो नही डाली गई...
वर्ना इंसाफ दिलाने के नाम पर कितनो ने ही जोश जोश में उस बच्ची की तस्वीरे शेयर की, अगर आपने भी शेयर की हो अपने वॉल पर तो प्लीज 🙏 उस तस्वीर को हटा दीजिए.. धन्यवाद

शहरी प्रॉपर्टी व कृषि भूमि खरीदने ,बेचने के लिऐ संपर्क करे9414246741
19/05/2024

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किसी  #विवाह समारोह या पार्टी में  #पुरुष के पेंट की ज़िप भी खुली रह जाय तो वो बड़ा  #लज्जित महसूस करता है....वहीं कुछ अ...
16/05/2024

किसी #विवाह समारोह या पार्टी में #पुरुष के पेंट की ज़िप भी खुली रह जाय तो वो बड़ा #लज्जित महसूस करता है....

वहीं कुछ अभिजात्य और आधुनिक वर्ग की #स्त्री जब तक अपनी उघड़ी हुई पीठ,नाभिदर्शन और अधखुले वक्ष न दिखा दे उसके कलेजे को ठंडक नहीं मिलती....

#मातृशक्ति अन्यथा न लें,🙏
पर,जो #सत्य है वो सत्य है....!!✍️✍️✍️

📮 यह कैसा मृत्युभोज है ???❓जिस भोजन को रोते हुए बनाया जाता है,जिस भोजन को खाने के लिए रोते हुए         बुलाया जाता हैं,ज...
15/04/2024

📮 यह कैसा मृत्युभोज है ???❓
जिस भोजन को रोते हुए बनाया जाता है,
जिस भोजन को खाने के लिए रोते हुए
बुलाया जाता हैं,
जिस भोजन को आँसू बहाते हुए
खाया जाता हैं,
उस भोजन को
मृत्युभोज कहा जाता है,
😩😩😩😭😭
जिस परिवार मे विपदा आई हो उसके साथ इस संकट की घड़ी मे जरूर खडे़ हो और तन,मन,और धन से सहयोग करे और मृतक भोज का बहिस्कार करे ।
भोजन तभी करना चाहिए जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो, खाने वाले का मन प्रसन्न हो, लेकिन जब खिलाने वाले एवं खाने वालों दोनो के दिल में दर्द हो, वेदना हो,
तो ऐसी स्थिति में कदापि भोजन नहीं करना चाहिए।
मृत्यु भोज हमारे ऊपर एक कलंक है इसे हम सबको मिलकर खत्म कर देना चाहिये ।।। 🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽
अजय गौड
रायसिंहनगर राजस्थान
09414246741
Everyone highlight
👏👏👏👏

‼️ ॐ नमो नारायण ‼️।। स्वास्तिक मन्त्र ।।ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्...
13/04/2024

‼️ ॐ नमो नारायण ‼️

।। स्वास्तिक मन्त्र ।।

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो ब्रिहस्पतिर्दधातु।। ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

स्वास्तिक चिन्ह को सनातन धर्म में बहुत ही पवित्र चिन्ह माना गया है। जिस प्रकार से ॐ और श्री शब्द का हिन्दू धर्म में बहुत महत्व है। उसी प्रकार से स्वास्तिक भी बहुत पवित्र और शुभता का प्रतीक है। इस प्रकार जल द्वारा चारों दिशाओं में छींटे लगाकर स्वास्तिक मंत्र का उच्चारण करने की क्रिया को स्वास्तिवाचन कहलाती है। स्वास्तिक के चिन्ह को मंगल का प्रतीक माना जाता है।

स्वास्तिक मंत्र।

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो ब्रिहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

स्वास्तिक मंत्र का अर्थ- हे इंद्र देव, जो महान कीर्ति रखने वाले है वह हमारा कल्याण करें। सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान के स्वरुप आप हैं पुषादेव हमारा कल्याण करें।जिसका हथियार अटूट है। हे गरुड़ भगवान – हमारा मंगल करो। हे ब्रहस्पति देव हमारा कल्याण करो।

