Vastu Guru

Vastu Guru Vastu can fruitfully be applied to the areas of our activities. We should initially concentrate on areas, which affect our life, i.e., where we live and work.

"Vastu" is the science of building and essentially the art of balancing nature with man-made environment and correct placement of man in such a manner so as to get the maximum benefits of the energy emanated by natural and man-made environment. We all care about our homes and spend time, effort and money, trying to make them more comfortable. For most of us it represents one of the biggest investm

ents we ever make. Our home (the architecture of our homes) can damage our health, the air we breathe and the water we drink, without our even being aware of it. Similarly, at the places where we work, environmental stresses contribute to overall load, preventing us to reach our full potential. Resisting these external forces becomes more important for growth and development. We are enveloped by a series of environmental hazards in our day-to-day life, which leads us to inevitable and endless physical and mental disorders. Harmony with the environment, peace for the spirit and health for the human beings are the criteria for healthy homes. These have deep roots in the human experience and in traditions of home building, according to the cultures across the world. This section provides basic concepts of Vastu principles and deals with:

वास्तु ज्ञानसनातन धर्म के अनुसार गृह प्रवेश से पहले 20 बातें     घर चाहे स्वयं का बनाया हो या फिर किराये का। जब हम प्रवे...
19/12/2025

वास्तु ज्ञान

सनातन धर्म के अनुसार गृह प्रवेश से पहले 20 बातें

घर चाहे स्वयं का बनाया हो या फिर किराये का। जब हम प्रवेश करते हैं तो नई आशा, नए सपने, नई उमंग स्वाभाविक रूप से मन में हिलोर लेती है। नया घर हमारे लिए मंगलमयी हो, प्रगतिकारक हो, यश, सुख, समृद्धि और सौभाग्य की सौगात दें यही कामना होती है।

आइए जानें 20 जरूरी बातें जो आपको नए घर में प्रवेश के समय याद रखनी चाहिए।

1. सबसे पहले गृह प्रवेश के लिए दिन, तिथि, वार एवं नक्षत्र को ध्यान में रखते हुए, गृह प्रवेश की तिथि और समय का निर्धारण किया जाता है। गृह प्रवेश के लिए शुभ मुहूर्त का ध्यान जरुर रखें। एक विद्वान ब्राह्मण/वेदपाठी की सहायता लें, जो विधिपूर्वक मंत्रोच्चारण कर गृह प्रवेश की पूजा को संपूर्ण करता है।

2. माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ माह को गृह प्रवेश के लिए सबसे सही समय बताया गया है। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, पौष इसके लिहाज से शुभ नहीं माने गए हैं।

3. मंगलवार के दिन भी गृह प्रवेश नहीं किया जाता विशेष परिस्थितियों में रविवार और शनिवार के दिन भी गृह प्रवेश वर्जित माना गाया है। सप्ताह के बाकि दिनों में से किसी भी दिन गृह प्रवेश किया जा सकता है। अमावस्या व पूर्णिमा को छोड़कर शुक्लपक्ष 2, 3, 5, 7, 10, 11, 12, और 13 तिथियां प्रवेश के लिए बहुत शुभ मानी जाती हैं।

4. पूजन सामग्री- कलश, नारियल, दीपक, फूल शुद्ध जल, कुमकुम, चावल, अबीर, गुलाल, धूपबत्ती, पांच शुभ मांगलिक वस्तुएं, आम या अशोक के पत्ते, पीली हल्दी, गुड़, चावल, दूध आदि।

5. मंगल कलश के साथ नए घर में प्रवेश करना चाहिए।

6. घर को रंगोली, फूलों से सजाना चाहिए।

7. मंगल कलश में शुद्ध जल भरकर उसमें आम या अशोक के आठ पत्तों के बीच नारियल रखें।

8. कलश व नारियल पर कुमकुम से स्वस्तिक का चिन्ह बनाएं।

9. नए घर में प्रवेश के समय घर के स्वामी और स्वामिनी को पांच मांगलिक वस्तुएं नारियल, पीली हल्दी, गुड़, चावल, दूध अपने साथ लेकर नए घर में प्रवेश करना चाहिए।

10. भगवान गणेश की मूर्ति, दक्षिणावर्ती शंख, श्री यंत्र को गृह प्रवेश वाले दिन घर में ले जाना चाहिए।

11. मंगल गीतों के साथ नए घर में प्रवेश करना चाहिए।

12. पुरुष पहले दाहिना पैर तथा स्त्री बांया पैर बढ़ा कर नए घर में प्रवेश करें।

13. इसके बाद भगवान गणेश का ध्यान करते हुए गणेश जी के मंत्रों के साथ घर के ईशान कोण में या फिर पूजा घर में कलश की स्थापना करें।

14. रसोई घर में भी पूजा करनी चाहिये। चूल्हे, पानी रखने के स्थान और स्टोर आदि में धूप, दीपक के साथ कुमकुम, हल्दी, चावल आदि से पूजन कर स्वास्तिक चिन्ह बनाना चाहिए।

15. रसोई में पहले दिन गुड़ व हरी सब्जियां रखना शुभ माना जाता है।

16. चूल्हे को जलाकर सबसे पहले उस पर दूध उफानना चाहिए।

17. मिष्ठान बनाकर उसका भोग लगाना चाहिए।

18. घर में बने भोजन से सबसे पहले भगवान को भोग लगाएं।

19. गौ माता, कौआ, कुत्ता, चींटी आदि के निमित्त भोजन निकाल कर रखें।

20. ब्राह्मण को भोजन कराएं या फिर किसी गरीब भूखे आदमी को भोजन करा दें। इससे घर में सुख, शांति व समृद्धि आती है व हर प्रकार के दोष दूर हो जाते हैं।

Vastu mahendaar (kashliwal) jain
VMKJ

19/12/2025
पिता पर अनमोल विचार* इस दुनिया में एक पिता ही ऐसा होता है जो अपनी सन्तान को अपने से सदा आगे ही बढ़ते हुए देखना चाहता है।*...
19/06/2022

पिता पर अनमोल विचार

* इस दुनिया में एक पिता ही ऐसा होता है जो अपनी सन्तान को अपने से सदा आगे ही बढ़ते हुए देखना चाहता है।
* अनुशासन का दूसरा नाम पिता ही होते है।
* दुःख चाहे कितना भी आये लेकिन दुःख की परछाई कभी अपने बच्चो पर नही आने देते है ऐसे होते है पिता।
* जब किसी चीज की इच्छा रखते है तो उसे सबसे पहले पिता ही पूरा करते है।
* भगवान् सबका ख्याल रखने के लिए खुद नही आ सकते तो उन्होंने पिता को इस दुनिया में भेज दिया।
* जीवन में कभी भी कोई कष्ट न मिले ऐसी व्यवस्था एक पिता ही करता है।
* एक पिता की खावाहिस होती है उसका बेटा उससे भी ज्यादा कामयाब बने।
* शहरो में भले ही हमारे घर मकान नंबर से जाने जाते है लेकिन गाँवों में आज भी हमारे घर हमारे पापा के नाम से ही पहचाने जाते है।
* जिस प्रकार एक कुम्हार के थाप से मिट्टी भी सुंदर घड़े का रूप ले लेता है ठीक उसी प्रकार पापा के डांट फटकर से ही तो संस्कारी पुत्र का निर्माण होता है।
* आज भी हम अपने पापा के नाम और Famous की वजह से जाने जाते है इससे बड़ी गर्व की बात क्या हो सकती है।
* सपने खुशियों के भले ही हम देखे लेकिन उसे पूरा करने का जिम्मा पिता ही तो उठाते है।
* अगर ईश्वर का रूप देखना है तो एकबार अपने ईश्वर समान पिता को देख लेना।
* मेरी पहचान मेरे पिता के साथ है।
* हमारे खुशियों के लिए आज भी पापा अपने इच्छाओ को कुर्बान कर देते है ऐसे होते है पिता।
* गुस्से में जब अपनापन दिखे तो समझ जाना ऐसा प्यार पापा का ही होता है।
* जब जब दुःख की घड़ी आती है तो सबसे पहले पापा ही साथ खड़े होते है।
* भले ही पापा का गुस्सा हमे गुस्सा दिखता है लेकिन असल में वो पापा का प्यार होता है।
* बिन पिता के जीवन काटना घुटन सा होता है।
* बिन पिता के जीवन अधुरा सा होता है।
* ईश्वर के रूप होते है पिता।
* बच्चो की खुशिया के लिए खुद बच्चे बन जाते है पापा।
* आप बदल सकते है लेकिन पापा का प्यार कभी नही बदलता है।
* पिता की डांट भले ही कड़वी हो लेकिन यह दवा के समान फायदेमंद होती है।
* हर बेटी अपने पापा के जैसा ही जीवनसाथी की कामना करती है।
* पिता को ख़ुशी उस समय दोगुनी हो जाती है जब उसकी पहचान बेटे के काम से होने लगे।
* उस बच्चे से उसका हाल पूछना जिसके सिर पर पिता का छत्रछाया नही होती।
* एक पिता 100 अध्यापक के बराबर महत्व रखता है।
* पापा है तो दुनिया है खुशिया है, बिन पापा के सब वीरान।
* हर कोई रिश्ते स्वार्थ से निभाते है लेकिन माँ बाप निस्वार्थ अपनी संतान की सेवा करते है।
* स्वर्ग पाना है तो माँ बाप के चरणों में शीश झुकाना।
* एक पिता तब तक अपने बेटे के पिता है जबतक की उसका जीवनसाथी नही मिल जाती, और बेटी तबतक बेटी है जबतक जिन्दगी खत्म नही हो जाती।
* पिता के पैसो पर घमंड तो सभी करते है लेकिन पिता को ख़ुशी तब मिलती है जब वह अपने बेटो की कमाई पर जीता है।
* भगवान का दिया हुआ सबसे कीमती तोहफा होते है पिता।
* ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया पापा आपने, हर मुश्किल से लड़ना भी सिखाया आपने।

