क्षत्रिय केवल राजपूत है

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क्षत्रिय केवल राजपूत है Kapil chhinta rajput

मै मेरे मित्र  #सुशांत शेखर सिंह कच्छवाहा को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं । जो कि 𝗕𝗶𝗼𝗰𝗵𝗲𝗺𝗶𝘀𝘁𝗿𝘆 और ड्रग डिजाइन में एक शोधक...
16/08/2025

मै मेरे मित्र #सुशांत शेखर सिंह कच्छवाहा को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं । जो कि 𝗕𝗶𝗼𝗰𝗵𝗲𝗺𝗶𝘀𝘁𝗿𝘆 और ड्रग डिजाइन में एक शोधकर्ता है ।

उनके बारे में जानकारी साझा करना चाहता हूं। वह हाल ही में 𝗖𝗮𝗺𝗯𝗿𝗶𝗱𝗴𝗲 ब्रिटेन से लौटे हैं। ब्रिटेन सुशांत 4 मार्च 2021 को गया था ।

वह मूल रूप से बिहार के सहरसा जिले के महुवा गांव के रहने वाले है ।

वर्तमान में एक ऐसी परियोजना पर काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य भारत को 𝗡𝗖𝗘𝘀 (𝗡𝗲𝘄 𝗖𝗵𝗲𝗺𝗶𝗰𝗮𝗹 𝗘𝗻𝘁𝗶𝘁𝗶𝗲𝘀 𝗘𝗻𝘁𝗶𝘁𝗶𝗲𝘀) के क्षेत्र में नवाचार के केंद्र के रूप में एंटीकैंसर गुणों और कई अन्य चिकित्सीय क्षमता के साथ विकास करना है।
*Nces क्या हैं?*

ये नए रासायनिक यौगिक (नई दवाओं के लिए अणु) हैं जो पहले कभी नहीं बनाए गए या उपयोग किए गए हैं, और गंभीर बीमारियों के इलाज में उपयोग किया जा सकता है।

*अब तक पूरा काम:*
सुशांत सिंह कछावा ने कम्प्यूटेशनल रसायन विज्ञान के माध्यम से बनाए गए 32 नए रासायनिक अणुओं को डिजाइन किया है।

इनमें से, 3 मुख्य अणु विभिन्न कैंसर (कोलोरेक्टल कैंसर, फेफड़े के कैंसर, रक्त कैंसर) का इलाज करने में मदद कर सकते हैं।

डिजाइन यह सुनिश्चित करता है कि भारत दवा निर्माण के लिए अपनी बौद्धिक संपदा प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने 𝗣𝗵𝗮𝗿𝗺𝗮𝗿𝗼𝗻, विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त CRO और CDMO, और उनके 𝗦𝘆𝗻𝘁𝗵𝗲𝘁𝗶𝗰 𝗦𝘆𝗻𝘁𝗵𝗲𝘁𝗶𝗰 𝗙𝗧𝗘 𝗽𝗿𝗼𝗽𝗼𝘀𝗮𝗹 𝗳𝗶𝗻𝗮𝗹𝗶𝘇𝗲𝗱 𝗳𝗶𝗻𝗮𝗹𝗶𝘇𝗲𝗱 के साथ एक गोपनीयता समझौते (CDA) पर हस्ताक्षर किए हैं।

सुशांत ने सीडीए पर हस्ताक्षर किए हैं और अन्य अमेरिका आधारित प्रतिष्ठित सीडीएमओ जैसे 𝗔𝗱𝗲𝘀𝗶𝘀 और *Richman* 𝗖𝗵𝗲𝗺𝗶𝗰𝗮𝗹 𝗜𝗡𝗖 के साथ मॉडल पर चर्चा की है।

वर्तमान में, सुशांत शेखर सक्रिय रूप से भारत के भीतर इन nces के संश्लेषण और निष्पादन के लिए संस्थागत या औद्योगिक सहयोग की मांग कर रहे हैं।

सुशांत को 14 अगस्त 2025 को पुणे में साइंटिस्ट सम्मलेन में आमंत्रित किया था । सुशांत सिंह ने वहां बहुत प्रभावशाली प्रजेंटेशन दिया । लगातार 2 घंटे तक अपना प्रेजेंटेशन दिया ।

इस वैज्ञानिक सम्मेलन में सभी वैज्ञानिक उनकी इतनी कम उम्र ओर विलक्षण प्रतिभा को देखकर चौंक गए ।क्योंकि सुशांत कैंसर के 70% एंटी मेडिसिन को रिसर्च करने में सफल रहा है ।

*परियोजना लक्ष्य:*

• हर साल 30+ नए जैवशक्रिय रासायनिक अणु बनाएं
• वैश्विक दवा खोज के लिए भारत में एक केंद्र स्थापित करें
• विज्ञान के माध्यम से नए रोजगार और औद्योगिक अवसर उत्पन्न करें

वर्तमान में, भारत में कैंसर निदान दवा का विकास बहुत सीमित है। यह परियोजना हजारों करोड़ रुपये के आर्थिक और वैज्ञानिक लाभ प्रदान कर सकती है और वैश्विक स्तर पर कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ने में मदद कर सकती है।

यूएसए और यूके में एनसीई का विकास हो रहा है। एंटी कैंसर रिसर्च परियोजनाओं के लिए 100 करोड़ रुपये तक की फंडिंग अमेरिका की कंपनी देने को तैयार है ।

सुशांत का संकल्प यह है कि यह बौद्धिक संपदा (आईपी) भारत से संबंधित होना चाहिए और इसका विकास भारत में ही होना चाहिए।

वह चाहते हैं कि यह शोध और इसके आर्थिक लाभ हमारे देश के वैज्ञानिकों, उद्योग और लोगों के लिए हो ताकि भारत वैश्विक दवा की खोज में भी एक नेता बन सके।

यह भारत की वैज्ञानिक उन्नति और आर्थिक विकास के लिए एक जबरदस्त अवसर का प्रतिनिधित्व करता है...

साभार :- शिव सिंह मेघसर...

साम्राज्य का अर्थ क्या होता है ? जब आपके दरबार में दूसरे शासक अपने लोगो को उपस्थित रहने के लिए भेजते हैं ।जब आपके युद्ध ...
28/07/2025

साम्राज्य का अर्थ क्या होता है ?

जब आपके दरबार में दूसरे शासक अपने लोगो को उपस्थित रहने के लिए भेजते हैं ।

जब आपके युद्ध अभियान में दूसरे शासक अपनी सेना को आपकी सहायता करने भेजते हैं।

जब बिना युद्ध के अलग अलग इलाकों के शासक आपको अपने क्षेत्र के राजस्व में से एक हिस्सा देते हैं ।

क्या इनमें से किसी भी कसौटी पर संघ द्वारा थोपा जा रहा तथाकथित साम्राज्य खड़ा उतरता है ? जवाब है नहीं फिर किस बात का साम्राज्य ?