स्वास्तिक मंत्र का प्रयोग शुभ और शांति के लिए किया जाता है। सभी धार्मिक कार्यों के प्रारम्भ के समय पूजा या अनुष्ठान के समय इस मंत्र द्वारा वातावरण को पवित्र और शांतिमय बनाया जाता है। इस मंत्र का उच्चारण करते समय चारों दिशाओं में जल के छींटा दिया जाता है।

स्वास्तिक शब्द को ‘सु’ और ‘अस्ति’ का मिश्रण योग माना गया है.‘सु’ का अर्थ है शुभ और ‘अस्ति’ से तात्पर्य है होना. इसका मतलब स्वास्तिक का मौलिक अर्थ है ‘शुभ हो’,‘कल्याण हो'।

स्वास्तिक का अर्थ

स्वास्तिक का अर्थ होता है - कल्याण या मंगल. इसी प्रकार स्वास्तिक का अर्थ होता है - कल्याण या मंगल करने वाला, स्वास्तिक एक विशेष तरह की आकृति है जिसे किसी भी कार्य को करने से पहले बनाया जाता है माना जाता है कि यह चारों दिशाओं से शुभ और मंगल चीजों को अपनी तरफ आकर्षित करता है।

चूंकि स्वास्तिक को कार्य की शुरुआत और मंगल कार्य में रखते हैं अतः यह भगवान् गणेश का रूप भी माना जाता है माना जाता है कि इसका प्रयोग करने से व्यक्ति को सम्पन्नता, समृद्धि और एकाग्रता की प्राप्ति होती है इतना ही नहीं जिस किसी पूजा उपासना में स्वास्तिक का प्रयोग नहीं किया जाता, वह पूजा लम्बे समय तक अपना प्रभाव नहीं रख पाती है।

स्वास्तिक का वैज्ञानिक महत्व:

यदि आपने स्वास्तिक सही तरीके से बनाया हुआ है तो उसमें से ढेर सारी सकारात्मक उर्जा निकलती है।

यह उर्जा वस्तु या व्यक्ति की रक्षा,सुरक्षा करने में मददगार होती है।

स्वास्तिक की उर्जा का अगर घर,अस्पताल या दैनिक जीवन में प्रयोग किया जाय तो व्यक्ति रोगमुक्त और चिंता मुक्त रह सकता है।

गलत तरीके से प्रयोग किया गया स्वास्तिक भयंकर समस्याएं भी पैदा कर सकता है।

स्वास्तिक का प्रयोग कैसे करें:

स्वास्तिक की रेखाएं और कोण बिलकुल सही होने चाहिए।

भूलकर भी उलटे स्वास्तिक का निर्माण और प्रयोग न करें।

लाल और पीले रंग के स्वास्तिक ही सर्वश्रेष्ठ होते हैं।

जहां-जहां वास्तु दोष हो वहां घर के मुख्य द्वार पर लाल रंग का स्वास्तिक बनायें।

पूजा के स्थान, पढाई के स्थान और वाहन में अपने सामने स्वास्तिक बनाने से लाभ मिलता है।

स्वास्तिक की चारों रेखाएं चार देवों का प्रतीक-

स्वास्तिक की चार रेखाओं की चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार लोक और चार देवों यानी कि भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश (भगवान शिव) और गणेश से तुलना की गई है। स्वास्तिक की चार रेखाओं को जोड़ने के बाद मध्य में बने बिंदु को भी विभिन्न मान्यताओं द्वारा परिभाषित किया जाता है।

स्वास्तिक लाल रंग से ही बनाया जाता है क्योंकि लाल रंग व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्तर को जल्दी प्रभावित करता है यह रंग शक्ति का प्रतीक माना जाता है सौर मण्डल में मौजूद ग्रहों में से मंगल ग्रह का रंग भी लाल है यह एक ऐसा ग्रह है जिसे साहस, पराक्रम, बल व शक्ति के लिए जाना जाता है. यही वजह है कि स्वास्तिक बनाते समय सिर्फ लाल रंग का ही उपयोग करने की सलाह दी जाती है।
‼️जय श्रीराम ‼️🚩🚩🙏🙏

11/04/2024

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