Hare Krishna Properties Vrindavan

Hare Krishna Properties Vrindavan Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Hare Krishna Properties Vrindavan, Real Estate, Vrindavan.

हे मेरे बाँकेबिहारी....!! क्या इस ग्रीष्म में बिन फूल बंगलो के बैठोगे मेरे प्राणाधार 😒कौन चुनेगा बागों से कलियां, कौन गु...
13/04/2025

हे मेरे बाँकेबिहारी....!!
क्या इस ग्रीष्म में बिन फूल बंगलो के बैठोगे मेरे प्राणाधार 😒
कौन चुनेगा बागों से कलियां, कौन गुंथेगा फूलों के हार?
कौन पुष्प बाग़ों से चुनकर बंगला तेरा सजाएगा?
कौन जो बरसाकर इत्र तुम्हें आसान पर बैठाएगा?
क्या फ़ब्बारों की शीतल बूँदें रोग के भय में शुष्क हो जाएँगी?
क्या दर्शन की प्यासी यह अँखियाँ घर में ही बहती रह जाएँगी?
बहुत हुई वियोग की अवधि अब तो दरस दिखाओ नाथ।
कोरोना मुक्त कर इस धरा को मुझे श्री धाम वृन्दावन बुलाओ नाथ

बांके बिहारी लाल की जय

आज से बिहारी जी के दर्शन का समय परिवर्तन हो गया हैं लोगो तक शेयर करें जय बिहारी जी की राधे राधे
16/03/2025

आज से बिहारी जी के दर्शन का समय परिवर्तन हो गया हैं लोगो तक शेयर करें
जय बिहारी जी की
राधे राधे

आप सभी को रंग भरनी एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं आमलकी (रंगभरी) एकादशी व्रत कथा: युधिष्ठिरने कहा- श्रीकृष्ण ! अब फाल्गुन ...
10/03/2025

आप सभी को रंग भरनी एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं

आमलकी (रंगभरी) एकादशी व्रत कथा: युधिष्ठिरने कहा- श्रीकृष्ण ! अब फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम और माहात्म्य बताने की कृपा कीजिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले - महाभाग धर्मनन्दन ! सुनो - तुम्हें इस समय वह प्रसङ्ग सुनाता हूं, जिसे राजा = मान्धाताके पूछनेपर महात्मा वसिष्ठ ने कहा था। फाल्गुन शुक्ल पक्ष को एकादशी का नाम 'आमलकी' है। इसका स पवित्र व्रत विष्णुलोककी प्राप्ति करानेवाला है।

मान्धाताने पूछा- द्विजश्रेष्ठ ! यह 'आमलकी' कब उत्पन्न हुई, मुझे बताइये ।

वसिष्ठजीने कहा- महाभाग ! सुनो - पृथ्वीपर आमलकी' की उत्पत्ति किस प्रकार हुई, यह बताता हूं।

आमलकी महान् वृक्ष है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। भगवान् विष्णुके थूकने पर उनके मुखसे चन्द्रमाके समान कान्तिमान् एक विन्दु प्रकट हुआ। वह विन्दु पृथ्वी पर गिरा । उसीसे आमलकी (आँवले) का महान् वृक्ष उत्पन्न हुआ। यह सभी वृक्षों का आदिभूत कहलाता है। इसी समय समस्त प्रजा को सृष्टि करनेके लिये भगवान्ने ब्रह्माजी को उत्पन्न किया। उन्हींसे इन प्रजाओं की सृष्टि हुई। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग तथा निर्मल अन्तःकरणवाले महर्षियोंको ब्रह्माजीने जन्म दिया । उनमें से देवता और ऋषि उस स्थानपर आये, जहाँ विष्णुप्रिया आमलकीका वृक्ष था। महाभाग ! उसे देखकर देवताओ को बड़ा विस्मय हुआ। वे एक-दूसरे पर दृष्टिपात करते हुए उत्कण्ठापूर्वक उस वृक्ष की ओर देखने लगे और खड़े-खड़े सोचने लगे कि प्रक्ष (पाकर) आदि वृक्ष तो पूर्व कल्पकी ही भांति हैं, जो सब-के-सब हमारे परिचित है, किन्तु इस वृक्षको हम नहीं जानते। उन्हें इस प्रकार चिन्ता करते देख आकाशवाणी हुई - 'महर्षियो ! यह सर्वश्रेष्ठ आमलकीका वृक्ष है, जो विष्णु को प्रिय है। इसके स्मरणमात्रसे गोदानका फल मिलता है। स्पर्श करने से इससे दूना और फल भक्षण करनेसे तिगुना पुण्य प्राप्त होता है। इसलिये सदा प्रयत्नपूर्वक आमलकीका - सेवन करना चाहिये। यह सब पापों को हरने वाला वैष्णव वृक्ष बताया गया है। इसके मूलमें विष्णु, उसके ऊपर ब्रह्मा, स्कन्धमें परमेश्वर भगवान् रुद्र, शास्त्राओंमें मुनि, टहनियोंमें देवता, पत्तोंमें वसु, फूलों में मरुद्रण तथा न फलोंमें समस्त प्रजापति वास करते हैं। आमलकी सर्वदेवमयी बतायी गयी है। अतः विष्णुभक्त पुरुषों के लिये यह परम पूज्य है।'