अठारहवीं सदी में वो एक जुट होकर लड़े और इसका उन्हें लाभ मिला । उनके एकजुट होकर लड़ने की प्रशंसा भी होनी चाहिए ।लेकिन उनके दरबार में किसी राजा ने अपने प्रतिनिधि नहीं भेजे ।किसी ने बिना युद्ध लड़े इन्हें एक पैसा नहीं दिया ।इनके खिलाफ विद्रोह होते रहे ।किसी भी राजा ने इनके सैन्य अभियान में अपनी सेना को नहीं भेजा ।

दक्कन के इतिहास को जिस तरह से संघ थोप रहा है उसका बहुत ही ज्यादा नुकसान संघ को हो जाएगा। वो ना तो कोई साम्राज्य था और ना ही किसी हिंदू ने उन्हें सम्मान की नजर से देखा था। पिंडारियो के झुंड को हिंदू सेना बना कर मत थोपिए ।इसे किसी भी कीमत पर इस देश का कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति स्वीकार नहीं करेगा।

यह शर्म की बात है कि पूरी दुनिया जनरल जॉर्ज पैटन और इरविन रोमेल के बारे में जानती है, लेकिन असाधारण क्षमता वाले भारत के ...
15/07/2025

यह शर्म की बात है कि पूरी दुनिया जनरल जॉर्ज पैटन और इरविन रोमेल के बारे में जानती है, लेकिन असाधारण क्षमता वाले भारत के जनरल सगत सिंह राठौड़ को नहीं; वह लेफ्टिनेंट जनरल जो कभी एक युद्ध नहीं हारे व विश्व में भारत देश को महान सैन्य ताकतों वाले देश में शुमार किया।
इस से ज़्यादा दुख कि बात है कि भारतीय सेना तक के कोर्स में आज़ाद भारत के महानतम फौजी जनरल का नाम नही है। 4 लड़ाइयों के विजेता और बांग्लादेश के असल निर्माता को परम वीर चक्र तक से सम्मानित नही किया गया।

उन्होंने गोवा को आजाद कराया, ढाका पर विजय प्राप्त करके बांग्लादेश को आज़ाद कराया, चीन को हराया और पूर्वोत्तर विद्रोहियों को समाप्त किया, क्या यह भारत की अंतराष्ट्रीय सैन्य ताकतों में शुमार करना नहीं था ?

भारत-चीन युद्ध 1962 की हार के पांच साल बाद ही 1967 में हुई जंग में भारत जीता था और जीत के हीरो रहे थे राजस्थान के लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह राठौड़।

उन्हें केवल गुमनामी में भेजा गया। ऐसे निष्कृष्ट राजनीति वाले देश में आपके राष्ट्रवाद का परिणाम देखिए कि कुछ चंद लोगों को इसका श्रेय लेना था,इसलिए इस महान योद्धा के अद्वितीय योगदान को जानबूझकर अनदेखा कर दिया गया।
समय आने पर उनका प्रमोशन तक रोक दिया गया और उनके जूनियर अफसर को उनकी जगह प्रमोट कर दिया गया।
कल जनरल सगत सिंह राठौड़ को उनके 103 वे जन्मदिवस पर याद किया गया ।लेकिन ,वह ऐसी शख्सियत हैं,जिन्हें हर दिन याद ही नहीं किया जाना चाहिए ।
इस महान विभूति को भारत रत्न भी दिया जाना चाहिए ।

◆शौर्य, साहस की प्रतिमूर्ति सगत सिंह ◆
विशेषज्ञ मानते हैं कि सवा 6 फुट के लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह राठौड़ जैसा मिलिट्री जीनियस आज तक आज़ाद भारत में नही हुआ ।
1971 विजय दिवस के असली हीरो सगत सिंह राठौर के बारे में जानने के लिये 1971 की उस ऐतिहासिक लड़ाई से थोड़ा पीछे झांकने की जरूरत है ।

सन -1961 ।
जनरल सगत सिंह के सैनिक जीवन का सबसे बड़ा ब्रेक तब आया जब उन्हें 1961 में ब्रिगेडियर का प्रमोशन देकर आगरा स्थित 50 पैराशूट ब्रिगेड का कमांडर बनाया गया और वो भी तब जबकि वो पैराट्रूपर नहीं थे। जनरल सगत सिंह की जीवनी लिखने वाले मेजर जनरल वी के सिंह बताते हैं, "आप उनकी कार्य क्षमता का अंदाजा सिर्फ इससे ही लगा सकते हैं कि उनको उस समय पैरा ब्रिगेड की कमान दी गई जब उनकी उम्र चालीस साल से ज़्यादा थी । पैरा ब्रिगेड की कमान तब तक सिर्फ़ पैराट्रूपर को ही दी जाती थी, किसी इंफ़ेंट्री अफ़सर को नहीं।"

"ब्रिगेडियर होते हुए भी उन्होंने उस उम्र में पैरा का प्रोबेशन पूरा किया। जब आप इसे पूरा कर लेते हैं तभी आपको विंग्स मिलते हैं जिससे पैराट्रूपर पहचाना जाता है। सगत सिंह जानते थे कि जब तक उन्हें विंग नहीं मिलते उन्हें अपनी ब्रिगेड का सम्मान नहीं मिलेगा. उन्होंने जल्द से जल्द अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के लिए एक दिन में दो-दो जंप तक लिए । "

1961 के गोवा ऑपरेशन में जनरल सगत सिंह की 50 पैरा को एक सहयोगी भूमिका में चुना गया था, लेकिन उन्होंने उन्हें दी गई ज़िम्मेदारी से कहीं बढ़ कर काम किया और गोवा को इतनी तेज़ी से आज़ाद कराया कि सभी दंग रह गए।
मेजर जनरल वी के सिंह बताते हैं, "18 दिसंबर को ऑपरेशन शुरू हुआ और 19 तारीख को ही उनकी बटालियन पंजिम के पास पहुंच गई. वहाँ सगत ने ही यह कह कर अपनी बटालियन को रोका कि रात हो गई है । पंजिम आबादी वाला इलाका है । रात में हमला करने से कैजुएलटीज़ हो सकती हैं।"
"सुबह उन्होंने नदी पार की । गोवा की सरकार ने पुल वगैरह तोड़ दिए थे । इन लोगों ने एक तरह से तैर कर नदी पार की । स्थानीय लोगों का उन्हें बहुत समर्थन मिला । 36 घंटे में उन्होंने पूरे पंजिम पर कब्ज़ा कर लिया ।"

जून 1962 आते आते 50 पैरा गोवा का अपना ऑपरेशन पूरा कर वापस आगरा आ गई । तभी आगरा के मशहूर क्लार्क्स शीराज़ होटल में एक दिलचस्प घटना घटी ।
जनरल वी के सिंह बताते हैं, "जनरल सगत वहां सिविल ड्रेस में गए थे । वहाँ पर कुछ अमरीकी टूरिस्ट भी थे । वो बहुत ग़ौर से जनरल सगत को देख रहे थे । उन्हें लगा कि वो क्यों उन्हें देख रहे हैं । कुछ देर बाद उनमें से एक शख़्स ने आ कर उनसे पूछा कि क्या आप ब्रिगेडियर सगत सिंह हैं?"