वास्तुगुरू महेन्द्र जैन

पेड़ों के बार मे महत्वपूर्ण जानकारी  पेड़ धरती पर सबसे पुरानें living organism हैं, और ये कभी भी ज्यादा उम्र की वजह से न...
18/06/2022

पेड़ों के बार मे महत्वपूर्ण जानकारी

पेड़ धरती पर सबसे पुरानें living organism हैं, और ये कभी भी ज्यादा उम्र की वजह से नहीं मरते।
हर साल 5 अऱब पेड़ लगाए जा रहे है लेकिन हर साल 10 अऱब पेड़ काटे भी जा रहे हैं।
एक पेड़ दिन में इतनी ऑक्सीजन देता है कि 4 आदमी जिंदा रह सकें।
देशों की बात करें, तो दुनिया में सबसे ज्यादा पेड़ रूस में है उसके बाद कनाडा में उसके बाद ब्राज़ील में फिर अमेरिका में और उसके बाद भारत में केवल 35 अऱब पेड़ बचे हैं।
दुनिया की बात करें, तो 1 इंसान के लिए 422 पेड़ बचे है. लेकिन अगर भारत की बात करें,तो 1 हिंदुस्तानी के लिए सिर्फ 28 पेड़ बचे हैं।
पेड़ो की कतार धूल-मिट्टी के स्तर को 75% तक कम कर देती है. और 50% तक शोर को कम करती हैं।
एक पेड़ इतनी ठंड पैदा करता है जितनी 1 A.C 10 कमरों में 20 घंटो तक चलने पर करता है. जो इलाका पेड़ो से घिरा होता है वह दूसरे इलाकों की तुलना में 9 डिग्री ठंडा रहता हैं।
पेड़ अपनी 10% खुराक मिट्टी से और 90% खुराक हवा से लेते है।
एक एकड़ में लगे हुए पेड़ 1 साल में इतनी Co2 सोख लेते है जितनी एक कार 41,000 km चलने परछोड़ती हैं।
दुनिया की 20% oxygen अमेजन के जंगलो द्वारा पैदा की जाती हैं. ये जंगल 8 करोड़ 15 लाख एकड़ में फैले हुए हैं।
इंसानो की तरह पेड़ो को भी कैंसर होती है.कैंसर होने के बाद पेड़ कम ऑक्सीजन देने लगते हैं।
पेड़ की जड़े बहुत नीचे तक जा सकती है. दक्षिण अफ्रिका में एक अंजीर के पेड़ की जड़े 400 फीट नीचे तक पाई गई थी।
दुनिया का सबसे पुराना पेड़ स्वीडन के डलारना प्रांतमें है.टीजिक्कोनाम का यह पेड़ 9,550 साल पुराना है।
किसी एक पेड़ का नाम लेना मुश्किल है लेकिन तुलसी, पीपल, नीम और बरगद दूसरों के मुकाबले ज्यादा ऑक्सीजन पैदा करते हैं।

इस बरसात में कम से कम एक पेड़ अवश्य लगायें।
"स्वयं जगें लोगों को जगाएं,मिलकर पर्यावरण बचाएँ।"

आइये इस धरा का सौंदर्य वृक्ष लगा कर बढ़ायें।

वास्तुगुरू महेन्द्र जैन

ज्यामिति और यज्ञ वेदियाँसनातन धर्म या हिन्‍दू धर्म का सबसे प्राचीन ग्रन्‍थ वेदों को माना जाता है, उनमें से भी सबसे प्राच...
05/06/2022

ज्यामिति और यज्ञ वेदियाँ

सनातन धर्म या हिन्‍दू धर्म का सबसे प्राचीन ग्रन्‍थ वेदों को माना जाता है, उनमें से भी सबसे प्राचीन या पहला वेद ऋग्‍वेद है। वेदों में तत्‍कालीन समाज की जीवन शैली, धार्मिक कर्मकाण्‍ड, व्रत, अनुष्‍ठान इत्‍यादि का वर्णन किया गया है। साथ ही इनमें देवताओं की स्‍तुती का विशेष महत्‍व रहा है, जो यज्ञ, अनुष्‍ठान और मंत्रोच्‍चारण से संपन्‍न की जाती थी। यज्ञ और अनुष्‍ठानों को वेदी के माध्‍यम से पूर्ण किया जाता था, जिसका उपयोग हम आज भी देख सकते हैं।

वैदिक काल में तैयार की जाने वाली वेदियों में ज्यामिति और खगोल विज्ञान का विशेष ध्‍यान रखा जाता था अर्थात अनुष्‍ठान हेतु प्रयोग में लायी जाने वाली वेदियों में चन्‍द्र वर्ष और सूर्य वर्ष के मिलन की खगोलीय संख्‍याओं को प्रयोग किया जाता था। वेदों में उल्लिखित खगोलीय जानकारी ने आधुनिक खगोल शास्त्रियों के लिए एक पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाई है। तीन प्रकार की वेदियां संपूर्ण ब्रह्माण्‍ड (आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्‍वी) को इंगित करती हैं, जिसमें पृथ्‍वी के लिए गोलाकार तथा आकाश के लिए वर्गाकार वेदियों का प्रयोग किया गया। एक आयताकार वेदी का वृत्‍तीय मान तथा एक वृत्‍ताकार वेदी (पृथ्‍वी) का आयताकार (आकाश) मान बराबर करना एक ज्‍यामितीय समस्‍या थी, जो प्राचीन ज्‍यामितीय की पहली समस्‍या भी मानी जाती है।

अग्नि वेदियां 21 पृथ्‍वी वेदी के, 78 अंतरिक्ष वेदी के, 261 आकाश वेदी के पत्‍थरों से घिरी होती हैं। इन्‍हीं संख्‍याओं को तीनों (पृथ्‍वी, अंतरिक्ष, आकाश) के प्रतीकात्‍मक रूप में व्‍यक्‍त किया गया। पृथ्‍वी और ब्रह्माण्ड के द्विभाजन को ध्‍यान में रखते हुए इसके लिए 21 और 339 संख्‍याएं इंगित की गयी हैं क्‍योंकि ब्रह्मांड में अंतरिक्ष और आकाश भी शामिल हैं। हजारों ईंटों से तैयार की जाने वाली इन पांच परतों की वेदी के निर्माण हेतु अनेक बीजगणितीय और ज्यामितीय समस्‍याओं से होकर गुजरना पड़ता था। इसलिए इसमें सामान्‍य और विशेष दो प्रकार की ईंटों का प्रयोग किया गया। वर्ष के 360 दिन तथा 36 अंतराल महीने को इंगित करने के लिए 396 विशेष ईंटों का प्रयोग किया गया। इसी प्रकार वेदी की परतों में प्रयोग होने वाली ईंटों की भिन्‍न-भिन्‍न संख्‍याओं का योग तिथियों, चन्‍द्र वर्ष के दिनों तथा एक वर्ष में मुहुर्तों की संख्‍या इत्‍यादि को दर्शाते हैं।

ऋग्वेद के अक्षरों की संख्या 4,32,000, चालीस वर्षों में आने वाले मुहूर्तों की संख्या के समान है, जो एक प्रतीकात्मक वेदी का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऋग्वेद के छंदों की गणना हम चालीस वर्षों में आकाश के दिवसों की संख्या या 261×40= 10,440 से कर सकते हैं और सभी वेदों के छंद की गणना 261×78= 20,358 से कर सकते हैं।