ऋषि बोले- [ अव्यक्त स्वरूपसे बोलनेवाले महापुरुष ! ] हमलोग आपको क्या समझें- आप कौन है ? देवता है या कोई और ? हमें ठीक-ठीक बताइये । आकाशवाणी हुई जो सम्पूर्ण भूतोंके कर्ता और समस्त भुवनोंके स्रष्टा है, जिन्हें विद्वान् पुरुष भी कठिनतासे देख पाते हैं, वही सनातन विष्णु मैं हूं।

देवाधिदेव भगवान् विष्णुका कथन सुनकर उन ब्रह्मकुमार महर्षियों के नेत्र आश्चर्य से चकित हो उठे। उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। वे आदि-अन्तरहित भगवान्की स्तुति करने लगे।

ऋषि बोले- सम्पूर्ण भूतोंके आत्मभूत, आत्मा एवं परमात्मा को नमस्कार है। अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले अच्युतको नित्य प्रणाम है। अन्तरहित परमेश्वरको बारम्बार प्रणाम है। दामोदर, कवि (सर्वज्ञ) और यज्ञेश्वरको नमस्कार है। मायापते ! आपको प्रणाम है। आप विश्वके स्वामी हैं; आपको नमस्कार है।

ऋषियों के इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् श्रीहरि संतुष्ट हुए और बोले - महर्षियो ! तुम्हें कौन-सा अभीष्ट वरदान हूं ?'
ऋषि बोले- भगवन्! यदि आप संतुष्ट हैं तो हमलोगोंके हितके लिये कोई ऐसा व्रत बतलाइये, जो स्वर्ग और मोक्षरूपी फल प्रदान करनेवाला हो।

श्रीविष्णु बोले - महर्षियो ! फाल्गुन शुक्लपक्षमें यदि पुष्य नक्षत्र से युक्त द्वादशी हो तो वह महान् पुण्य देने वाली और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली होती है। द्विजवरो ! उसमें जो विशेष कर्तव्य है, उसको सुनो। आमलकी एकादशीमें आँवले के वृक्षके पास जाकर वहां रात्रि में जागरण करना चाहिये। इससे मनुष्य सब पापों से छूट जाता और सहस्त्र गोदानों का फल प्राप्त करता है। विप्रगण ! यह व्रतोंमें उत्तम व्रत है, जिसे मैंने तुमलोगोंको बताया है।

ऋषि बोले - भगवन् ! इस व्रतकी विधि बतलाइये। यह कैसे पूर्ण होता है? इसके देवता, नमस्कार और मन्त्र कौन-से बताये गये हैं ? उस समय स्त्रान और दान कैसे किया जाता है ? पूजन की कौन-सी विधि है तथा उसके लिये मन्त्र क्या है ? इन सब बातों का यथार्थ रूप से वर्णन कीजिये ।

भगवान् विष्णु ने कहा-द्विजवरो ! इस व्रतको जो उत्तम विधि है, उसको श्रवण करो ! एकादशी को प्रातःकाल दन्तधावन करके यह सङ्कल्प करे कि 'हे पुण्डरीकाक्ष ! हे अच्युत ! मैं एकादशीको निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूंगा। आप मुझे शरणमें रखें।' ऐसा नियम लेने के बाद पतित, चोर, पाखण्डी, दुराचारी, मर्यादा भंग करनेवाले तथा गुरुपत्नीगामी, मनुष्यों से वार्तालाप न करे। अपने मनको वशमें रखते हुए नदीमें, पोखरेमें, कुएं पर अथवा घर में ही स्नान करे। स्नान के पहले शरीर में मिट्टी लगाये ।

मृत्तिका लगाने का मन्त्र अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे । मृत्तिके हर मे पापं जन्मकोट्यां समर्जितम् ॥ 'वसुन्धरे ! तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चला करतेहैं तथा वामन अवतारके समय भगवान् विष्णुने भो तुम्हें अपने पैरोंसे नापा था। मृत्तिके ! मैंने करोड़ों जन्मोंमें जो पाप किये है, मेरे उन सब पापोंको हर लो।'