"उन्होंने कहा हाँ, लेकिन आप ये क्यों पूछ रहे हैं? टूरिस्ट ने कहा कि हम अभी अभी पुर्तगाल से आ रहे हैं । वहाँ जगह जगह आपके पोस्टर लगे हुए हैं । आपके चेहरे के नीचे लिखा है कि जो आपको पकड़ कर लाएगा उसे हम दस हज़ार डॉलर का इनाम देंगे ।
"जनरल सगत ने कहा ठीक है आप कहें तो मैं आपके साथ चलूँ. अमरीकी पर्यटक ने हंसते हुए कहा कि अभी हम पुर्तगाल वापस नहीं जा रहे हैं ।"

इसके बाद जनरल सगत सिंह को 17 माउंटेन डिविजन का जीओसी बनाया गया । उनकी इसी पोस्टिंग के दौरान नाथुला में चीनी सैनिकों की भारतीय सैनिकों से ज़बरदस्त भिड़ंत हुई ।
1962 के बाद पहली बार जनरल सगत सिंह ने दिखाया कि चीनियों के साथ न सिर्फ़ बराबरी की टक्कर ली जा सकती है, बल्कि उन पर भारी भी पड़ा जा सकता है। जनरल वी के सिंह बताते हैं, "इत्तेफ़ाक से मैं उस समय वहीं पोस्टेड था । जनरल सगत सिंह ने जनरल अरोड़ा से कहा कि भारत चीन सीमा की मार्किंग होनी चाहिए । उन्होंने कहा कि मैं सीमा रेखा पर चलता हूँ । अगर चीनी विरोध नहीं करते हैं तो हम मान लेंगे कि यही बॉर्डर है और वहाँ पर हम फ़ेसिंग बना देंगे ।"

"जब उन्होंने ये करना शुरू किया तो चीनियों ने विरोध किया । उनके सैनिक आगे आ गए । कर्नल राय सिंह ग्रनेडियर्स की बटालियन के सीओ थे । वो बंकर से बाहर आकर चीनी कमांडर से बात करने लगे । इतने में चीनियों ने फ़ायर शुरू कर दिया । कर्नल राय सिंह को गोली लगी और वो वहीं गिर गए । "
"गुस्से में भारतीय सैनिक अपने बंकरों से निकले और चीनियों पर हमला बोल दिया । जनरल सगत सिंह ने नीचे से मीडियम रेंज की आर्टलेरी मंगवाई और चीनियों पर फ़ायरिंग शुरू करवा दी । इससे कई चीनी सैनिक मारे गए । चीनी भी गोलाबारी कर रहे थे लेकिन नीचे होने के कारण उन्हें भारतीय ठिकाने दिखाई नहीं दे रहे थें ।"

"जब सीज़ फ़ायर हुआ तो चीनियों ने कहा कि आप लोगों ने हम पर हमला किया है । एक तरह से उनकी बात सही भी थी । हमारे सारे शव चीनी क्षेत्र में पाए गए । बाद में सगत सिंह के अफ़सर उनसे नाराज़ भी हुए कि आपने ख़ामख़ा की लड़ाई कर दी ।"

"हमारे करीब 200 लोग हताहत हुए । 65 लोग तो मारे गए । चीन के करीब 300 लोग हताहत हुए । लेकिन एक चीज़ ध्यान देने लायक थी कि 1962 की लड़ाई के बाद भारतीय सैनिकों के मन में चीनियों के प्रति जो दहशत बैठ गई थी, वो जनरल सगत सिंह के कारण ख़त्म हो गई । भारत के जवान को अहसास हो गया कि वो भी चीनियों को मार सकते हैं । पहली बार वी गेव द चाइनीज़ अ ब्लडी नोज़."

जनरल सगत सिंह के सैनिक करियर का वो स्वर्णिम क्षण था जब उन्हें नवंबर 1970 में 4 कोर की कमान दी गई । इसने 1971 के बांग्लादेश युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई ।
जनरल रणधीर सिंह बताते हैं, "अगरतला आकर उन्होंने देखा कि यहां तो कोई इंफ़्रास्ट्रक्चर ही नहीं है । ब्रॉड गेज लाइन 1400 किलोमीटर दूर थी । उन्होंने फिर सब ठीक करने का बीड़ा उठाया । काफ़ी तादाद में इंजीनयर लगाए गए । हमारी किस्मत इस मामले में अच्छी रही कि पाकिस्तानी सेना ने मार्च से अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ अत्याचार शुरू कर दिए थे । इसकी वजह से बहुत सारे शरणार्थी त्रिपुरा आ गए थे ।"

जनरल सगत सिंह अपनी पत्नी और बेटे रणविजय सिंह के साथ
"इन शरणार्थियो की मदद से इंजीनियर्स ने इंफ़्रास्ट्रक्चर खड़ा किया । याद रखें, तकरीबन एक लाख सैनिकों को वहां आना था । करीब तीस हज़ार टन के सैनिक साज़ो-सामान को भी वहां पहुंचना था. 5000 गाड़ियां और 400 खच्चरों की व्यवस्था होनी थी । वहां एक सिंगल लेन रोड थी और पुल तो इतने कमज़ोर थे कि मीडियम रेंज गन भी उसके पार नहीं जा सकती थी ।"

युद्ध के दौरान जनरल सगत सिंह को फ़्लाइंग जनरल का नाम दिया गया । उनके एडीसी रहे लेफ़्टिनेंट जनरल रणधीर सिन्ह बताते हैं कि जनरल सगत सिंह सुबह छह बजे उठ कर हेलिकॉप्टर में जाते थे । अगरतला हैंडीक्रॉफ़्ट इंपोरियम ने उन्हें एक पिकनिक बास्केट दे रखी थी ।

"मैं उसमें कोल्ड काफ़ी और सैंडविचेज़ लेकर चलता था । पूरे दिन जनरल साहब लड़ाई का ऊपर से जाएज़ा लेते थे । कई बार होता था कि जहाँ लड़ाई हो रही होती थी, वहीं वो लैंड कर जाते थे । शाम जब अँधेरा हो रहा होता था तब हेलिकॉप्टर वापस लैंड करता था...फिर वो ऑपरेशन रूम में जाते थे ।"
"नौ बजे आल इंडिया रेडियो के समाचार सुनने के लिए हम आफ़िसर मेस में आते थे । हम कभी बीबीसी लगाते थे, तो कभी ऑल इंडिया रेडियो । रात दस बजे जनरल सगत सिंह हुक्म पास करते थे मुझे कि कल का कार्यक्रम ये है । आप सब को सूचना दे दीजिए । इसके बाद वो डिनर खा कर रात बारह बजे अपने हट में जाकर सो जाते थे । "