ऋग्वेद के 1,017 सूक्तों को 216 समूहों में दस पुस्तकों में विभाजित किया गया है। इन संख्‍याओं को ऋग्‍वेद के ब्राह्मणा में वर्णित पांच-परतों वाली वेदी के समान माना जाता है, इसमें प्रथम दो पुस्‍तकें पृथ्वी और आकाश के मध्य अंतरिक्ष के रूप में मध्यवर्ती की भूमिका निभाती हैं। अंतरिक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाली संख्या 78 को 3 गुणक के साथ तीनों लोक के लिए प्रयोग किया जाए तो यह 234 सूक्तों का निर्माण करती है, जोकि इन दोनों पुस्तकों की वास्तविक संख्या है। ऋग्वेद की पुस्तकों को पांच-परतों वाली वेदी की पुस्तकों के प्रतिनिधित्व के रूप में देखा जा सकता है।

वास्तुगुरू महेन्द्र जैन

वास्तु के अनुसार आलमारी को रखने की सही दिशाआप चाहे अमीर हो, मिडिल क्लास या फिर गरीब लेकिन हर घर में एक अलमारी जरूर होती ...
05/06/2022

वास्तु के अनुसार आलमारी को रखने की सही दिशा

आप चाहे अमीर हो, मिडिल क्लास या फिर गरीब लेकिन हर घर में एक अलमारी जरूर होती हैं । यह अलमारी हमारे घर का दिल होती हैं। इसके अन्दर लोग अपने गहने, पैसे, कपड़े, जरूरी कागजात जैसी तमाम तरह की चीजें रखते हैं। अलमारी आपके घर की अर्थव्यवस्था पर सीधा सीधा असर डालती हैं ।

आप ने अलमारी को घर के किस कोने में रखा हैं, अलमारी के अन्दर कौन कौन सा सामान हैं, अलमारी का रंग कौन सा हैं, इन सभी बातों का असर घर की गरीबी और अमीरी पर पड़ता हैं. । आसान शब्दों में कहे तो अलमारी को वास्तु के हिसाब से रखने पर आपके घर धन की वर्षा हो सकती हैं लेकिन यदि आप ने वास्तु नियमो का पालन नहीं किया तो आपके घर दरिद्रता प्रवेश कर सकती हैं ।

1. घर की अलमारी के दरवाजे कभी भी दक्षिण दिशा में नहीं खुलने चाहिए । जिन अलमारियों के दरवाजे दक्षिण दिशा की ओर खुलते हैं वो पैसो के मामले में हमेशा खाली ही रहती हैं ।

2. अलमारी को कभी भी डायरेक्ट जमीन पर नहीं रखना चाहिए । उसके नीचे लकड़ी के पटिए का टेका या स्टैंड लगा देना चाहिए । आप चाहे तो अलमारी के नीचे पेपर, पन्नी या कपड़ा भी बिछा सकते हैं ।

3. घर के उत्तर पूर्वी कोने में भूलकर भी अलमारी ना रखे । इस कोने में अलमारी रखना अशुभ माना जाता हैं ।

4. घर के दक्षिण पश्चिम कौने या सिर्फ पश्चिम दिशा में अलमारी को रखना शुभ होता हैं । इस जगह रखी गई अलमारी में कभी भी धन की कमी नहीं होती हैं ।

5. अलमारी के अन्दर बनी तिजोरी को कभी खाली ना रखे । इसके अन्दर कुछ ना कुछ पैसे और गहने अवश्य रखे । इस तरह घर में बरकत बनी रहती हैं ।

6. अलमारी के अन्दर गणेश जी और लक्ष्मी जी की तस्वीर जरूर रखे । इसे आप अलमारी के अंदरूनी या बाहरी हिस्से में चिपका सकते हैं. ऐसा करने से अलमारी के अन्दर धन की वृद्धि होती हैं ।

7. अलमारी के अन्दर 5 या 7 चांदी के सिक्के जरूर रखे । ऐसा करने से घर में अचानक धन लाभ के आसार बढ़ जाते हैं ।

8. घर के अन्दर रखी अलमारी का रंग क्रीम या हल्का पीला होना चाहिए । भूलकर भी घर में हरे या लाल रंग की अलमारी ना रखे ।

9. घर के दक्षिण पश्चिम कौने या पश्चिम दिशा में अलमारी रखने से पहले उस स्थान पर यानी अलमारी के ठीक नीचे स्वस्तिक का निशान बना दे । एक स्वस्तिक का चिह्न आप अलमारी के ऊपर भी बना सकते हैं । ऐसा करने से घर में धन चोरी होने का खतरा टल जाता हैं ।

10. अलमारी पर धुल की परत ना जमने दे । इसकी साफ़ सफाई का ध्यान रखे । तभी लक्ष्मी इसके अन्दर आएगी ।

वास्तुगुरू महेन्द्र जैन

Copper EH Helix Copper helix the ill effects of a vaastu defect diminishes automatically if helix is placed this is one ...
05/06/2022

Copper EH Helix

Copper helix the ill effects of a vaastu defect diminishes automatically if helix is placed this is one of the superb remedy for fire defect like wrong directions of kitchen, main switches, inverter . Similarly in business places of fire gadgets like transformers, electric panels, boilers, pantry can be corrected by installing multiple copper energy helix in south east direction. P if you main door is at south east corner, simply fix 3 helix behind the door to balance the energy. Places of master bed room at south east can be corrected by placing three or multiple copper helix at south east corner of bed room. P any other defect related to south east can be corrected with installation of 3 or in multiple at affected places it can be concealed in the floor or ceiling. P in case of ready structure it can be hanged or nailed or placed on the floor p copper helix are one of the best remedy for south east corner defects like :- p missing south east corner (corner cut),toilet at south east corner leads to financial worries, female sickness, legal disputes,slope at south-east brings misfortune,master bed room at south-east causes quarrel and differences amongst the couple,water body like water tank, underground water tank & septic tank is a serious vastu defect,study room in this corner makes children hyper,owners cabin in south east corner results in to dispute with clients,water bodies like under ground tank, borewell or septic causes losses in business,a chilling plant or cooling tower in south east zone makes fire element weak,toilet block at south east.

This helix is specially designed to activate & balance the wind element of the northwest corner. Place this helix at the northwest corner.

This is one of the superb remedies for defects like missing or extended northwest corner, wrong entrance at the northwest, water body at northwest etc.

Vastu defects of the northwest can be corrected by installing 3 or multiple brass energy helix in a northwest direction.

If your main door is at northwest corner (north side) corner, simply fix this helix above the main door to balance the energy.

Lead Metal Helix is one of the best remedies for South West corner defects like:-

1. Missing South West corner (corner cut)

2. Toilet at South West corner leads to serious illness, money troubles

3. The kitchen at South West corner leads to sickness to a female member

4. Children room in south-west makes them more dominant

5. Electricity in south-west causes fire accidents

6. Lower flooring or slope towards the south-west causes business losses

7. The door at south-west harms owner of the house physically

8. Borewell or Underground water tank at south-west causes short life

9. Extension towards the south-west becomes a reason for unwanted expenses

Commercial or Industrial Vastu defects:-

1. Transformer or electric panel at south-west causes accidents.

2. Open space at south-west causes lower products or low productivity.

3. The door at the south-west makes business unstable.

4. Toilet block at south-west harms relationship with employees, workers & customers.

5. Higher flooring level at north-east restricts business growth.

6. Septic tank or underground water tank at south-west.

7. Scrap area in south-west harms the reputation of the business.

Installation:-

Place lead metal Helix at the south-west corner or its nearest.

Vastuguru Mahendra Jain

घोड़े की पेंटिंग अपने घर आफिस में उस स्थान पर लगाएं जहाँ आप सबसे ज्यादा बैठते हैं,और आपकी नजर बार बार इसके ऊपर पडे इसके ...
15/05/2022

घोड़े की पेंटिंग अपने घर आफिस में उस स्थान पर लगाएं जहाँ आप सबसे ज्यादा बैठते हैं,और आपकी नजर बार बार इसके ऊपर पडे इसके लिए कोई भी दिशा हो सकती है,

अगर हम इसे दक्षिण में लगाएं और खुद पश्चिम में बैठे तो हमारी नजर इस पेंटिंग पर कम पडेगी और इसके द्वारा मिलने वाली प्रेरणा से बंचित रह जायेगें।

इस पेंटिंग से हमें इसकी गहराई, रंग, ऊर्जा का संदेश मिलता है जिसे देखकर ही सकारात्मक विचार मन में आते हैं, इसलिए इसे अपने सामने लगाएं पीछे नहीं।

घोड़े की संख्या 5,7,9 कुछ भी हो सकती है, ऐसा कहीं नहीं लिखा। ये 7 ही होने चाहिए, अगर 7 सूर्य के घोड़े हैं तो 5 तत्वों से दुनिया बनी है।

इंसानी शरीर भी 5 तत्वों से ही बना है, 9 ग्रह से सभी तत्वों को बैलेंस किया जाता है, माता के 9 दिन होते हैं, और भी बहुत सी चीजें हैं, इसलिए घोड़ा अकेला नहीं होना चाहिए संख्या कुछ भी हो सकती है।

