01/09/2025
उत्तराखण्ड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश का पर्वतीय क्षेत्र) लंबे समय से उपेक्षा का शिकार था।
यहाँ के लोग शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित थे।
पहाड़ों से लगातार पलायन हो रहा था।
नौकरियों में आरक्षण नीति (मंडल कमीशन) लागू होने पर पर्वतीय युवाओं ने अलग राज्य की माँग और तेज़ कर दी।
इसी माहौल में 1994 का आंदोलन जन्मा।
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आंदोलन की शुरुआत (1994)
जुलाई–अगस्त 1994 से उत्तराखण्ड में जगह–जगह आंदोलन तेज़ हो गया।
छात्र, किसान, बेरोजगार युवा और महिलाएं – सभी अलग राज्य की माँग को लेकर सड़कों पर उतर आए।
“अलग उत्तराखण्ड राज्य चाहिए” नारा घर-घर गूँजने लगा।
अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी, श्रीनगर, देहरादून, नैनीताल और कुमाऊँ–गढ़वाल के लगभग सभी जिलों में लोग प्रदर्शन कर रहे थे।
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खटीमा गोलीकांड (1 सितम्बर 1994)
खटीमा (उधम सिंह नगर) में हजारों आंदोलनकारी शांतिपूर्ण तरीके से रैली और नारेबाजी कर रहे थे।
बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे।
पुलिस ने आंदोलनकारियों को रोकने का प्रयास किया और स्थिति को नियंत्रित करने के नाम पर अचानक गोलियाँ चलाईं।
मौके पर ही 7 आंदोलनकारी शहीद हो गए और 165 से अधिक लोग घायल हुए।
महिलाओं और युवाओं पर भी लाठीचार्ज और बर्बर दमन किया गया।
खटीमा गोलीकांड के अमर शहीद
1. भगवान सिंह सिरौला
2. प्रताप सिंह
3. सलीम अहमद
4. गोपीचन्द
5. धर्मानन्द भट्ट
6. रमजीत सिंह खटीमा
7. रामपाल (बरेली)
परिणाम
खटीमा गोलीकांड ने पूरे उत्तराखण्ड में आक्रोश की ज्वाला भड़का दी।
2 सितम्बर को मसूरी गोलीकांड हुआ जिसमें भी कई लोग शहीद हुए।
इन घटनाओं ने आंदोलन को और व्यापक बना दिया और अंततः 9 नवम्बर 2000 को उत्तराखण्ड को अलग राज्य का दर्जा मिला।
लेकिन आज भी लोग कहते हैं – “हमें उत्तराखण्ड तो मिला, पर वह सपनों का उत्तराखण्ड नहीं बना। शहीदों का बलिदान तभी सार्थक होगा जब पलायन रुकेगा, भ्रष्टाचार खत्म होगा और पहाड़ के युवा अपने गांव में ही रोजगार पाएँगे।”
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