इसी तरह के एक हेलिकॉप्टर मुआयने के दौरान जनरल सगत के हेलिकॉप्टर पर पाकिस्तानी सैनिकों ने गोलियाँ चलाईं थीं ।
जनरल रणधीर सिंह बताते हैं, "जनरल साहब देखना चाह रहे थे कि कहां-कहां लैंडिंग हो सकती है। हम मेघना नदी के साथ-साथ जा रहे थे । आशुगंज ब्रिज के पास हेलिकॉप्टर पर नीचे से मीडियम मशीन गन का फ़ायर आया। पायलेट बुरी तरह से घायल हो गया। हम लोगों पर जो उसके पीछे बैठे हुए थे, उनके खून के छींटे और माँस के टुकड़े आकर गिरे, जनरल साहब के माथे पर भी एक चोट लगी।"

"लेकिन उस हेलिकाप्टर के सह पायलेट ने स्थिति पर नियंत्रण कर लिया और विमान को अगरतला वापस लाने में सफल हो गया। जब हेलिकाप्टर की जांच की गई तो पता चला कि उसमें गोलियों से 64 सुराख हो गए थे। जनरल सगत सिंह पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने एक और हेलिकॉप्टर लिया और दोबारा निकल पड़े निरीक्षण पर ।"
जनरल सगत सिंह को सबसे बड़ी वाह-वाही तब मिली जब उन्होंने चार किलोमीटर चौड़ी मेघना नदी को हेलिकॉप्टरों की मदद से एयर ब्रिज़ बना कर पार किया ।

बांग्लादेश युद्ध में जनरल सगत सिंह की कमांड में काम कर रहे लेफ़्टिनेंट जनरल ओ पी कौशिक बताते हैं, "उन दिनों हमारे पास एमआई 4 हेलिकॉप्टर हुआ करते थे । उनमें उन दिनों रात में लैंड करने की काबलियत नहीं होती थी । लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा सैनिक मेघना पार कराने के लिए जनरल सगत ने लाइटेड हैलिपैड बनाने का आदेश दिया । आपको अचंभा होगा कि हमने खाली मिल्क कैन में केरोसीन तेल डाल कर रोशनी की । एमआई हेलिकॉप्टरों में एक बार में आठ सैनिक बैठ सकते थे । हमने लगातार सैकड़ों फेरे लगा कर लगभग पूरी ब्रिगेड मेघना के पार उतार दी ।"

दिलचस्प ये है कि पूर्वी कमान के प्रमुख जनरल जग्गी अरोड़ा ने उन्हें मेघना नदी न पार करने के निर्देश दिए थे । जब वो मेघना नदी पार कर चुके तो उनके पास जनरल अरोड़ा का फ़ोन आया और दोनों के बीच ज़बरदस्त कहा-सुनी हुई ।

जनरल सगत सिंह अपनी कमांड के सैनिकों का हालचाल पूछते हुए
जनरल कौशिक बताते हैं, "मैं उस समय जनरल सगत सिंह की बगल में ही बैठा हुआ था । कोलकाता से आर्मी कमांडर अरोड़ा का फ़ोन आया कि आपने मेघना नदी क्यों पार की? जनरल सगत सिंह ने कहा आपने मुझे जो काम सौंपा था मैंने उससे ज़्यादा कर दिखाया है ।"

"इस पर अरोड़ा संतुष्ट नहीं हुए । सगत ने कहा मेरी ये ड्यूटी बनती है कि अगर मुझे किसी कदम से देश का फ़ायदा होता दिखाई देता हो तो मैं वो कदम उठा सकता हूँ । मैंने न सिर्फ़ मेघना नदी पार की है बल्कि मेरे सैनिक तो ढाका के बाहरी इलाके में भी पहुंच चुके हैं । जनरल अरोड़ा ने आदेश दिया, नहीं आप अपने आगे बढ़ चुके सैनिकों को वापस बुलवाइए । सगत सिंह ने कहा मेरा कोई सैनिक वापस नहीं लौटेगा । अगर आप इससे सहमत नहीं है तो आप दिल्ली तक ये मामला पहुंचाइए । इसके बाद सगत सिंह ने गुस्से से फ़ोन रखते हुए कहा वो मुझसे सैनिक वापस बुलाने के लिए कह रहे है... ओवर माई डेड बॉडी ।"

इतना सब कुछ करने के बाद भी जनरल सगत सिंह को कोई वीरता पुरस्कार नहीं दिया गया । उन्हें मिला तो सिर्फ़ और सिर्फ-भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान -पद्म भूषण । और तो और उनका प्रोमोशन भी नहीं हुआ ।
मेजर जनरल वी के सिंह बताते हैं, "ये बहुत दुख की बात है कि 1971 की लड़ाई में जिनका प्रदर्शन सबसे अच्छा था । उन्हें कोई वीरता पुरस्कार नहीं मिला । तमाम लोगों को वीर चक्र और महावीर चक्र मिले, लेकिन सगत सिंह को नहीं मिला ।दूसरे उनको प्रमोशन भी नहीं मिला । आर्मी चीफ़ न सही उनको आर्मी कमांडर तो बनाया जा सकता था । शायद इसकी वजह ये रही हो कि उनकी अपने ऊपर के अधिकारियों से अक्सर नोक-झोंक होती रहती थी ।"

जनरल सगत सिंह ने रिटायर होने के बाद अपनी पौत्री मेघना सिंह के साथ
अपना जीवन जयपुर में बिताया ।
उनकी पौत्री मेघना सिंह कहती हैं, "मेरे दादाजी एक ऐसे इंसान थे जिन्हें आप भीड़ में मिस कर ही नहीं सकते । वो छह फ़ीट तीन इंच लंबे थे । भारी आवाज़ थी उनकी । बहुत ही सौम्य । उनसे कोई भी बात कर सकता था । हम लोग हॉस्टल में रहते थे । जब हम छुट्टियों में घर आते थे तो वो हमारे फ़ार्म हाउस में उगने वाले फलों आम और चीकू को हमारे लिए करीने से प्लेट में काट कर हमारा इंतज़ार करते थे । खाने की मेज़ पर टेबिल मैनर्स के वो बहुत कायल थे । जयपुर में जब पहला पित्ज़ा हट खुला तो वो ही हमें पहली बार वहां लेकर गए थे ।"

जनरल सगत सिंह को भारत का सबसे निर्भीक जनरल माना जाता है । उन्होंने न सिर्फ़ कई ऑपरेशनों में जीत हासिल की बल्कि उस सबसे कहीं ज़्यादा काम किया जितना उन्हें करने के लिए दिया गया था । भारतीय सेना में उनको वही मुकाम हासिल है जो अमरीकी सेना में जनरल पैटन और जर्मन सेना में रोमेल को हासिल था ।