अकेला घोड़ा अकेलेपन को दर्शाता है इसलिए संगठित चित्र ही लगाने चाहिए।

वास्तुगुरू महेन्द्र जैन

षोडश संस्कारों का परिचय1. गर्भाधान संस्कारस्वस्थ सुसंस्कृत युवक एवं युवती जो आयु परिपुष्ट हों सुमन, सुचित्त होकर परिवार ...
05/05/2022

षोडश संस्कारों का परिचय

1. गर्भाधान संस्कार
स्वस्थ सुसंस्कृत युवक एवं युवती जो आयु परिपुष्ट हों सुमन, सुचित्त होकर परिवार हेतु सन्तान प्राप्ति के उद्देश्य से इस संस्कार को करते हैं। वैदिक संस्कृति में गर्भाधान को श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाववाली आत्मा को बुलाने के लिए धार्मिक पवित्र यज्ञ माना गया है।
जैसे अच्छे वृक्ष या खेती के लिए उत्तम भूमि एवं बीज की आवश्यकता होती है वैसे ही बालक के शरीर को यथावत बढ़ने तथा गर्भ के धारण पोषण हेतु आयुर्वेद के अनुसार पुरुष की न्यूनतम आयु 25 वर्ष तथा स्त्री की 16 वर्ष आवश्यक होती है।
वैदिक मान्यतानुसार दम्पति अपनी इच्छानुसार बलवान्, रूपवान, विद्वान, गौरांग, वैराग्यवान् संस्कारोंवाली सन्तान को प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए ब्रह्मचर्य, उत्तम खान-पान व विहार, स्वाध्याय, सत्संग, दिनचर्या, चिन्तन आदि विषयों का पालन करना पड़ता है। जिसका विवरण आयुर्वेद विषयक ग्रन्थों में विस्तार से देखा जा सकता है।
गर्भाधान से पहले व गर्भाधान के समय जैसी शारीरिक व मानसिक स्थिति माता-पिता की होती है, उसी का प्रभाव आनेवाले सन्तान (गर्भस्थ आत्मा) पर पड़ता है। इतिहास साक्षी है कि रुक्मिणी के इच्छानुसार भगवान श्रीकृष्ण नें सुसन्तान प्राप्ति के लिए सपत्नीक 12 वर्षों तक एकान्त स्थान पर ब्रह्मचर्य का पालन किया था। अर्थात् ये 12 वर्ष उन्होंने रज-वीर्य की पुष्टि, संस्कारों की श्रेष्ठता आदि गुणों की वृद्धि में लगाए थे। तभी तो उन्हें प्रद्युम्न जैसी अत्युत्तम सन्तान मिली, जो भगवान श्रीकृष्ण सदृश गुणोंवाली थी।
मानव जीवन की संस्कार अर्थात् दोषमार्जनम्, हीनांगपूर्ति तथा अतिषयाधान इंजीनियरिंग इस प्रकार है-

(अ) जन्म पूर्व-
1) गर्भाधान:-
(क) गर्भाधान पूर्व- जीव पुरुष के माध्यम से स्त्री में अभिसिंचित होता है। पुरुष में इसका प्रवेष औषध अर्थात् अनाज, वनस्पति अर्थात् फल और आपः अर्थात् प्रवहणषील तत्व जल और प्राण के माध्यम से होता है। जीव का अवतरण यम- वायु (योगसिद्ध वायु) से होता है। इन समस्त की शुद्धि योजना कर समावर्तन तथा विवाह संस्कार से संस्कारित गृहाश्रम प्रविष्ट वर-वधू से पति-पत्नी बने परिपुष्ट आयु, बल, शील, कुल सम बनें। यह गर्भ में जीव के आह्नान की पूर्व योजना है। सुश्रुत संहिता (आयुर्वेद) निर्देषित सर्वोषधी जिसमें दो खंड आम्बा हल्दी, चन्दन, मुरा, कुष्ट, जटामांसी, मोरवेल, शिलाजित, कपूर, मुस्ता, भद्रमोथ, समान मात्रा में लेकर गाय के दूध में उबाल उसकी दही जमा घृत बना (दूध और सर्वोषधी का अनुपात 16ः1 होगा) इस घृत के एक सेर में एक रत्ती कस्तूरी, एकेक माषा केसर, एवं जायफल, एक जावित्री मिलाकर इस घी से विधि अनुसार हवन करके यज्ञ अवशेष घी का पत्नी उबटन रूप में प्रयोग कर तथा उपरोक्त घी का भोजन रूप में सेवन करना गर्भ में जीव के आह्वान की तैयारी है। यह भौतिक संस्कार योजना जीव के आह्वान की है। इसके समानान्तर आधिदैविक, आध्यात्मिक योजना के अन्तर्गत विश्व की देव व्यवस्था तथा अध्यात्म व्यवस्था के पवित्रीकरण की मानसिक योजना विषिष्ट हवन मन्त्रों में दी गई है। यह योजना इसलिए आवश्यक है कि इसी व्यवस्था से संस्कारी जीव उतरता है। ये व्यवस्था करने की उपादेयता क्या है ?
यह नियम है कि अपनी संस्कार (जाति, आयु, भोग विपाक-कर्मफल) धारिता के अनुकूल परिस्थितियों में जीवात्मा जन्म लेता है। गर्भाधान प्रक्रिया उत्तम परिस्थितियों के निर्माण की योजना है कि उत्तम संस्कारित जीव उत्पन्न हो।
(ख) गर्भाधान काल- एक प्रहर रात्रि बीतने तथा एक प्रहर रात्रि शेष रहने के मध्य के काल में आरोग्यमय द्वि-तन, अत्यन्त प्रसन्न मन, अतिप्रेममय सम्बन्ध, आह्लाद आभर पति-पत्नी स्थिर संयत शरीर, प्रसन्न वदन, आनन्द पूर्वक गर्भाधान करें। प्रक्षेपण एवं धारण क्रिया सहज सौम्य हो।
(ग) गर्भाधान काल बाद- यह ज्ञात होते ही गर्भाधान हो गया है तो पति-पत्नी दश मास गर्भ के स्वस्थन, परिस्वस्थन, परिपुष्टन, देव-व्यवस्था के उत्तमीकरण की भावना से सने वेद-मन्त्रों से अर्थ सहित ही यज्ञ करें। इसके पश्चात भोजन व्यवस्था में सम-क्षार, अम्ल, लवणनिग्ध, कमतीता (मिर्च), पुष्टिकारक भोजन आयोजन करे। भोजन ऋतुओं के अनुकूल ही हो।

