30/04/2026
मरने के बाद भी इस देश में गरीब को ये साबित करना पड़ता है कि वो सच में मर चुका है…
कितनी अजीब बात है ना… जहाँ इंसान की आख़िरी सच्चाई भी कागज़ों की मोहर पर टिकी होती है।
जीते जी वो सिस्टम से लड़ता है… और मरने के बाद भी उसकी आत्मा को फाइलों में अटकना पड़ता है…
किसी के पास पहचान नहीं, किसी के पास समय नहीं, और गरीब के हिस्से में हमेशा बस “प्रक्रिया” आ जाती
है…
जिम्मेदार कौन है?
सरकार… जो सिस्टम बनाती है
समाज… जो देखकर भी चुप रहता है
और हम… पढ़े-लिखे लोग…
जो समझते सब हैं,
पर बोलते बहुत कम हैं…
सच तो ये है— ये सिर्फ किसी एक की गलती नहीं,
ये उस पूरे सिस्टम की चुप्पी है
जहाँ इंसानियत धीरे-धीरे कागज़ों में खो जाती है…
काश… किसी दिन
इंसान की कीमत उसकी फाइल से नहीं,
उसकी ज़िंदगी से तय हो…