भारत- पाकिस्तान युद्ध, 1971
उनके साथ काम कर चुके जनरल ओ पी कौशिक बताते हैं, "मैंने कई लड़ाइयां लड़ी हैं । 1962 में भारत चीन युद्ध के समय मैं कैप्टेन था । उसके बाद 1965 और 1971 के युद्ध में भी मैं था । सियाचिन और कश्मीर में भी मैं जनरल आफ़िसर कमांडिंग रह चुका हूँ । अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि मेरे विचार से भारतीय सेना का बेस्ट फ़ील्ड कमांडर जनरल सगत सिंह हुआ है ।"

"वो डिस्ट्रीब्यूशन करने यानी लोगों को ज़िम्मेदारी देने में बहुत तेज़ थें । वो काम को डिसेंट्रिलाइज़ करते थे और अपने जूनियर्स पर पूरा भरोसा देते थे । उनमें मोटिवेट करने की भी बहुत ज़बरदस्त भावना थी । अगर कोई ग़लती हो जाती थी तो वो इसके लिए जूनियर को ज़िम्मेदार नहीं ठहराते थे बल्कि उसे खुद सुधारने की कोशिश करते थे और अक्सर उस ग़लती को अपने ऊपर ले लेते थे ।
सैन्य क्षेत्र को जयपुर के कई हिस्सों से जोड़ने वाले लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह मार्ग पर स्थापित उनकी प्रतिमा हर घड़ी सैनिकों और आम जन को देश सेवा की सीख देती है । जयपुर में स्थापित यह प्रतिमा ही नहीं,देश के कई हिस्सों में सगत की प्रतिमाएं स्थापित की गयी है । बस नहीं किया गया तो वह है इस वीर योद्धा को भारत रत्न दिए जाने का फैसला । वजह-वह राजनेता नहीं थे । योद्धा थे । योद्धा भी ऐसे जिन्होंने जिंदगी भर शौर्य,पराक्रम,वीरता की यश गाथाएं लिखी ।
सादर नमन !

आज शिरोमणि शहीद भाई मणि सिंह जी का पारंपरिक तिथि के अनुसार शहीदी दिवस है। भाई मणि सिंह जी परमार राजपूत वंश से थे और लाहौ...
09/07/2025

आज शिरोमणि शहीद भाई मणि सिंह जी का पारंपरिक तिथि के अनुसार शहीदी दिवस है। भाई मणि सिंह जी परमार राजपूत वंश से थे और लाहौर के नखास चौक पर मुगलों द्वारा शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर शहीद किए गए थे। धन्य धन्य साहिब श्री गुरु ग्रंथ साहिब महाराज जी का वर्तमान स्वरूप दशमेश पिता धन्य धन्य साहिब श्री गुरु गोबिंद सिंह महाराज जी द्वारा भाई मणि सिंह परमार जी के हाथों ही संकलित करवाया गया था।

विक्रम संवत 1791 में आज ही के दिन भाई मणि सिंह परमार जी के साथ लाहौर के नखास चौक पर मुगलों द्वारा शहीद किये गये कुछ सिखों के नाम इस प्रकार हैं:

1. भाई आलम सिंह जी राठौड़ राजपूत
2. भाई उदय सिंह जी राठौड़ राजपूत
3. भाई रण सिंह जी परमार राजपूत
4. भाई संगत सिंह जी परमार राजपूत
5. भाई जगत सिंह जी परमार राजपूत
6. भाई चितर सिंह जी परमार राजपूत
7. भाई गुरबख्श सिंह जी परमार राजपूत
8. भाई भूपत सिंह जी परमार राजपूत
9. भाई गुलजार सिंह जी परमार राजपूत
10. भाई मोहकम सिंह ओहरी जी
11. भाई औलिया सिंह जी
12. भाई कीरत सिंह जी
13. भाई श्रद्धा सिंह जी
14. भाई गुरमुख सिंह जी
15. भाई संत सिंह जी
16. भाई काहन सिंह जी
17. भाई चैन सिंह जी

स्रोत: गुरु दे शेर
इतिहासकार: डॉ. हरजिंदर सिंह 'दिलगीर'

बीसवीं सदी के शुरुआत से शिक्षा और व्यापार की महत्ता बढ़ती गई और यही क्षेत्र देश और दुनिया में उच्च वर्ग का निर्माण करने ...
22/04/2025

बीसवीं सदी के शुरुआत से शिक्षा और व्यापार की महत्ता बढ़ती गई और यही क्षेत्र देश और दुनिया में उच्च वर्ग का निर्माण करने लगे ।भारत में इन दोनों क्षेत्रों में बनिया,कायस्थ,ब्राह्मण,खत्री समाज पीढ़ियों से संबंधित थी तो इन्हें इसका लाभ भी मिला ।इसीलिए राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा और व्यापार से जुड़े क्षेत्र में आप इन समाजों को शीर्ष पर देखेंगे। यह अनुचित नहीं है ।पीढ़ियों की अर्जित पूंजी है ये इनकी।

इनके अलावा जो ग्रामीण समाज रहा है वो सामूहिक सामुदायिक भावना से ही आगे बढ़ पाया ।गुजरात का खेतिहर पाटीदार समाज व्यापार में आगे बढ़ा तो तेलुगु ग्रामीण जातियां शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर करने लगी ।यह संभव हो पाया क्योंकि इन समाजों ने इन क्षेत्रों में खुद को बेहतर बनाने के लिए संगठित होकर कार्य किए।

यही रास्ता राजपूतों को भी अपनाना होगा।अपने समाज के बच्चों को विशेष प्रशिक्षण मिले इसकी सामाजिक स्तर पर व्यवस्था करनी होगी।यदि यह दस वर्ष कर लिया तो धीरे धीरे समाज शिक्षा और व्यापार के क्षेत्र में आगे बढ़ने लगेगा।

मेरी एक बात ध्यान रखिए।किसी की सफलता से कभी जलना मत और विरोध तभी करना जब कोई आपके विरुद्ध षडयंत्र करे ।सफल होने के लिए सिर्फ परिश्रम और सही गाइडेंस मायने रखती है।

जवाहर सरकार आईएएस रहे हैं ,प्रसार भारती के सर्वेसर्वा थे ,संसद सदस्य रहे हैं।ये करनी सेना का आगरे का एक वीडियो साझा कर ल...
13/04/2025

जवाहर सरकार आईएएस रहे हैं ,प्रसार भारती के सर्वेसर्वा थे ,संसद सदस्य रहे हैं।ये करनी सेना का आगरे का एक वीडियो साझा कर लिखते हैं कि मेरा जन्म ऐसे भारत में नहीं हुआ था।

सही लिखा है जवाहर सरकार ने ,इन्होंने कभी देखा ही नहीं कि लाखों की भीड़ प्रदर्शन के लिए पहुंचे कहीं ,लेकिन एक रत्ती का भी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया हो ।ऐसी भीड़ जो किसी को नुकसान नहीं पहुंचाए उसे देखने के जवाहर सरकार आदि नहीं हैं।