2. पुंसवन संस्कार

यह संस्कार गर्भावस्था के दूसरे व तीसरे माह में किया जाता है। इसका उदेश्य गर्भस्थ शिशु को पौरुषयुक्त अर्थात् बलवान, हृष्ट-पुष्ट,निरोगी, तेजस्वी, एवं सुन्दरता के लिए किया जाता है।
चरक संहिता के अनुसार उकडूं बैठने, ऊंचे-नीचे स्थानों में फिरने, कठिन आसन पर बैठने, वायु-मलमूत्रादि के वेग को रोकने, कठोर परिश्रम करने, गर्म तथा तेज वस्तुओं का सेवन करने एवं बहुत भूखा रहने से गर्भ सूख जाता है, मर जाता है या उसका स्राव हो जाता है। इसी प्रकार चोट लगने, गर्भ के किसी भांति दबने, गहरे गड्ढे कंुए पहाड़ के विकट स्थानों को देखने से गर्भपात हो सकता है। तथा सदैव सीधी उत्तान लेटी रहने से नाड़ी गर्भ के गले में लिपट सकती है जिससे गर्भ मर सकता है।
इस अवस्था में गर्भवती अगर नग्न सोती है या इधर-उधर फिरती है तो सन्तान पागल हो सकती है। लड़ने-झगड़ने वाली गर्भवती की सन्तान को मृगी हो सकती है। यदि वो मैथुनरत रहेगी तो सन्तान कामी तथा निरन्तर शोकमग्ना की सन्तान भयभीत, कमजोर, न्यूनायु होगी। परधन ग्रहण की इच्छुक की सन्तान ईर्ष्यालू, चोर, आलसी, द्रोही, कुकर्मी, होगी। बहुत सोनेवाली की सन्तान आलसी, मूर्ख मन्दाग्नीवाली होगी। यदि गर्भवती षराब पीएगी तो सन्तान विकलचित्त, बहुत मीठा खानेवाली की प्रमेही, अधिक खट्टा खानेवाली की त्वचारोगयुक्त, अधिक नमक सेवन से सन्तान के बाल शीघ्र सफेद होना, चेहरे पर सलवटें एवं गंजापनयुक्त, अधिक चटपटे भोजन से सन्तान में दुर्बलता, अल्पवीर्यता, बांझ या नपुंसकता के लक्षण उत्पन्न होंगे एवं अति कड़वा खानेवाली की सन्तान सूखे षरीर अर्थात् कृष होगी।
गर्भवती स्त्री सदा प्रसन्न रहे, पवित्र आभूषणों को पहने, श्वेत वस्त्र को धारण करे, मन शान्त रखे, सबका भला चाहे, देवता ब्राह्मण गुरु की सेवा करनेवाली बने। मलिन विकृत हीन अंगों को न छूए। बदबूदार स्थानों तथा बुरे दृष्यों से दूर रहे। बेचैनी उत्पन्न करनेवाली बातों को न सुने। सूखे, बासी, सड़े-गले अन्न का सेवन न करे। खाली मकान में जाना, स्मशान में जाना, वृक्ष के नीचे रहना, क्रोध करना, ऊंचे चिल्लाना आदि को छोड़ देवे।
मद करनेवाले खाद्य पदार्थों का सेवन न करे। सवारी पर न चढ़े, मांस न खाए। इन्द्रियां जिस बात को न चाहें उनसे दूर रहे। उक्त बातों का अभिप्राय यह है कि माता की हर बात का प्रभाव उसके सन्तान के शरीर निर्माण पर होता है इसलिए माता का दायित्व है कि सन्तान के षारीरिक विकास को ध्यान में रखते हुए अपने खान-पान, रहन-सहन, आदि व्यवहार को उत्तम बनाए रखे।
यह संस्कार गर्भधारण के दो-तीन माह बाद करते हैं। स्त्री एवं भ्रूण के रक्षार्थ यह संस्कार है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह संस्कार एन्झाइमीकरण के लिए है। इसमें यज्ञ-मन्त्रों की भावना के साथ आनन्द, स्वस्थ देव-व्यवस्था, उत्तम सम-हृदय, सम-प्रजा, हित-मन भावना, अति वर्जन, समाहार चित्त रहने का विधान है। गायत्री, अथर्वदेव, यजुर्वेद, ब्रह्म का हिरण्यगर्भ, सम वर्तमान, सर्वाधार-स्वरूप भाव विशेष धारण करने चाहिएं। वटवृक्ष की जड़, कोंपल तथा गिलोय की गन्ध पिंगला अर्थात् दाहिनी नासिकापुट के चलते समय स्त्री को सूंघाने का विधान है।

3 सीमन्तोन्नयन संस्कार

सीमन्त शब्द का अर्थ है मस्तिष्क और उन्नयन शब्द का अर्थ है विकास। पुंसवन संस्कार शारीरिक विकास के लिए होता है तो यह मानसिक विकास के लिए किया जाता है। इस संस्कार का समय गर्भावस्था के चतुर्थ माह, चौथे में न कर पाए तो छठे, इसमें भी नहीं कर पाए तो आठवें माह में कर सकते हैं।
सुश्रुत के अनुसार पांचवे महिने में मन अधिक जागृत होता है, छठे में बुद्धि तो सातवें में अंग-प्रत्यंग अधिक व्यक्त होने लगते हैं। आठवें माह में ओज अधिक अस्थिर रहता है। इस संस्कार का उदेश्य है कि माता इस बात को अच्छी प्रकार समझे कि सन्तान के मानसिक विकास की जिम्मेवारी अब से उस पर आ पड़ी है। आठवे महिने तक गर्भस्थ शिशु के शरीर-मन-बुद्धि-हृदय ये चारों तैयार हो जाते हैं। इस समय गर्भिणी को दौहृद कहा जाता है। उसके दो हृदय काम करने लगते हैं। यही अवस्था गर्भिणी के लिए सब से खतरनाक अवस्था है। प्रायः आठवें माहोत्पन्न सन्तान जीती नहीं, इसलिए इस अवस्था में स्त्री को सन्तान के शरीर-मन-बुद्धि-हृदय इन सबको स्वस्थ, क्रियाशील बनाए रखने की तरफ विशेष ध्यान देना चाहिए।
यह सुतन अर्थात् उत्तम तन निर्माण व्यवस्था है। इसमें चावल, मूंग, तिल की खिचड़ी में घी डाल कर उससे आहुतियों तथा उसे खाने का विधान है। चावल- शर्करा, मूंग- प्रोटीन, तिल, घी- स्वस्थ वसा यह सम्पूर्ण आहार है। इस संस्कार का आधार ”सहस्र पोषण“ भी हो सकता है। यह सौभाग्य संस्कार है। सर्वमित्र-भाव, प्रवहणशील, औषध शुद्धि-भाव, उत्तम मति, उत्तम दृष्टि, उत्तम ऐश्वर्य-भाव, ब्रह्मन्याय-आस्था इन भावों के साथ यज्ञकर्म करना है।

4 जातकर्म संस्कार

शिशु के विश्व प्रवेश पर उसके ओजमय अभिनन्दन का यह संस्कार है। इसमें सन्तान की अबोध अवस्था में भी उस पर संस्कार डालने की चेष्टा की जाती है। माता से शारीरिक सम्बन्ध टूटने पर उसके मुख नाकादि को स्वच्छ करना ताकि वह श्वास ले सके तथा दूध पी सके। यह सफाई सधी हुई दाई से कराएँ। आयुर्वेद के अनुसार सैंधव नमक घी में मिलाकर देने से नाक और गला साफ हो जाते हैं।
बच्चे की त्वचा को साफ करने के लिए साबुन या बेसन और दही को मिलाकर उबटन की तरह प्रयोग किया जाता है। स्नान के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग होता है। चरक के अनुसार कान को साफ करके वे शब्द सुन सकें इसलिए कान के पास पत्थरों को बजाना चाहिए।
बच्चे के सिर पर घी में डूबोया हुआ फाया रखते हैं क्योंकि तालु जहां पर सिर की तीन अस्थियां दो पासे की ओर एक माथे से मिलती है वहां पर जन्मजात बच्चे में एक पतली झिल्ली होती है। इस तालु को दृढ़ बनाने इसकी रक्षा करने इसे पोषण दिलाने के लिए ये आवश्यक होता है। इस प्रयोग से बच्चे को सर्दी जुकाम आदि नहीं सताते।
जन्म पश्चात सम शीतोष्ण वातावरण में शिशु प्रथम श्वास ले। षिषु का प्रथम श्वास लेना अति महत्वपूर्ण घटना है। गर्भ में जन्म पूर्व शिशु के फफ्फुस जल से भारी होते हैं। प्रथम श्वास लेते समय ही वे फैलते हैं और जल से हलके होते हैं। इस समय का श्वसन-प्रश्वसन शुद्ध समशीतोष्ण वातायन में हो। शिशु के तन को कोमल वस्त्र या रुई से सावधानीपूर्वक साफ-सुथरा कर गोद में लेकर देवयज्ञ करके स्वर्ण शलाका को सममात्रा मिश्रित घी-षहद में डुबोकर उसकी जिह्वा पर ब्रह्म नाम लिखकर उसके वाक् देवता जागृत करे। इसके साथ उसके दाहिने तथा बाएं कान में ”वेदोऽसि“ यह कहे। अर्थात् तू ज्ञानवाला प्राणी है, अज्ञानी नहीं है। तेरा नाम ब्रह्मज्ञान है। इसके पष्चात् सोने की शलाका से उसे मधु-घृत चटाता उसके अन्य बीज देवताओं में शब्द उच्चारण द्वारा शतवर्ष स्वस्थ अदीन ब्रह्म निकटतम जीने की भावना भरे।
शिशु के दाएं तथा बाएं कान में क्रमषः शब्दोच्चार करते सविता, सरस्वती, इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा, मेधा, अग्नि, वनस्पति, सोम, देव, ऋषि, पितर, यज्ञ, समुद्र, समग्र व्यवस्था द्वारा आयुवृद्धि, स्वस्थता प्राप्ति भावना भरे। तत्पष्चात् शिशु के कन्धों को अपनत्व भाव स्पर्श करके उसके लिए उत्तम दिवसों, ऐश्वर्य, दक्षता, वाक् का भाव रखते उसके ब्रह्मचर्य-गृहस्थ-वानप्रस्थ (संन्यास सहित) तथा बल-पराक्रमयुक्त इन्द्रियों सहित और विद्या-शिक्षा-परोपकार सहित (त्र्यायुष-त्रि) होने की भावना का शब्दोच्चार करे। इसी के साथ प्रसूता पत्नी के अंगों का सुवासित जल से मार्जन करता परिशुद्धता ऋत-शृत भाव उच्चारे।
इसके पश्चात् शिशु को कः, कतरः, कतमः याने आनन्द, आनन्दतर, आनन्दतम भाव से सषब्द आशीर्वाद देकर, अपनत्व भावना भरा उसके अंग-हृदय सम-भाव अभिव्यक्त करते हुए उसके ज्ञानमय शतवर्ष जीने की कामना करता उसके शीष को सूंघे। इतना करने के पश्चात पत्नी के दोनों स्तनों को पुष्पों द्वारा सुगन्धित जल से मार्जन कराकर दक्षिण, वाम स्तनों से शिशु को ऊर्जित, सरस, मधुमय प्रविष्ट कराने दुग्धपान कराए। इसके पष्चात् वैदिक विद्वान् पिता-माता सहित शिशु को दिव्य इन्द्रिय, दिव्य जीवन, स्वस्थ तन, व्यापक-अभय-उत्तम जीवन शतवर्षाधिक जीने का आषीर्वाद दें।
जातकर्म की अन्तिम प्रक्रिया जो शिशु के माता-पिता को करनी है वह है दस दिनों तक भात तथा सरसौं मिलाकर आहुतियां देनाहै।

