20/02/2026
🚜 शराब सस्ती, डोडा पोस्त पर पाबंदी क्यों? किसानों का सरकार से सीधा सवाल!
डोडा पोस्त से पाबंदी हटाने की मांग अब एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले चुकी है। गांव की चौपालों से लेकर सड़कों तक, किसानों की आवाज़ एक साथ गूंज रही है। उनका साफ कहना है कि मौजूदा नीति ने समाज से नशा तो खत्म नहीं किया, बल्कि तस्करों को ताकतवर और किसानों को तबाह कर दिया है।
किसानों ने सरकार की नीतियों पर कुछ गंभीर और सीधे सवाल उठाए हैं:
दोहरी नीति: 200 रुपये में शराब खुलेआम उपलब्ध है, जिससे आए दिन झगड़े और हादसे होते हैं। फिर भी सस्ती शराब को बढ़ावा और पारंपरिक डोडा पोस्त पर सख्त पाबंदी क्यों?
कालाबाज़ारी का खेल: पाबंदी से पहले जो डोडा 200 रुपये किलो मिलता था, आज वह ब्लैक मार्केट में 10 से 12 हज़ार रुपये किलो तक बिक रहा है। इससे सिर्फ तस्करों की जेबें भर रही हैं।
परंपरा बनाम अपराध: किसानों का मानना है कि गांवों में डोडा पोस्त का सेवन शांतिपूर्ण रहा है, जबकि शराब घरेलू हिंसा और अशांति का बड़ा कारण है।
किसान बर्बाद, तस्कर आबाद: किसान इसे कानूनी रूप से उगा या बेच नहीं सकता, लेकिन तस्करों के ज़रिए यह आसमान छूती कीमतों पर हर जगह उपलब्ध है।
यह लड़ाई अब सिर्फ एक फसल या उत्पाद की नहीं रही; यह किसान के हक़, सम्मान और न्याय की लड़ाई बन चुकी है। किसानों की स्पष्ट मांग है कि पाबंदी हटाई जाए ताकि कालाबाज़ारी रुके और तस्करों पर लगाम लगे।
अब गेंद सरकार के पाले में है—संवाद या संघर्ष?
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