वो तो आदि हैं हिंदू मुस्लिम के नाम पर बंगाल में होने वाले दंगों के।वो आदि हैं वामपंथ और कांग्रेस के बीच की राजनीति में होते हत्याओं के।ये आदि हैं मुजफ्फरनगर,भागलपुर जैसे दंगों के ,ये आदि हैं आरक्षण के नाम पर हरियाणा को जलता देखने के ,ये आदि हैं देखने के की किस तरह देश की राजधानी को घेर कर बैठ जाते हैं लोग,इनको आदत है मुंबई में हुए बम धमाकों को देखने के ,इनको आदत है पंजाब ,कश्मीर के अलगाववाद को देखने के ,इनको आदत है नक्सली के भेष में छुप जातीय नरसंहार करने वालो को देखने के ।

इनको कैसे यह स्वीकार होगा कि जिस समाज को अत्याचारी साबित करने को आजादी से पूर्व से इस देश में लोग लगे हैं वो लाखों की संख्या में इक्कठे होते हैं लेकिन किसी को एक खरोच नहीं लगती ।

जवाहर सरकार को मुर्शिदाबाद में हुआ दंगा नहीं दिखा लेकिन करनी सेना के विरुद्ध जहर उगलने से वो नहीं चुके।

मैं करनी सेना का कोई प्रशंसक नहीं हूं लेकिन किसी को उन्होंने एक खरोच भी नहीं लगने दिया ।फिर भी इस देश की सिविल सोसायटी उनके माध्यम से हमे उपद्रवी साबित करने पर तुली है।

सरकार जैसे लोग हमारा आस्तित्व पिछले सौ साल में खत्म नहीं कर पाए जब हमारा समाज सामूहिक चेतना क्या होती है उसे समझता भी नहीं था।

अब तो हम लड़ने आए हैं मैदान में ।इतनी आसानी से तो खत्म नहीं होंगे ।

01/04/2025

यह तो भला मानो मुसलमान का जो हमारे प्रति जो नफरत अन्य हिंदू जातियों में है उसको वह लोग झेल रहे हैं

अगर मुसलमान भारत में नहीं होते तो जो बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हो रहा है

वह ऐसा ही भारत के बाकी हिंदू हमारे साथ करते और आने वाले समय में यही होगा आप लिखकर ले लो
आने वाले समय में जो दंगे फसाद होंगे उसमें हमारे समाज को चुन चुन कर मर जाएगा खोज खोज कर मर जाएगा

आज भी आप देख लीजिए भारत में मुसलमान को प्रचार करने वाले अधिकतर हिंदू ही है मुगलों की यश गान गाने वाले हिंदू है मुगलों को महान बताने वाले हिंदू है मुसलमान के मदरसो में चंदा देने वाले भी हिंदू है
दरगाहों में चंदा देने वाले हिंदू है मजारों पर माथा फोड़ने वाले हिंदू है

परंतु आपके समाज के बलिदान हो चुके वीर महापुरुषों सती माता जोहर कर चुकी हमारी माता और बहनों का अपमान करने वाले भी हिंदू ही हैं।आपको मुग़लपूत, अत्याचारी, शोषक आदि परिभाषाएं हिंदुओं ने ही दी है।

आप कौन से हिंदुओं को बचाने की बात कर रहे हैं
जितना शत्रु आपको मुसलमान है उससे बड़ा शत्रु तो आपका खुद हिंदू ही है आप तो खुद चारों तरफ से शत्रुओं से घिरे हुए हो
नोट=नीचे कमेंट में यूट्यूब चेनल ओर fb का लिंक देखिए।एक बूढ़ा ब्राह्मण है और दूसरा जाट।

इतिहास लेखन ,धर्म की विवेचना और सामाजिक अध्ययन इस देश में सिर्फ राजनीति के लिए इस्तेमाल होती है और जहां राजनीति हो वहां ...
01/04/2025

इतिहास लेखन ,धर्म की विवेचना और सामाजिक अध्ययन इस देश में सिर्फ राजनीति के लिए इस्तेमाल होती है और जहां राजनीति हो वहां झूठ बोलना और भ्रमित करना दिखेगा ही।

हमारे यहां इतिहास को किस तरह राजनीति के लिए इस्तेमाल किया जाता है उसका कुछ उदाहरण यहां देता हूं :

सिपाही विद्रोह के समय ग्वालियर के सिंधिया अंग्रेजो के साथ थे इसीलिए गद्दार थे और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजो से लड़ी इसीलिए वो देश भक्त थी ।यही पढ़ाया जाता है।

लेकिन क्या कभी हमने सोचा कि रानी ने विद्रोह क्यों किया था ? डलहौजी ने उनके गोद लिए बेटे को झांसी गद्दी का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया था और रानी के तमाम कोशिशों के बाद भी उनके बेटे को राजा नहीं माना गया।
यदि अंग्रेज रानी की बात मान कर उनके दत्तक पुत्र को राजा मान लेते तो क्या रानी विद्रोह करती ?

यदि जवाब ना में है तो फिर यहां देश भक्ति और गद्दारी की बात कहां से आ गई ?

दूसरा उदाहरण अवध का देखिए : अवध की बेगम हजरत महल ने विद्रोह किया था वो इसीलिए देश भक्त कही गई ।लेकिन उन्होंने विद्रोह क्यों किया था ? क्या हम यह मालूम है ?

अवध के नवाब वाजिद अली ने विद्रोह से पूर्व अपनी मां को ब्रिटेन की महारानी के पास भेजा था ।उनकी मां बेगम किश्वर लन्दन गई थी ।यदि रानी उनकी बात मान लेती तो क्या अवध में विद्रोह होता ?

सिख और पंजाब के मुसलमान सिपाही विद्रोह के समय अंग्रेजो के साथ क्यों थे ?

राजपूत,भूमिहार ,ब्राह्मण ,अहीर ,जाट ,भील ,मीणा,गुजर ,मराठा और कई अनगिनत जातियां अंग्रेजो की सेना में क्यों थी ?

सिख ,मुसलमान अंग्रेजो की सेना में क्यों थे ?

अंग्रेजो के प्रशासनिक सेवा में कायस्थ ,ब्राह्मण ,खत्री क्यों बहुलता में थे ?

क्यों कुर्मी ,लोध,कोयरी ,जाट जैसी किसान जातियां अंग्रेजो के द्वारा बनाई गई कृषि व्यवस्था जिसमें भूमि का बंदोबस्त किया गया था उसके हिस्से थे ?

भीमा कोरेगांव की लड़ाई में महार क्यों अंग्रेजो के साथ मिलकर ब्राह्मण पेशवाओं के विरुद्ध लड़े ?

भारतीय सेना के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ भी तो अंग्रेजी सेना में रहे थे ।फिर क्या जिस तरह सिंधिया को गद्दार कहा जाता है ,क्या हम इन्हें भी वही बोल सकते हैं ?

यदि हम ईमानदारी से इसे समझने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि आज जो राष्ट्र की अवधारणा हमारे मन में है वो उन्नीसवीं सदी में नहीं थी !