5 नामकरण संस्कार

इस संस्कार का उदेश्य केवल शिशु को नाम भर देना नहीं है, अपितु उसे श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर उच्च से उच्चतर मानव निर्माण करना है। पश्चिमी सभ्यता में निरर्थक नाम रखने का अन्धानुकरण भारत में भी बढ़ता जा रहा है। उनके लिए चरक का सन्देश है कि नाम साभिप्राय होनें चाहिएं। नाम केवल सम्बोधन के लिए ही न होकर माता-पिता द्वारा अपने सन्तान के सामने उसके जीवनलक्ष्य को रख देना होता है।
सन्तान के जन्म के दिन से ग्यारहवें दिन में, या एक सौ एकवें दिन में, या दूसरे वर्ष के आरम्भ में जिस दिन जन्म हुआ हो यह संस्कार करना चाहिए। नाम ऐसा रक्खे कि श्रवण मात्र से मन में उदात्त भाव उत्पन्न करनेवाला हो। उच्चारण में वो कठिन नहीं अपितु सुलभ होना चाहिए। पाश्चात्य संस्कृति में चुम्बन लेने की प्रथा है और ऐसा करने से अनेक प्रकार के संक्रान्त रोग शिशु को हो सकते हैं। जबकि भारतीय संस्कृति में स्पर्ष या सूंघने का वर्णन आता है। षिषु को गोद में लेकर उसके नासिका द्वार को स्पर्श करने से इसका ध्यान अपने आप स्पर्शकर्ता की ओर खिंच जाता है।
स्व-नाम श्रवण व्यक्ति अपने जीवन में अधिकतम बार करता है। अपना नाम उसकी सबसे बड़ी पहचान है। अपना नाम पढ़ना, सुनना हमेशा भला और उत्तम लगता है। इसलिए नाम रखने में ‘देवश्रव’, ‘दिवस ऋत’ या ‘श्रेष्ठ श्रव’ भाव आना चाहिए। मानव अपना नाम सबसे अधिक बार अपने भीतर भरता है। जो मानव भीतर भरता है वही बाहर निकालता है। यह ”ब्रडाब्रनि-कडाकनि“ सिद्धान्त है। “ब्रह्म डाल ब्रह्म निकाल-कचरा डाल कचरा निकाल” सिद्धान्त के अनुसार नाम हमेशा शुभ ही रखना चाहिए। शुभ तथा अर्थमय नाम ही सार्थक नाम है।
”कः कतमः“ सिद्धान्त नामकरण का आधार सिद्धान्त है। कौन हो ? सुख हो, ब्रह्मवत हो। कौन-तर हो ? ब्रह्मतर हो। कौन-तम हो ? ब्रह्मतम हो। ब्रह्म व्यापकता का नाम है। मानव का व्यापक रूप प्रजा है। अतिव्यापक रूप सु-प्रजा है। भौतिक व्यापकता क्रमश: पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक है। इन लोकों के आरोहण के भाव वेद मन्त्रों में हैं। ‘वीर’ शरीर-आत्म-समाज बल से युक्त युद्ध कुशल व्यक्ति का नाम है। ‘सुवीर’ प्रशस्त वीर का नाम है जो परमात्म बल शरीर, आत्म, समाज में उतारने में कुशल होता है। सामाजिक आत्मिक निष्ठाओं (यमों) का पालन ही व्यक्ति को श्रेष्ठ ऐश्वर्य देता उसको सु-ऐश्वर्य दे परिपुष्ट करता है। इन भावों से भरा इन्हें कहता पिता शिशु की आती-जाती श्वास को स्पर्श करते हुए उत्तम, सार्थक नाम रखे।
यदि सन्तान बालक है तो समाक्षरी अर्थात् दो अथवा चार अक्षरोंयुक्त नाम रखा जाता है। और इनमें ग घ ङ ज झ ´ ड ढ ण द ध न ब भ म य र ल व इन अक्षरों का प्रयोग किया जाए। बालिका का नाम विषमाक्षर अथात् एक, तीन या पांच अक्षरयुक्त होना चाहिए।

6 निष्क्रमण संस्कार

निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकलना। घर की अपेक्षा अधिक शुद्ध वातावरण में शिशु के भ्रमण की योजना का नाम निष्क्रमण संस्कार है। बच्चे के शरीर तथा मन के विकास के लिए उसे घर के चारदीवारी से बाहर ताजी शुद्ध हवा एवं सूर्यप्रकाश का सेवन कराना इस संस्कार का उद्देश्य है। गृह्यसूत्रों के अनुसार जन्म के बाद तीसरे शुक्ल पक्ष की तृतीया अर्थात् चान्द्रमास की दृष्टि से जन्म के दो माह तीन दिन बाद अथवा जन्म के चौथे माह में यह संस्कार करे।
इसमें शिशु को ब्रह्म द्वारा समाज में अनघ अर्थात् पाप रहित करने की भावना तथा वेद द्वारा ज्ञान पूर्ण करने की भावना अभिव्यक्त करते माता-पिता यज्ञ करें। पति-पत्नी प्रेमपूर्वक शिशु के शत तथा शताधिक वर्ष तक समृद्ध, स्वस्थ, सामाजिक, आध्यात्मिक जीने की भावनामय होकर शिशु को सूर्य का दर्शन कराए। इसी प्रकार रात्रि में चन्द्रमा का दर्षन उपरोक्त भावना सहित कराए। यह संस्कार शिशु को आकाष, चन्द्र, सूर्य, तारे, वनस्पति आदि से परिचित कराने के लिए है।
आयुर्वेद के ग्रन्थों में कुमारागार, बालकों के वस्त्र, उसके खिलौने, उसकी रक्षा एवं पालनादि विषयों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। कुमारागार ऐसा हो जिसमें अधिक हवा न आती हो किन्तु एक ही मार्ग से वायु प्रवेश हो। कुत्ते, हिंसक जन्तु, चूहे, मच्छर, आदि न आ सकें ऐसा पक्का मकान हो। जिसमें यथास्थान जल, कूटने-पीसने का स्थान, मल-मूत्र त्याग के स्थान, स्नानगृह, रसोई अलग-अलग हों। इस कुमारागार में रक्षा के समस्त साधन, मंगलकार्य, होमादि की सामग्री उपस्थित हों। बच्चों के बिस्तर, आसन, बिछाने के वस्त्र कोमल, हल्के पवित्र, सुगन्धित होनें चाहिए। पसीना, मलमूत्र एवं जूं आदि से दूषित कपड़े हटा देवें। बरतन नए हों अन्यथा अच्छी प्रकार धोकर गुग्गुल, सरसौं, हींग, वच, चोरक आदि का धुंआ देकर साफ करके सुखाकर काम में ले सकते हैं। बच्चों के खिलौने विचित्र प्रकार के बजनेवाले, देखने में सुन्दर एवं हल्के हों। वे नुकीले न हों, मुख में न आ सकनेवाले तथा प्राणहरण न करनेवाले होनें चाहिएl