खान-मन्त्र त्वं मातः सर्वभूतानां जीवनं तत्तु रक्षकम् । स्वेदजोद्धिज्जजातीनां रसानां पतये नमः ॥ स्त्रातोऽहं सर्वतीर्थेषु हृदप्रस्त्रवणेषु च। नदीषु देवखातेषु इदं स्त्रानं तु मे भवेत् ॥

जलकी अधिष्ठात्री देवी ! मातः ! तुम सम्पूर्ण भूतों के लिये जीवन हो। वही जीवन, जो स्वेदज और उद्धिज्ज जातिके जीवोंका भी रक्षक है। तुम रसोंकी स्वामिनी हो। तुम्हें नमस्कार है। आज मैं सम्पूर्ण तीर्थों, कुण्डों, झरनों, नदियों और देवसम्बन्धी सरोवरोंमें स्नान - कर चुका। मेरा यह स्नान उक्त सभी स्त्रानोंका फल देनेवाला हो ।'
विद्वान् पुरुष को चाहिये कि वह परशुरामजी को सोने की प्रतिमा बनवाये। प्रतिमा अपनी शक्ति और धन के अनुसार एक या आधे माशे सुवर्ण की होनी चाहिये। खान के पश्चात् घर आकर पूजा और हवन करे। इसके बाद सब प्रकार की सामग्री लेकर आँवले के वृक्षके पास जाय। वहां वृक्ष के चारों ओर की जमीन झाड़-बुहार, लीप-पोतकर शुद्ध करे। शुद्ध की हुई भूमि में मन्त्रपाठ- पूर्वक जलसे भरे हुए नवीन कलशकी स्थापना करे। कलश में पञ्चरत्र और दिव्य गन्ध आदि छोड़ दे। श्वेतचन्दन से उसको चर्चित करे। कण्ठमें फूलकी माला पहनाये। सब प्रकार के धूप की सुगन्ध फैलाये। जलते हुए दीपकों की श्रेणी सजाकर रखे। तात्पर्य यह कि सब ओर से सुन्दर एवं मनोहर दृश्य उपस्थित करें। पूजाके लिये नवीन छाता, जूता और वस्त्र भी मैगाकर रखे । कलशके ऊपर एक पात्र रखकर उसे दिव्य लाजों (खीलों) से भर दे। फिर उसके ऊपर सुवर्णमय परशुरामजी की स्थापना करे । 'विशोकाय नमः' कहकर उनके चरणों की, 'विश्वरूपिणे नमः' से दोनों घुटनोंकी, 'उग्राय नमः' से जांघों की, 'दामोदराय नमः' से कटिभाग की, 'पद्मनाभाय नमः' से उदरकी,
वसिष्ठजी कहते हैं- महाराज ! इतना कहकर देवेश्वर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् उन समस्त महर्षियोंने उक्त व्रतका पूर्णरूपसे पालन किया। नृपश्रेष्ठ ! इसी प्रकार तुम्हें भी इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये ।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- युधिष्ठिर ! यह दुर्धर्ष व्रत मनुष्यको सब पापों से मुक्त करनेवाला है।

।।श्री राधा ।।बहुत ही सुन्दर पद सखी ललितकिशोरी जू को***********†***********************कुंज कुंज रंग श्री बन आली पिचकरिन...
28/02/2025

।।श्री राधा ।।
बहुत ही सुन्दर पद सखी ललितकिशोरी जू को
***********†***********************
कुंज कुंज रंग श्री बन आली पिचकरिन बोछारन बरसै।
उमड़ गुलाल घुमड़ बादर मैं झलक अबीर सरस रंग सरसै।
अवला चमक चमक चपला सी विलसै तन घनश्याम सुन्दर सै।
ललितकिशोरी मारी मारि मन होरी मैं अब कंबलों तरसैं।।

भावार्थ
सखि ललित किशोरी जू कह रहे हैं अरि सखि देख तो सही या ब्रज के सब कुन्ज लताओं में पिचकारी चल रहीं हैं बादलों में गुलाल की झलक है ओर एक अचम्भे की बात है कि ये बिजली हमारे घनश्याम में से ऐसी चमक रही है जैसे आकाश के जो श्याम घन
।।।। आसमान के काले बादल।।।। में से बिजली चमकती है ऐसे ही हमारे घनश्याम के मुख से चमकती भई लग रही है अरी चलो अब लज्जा छोड़ के श्याम सुन्दर से होरी खेलने चलती है कब तक हम अपने मन को मारेंगी
जय जय श्री राधारमण हरी बोल

Address

Vrindavan
281121

Telephone

+91 70781 11000

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Hare Krishna Properties Vrindavan posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Hare Krishna Properties Vrindavan:

Share

Category