बीसवीं सदी के शुरुआत से एक राष्ट्र की अवधारणा हमारे यहां विकसित होने लगी और इसीलिए इससे पूर्व मैं किसी को गद्दार नहीं मानता चाहे वो किसी भी जाति धर्म का क्यों ना हो।

इतिहास की विवेचना गलत तरीके से कर हम लोगों को मानसिक बीमार ही बनाते हैं और यही कार्य इस देश में इतिहासकारों ,राजनीति करने वालों ने की है।

जिन्होंने बहादुरी दिखाई उनका सम्मान है लेकिन गद्दार कोई नहीं था क्यों कि राष्ट्र की कोई अवधारणा ही नहीं थी।

कुछ लोग अशोक और अकबर को राष्ट्र को एकजुट करने वाला बोलते हैं और यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि उस समय राष्ट्र की अवधारणा थी ।क्या हमे नहीं मालूम कि देश भर में लोग इस इंतजार में बैठे रहते थे कि कब अशोक ,अकबर कमजोर होंगे और कब इनसे अलग हो हम अपनी सत्ता स्थापित कर लेंगे ।यह तो वही बात हो गई कि आज कोई राज्य यह सोचे कि कब दिल्ली कमजोर हो और हम भारत गणराज्य से बाहर निकल अपने राज्य को राष्ट्र बना ले।इसे हम राष्ट्र की अवधारणा का जागृत होना बोलेंगे ?

इतिहास को समय के हिसाब से समझने की जरूरत है ताकि इसका इस्तेमाल कर इतिहासकार,पत्रकार,राजनीति करने वाले लोग आम लोगो को भ्रमित कर उनको अपने फायदे के लिए इस्तेमाल ना कर लें।

नोट...अंग्रेजो की तरफ से लड़ने वाले ये सिख सिपाही थे लेकिन इन्हें मैं गद्दार नहीं मानता ।भारत आजाद होने से पहले कोई गद्दार नहीं था।सब ने अपने अपने हित को ध्यान में रख कार्य किया था।उस समय राष्ट्र की कोई अवधारणा ही नहीं थी ।हम एक हैं जैसी कोई सोच नहीं थी।

इतिहास को राजनीति के लिए इस्तेमाल करने वाले ही उस काल खंड में जिसमें राष्ट्र की कोई अवधारणा नहीं थी उसमें गद्दार ढूंढते हैं।

हालही में महाराणा सांगा को लेकर एक राजनेता ने अनुचित शब्द कहे है ।। उसने कहा है की महाराणा सांगा ने बाबर को भारत मे बुला...
31/03/2025

हालही में महाराणा सांगा को लेकर एक राजनेता ने अनुचित शब्द कहे है ।। उसने कहा है की महाराणा सांगा ने बाबर को भारत मे बुलाया था , साथ ही उस नेता ने बहुत ही अपमानजनक शब्द महाराणा सांगा के लिए कहे ।। यही शब्द एक जिंदा राजनेता के लिए कहा गया था, भीड़ पूरा स्टूडियो तोड़ आयी .... ।। किंतु भारतीय वीरों के सम्मान की परवाह कहां ??

बाबरनामा में कहीं इस बात का जिक्र नही है की बाबर को भारत मे श्री महाराणा सांगा ने बुलाया था ।। बाबरनामा के अनुसार तो बाबर को आमंत्रित करने वाला दौलत खान लौदी था ।। बाबरनामें जो जिक्र हुआ है, उसकी फोटो भी लगा दी है, आप खुद भी पढ़ सकते है ।।

समाजवादी पार्टी के नेता के मुंह पर यह प्रमाण मारिये । उसे बताइए की हिन्दू राजा गद्दार नही होते ।।

बाबरनामा का यह हिंदी रूपांतरण मुंशी देवी प्रसाद जी ने किया है, मुंशी देवीप्रसाद जी जोधपुर राज्य के सेवक हुआ करते थे ।। हिंदी जगत्‌ में मुंशी जी की ख्याति मुख्यत: प्राचीन इतिहास के प्रकांड पंडित के रूप में है। इन विषयों पर हिंदी और उर्दू में इन्होंने 50-60 ग्रंथों की रचना की थी जिनमें अकबरनामा, हुमायूँनामा, बाबरनामा, जहाँगीरनामा जैसे सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक आकरग्रंथ उल्लेख्य हैं।

वास्तविकता यह थी कि ..

1523 का वर्ष दिल्ली सल्तनत के लिए उथल-पुथल भरा था। सुल्तान इब्राहिम लोदी अपने ही रिश्तेदारों और दरबारियों से घिरे संघर्षों में उलझा हुआ था। सत्ता की इस रस्साकशी में पंजाब के शक्तिशाली सूबेदार, दौलत खान लोदी, भी शामिल थे, जो स्वयं इब्राहिम लोदी के शासन से असंतुष्ट थे। उनके साथ इब्राहिम के चाचा, आलम खान (अला-उद-दीन), भी थे, जो उस समय गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर द्वितीय की शरण में रह रहे थे।

जब पूरे साम्राज्य में विद्रोह की लहर उठी, तब दौलत खान को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी। स्थिति की गंभीरता को समझने के लिए उन्होंने अपने बेटे, गाजी खान लोदी, को दिल्ली भेजा, ताकि वह दरबार की गतिविधियों का आकलन कर सके। गाजी खान जब वापस लौटा, तो उसने अपने पिता को सतर्क किया कि सुल्तान इब्राहिम लोदी उनकी गवर्नरी छीनने की योजना बना रहा है। इस खतरे को भांपते हुए दौलत खान ने काबुल के शासक बाबर की ओर सहायता की दृष्टि से दूत भेजे।

बाबर ने इस अवसर को हाथ से जाने नहीं दिया और अपनी सेना के साथ पंजाब की ओर कूच कर गया। शीघ्र ही उसने लाहौर और दीपालपुर पर अधिकार कर लिया। दौलत खान लोदी और उनके पुत्र गाजी तथा दिलावर खान बाबर से मिलने दीपालपुर पहुंचे। परंतु जब बाबर ने लाहौर पर अपना नियंत्रण रखते हुए, दौलत खान को केवल जालंधर और सुल्तानपुर देने का प्रस्ताव रखा, तो वह गहरे असंतोष में डूब गए।

अपनी अपेक्षाओं पर पानी फिरता देख, दौलत खान और गाजी खान ने बाबर के सामने समर्पण करने के बजाय छिपने का रास्ता चुना। वहीं, उनके पुत्र दिलावर खान ने अपने ही पिता को धोखा दे दिया और बाबर का अधीनता स्वीकार कर ली। बाबर ने उसे सुल्तानपुर की सूबेदारी सौंपते हुए 'खान-ए-खाना' की प्रतिष्ठित उपाधि प्रदान की।
इस प्रकार, सत्ता और महत्वाकांक्षाओं के इस खेल में दौलत खान लोदी, जो कभी पंजाब के शक्तिशाली शासक थे, अपने ही पुत्र की बेवफाई के कारण इतिहास के पन्नों में विलुप्त होते चले गए, जबकि बाबर की शक्ति उत्तरी भारत में निरंतर बढ़ती गई।