7 अन्नप्राशन संस्कार

जीवन में पहले पहल बालक को अन्न खिलाना इस संस्कार का उद्देश्य है। पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार छठे माह में अन्नप्राशन संस्कार होना चाहिए। कमजोर पाचन शिशु का सातवे माह जन्म दिवस पर कराए।
इसमें ईश्वर प्रार्थना उपासना पश्चात शिशु के प्राण-अपानादि श्वसन व्यवस्था तथा पंचेन्द्रिय परिशुद्धि भावना का उच्चारण करता घृतमय भात पकाना तथा इसी भात से यज्ञ करने का विधान है। इस यजन में माता-पिता तथा यजमान विश्व देवी प्रारूप की अवधारणा के साथ शिशु में वाज स्थापना (षक्तिकरण-ऊर्जाकरण) की भावना अभिव्यक्त करे। इसके पश्चात पुनः पंच श्वसन व्यवस्था तथा इन्द्रिय व्यवस्था की शुद्धि भावना पूर्वक भात से हवन करे। फिर शिशु को घृत, मधु, दही, सुगन्धि (अति बारीक पिसी इलायची आदि) मय भात रुचि अनुकूल सहजतापूर्वक खिलाए। इस संस्कार में अन्न के प्रति पकाने की सौम्य महक तथा हवन के एन्झाइम ग्रहण से क्रमषः संस्कारित अन्नभक्षण का अनुकूलन है।
माता के दूध से पहले पहल शिशु को अन्न पर लाना हो तो मां के दूध की जगह गाय का दूध देना चाहिए। इस दूध को देने के लिए 150 मि.ग्रा. गाय के दूध में 60 मि.ग्रा. उबला पानी व एक चम्मच मीठा ड़ालकर शिशु को पिला दें। यह क्रम एक सप्ताह तक चलाकर दूसरे सप्ताह एक बार की जगह दो बार बाहर का दूध दें। तीसरे सप्ताह दो बार की जगह तीन बार बाहर का दूध दें, चौथे सप्ताह दोपहर दूध के स्थान पर सब्जी का रसा, थोड़ा दही, थोड़ा शहद, थोड़ा चावल दें। पांचवें सप्ताह दो समय के दूध के स्थान पर रसा, सब्जी, दही, शहद आदि बढ़ा दें। इस प्रकार बालक को धीरे-धीरे माता का दूध छुड़ाकर अन्न पर ले आने से बच्चे के पेट में कोई रोग होने की सम्भावना नहीं रहती।
इस संस्कार पश्चात कालान्तर में दिवस-दिवस क्रमश: मूंगदाल, आलू, विभिन्न मौसमी सब्जियां, शकरकंद, गाजर, पालक, लौकी आदि (सभी भातवत अर्थात् अति पकी- गलने की सीमा तक पकी) द्वारा भी शिशु का आहार अनुकूलन करना चाहिए। इस प्रकार व्यापक अनुकूलित अन्न खिलाने से शिशु अपने जीवन में सुभक्षण का आदि होता है तथा स्वस्थता प्राप्त करता है। इस संस्कार के बाद शिशु मितभुक्, हितभुक्, ऋतभुक्, शृतभुक् होता है।

8 चूड़ाकर्म संस्कार

इसका अन्य नाम मुण्डन संस्कार भी है। रोगरहित उत्तम समृद्ध ब्रह्मगुणमय आयु तथा समृद्धि-भावना के कथन के साथ शिशु के प्रथम केशों के छेदन का विधान चूडाकर्म अर्थात् मुण्डन संस्कार है। यह जन्म से तीसरे वर्ष या एक वर्ष में करना चाहिए। बच्चे के दांत छः सात मास की आयु से निकलना प्रारम्भ होकर ढाई-तीन वर्ष तक की आयु तक निकलते रहते हैं।
दांत निकलते समय सिर भारी हो जाता है, गर्म रहता है, सिर में दर्द होता है, मसूड़े सूझ जाते हैं, लार बहा करती है, दस्त लग जाते हैं, आंखे आ जाती हैं, बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है। दांतों का भारी प्रभाव सिर पर पड़ता है। इसलिए सिर को हल्का और ठंडा रखने के लिए सिर पर बालों का बोझ उतार ड़ालना ही इस संस्कार का उदेश्य है।
बालों को उस्तरे से निकाल देने के निम्न कारण हैं- शिशु गर्भ में होता है तभी उसके बाल आ जाते हैं, उन मलिन बालों को निकाल देना, सिर की खुजली दाद आदि से रक्षा के लिए, सिर के भारी होने आदि से रक्षा के लिए तथा नए बाल आने में सहायक हों, इसलिए मुण्डन कराया जाता है।
इस संस्कार द्वारा बालक में त्र्यायुष भरने की भावना भरी जाती है। त्र्यायुष एक व्यापक विज्ञान है। अ) ज्ञान-कर्म-उपासना त्रिमय चार आश्रम त्र्यायुष हैं। ब) शुद्धि, बल और पराक्रम त्र्यायुष हैं। स) शरीर, आत्मा और समाज त्र्यायुष हैं। द) विद्या, धर्म, परोपकार त्र्यायुष हैं। ई) शरीर-मन-बुद्धि, धी-चित्त-अहंकार आदि अर्थात् आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक इन त्रिताप से रहित करके त्रिसमृद्धमय जीवन जीना त्र्यायु है।

9 कर्णवेध संस्कार

कान में छेद कर देना कर्णवेध संस्कार है। गृह्यसूत्रों के अनुसार यह संस्कार तीसरे या पांचवे वर्ष में कराना योग्य है। आयुवेद के ग्रन्थ सुश्रुत के अनुसार कान के बींधने से अन्त्रवृद्धि (हर्निया) की निवृत्ति होती है। दाईं ओर के अन्त्रवृद्धि को रोकने के लिए दाएं कान को तथा बाईं ओर के अन्त्रवृद्धि को रोकने के लिए बाएं कान को छेदा जाता है।
इस संस्कार में शरीर के संवेदनषील अंगों को अति स्पर्शन या वेधन (नुकीली चीज से दबाव) द्वारा जागृत करके थेलेमस तथा हाइपोथेलेमस ग्रन्थियों को स्वस्थ करते सारे शरीर के अंगों में वह परिपुष्टि भरी जाती है कि वे अंग भद्र ही भद्र ग्रहण हेतु सशक्त हों। बालिकाओं के लिए इसके अतिरिक्त नासिका का भी छेदन किया जाता है।
सुश्रुत में लिखा है- ”रक्षाभूषणनिमित्तं बालस्य कर्णौ विध्येते“ अर्थात् बालक के कान दो उदेश्य से बींधे जाते हैं। बालक की रक्षा तथा उसके कानों में आभूषण डाल देना। आजकल यह काम सुनार या कोई भी व्यक्ति जो इस काम में निपुण हो कर देता है। परन्तु सुश्रुत में लिखा है ”भिषक् वामहस्तेनाकृष्य कर्णं दैवकृते छिद्रे आदित्यकरावभास्विते शनैः शनैः ऋजु विद्धयेत्“- अर्थात् वैद्य अपने बाएं हाथ से कान को खींचकर देखे, जहां सूर्य की किरणें चमकें वहां-वहां दैवकृत छिद्र में धीरे-धीरे सीधे बींधे। इससे यह प्रतीत होता है कि कान को बींधने का काम ऐसे-वैसे का न होकर चिकित्सक का है। क्योंकि कान में किस जगह छिद्र किया जाय यह चिकित्सक ही जान सकता है।

10 उपनयन संस्कार

इस संस्कार में यज्ञोपवीत या जनेऊ धारण कराया जाता है। इसके धारण कराने का तात्पर्य यह है कि बालक अब पढ़ने के लायक हो गया है, और उसे आचार्य के पास विद्याध्ययन के लिए व्रत सूत्र में बांधना है। यज्ञोपवीत में तीन सूत्र होते हैं जो तीन ऋणों के सूचक हैं। ब्रह्मचर्य को धारण कर वेदविद्या के अध्ययन से ”ऋषिऋण“ चुकाना है। धर्मपूर्वक गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर सन्तानोत्पत्ति से ”पितृऋण“ और गृहस्थ का त्याग कर देष सेवा के लिए अपने को तैयार करके ”देवऋण“ चुकाना होता है। इन ऋणों को उतारने के लिए ही क्रमषः ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आश्रम की योजना वैदिक संस्कृति में की गई है।
बालक-बालिका के पढ़ने योग्य अर्थात् पांचवे से सातवे वर्ष तक यह संस्कार करना उचित है। इस संस्कार के पूर्व बालक को आर्थिक सुविधानुसार तीन दिवस तक दुग्धाहार, श्रीखंडाहार, दलियाहार, खिचड़ी-आहार इन में से किसी एक का चयन कर उसी का सेवन कराना चाहिए।
इस संस्कार में आचार्य की पुरोहितम् भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आचार्य हरहित चाहती सम्भ्रान्त महिलावत अर्थात् जलवत बच्चे की कल्याण की भावना से उसका यज्ञोपवीत कराए। आचार्य की भावना श्रेष्ठ ही श्रेष्ठ बच्चे को बनाने की होनी चाहिए। वह विभिन्न देव भावों से बालक के जीवन को भरने का संकल्प लेते यज्ञोपवीत संस्कार कराता है।
यज्ञोपवीत की महान् शर्त यह है कि आचार्य तथा बच्चा सम-हृदय, सम-चित्त, एकाग्र-मन, सम-अर्थ-सेवी हो। लेकिन इस सब में आचार्य आचार्य हो तथा शिष्य शिष्य हो। आचार्य परिष्कृत बचपन द्वारा बालक के सहज बचपन का परिष्कार करे। यह महत्वपूर्ण शर्त है। आचार्य बच्चे के विकास के विषय में सोचते समय अपनी बचपनी अवस्था का ध्यान अवश्य ही रखे। इस संस्कार के द्वारा आचार्य तथा बालक शिक्षा देने-लेने हेतु एक दूसरे का सम-वरण करते हैं। यह बिल्कुल उसी प्रकार होता है जैसे मां गर्भ में अपने शिशु का और शिशु अपनी मां का वरण करता है।

11 वेदारम्भ संस्कार

यह उपनयन के साथ-साथ ही किया जाता है। इस संस्कार को करके वेदाध्ययन प्रारम्भ किया जाता था। इसमें बालक में सुश्रव, सुश्रवा, सौश्रवस होने तथा इसके बाद यज्ञ की विधि फिर वेद की निधि पाने की भावना होती है। यह संस्कार महान् अस्तित्व पहचान संस्कार है। इसे संस्कारों का संस्कार कह सकते हैं। इस संस्कार द्वारा बालक में आयु, मेधा, वर्चस्, तेज, यश, समिध्यस्, ब्रह्मवर्चस्, अस्तित्व, संसाधन, त्व आदि भाव जागृत किए जाते हैं। इस संस्कार में मत कर निर्देश, दोष मार्जनम्, कर निर्देश हीनांगपूर्ति तथा भाव जागृति अतिषयाधान रूप में है।
ऊपर दिए अतिशयाधान के साथ-साथ अग्नि के दिव्यदा स्वरूपों से अनेक दिव्यों की आकांक्षा करते हैं। तथा हर बालक वाक्, प्राण, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, की इन्द्रियों की परिपूर्णता के साथ-साथ इनमें यष, बल भाव आभर होने के मन्त्र ओ3म् वाक् वाक् रूप में कहता है। फिर बालक आचार्य से सम्पूर्ण चेतना अस्तित्व एवं सावित्री तीन महाव्याहृति के निकटतम कर देने की आकांक्षा करता है। आचार्य बालक से विषिष्ट शाखा विधि से गायत्री मन्त्र का तीन पदों, तीन महाव्याहृतियों या सावित्री क्रम में निम्नलिखित अनुसार पाठ कराता है। प्रथम बार- ओ3म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्। द्वितीय बार- ओ3म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि। तृतीय बार- ओ3म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।।
यह पाठ धीरे-धीरे कराया जाता है। इसके पश्चात् निम्नलिखित रूप में उसका संक्षेप में अर्थ बताया जाता है। सम्पूर्ण अर्थ प्रक्रिया भी उपरोक्त त्रि टुकड़ों में सिखाने का नियम है।
ओ3म्:- ब्रह्म का श्रेष्ठ नाम इस के साथ हर नाम लग जाता है। भूः:- अस्तित्व का अस्तित्व- प्राण का प्राण। हीनांगपूर्त। भुवः:- सर्व दुःख निवारक- खराब इन्द्रियपन निवारक। दोष मार्जन। स्वः:- आनन्द दा। अतिषयाधान। सवितुः:- उत्पत्तिकर्ता, धारक, पालक, ऐश्वर्य दा। देवस्य:- सप्तर्षि- सप्त देव, सप्त ब्रह्मभाव का। प्रकाष के समान सातों का एक भाव। वरेण्यम्:- वरण करने योग्य।
तत्:- वह-यह-व्यापक तेज। धीमहि:- धारण से सिद्ध कर धी में उतारे, ध्यान सिद्ध करे। यः:- यह-वह परमात्मा। नः:- हमारी। धियः:- चित्तवृत्तियों को। प्रचोदयात्:- प्रकृष्ट गुण, कर्म, रक्त चयापचय स्व भाव में प्रेरित करे।
उपरोक्त शाखा विधि से त्रि पाठ तथा अर्थ एक महान् अध्ययन या स्मरण योजना है। इसके प्रारूप इस प्रकार हैं। (अ) मन्त्र या बीज का ज्ञान। (ब) क्षैतिज (समानान्तर) हॉरिझोण्टल अध्ययन। (स) ऊर्ध्व (वर्टिकल) अध्ययन। (द) तीर्यक् अध्ययन। (ई) आयतनिक अध्ययन।
इसके पश्चात् आचार्य बालक हेतु वस्त्र, संसाधन आदि की व्यवस्था करे। फिर उसे न करना, करना निर्देष पिता दे। न करना
दुष्ट-कर्म, अधर्म, दुराचार, असत्याचरण, अन्यायाचरण एवं हर्ष-षोकादि, आचार्य के अध्ार्माचरण एवं कथन, क्रोध, मिथ्याभाषण, अष्टमैथुन- स्त्री-ध्यान, कथा, स्पर्ष, क्रीड़ा, दर्शन, आलिंगन, एकान्तवास एवं समागम, गाना-बजाना-नृत्य (फिल्मी), गंध, अंजन सेवन, अतिस्नान, अतिभोजन, अतिनिद्रा, अतिजागरण, निन्दा, लोभ, मोह, भय, शोक, मांसभक्षण, शुष्क अन्न, धचकेदार सवारी, मर्दन, उबटन, अतितीखा, अतिखट्टा, अतिलवण एवं क्षारयुक्त भोजन, मान-सम्मान की आशा।करना
संध्या-उपासना, भोजन पूर्व आचमन, धर्मक्रिया, नित्य वेद को सांगोपांग पढ़ना, पुरुषार्थ करना, भूमि (दृढ़ आधारतल) पर शयन, रात्रि के चौथे प्रहर (ब्राह्म-मूहुर्त) जागरण, शौच, दन्तधावन, योगाभ्यास, ऊर्ध्वरेता बनना, युक्ताहार-विहारसेवी, विद्याग्राहिता, सुशीलता, अल्पभाषी, सभा के आचरण, अग्निहोत्र, अभिवादन, दस इन्द्रियों एवं ग्यारहवें मन को संयम में रखना, यम-सेवन पूर्वक नियमों का आचरण, सामाजिक-नैतिक-व्यक्तिगत नियमों का पालन, चतुर्वेदी बनना, न्याय-धर्माचरण सहित कर्म, श्रेष्ठाचार, श्रेष्ठ दान एवं सत्यधारण, न्यायाचरण।
इन निर्देषों के पश्चात् विद्यार्थी को चौदह विद्याओं जो कि बीज रूप हैं का क्रमबद्ध उत्तरोत्तर अभ्यास एक ही आचार्य द्वारा अपने आश्रम में रखकर करवाना चाहिए। इन विद्याओं के ग्रन्थ हैं-
(1) 6 अंग:- 1) षिक्षा, 2) कल्प, 3) व्याकरण, 4) निरुक्त, 5) छन्द, 6) ज्योतिष। आधार पुस्तकें- पाणिनि मुनिकृत अष्टाध्यायी तथा लिंगानुषासन, पतंजलि मुनिकृत महाभाष्य, यास्क मुनिकृत निघण्टु एवं निरुक्त, कात्यायन आदि मुनिकृत कोश, आप्त मुनिकृत त्रि-षब्दार्थ विधि, पिंगलाचार्यकृत छन्द ग्रन्थ, यास्कमुनिकृत काव्यालंकार सूत्र- वात्स्यायन मुनिकृत भाष्य, आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति, तात्पर्य और अन्वयार्थ सहित अंक गणित, वैदिक विदुरनीति तथा मनुस्मृति एवं वाल्मिकी रामायण।
(2) 6 उपांग:- आधार पुस्तकें- अ) जैमिनीकृत मीमांसा, ब) कणादकृत वैषेषिक, स) गौतमकृत न्याय, द) व्यासकृत वेदान्त, ई) पतंजलिकृत योग, फ) कपिलकृत सांख्य तथा इनसे अन्तर्सम्बन्धित दस उपनिषदें- ईश, कठ, केन, प्रष्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक।
(3) चार वेद:- आधार संहिता पुस्तकें- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। पठनविधि- इन संहिताओं में स्थित मन्त्रों को छन्द, स्वर, पदार्थ, अन्वय, भावार्थ क्रम से पढ़ना। इन वेदों के पढ़ने में सहायक ग्रन्थ हैं- आश्वलायनकृत श्रौत गृह्य तथा धर्म सूत्र। इन की शाखाएं हैं- ऐतरेय, शतपथ, ताण्ड्य, तथा गोपथ ब्राह्मण।
(4) चार उपवेद:- आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, अर्थवेद। आयुर्वेद में चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, भावप्रकाश निघण्टु, धनुर्वेद में अंगिराकृत लक्ष्यविद्या, गन्धर्ववेद में नारद संहितादि में स्वर, रागिणी, समय, वादित्र, ताल, मूर्छनादि का विवरण तथा अर्थवेद में विष्वकर्मा, त्वष्टा तथा मयकृत षिल्प के संहिता ग्रन्थों का समावेष है। इस के साथ भरतमुनिकृत नाट्य शास्त्र मिलाकर सम्पूर्ण सां

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