पिलसूड का युद्ध मराठों व सवाई जयसिंह के बीच मालवा का सूबा सवाई जयसिंह के मनसब में था। राजधानी ऊजैन  पर मराठों ने अफगानों...
31/03/2025

पिलसूड का युद्ध मराठों व सवाई जयसिंह के बीच

मालवा का सूबा सवाई जयसिंह के मनसब में था। राजधानी ऊजैन पर मराठों ने अफगानों के साथ मिलकर आक्रमण की योजना बनाई। 12000 अफगान सैनिकों ने नर्मदा पार की मराठाओं की 42000 की सेना उनसे ऊजैन में आ मिलनी थी। सवाई जय सिंह ने फुर्ती दिखाकर इनको मिलने से रोक दिया। 10 अप्रेल 1715 को जयसिंह अफगानों से भिड गया।2000 सवार खोकर अफगान सेना भाग खडी हुयी जयसिंह ने उनका पिछा किया किंतु तभी खबर मिली की मराठा ऊजैन पर आक्रमण करने बढ रहे हैं। जयसिंह ने फिर फूर्ती दिखायी । एक दिन में 38 मील का मार्ग तय कर ऊजैन के बाहर मोर्चाबंदी कर ली। मराठा आगे नहीं बढ़े व लौटने लगे।जयसिंह ने पिछा किया दिन ढलते समय दोनों सेनाओं में मुठभेड हुयी। मराठों के पैर ऊखड गये। उनकी काफी क्षति हुयी। 7 मील जाकर मराठा रुके ,उन्होने वंही रात बीताने का निश्चय किया। जयसिंह अपनी सेना के साथ लड़ाई के मैदान में जमे रहे। उनके सैनिक थके हुये व भूखे थे,घोडों को भी दाना पानी नहीं मिला था किंतु जयसिंह ने उन्हे आराम करने की आज्ञा नहीं दी। दिन निकलने के तीन घंटे पहले मराठा शिविर पर हमला कर दिया। इस अकस्मात आक्रमण से घबरा कर मराठा फौज ने भाग कर जान बचाई। हडबडी में सारा सामान पिछे छोड गये।खानदेश से लूटी गयी बहुत सी मूल्यवान सामग्री ,फौजी साजो सामान । जय सिंह ने सैनिकों को सैनिकों को सामान लेने की खुली छूट देदी। सामग्री इतनी अधिक थी कि हर सैनिक कई वर्ष के लिए अमीर बन गया।
(संदर्भ- " सवाई जयसिंह " लेखक राजेन्द्र शंकर भट्ट )
Battle Of Pilsud;

Sawai Jai Singh Kachwaha & his 10,000 Rajputs routed the 12,000 strong Pathan army under Dilir Khan. The Rajputs lost about 500 men & the Pathans lost 2,000 men . Dilir Khan invited the Marathas for assistance

A large Maratha Army led by Khanderao Dabhade, Kanhoji Bhonsle & Ganga crossed Narmada. The famed Maratha cavalry was 42,000 strong & was in it's absolute prime, their general Khanderao Dabhade was a Charismatic leader

Rajputs had always been the best fighters on horseback & at once marched to confront the much larger Maratha Cavalry. For every Rajput soldier their were 4 Maratha soldiers , Marathas confident of their superior numbers charged at Rajputs, Rajputs charged back at greater pace and a battle ensued, Rajputs cut through the Maratha ranks & Marathas after struggling for 4 hours in vain against Rajput cavalry decided to retreat

Marathas lost heavily both in terms of men & horses . The Marathas took refuge in the mountains of Pilsud.Flushed by this victory, Rajputs pursued Marathas and surprised them.

Marathas were taken aback & fled leaving behind all the property & their injured comrades behind.

Source: Gupta & Bakshi, R.K.& S.R. (2008). Rajasthan Through the Ages vol. 4. Sarup & Sons. pp. 91, 92.
Sarkar Jadunath (1984). History of Jaipur: C. 1503-1938. Orient Longman. pp. 163–166.

27/02/2025

बौद्धिक क्षत्रियों द्वारा ऐतिहासिक तथ्यों के माध्यम से जो तर्क पूर्ण जवाब दिया जा रहा है ।

अब उस तर्कपूर्ण जवाब से,हर वर्ग के बौद्धिक लोग प्रभावित हो रहे हैं और सत्य को स्वीकार कर रहे हैं।

भारत विश्व में इकलौता देश है ।जहां पर लोकतांत्रिक सत्ता में प्रभाव रखने वाली, केवल कुछ जातियों के लोंगो द्वारा, योद्धा जाति का सुनियोजित अपमान किया जाता है।

जो लोग क्षत्रियों को अपमानित करने का प्रयास कर रहे हैं। एक बार वह स्वयं को क्षत्रियों के स्थान पर रखकर देख लें।

अगर क्षत्रियों के स्थान पर ,अगर उनकी जाति होती और उनके पूर्वजों के बलिदान का मजाक उड़ाया जाता। तो क्या वह इसे स्वीकार करते?

इस लोकतंत्र में भी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों और क्षेत्रीय दलों का संचालन करने वाली कुछ जातियां हीं , क्षत्रिय विरोध को सुनियोजित रूप से हवा देती रहती हैं।

कुछ जातियों के राजनीतिक हित क्षत्रिय विरोध में निहित हैं। अतः वह अन्य जातियों को क्षत्रिय विरोध के लिए उकसाकर, क्षत्रियों को अन्य वर्गों के साथ,राजनीतिक एवं सामाजिक संघर्ष में उलझाए रखना चाहती हैं।

वर्तमान बौद्धिक क्षत्रिय ,कुछ जातियों के इस राजनीतिक एवं सामाजिक षड्यंत्र को समझ चुका है और उसका समय-समय पर तथ्यात्मक रूप से पर्दाफाश भी करता रहता है ।

अल्पसंख्यक वर्ग के खान सर को, क्षत्रियों का योगदान और बलिदान समझ में आ रहा है ।

लेकिन भारत में क्षत्रियों से ईर्ष्या रखने वाली तथाकथित जातियां एहसान फरामोश हो चुकी हैं।

सत्ता ही इस विरोध को संचालित करती है ।तो अब क्षत्रियों को भी स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता के द्वारा ,अन्य सहयोगी जातियों एवं वर्गों के साथ समन्वय स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए।

और ऐसे राष्ट्रीय राजनीतिक दलों एवं क्षेत्रीय दलों को सत्ता से बाहर करना चाहिए ।जो क्षत्रियों के विरोध को सुनियोजित रूप से संचालित करते हैं।

राजन्य क्रॉनिकल्स टीम

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Sirmour Rajgarh
Sirmour

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